भाई होली की छुट्टी पर घर आया था। – News

भाई होली की छुट्टी पर घर आया था।

भाई होली की छुट्टी पर घर आया था।

भाई की होली की छुट्टी और ख़ौफ़नाक हक़ीक़त

राजस्थान के एक प्रतिष्ठित परिवार की वास्तविक घटना पर आधारित विस्तृत एवं झकझोर देने वाली कहानी

अध्याय 1: राजस्थान का समृद्ध परिवार और बचपन की छाँव

राजस्थान अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, भव्य हवेलियों और सुनहरे रेतीले धोरों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इसी ऐतिहासिक प्रदेश के एक छोटे किंतु साधन-संपन्न कस्बे में रामस्वरूप जी का एक खुशहाल और संयुक्त परिवार रहता था। रामस्वरूप जी और उनके छोटे भाई किशनचंद जी के बीच सगे भाइयों से भी बढ़कर प्रेम था। दोनों भाइयों ने मिलकर पास के मुख्य बाज़ार में कपड़ों का एक बहुत बड़ा और भव्य शो-रूम खोल रखा था।

उनकी दुकान पर दिन-भर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। सूती साड़ियों से लेकर आधुनिक परिधानों तक का व्यापार बहुत शानदार चलता था। आर्थिक रूप से परिवार में किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। घर में पक्के विशाल कमरे, बड़ा सा आँगन, गाड़ियों की सुविधा और तमाम आधुनिक सुख-साधन मौजूद थे। कस्बे के लोग इस परिवार की एकजुटता और संपन्नता की मिसाल दिया करते थे।

वर्ष 2002-2003 के आसपास रामस्वरूप जी के घर एक बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया—ऋषि। ऋषि अपने माता-पिता की इकलौती और लाडली संतान था। ऋषि के जन्म के लगभग दो-तीन साल बाद उसके छोटे चाचा किशनचंद जी और चाची के घर भी एक प्यारी सी बच्ची ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया—सुनीता।

ऋषि और सुनीता भले ही चचेरे भाई-बहन थे, लेकिन उनके बीच का रिश्ता सगे भाई-बहन से भी अधिक गहरा और आत्मीय था। बचपन से ही दोनों एक साथ खेलते, एक ही प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाते और शाम को आँगन में एक साथ बैठकर पढ़ाई करते थे।

ऋषि जब भी बाज़ार से कोई खिलौना या टॉफ़ी लाता, तो सबसे पहला हिस्सा अपनी छोटी बहन सुनीता को ही देता था। वहीं सुनीता भी अपने बड़े भाई ऋषि की छोटी से छोटी बात का ध्यान रखती थी। ऋषि के स्कूल का बस्ता सँभालना, उसके जूते व्यवस्थित रखना और खेल-खेल में उससे मिठाइयाँ माँगना सुनीता का पसंदीदा काम था।

परिवार के सभी बड़े-बुजुर्ग—रामस्वरूप जी, उनकी पत्नी, किशनचंद जी और उनकी पत्नी—इन दोनों बच्चों के इस अटूट स्नेह को देखकर निहाल हो जाते थे। आँगन में जब ऋषि और सुनीता की हँसी गूंजती, तो पूरे घर की थकावट मिट जाती थी। उस समय किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि बचपन का यह निश्छल और पवित्र रिश्ता भविष्य में वासना और /अधर्म/ के एक ऐसे भयानक भंवर में डूब जाएगा कि पूरा परिवार श्मशान में बदल जाएगा।

अध्याय 2: कार दुर्घटना की काली भोर और अनाथ सुनीता

समय पंख लगाकर उड़ता रहा। ऋषि धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था और सुनीता भी अब एक समझदार बालिका के रूप में ढल रही थी। वर्ष 2015 के आसपास जब ऋषि की उम्र लगभग 15 वर्ष हो चुकी थी और सुनीता लगभग 12-13 वर्ष की एक नादान और मासूम बच्ची थी, तब इस हँसते-खेलते परिवार पर दुखों का एक ऐसा पहाड़ टूटा जिसने उनकी खुशियों को तहस-नहस कर दिया।

वह गर्मियों की एक मनहूस सुबह थी। सुनीता के माता-पिता—किशनचंद जी और उनकी पत्नी—अपने एक करीबी रिश्तेदार के यहाँ मांगलिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पास के शहर जा रहे थे। उन्होंने सुनीता को अपनी जेठानी (बड़ी मम्मी) के पास छोड़ दिया, क्योंकि सुनीता की परीक्षा सिर पर थी और उसे घर रहकर पढ़ाई करनी थी।

सुबह के लगभग छह बजे किशनचंद जी अपनी कार लेकर घर से निकले। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। घर से महज़ बीस किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग पर मोड़ काटते समय सामने से आ रहे एक अनियंत्रित तेज़ रफ़्तार ट्रक ने उनकी कार को ज़ोरदार टक्कर मार दी।

टक्कर इतनी भयावह थी कि कार के परखच्चे उड़ गए। दुर्घटना स्थल पर चीख-पुकार मच गई। राहगीरों ने तुरंत पुलिस और एम्बुलेंस को सूचना दी, लेकिन इससे पहले कि दोनों को अस्पताल पहुँचाया जाता, अत्यधिक रक्तस्राव और गंभीर चोटों के कारण किशनचंद जी और उनकी पत्नी ने दम तोड़ दिया।

जब यह दर्दनाक खबर रामस्वरूप जी के घर पहुँची, तो मानो घर की छत ढह गई। रामस्वरूप जी बदहवास होकर अस्पताल की ओर भागे, जबकि घर पर चीत्कार मच गया। 12 साल की मासूम सुनीता को तो समझ ही नहीं आ रहा था कि अचानक चारों तरफ रोना-धोना क्यों मचा है। जब अपने माता-पिता के पार्थिव शरीर घर के आँगन में तिरपाल पर रखे देखे, तो सुनीता पछाड़ खाकर गिर पड़ी।

उस काली भोर ने सुनीता के सिर से उसके जन्मदाता माता-पिता का साया हमेशा के लिए छीन लिया था।

मातम के उस कठिन दौर में रामस्वरूप जी और उनकी पत्नी ने अपनी रोती-बिलखती भतीजी सुनीता को अपने सीने से लगा लिया। रामस्वरूप जी ने रोते हुए ईश्वर की कसम खाई कि वे कभी सुनीता को यह अहसास नहीं होने देंगे कि वह अनाथ है। उन्होंने सुनीता की परवरिश अपनी सगी बेटी की तरह करने का संकल्प लिया।

ऋषि ने भी अपनी छोटी बहन सुनीता का हाथ थामा और उससे वादा किया, “सुनीता, तू बिल्कुल मत रो। तेरे मम्मी-पापा भले चले गए हों, लेकिन तेरा यह भाई ऋषि हमेशा तेरे साथ खड़ा रहेगा। तुझे दुनिया की हर खुशी दूँगा।”

उस हादसे के बाद सुनीता पूरी तरह अपने बड़े पापा, बड़ी मम्मी और भाई ऋषि पर आश्रित हो गई। रामस्वरूप जी ने अपने भाई के हिस्से का व्यापार भी सँभाला और सुनीता के नाम पर बड़ी-बड़ी बैंक एफडी करवा दीं ताकि उसके भविष्य में कोई रुकावट न आए।

अध्याय 3: दिल्ली का प्रवास और फासले का दौर

माता-पिता के जाने के सदमे से बाहर निकलने में सुनीता को दो-तीन साल का लंबा समय लग गया। इस दौरान ऋषि ने अपनी 12वीं की पढ़ाई पूरी कर ली। ऋषि बचपन से ही पढ़ने में होनहार था। उसके पिता रामस्वरूप जी का सपना था कि उनका बेटा केवल दुकानदारी तक सीमित न रहे, बल्कि पढ़-लिखकर केंद्र सरकार में एक उच्च पद पर आसीन हो।

वर्ष 2023 में ऋषि ने स्नातक की पढ़ाई पूरी की और प्रतियोगिता परीक्षाओं—विशेष रूप से संघ लोक सेवा आयोग और कर्मचारी चयन आयोग की तैयारियों के लिए दिल्ली जाने का फैसला किया। दिल्ली के मुखर्जी नगर में उसने एक हॉस्टल में कमरा लिया और एक नामी कोचिंग संस्थान में दाखिला ले लिया।

ऋषि के दिल्ली चले जाने से सुनीता घर पर अकेली पड़ गई। अब सुनीता भी कस्बे के कन्या महाविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई कर रही थी। हालाँकि ऋषि दिल्ली में अपनी तैयारियों में बहुत व्यस्त रहता था, फिर भी वह अपनी बहन सुनीता को रोज़ शाम को फोन करना नहीं भूलता था।

दोनों भाई-बहन घंटों फोन पर बातें करते थे। सुनीता उसे घर की छोटी-मोटी खबरें सुनाती—कस्बे में क्या हुआ, कॉलेज में क्या पढ़ाई हुई, और बड़ी मम्मी ने आज खाने में क्या बनाया। ऋषि भी अपनी दिल्ली की दिनचर्या, कोचिंग के टेस्ट और हॉस्टल के किस्से अपनी बहन से साझा करता था।

ऋषि साल में केवल दो या तीन बार ही घर आ पाता था—कभी दिवाली पर तो कभी गर्मियों की छुट्टियों में। जब भी ऋषि दिल्ली से घर आता, सुनीता उसके स्वागत के लिए पलकें बिछाए रहती थी। वह ऋषि के पसंदीदा पकवान बनाती और उसके लिए कमरे की साफ़-सफ़ाई करती।

लेकिन दिल्ली जैसे महानगरीय माहौल में रहते हुए ऋषि के विचारों और व्यक्तित्व में धीरे-धीरे एक विकृत बदलाव आने लगा था। इंटरनेट, अश्लील सामग्री का बढ़ता प्रभाव और अकेलेपन के कारण ऋषि की मानसिकता दूषित होने लगी थी। जो रिश्ता बचपन में निश्छल, पवित्र और सम्मान से भरा था, ऋषि की आँखों में उस रिश्ते का स्वरूप वासना की परत चढ़ने से धुँधला होने लगा था। वह जब भी फोन पर सुनीता की खिलखिलाती आवाज़ सुनता, तो उसके मन में /अनुचित/ और /कामुक/ विचार कौंधने लगते। हालाँकि वह अपनी इस /गंदी-नीयत/ को सुनीता के सामने प्रकट नहीं होने देता था और सही मौके की तलाश में था।

अध्याय 4: 1 मार्च 2026: होली का फ़ोन और भाई की शर्त

समय बीतता गया और नया साल 2026 आ गया। मार्च का महीना शुरू हो चुका था और फ़िज़ाओं में होली के त्योहार की रंगत घुलने लगी थी। चारों तरफ गुलाल और गीतों की गूंज सुनाई देने लगी थी।

तारीख थी 1 मार्च 2026। सुबह के लगभग 9:00 बज रहे थे। दिल्ली के मुखर्जी नगर वाले हॉस्टल में ऋषि अपनी मेज़ पर बैठा किताबें पलट रहा था। तभी उसके मोबाइल स्क्रीन पर सुनीता का फ़ोन जगमगाने लगा।

ऋषि ने फ़ोन उठाया और मुस्कराते हुए कहा, “हाँ सुनीता, बोल! सुबह-सुबह भाई की याद कैसे आ गई?”

दूसरी तरफ से सुनीता की चहकती हुई आवाज़ आई, “भाई! होली का त्योहार बस हफ़्ते भर दूर है। पूरा कस्बा रंगों से सज चुका है। आप इस बार होली पर घर कब आ रहे हो? कॉलेज में छुट्टियाँ भी होने वाली हैं।”

ऋषि ने थोड़ा नखरा दिखाते हुए कहा, “अरे सुनीता, इस बार पढ़ाई का बहुत प्रेशर है। दिल्ली में मेरी कोचिंग के टेस्ट सीरीज़ चल रहे हैं। सोच रहा हूँ इस बार होली पर यहीं रुक जाऊँ।”

यह सुनते ही सुनीता का मुँह उतर गया। वह ज़िद करते हुए बोली, “नहीं भाई! आप ऐसा नहीं कर सकते। पिछले तीन सालों से आप हर होली पर घर आए हो। इस बार अगर आप नहीं आए तो मैं किसी के साथ होली नहीं खेलूँगी और न ही खाना खाऊँगी। आपको आना ही पड़ेगा!”

ऋषि मन ही मन इसी पल का इंतज़ार कर रहा था। उसके दिमाग में एक /खौफ़नाक/ और /घिनौना/ षड्यंत्र आकार ले रहा था। उसने हँसने का नाटक करते हुए कहा, “अच्छा बाबा, ठीक है! रो मत। मैं आज तो नहीं आ पाऊँगा, लेकिन हाँ, एक-दो दिन के अंदर यानी 3 या 4 मार्च तक घर ज़रूर पहुँच जाऊँगा।”

सुनीता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह बोली, “सच्ची भाई? आप आ रहे हो ना? अच्छा भाई, जब आप दिल्ली से आओगे तो मेरे लिए वहाँ के बड़े बाज़ार से सुंदर-सुंदर नए सूट और पश्चिमी परिधान (कपड़े) ज़रूर लेकर आना। यहाँ कस्बे में वैसे ट्रेंडिंग कपड़े नहीं मिलते।”

ऋषि की आवाज़ में एक अजीब सा खिंचाव और धीमापन आ गया। उसने कहा, “ठीक है सुनीता, मैं तेरे लिए दिल्ली से जितने कहेगी उतने ढेरों कपड़े ले आऊँगा। लेकिन याद रखना, मेरी एक शर्त है।”

सुनीता ने नादानी में पूछा, “कैसी शर्त भाई?”

ऋषि ने चालाकी से अपने शब्दों को मोड़ते हुए कहा, “शर्त यह है कि अगर मैं तेरे लिए ढेरों महँगे उपहार और कपड़े लाऊँगा, तो घर आने के बाद तुझे भी मुझे मेरी पसंद का एक विशेष ‘गिफ़्ट’ देना पड़ेगा। बोल, मंज़ूर है?”

19-20 साल की सुनीता अपने भाई के इस छलावे और छिपे हुए /गंदे/ अर्थ को ज़रा भी नहीं समझ पाई। उसे लगा कि भाई शायद किसी महँगी घड़ी, किसी पसंदीदा मिठाई या घर के बने किसी विशेष व्यंजन की माँग कर रहा होगा।

सुनीता ने सहजता और नादानी में हँसते हुए कहा, “हाँ-हाँ भाई! आप बस कपड़े ले आओ, आप जो भी गिफ़्ट माँगोगे, मैं आपको ज़रूर दूँगी। अब आप जल्दी से आ जाओ!”

ऋषि ने फ़ोन काट दिया। फ़ोन काटने के बाद ऋषि की आँखों में एक क्रूर और /वासनापूर्ण/ चमक तैर गई। उसने मन ही मन सोचा कि इस बार होली पर वह अपनी बहन से कौन सा गिफ़्ट वसूलने वाला है।

अध्याय 5: 3 मार्च 2026: दिल्ली से वापसी और उपहारों का अंबार

1 मार्च की उस बातचीत के बाद ऋषि ने अपनी पैकिंग शुरू कर दी। उसने दिल्ली के करोल बाग और प्रसिद्ध बाज़ारों से सुनीता के लिए महँगे सूट, डिज़ाइनर साड़ियाँ, आधुनिक परिधान और कई प्रकार के कॉस्मेटिक्स खरीदे।

तारीख आ पहुँची 3 मार्च 2026

ऋषि दिल्ली से अंतरराज्यीय बस में सवार होकर दोपहर के लगभग 2:00 बजे अपने कस्बे पहुँच गया। जैसे ही ऋषि ने घर के मुख्य दरवाज़े पर कदम रखा, सुनीता दौड़ती हुई आई और उसने अपने भाई के पैर छूकर उसे गले से लगा लिया।

“भाई! आप आ गए! मैं कब से आपका इंतज़ार कर रही थी,” सुनीता चहकते हुए बोली।

रामस्वरूप जी और उनकी पत्नी भी अपने बेटे को देखकर बेहद खुश हुए। माँ ने ऋषि की नज़र उतारी और उसके लिए ठंडा पानी लेकर आई।

ऋषि के पास दो बड़े-बड़े बैग थे। उसने कमरे में जाकर दोनों बैग खोले और सुनीता के सामने उपहारों का ढेर लगा दिया। चमचमाते हुए नए कपड़े, महँगी ड्रेसेस और सौंदर्य प्रसाधन देखकर सुनीता की आँखें फटी की फटी रह गईं।

“अरे वाह भाई! आप तो सच में बहुत सारे कपड़े ले आए! यह सूट तो बहुत ही प्यारा है,” सुनीता ख़ुशी से झूमते हुए अपने कपड़े समेटने लगी।

ऋषि सफ़र की थकावट का बहाना बनाते हुए अपने बिस्तर पर लेट गया। उसने सुनीता से कहा, “सुनीता, मैं दिल्ली से रात भर का सफ़र करके आया हूँ, मेरा शरीर टूट रहा है। अभी मैं आराम करूँगा।”

सुनीता ने कहा, “हाँ भाई, आप आराम करो। मैं आपके लिए चाय बना देती हूँ।”

उस दिन ऋषि बेहद थका हुआ था, इसलिए उसने सुनीता से उस शर्त या गिफ़्ट के बारे में कोई बात नहीं की। अगला पूरा दिन यानी 4 मार्च 2026 भी यूँ ही सामान्य रूप से बीत गया। ऋषि अपने दोस्तों से मिलने बाज़ार चला गया और शाम को परिवार के साथ बिताई। लेकिन ऋषि की निगाहें लगातार सुनीता के चेहरे और शरीर पर टिकी हुई थीं। वह बस उस मौके की तलाश में था जब घर में कोई न हो।

अध्याय 6: 5 मार्च 2026: सूना मकान और ऋषि की घिनौनी माँग

नियति का चक्र बड़ी तेज़ी से घूम रहा था। तारीख आई 5 मार्च 2026

सुबह के लगभग 10:00 बज रहे थे। रामस्वरूप जी को अपने कपड़ों के शो-रूम पर एक बड़े सप्लायर से माल डिलीवरी के सिलसिले में जाना पड़ा। उनकी पत्नी (बड़ी मम्मी) को कस्बे के मंदिर में आयोजित धार्मिक कीर्तन और महिला समिति की बैठक में जाना था।

घर के बड़े-बुजुर्ग दोपहर तक वापस न लौटने की बात कहकर घर से निकल गए। अब विशालकाय मकान में केवल दो ही लोग मौजूद थे—ऋषि और उसकी चचेरी बहन सुनीता।

सुनीता रसोई में दोपहर के खाने की तैयारी कर रही थी और बर्तन साफ़ कर रही थी।

ऋषि ने जब देखा कि मुख्य दरवाज़ा बंद है, माता-पिता बाहर जा चुके हैं और घर में सन्नाटा पसरा हुआ है, तो उसके भीतर का शैतान जाग उठा। उसकी आँखों में /वासना/ और /हवस/ का नशा छा गया।

ऋषि अपने कमरे से निकला और दबे पाँव रसोई के पास पहुँचा। सुनीता उस समय अपने नए कपड़ों को समेटकर अपने कमरे में रखने जा रही थी। ऋषि को अपने सामने खड़ा देखकर सुनीता मुस्कुराई और बोली:

“भाई! आप जाग गए? मैं आपके लिए नाश्ता गरम कर दूँ?”

ऋषि ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने आगे बढ़कर सुनीता का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने कमरे की तरफ खींचने लगा।

सुनीता हैरान होकर बोली, “अरे भाई! क्या कर रहे हो? हाथ क्यों पकड़ रहे हो?”

ऋषि सुनीता को अपने कमरे के भीतर ले गया और पीछे से भारी लकड़ी के दरवाज़े की कुंडी लगा दी।

कमरे में सन्नाटा छा गया। सुनीता घबरा गई और पीछे हटते हुए बोली, “भाई! आपने कुंडी क्यों लगा दी? क्या बात है?”

ऋषि ने अपने चेहरे पर एक विकृत और कामुक मुस्कान लाते हुए कहा, “सुनीता! तू भूल गई क्या? 1 मार्च को फ़ोन पर तूने मुझसे वादा किया था। मैंने तुझे दिल्ली से ढेरों कपड़े और महँगे गिफ़्ट दिए हैं। अब मेरी शर्त पूरी करने का समय आ गया है। मुझे मेरा गिफ़्ट चाहिए!”

सुनीता ने मासूमियत से कहा, “हाँ भाई, मैं कहाँ मना कर रही हूँ? बताओ ना आपको क्या चाहिए? आपकी पसंदीदा घड़ी ला दूँ या आपकी पसंदीदा मिठाई बना दूँ?”

ऋषि ने सुनीता के बिल्कुल करीब आकर, उसकी आँखों में घूरते हुए बेहद /नंगे/ और /अमर्यादित/ शब्दों में कहा:

“मुझे कोई घड़ी या मिठाई नहीं चाहिए सुनीता! मुझे तू चाहिए। मेरा गिफ़्ट यह है कि तुझे आज मेरे साथ इस बिस्तर पर सोना पड़ेगा और मेरे साथ /अवैध-शारीरिक-संबंध/ बनाने पड़ेंगे!”

अध्याय 7: कमरे का ख़ौफ़नाक मंज़र और सुनीता की बेबसी

ऋषि के मुँह से निकले इन /घिनौने/ और /अधार्मिक/ शब्दों को सुनते ही सुनीता के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई! उसके चेहरे का रंग पीला पड़ गया। उसे अपनी कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही भाई है जिसने बचपन में उसकी रक्षा करने का वादा किया था और जिसके साथ उसने अपना पूरा बचपन बिताया था।

सुनीता रोते हुए काँपती आवाज़ में बोली, “भाई! यह आप क्या कह रहे हैं? आपका दिमागी संतुलन बिगड़ गया है क्या? मैं आपकी सगी बहन जैसी हूँ! हमने एक साथ बचपन बिताया है! आप ऐसा /पाप/ और /अधर्म/ करने की सोच भी कैसे सकते हैं?”

ऋषि पर /हवस/ का भूत सवार हो चुका था। उस पर किसी रिश्ते, मर्यादा या धर्म का कोई असर नहीं हो रहा था। उसने कड़े लहजे में कहा:

“मुझे नीति-अनीति का पाठ मत पढ़ा सुनीता! तूने फ़ोन पर वादा किया था। अगर तूने मेरी बात नहीं मानी, तो मैं तुझे जान से मार दूँगा और तेरी सारी निजी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल कर दूँगा! वैसे भी इस घर में अब तेरे माँ-बाप नहीं हैं, तू हमारे टुकड़ों पर पलती है!”

ऋषि के यह तीखे और क्रूर शब्द सुनीता के कलेजे में तीर की तरह चुभ गए। अपने मृत माता-पिता का अपमान और भाई का यह /राक्षसी/ रूप देखकर सुनीता की आत्मा काँप उठी।

सुनीता ने दरवाज़े की तरफ भागने की कोशिश की, लेकिन बलशाली ऋषि ने झपट्टा मारकर सुनीता के बाल पकड़ लिए और उसे ज़ोर से बिस्तर पर पटक दिया।

“छोड़ो मुझे! बचाओ! बड़े पापा!” सुनीता चीखने-चिल्लाने लगी।

लेकिन ऋषि ने बिना कोई दया दिखाए सुनीता के मुँह पर तकिया रख दिया ताकि उसकी आवाज़ बाहर न जा सके।

उस बंद कमरे में ऋषि ने अपनी ही चचेरी बहन की लाचारी, अनाथपन और बेबसी का फ़ायदा उठाते हुए मर्यादा की सारी सीमाएँ तार-तार कर दीं। सुनीता गिड़गिड़ाती रही, रोती रही, अपने मृत माता-पिता की दुहाई देती रही, लेकिन ऋषि नाम के उस हैवान ने उसके साथ ज़बरदस्ती /अवैध-शारीरिक-शोषण/ और /दुराचार/ किया।

लगभग आधे घंटे तक उस कमरे में /हवस/ का यह घिनौना खेल चलता रहा। जब ऋषि का काम पूरा हो गया, तो उसने अपने कपड़े सँभाले और बिस्तर से उठकर खड़ा हो गया।

सुनीता बिस्तर के कोने में सिमटी हुई, फटे कपड़ों में फूट-फूटकर रो रही थी। उसकी आँखें लाल थीं और शरीर दर्द से टूट रहा था।

ऋषि ने सुनीता की तरफ उँगली उठाकर धमकी भरे लहजे में कहा, “सुनीता! अगर तूने इस बारे में किसी को—बड़े पापा या बड़ी मम्मी को एक शब्द भी बताया, तो याद रखना मैं तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा और पूरे समाज में तुझे बदनाम कर दूँगा!”

इसके बाद ऋषि ने कमरे की कुंडी खोली और ऐसे बाहर निकल गया जैसे कुछ हुआ ही न हो।

अध्याय 8: घुटन का दौर और सुनीता का मानसिक अवसाद

5 मार्च की उस काली दोपहर के बाद सुनीता की दुनिया पूरी तरह उजड़ चुकी थी। जिस भाई को वह अपना रक्षक मानती थी, वही उसका सबसे बड़ा भक्षक बन चुका था।

सुनीता अपने कमरे में बंद हो गई। उसने दिन-रात रो-रोकर गुज़ार दिए। न उसने खाना खाया और न ही किसी से बात की। जब शाम को उसकी बड़ी मम्मी (रामस्वरूप जी की पत्नी) मंदिर से वापस आईं, तो उन्होंने सुनीता की हालत देखी।

सुनीता की आँखें सूजी हुई थीं और वह बदहवास लग रही थी। बड़ी मम्मी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखकर पूछा, “क्या हुआ बेटा सुनीता? तेरी तबीयत खराब है क्या? तू रो क्यों रही है?”

सुनीता के मन में आया कि वह चीख-चीखकर अपनी बड़ी मम्मी को ऋषि की /करतूत/ बता दे। लेकिन ऋषि की दी हुई जान से मारने की धमकी, समाज में बदनामी का डर और अपने बड़े पापा का दिल टूटने के ख़ौफ़ ने उसके मुँह पर ताला लगा दिया।

सुनीता ने रोते हुए झूठा बहाना बनाया, “नहीं बड़ी मम्मी… बस मुझे अपने मम्मी-पापा की बहुत याद आ रही थी… सिर में बहुत तेज दर्द है।”

बड़ी मम्मी ने उसे दिलासा दिया, उसे दवाई दी और सोने को कहा।

उधर ऋषि के हौसले और बुलंद हो चुके थे। उसे लगा कि सुनीता डर गई है और वह कभी किसी से शिकायत नहीं करेगी। अगले दो दिनों—6 मार्च और 7 मार्च को भी ऋषि ने घर में अकेले मिलने पर सुनीता को दबाने और दोबारा /अवैध-संबंध/ बनाने के लिए डराने-धमकाने की कोशिश की।

सुनीता अब पूरी तरह मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) में जा चुकी थी। उसके मन में आत्महत्या करने के विचार आने लगे। वह सोचने लगी कि ऐसे /कलंकित/ जीवन को जीने से अच्छा है कि वह अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ले। लेकिन फिर उसे लगा कि अगर वह मर गई, तो उसके /गुन्हेगार/ भाई को उसकी सज़ा कभी नहीं मिलेगी।

अध्याय 9: होली का दिन, रंगे हाथों पकड़े जाना और सच की चीख

दिन बीतते गए और होली का मुख्य त्योहार यानी 8 मार्च 2026 का दिन आ पहुँचा। पूरे कस्बे में ढोल-नगाड़ों की गूँज थी, लोग एक-दूसरे को गुलाल लगा रहे थे और खुशियाँ मना रहे थे।

रामस्वरूप जी के घर में भी सुबह से चहल-पहल थी। रिश्तेदार और पड़ोस के लोग बधाई देने आ रहे थे। दोपहर के लगभग 1:30 बजे, मेहमानों के जाने के बाद रामस्वरूप जी और उनकी पत्नी पड़ोस में होली की बधाई देने चले गए।

घर में एक बार फिर सन्नाटा छा गया।

ऋषि जो पिछले दो दिनों से मौके की तलाश में था, उसने देखा कि माता-पिता बाहर गए हैं। वह सीधे सुनीता के कमरे में घुस गया। सुनीता उस समय अपनी अलमारी साफ़ कर रही थी।

ऋषि ने अंदर आते ही दरवाज़ा बंद कर लिया और सुनीता को बाहों में भरने की कोशिश करने लगा।

“छोड़ो मुझे ऋषि! आज होली का पवित्र दिन है, कुछ तो शर्म करो!” सुनीता ने धक्का देते हुए चीखकर कहा।

ऋषि ने उसकी गर्दन दबोच ली और फुसफुसाते हुए बोला, “चुप रह! आज फिर होली का असली रंग हम दोनों मनाएँगे, चुपचाप शांत हो जा!”

ऋषि ने सुनीता को ज़बरदस्ती बिस्तर पर ढकेल दिया और उसके साथ फिर से /अमर्यादित-कृत्य/ करने की कोशिश करने लगा। सुनीता अपनी पूरी ताकत से संघर्ष कर रही थी, उसके कपड़े फट चुके थे और वह चीख रही थी।

लेकिन इस बार पापी का घड़ा भर चुका था!

संयोग से, रामस्वरूप जी पड़ोस में अपना मोबाइल फोन भूल आए थे, इसलिए वे महज़ दस मिनट के भीतर ही वापस घर लौट आए। जब रामस्वरूप जी ने घर का मुख्य दरवाज़ा खुला देखा और अंदर आए, तो उन्हें अपने बेटे ऋषि के कमरे से सुनीता की रोने और बचाओ-बचाओ की चीखें सुनाई दीं।

रामस्वरूप जी का दिल धड़क उठा। वे दौड़कर कमरे के पास पहुँचे और दरवाज़े को ज़ोर से धक्का दिया। दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।

जब रामस्वरूप जी ने अंदर का मंज़र देखा, तो उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया! उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई!

उनका सगा बेटा ऋषि उनकी अनाथ भतीजी सुनीता के ऊपर चढ़ा हुआ था, सुनीता के कपड़े फटे हुए थे और वह रो-रोकर गिड़गिड़ा रही थी।

रामस्वरूप जी का खून खौल उठा। उन्होंने आगे बढ़कर ऋषि की कॉलर पकड़ी और उसे एक ज़ोरदार तमाचा जड़कर ज़मीन पर पटक दिया!

“रे पापी! रे हैवान! यह क्या कर रहा था तू अपनी बहन के साथ?” रामस्वरूप जी दहाड़ पड़े।

तभी बड़ी मम्मी भी घर लौट आईं। कमरे का दृश्य और अपनी बेटी जैसी भतीजी की फटी हुई हालत देखकर वे भी चीख पड़ीं।

अध्याय 10: बड़े पापा का रोष, सामाजिक पंचायत और पुलिस की कार्रवाई

सुनीता दौड़कर अपने बड़े पापा के चरणों में गिर पड़ी और फूट-फूटकर रोने लगी।

“बड़े पापा! मुझे बचा लो! यह कोई भाई नहीं, यह शैतान है! इसने 5 मार्च को भी जब आप बाहर गए थे, मुझे जान से मारने की धमकी देकर मेरे साथ /गंदा-काम/ किया था! इसने मेरा सब कुछ लूट लिया बड़े पापा!” सुनीता की चीख से पूरा घर काँप उठा।

यह सुनते ही रामस्वरूप जी के होश उड़ गए। जिस बेटे को उन्होंने बड़ा अफ़सर बनाने के लिए दिल्ली भेजा था, वही बेटा इतना बड़ा /बलात्कारी/ और /राक्षस/ निकल जाएगा, उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था।

रामस्वरूप जी ने दीवार के कोने में रखी लोहे की छड़ (रॉड) उठा ली और अपने ही बेटे ऋषि पर ताबड़तोड़ वार करने शुरू कर दिए।

“तूने मेरे मृत भाई की अमानत को कलंकित कर दिया! तूने इस पवित्र घर को श्मशान बना दिया! तुझे जीने का कोई हक नहीं है!” रामस्वरूप जी रोते और चिल्लाते हुए अपने बेटे को पीट रहे थे।

ऋषि ज़मीन पर पड़ा दर्द से कराह रहा था और चीख रहा था, “पापा मुझे साफ़ कर दो! मुझसे गलती हो गई!”

बड़ी मम्मी भी अपने बेटे की इस घिनौना करतूत पर थू-थू कर रही थीं। उन्होंने रामस्वरूप जी से कहा, “इसे मत छोड़ो! इसने हमारे खानदान के मुँह पर कालिख पोत दी है!”

रामस्वरूप जी ने अपनी ममता और मोह को तिलांजलि दे दी। वे समझ गए कि अगर आज उन्होंने अपने बेटे को बचाया, तो वे अपने दिवंगत भाई किशनचंद को कभी मुँह नहीं दिखा पाएँगे।

रामस्वरूप जी ने तुरंत अपने मोबाइल से स्थानीय पुलिस थाने के थाना प्रभारी (SHO) को फ़ोन लगाया और पूरी घटना की जानकारी दी।

महज़ 20 मिनट के भीतर पुलिस की जीप सायरन बजाती हुई उनके घर के बाहर आकर रुकी। पुलिस बल के साथ महिला पुलिस अधिकारी भी मौजूद थीं।

रामस्वरूप जी ने खुद अपने बेटे ऋषि को पुलिस के हवाले किया और रोते हुए कहा, “साहब! यह मेरा बेटा नहीं, एक /हैवान/ है। इसने मेरी अनाथ भतीजी के साथ /बलात्कार/ और /शोषण/ किया है। इसे ऐसी सज़ा दीजिए कि इसकी आत्मा भी काँप उठे!”

पुलिस ने तुरंत पीड़िता सुनीता को अपने संरक्षण में लिया और उसे मेडिकल जाँच के लिए सरकारी अस्पताल भिजवाया। वहीं आरोपी ऋषि को हथकड़ी लगाकर थाने ले जाया गया।

अध्याय 11: सलाखों के पीछे ऋषि और परिवार का बिखराव

घटना की खबर आग की तरह पूरे कस्बे और आसपास के इलाकों में फैल गई। जो लोग रामस्वरूप जी के परिवार की मिसाल दिया करते थे, वे आज इस /घिनौने-कांड/ की खबर सुनकर स्तब्ध थे। बाज़ार में, चौपालों पर केवल इसी बात की चर्चा थी कि दिल्ली जाकर पढ़ाई करने वाला लड़का अपनी ही चचेरी बहन का /शोषण/ कर बैठा।

अस्पताल में महिला डॉक्टरों की टीम ने सुनीता का विस्तृत मेडिकल चेकअप किया। मेडिकल रिपोर्ट में ज़बरदस्ती, /शारीरिक-चोटों/ और /बलात्कार/ की पुष्टि हो गई।

पुलिस ने सुनीता के बयानों और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आरोपी ऋषि के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की गंभीर धाराओं—धारा 64 (बलात्कार), धारा 351 (आपराधिक धमकी) और अन्य सुसंगत धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली।

अगले दिन आरोपी ऋषि को भारी सुरक्षा के बीच स्थानीय अदालत में पेश किया गया।

अदालत के भीतर जब न्यायाधीश ने मामले की गंभीरता और रिश्ते की पवित्रता को तार-तार करने वाले इस /घिनौने-अपराध/ को देखा, तो उन्होंने ऋषि की ज़मानत याचिका को सिरे से ख़ारिज कर दिया और उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में केंद्रीय जेल भेजने का आदेश दिया।

जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा ऋषि अब सिर पकड़कर रो रहा था। उसका करियर, उसकी पढ़ाई, उसकी इज़्ज़त और उसका भविष्य सब कुछ एक पल में स्वाहा हो चुका था। उसकी /हवस/ ने उसे समाज की नज़र में एक /कीड़ा/ बना दिया था।

उधर, रामस्वरूप जी के घर में मातम छाया हुआ था। रामस्वरूप जी ने अपने शो-रूम पर ताला लगा दिया और समाज से मुँह छिपा लिया। बड़ी मम्मी दिन-रात रोती रहती थीं कि उनके अपने ही पेट से जन्मा बेटा इतना /नीच/ कैसे निकला।

सुनीता को इस गहरे मानसिक सदमे से उबारने के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श (काउंसलिंग) की मदद ली गई। रामस्वरूप जी ने सुनीता के नाम अपनी पूरी जायदाद और शो-रूम का मालिकाना हक स्थानांतरित करने का फैसला किया, ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके।

अध्याय 12: निष्कर्ष व सामाजिक संदेश

राजस्थान के उस शांत कस्बे में घटी यह खौफनाक और दिल दहला देने वाली वास्तविक घटना केवल एक अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे आधुनिक समाज में तेज़ी से गिरते नैतिक मूल्यों, इंटरनेट के दुष्प्रभाव और रिश्तों की टूटती मर्यादाओं पर एक करारा तमाचा है।

इस घटना से मिलने वाले मुख्य सामाजिक संदेश:

    रिश्तों की मर्यादा और नैतिक शिक्षा: परिवार में बच्चों को केवल अच्छी स्कूली शिक्षा देना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि उन्हें नैतिक मूल्यों, रिश्तों के सम्मान और मर्यादा की सीमा का बोध कराना अत्यंत आवश्यक है।
    अंधविश्वास और नादानी से बचाव: किसी भी रिश्ते पर अंधा विश्वास करना कभी-कभी भारी पड़ सकता है। नादानी में किसी की अनुचित शर्तों को स्वीकार न करें और किसी भी प्रकार के दबाव या धमकी की स्थिति में तुरंत परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को सूचित करें।
    अपराध के खिलाफ कड़ा रुख: रामस्वरूप जी ने अपने सगे बेटे के अपराध को छिपाने के बजाय न्याय का साथ दिया और उसे पुलिस के हवाले किया। एक आदर्श समाज के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि अपराधी चाहे अपना सगा ही क्यों न हो, उसे उसके किए की सज़ा अवश्य मिलनी चाहिए।

समाप्त

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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