बेटे ने घर से निकाला, बूढ़ी मां ने सड़क पर मिले बच्चे को पाला — 7 साल बाद जो हुआ, उसने पूरे गांव को रुला दिया
बेटे ने घर से निकाला, बूढ़ी मां ने सड़क पर मिले बच्चे को पाला — 7 साल बाद जो हुआ, उसने पूरे गांव को रुला दिया
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव की यह कहानी आज भी लोगों की जुबान पर है। यह एक ऐसी मां की कहानी है जिसे उसके अपने बेटे ने बारिश भरी रात में घर से निकाल दिया, लेकिन जिसने अपनी किस्मत को हार मानने के बजाय एक नई जिंदगी गढ़ दी।
लक्ष्मी देवी के पति की मृत्यु के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उनके इकलौते बेटे रमेश ने संभाल ली थी। पिता की बरसी के दिन, रिश्तेदारों के सामने ही रमेश ने अपनी मां पर गुस्सा निकाला — “यह घर मेरा है, पैसा मैंने कमाया है, आपका यहां कोई हक नहीं।” उसने मां का पुराना कपड़े का थैला उठाकर आंगन में फेंक दिया और मूसलाधार बारिश में उन्हें घर से बाहर निकाल दिया।
लक्ष्मी देवी ने न कोई सवाल किया, न विरोध। भीगते हुए उन्होंने अपना सामान समेटा और अंधेरे में निकल पड़ीं। पूरा गांव तमाशा देखता रहा, पर किसी ने आगे बढ़कर मदद नहीं की।
रात गहराते-गहराते वे थककर गांव के बाहर एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे रुक गईं। तभी झाड़ियों से एक नवजात शिशु के रोने की आवाज आई। बांस की एक टोकरी में एक नन्हा बच्चा ठंड से कांप रहा था। बिना एक पल सोचे लक्ष्मी देवी ने अपनी भीगी शॉल उतारकर बच्चे को लपेटा और सीने से लगा लिया। “हम दादी-पोता एक-दूसरे का सहारा बनेंगे,” उन्होंने खुद से कहा।
अगली सुबह गांव के सरपंच से विनती कर उन्होंने नदी किनारे की बंजर जमीन पर एक झोपड़ी बना ली। बच्चे का नाम रखा — आरव। गांव वाले तानें कसते रहे — “बुढ़िया सठिया गई है, खुद का पेट नहीं भरता और एक मुसीबत और पाल ली।” पर लक्ष्मी देवी चुप रहीं। जंगली सब्जियां तोड़कर, घोंगे-केकड़े पकड़कर उन्होंने गुजारा किया। खुद भूखी रहकर भी बच्चे को भरपेट खिलाती रहीं।
एक दयालु पड़ोसन राधा की मदद से उन्होंने पीठा बनाना और बाजार में बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी टोकरी खाली होने लगी। रातों को दिए की रोशनी में वे जमीन पर छड़ी से अक्षर बनाकर आरव को पढ़ातीं — “यह ‘अ’ है बेटा, अ से अच्छाई। तुझे हमेशा अच्छा इंसान बनना है।”

जब आरव सात साल का हुआ, गांव में अचानक हलचल मच गई। एक अमीर दंपति, श्री और श्रीमती खन्ना, अपने खोए हुए पोते को ढूंढते हुए गांव पहुंचे। उन्होंने बताया कि सात साल पहले उनकी बहू अवसाद में बच्चे को कहीं छोड़ गई थी और बाद में उसने आत्महत्या कर ली। डीएनए टेस्ट हुआ — पर परिणाम आया कि आरव उनका पोता नहीं था। दंपति ने फिर भी लक्ष्मी देवी की ममता के आगे नतमस्तक होकर ₹1 करोड़ की पेशकश की। लक्ष्मी देवी ने पैसे लेने से इनकार कर दिया — “प्यार को पैसों से नहीं तोला जा सकता।” उन्होंने बस इतना मांगा कि आरव को अच्छी शिक्षा मिल जाए। खन्ना दंपति ने आरव की पूरी पढ़ाई का जिम्मा उठा लिया और उसे शहर के सबसे अच्छे स्कूल में भेज दिया।
तीन साल बाद आरव लौटा — एक होनहार, सफल नौजवान के रूप में। गणित और प्रोग्रामिंग में उसकी प्रतिभा ने एक बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनी का ध्यान खींचा था और उसका एक प्रोजेक्ट असाधारण रूप से सफल हो गया था। उसने दादी के लिए एक नया घर बनवाया, और गांव में एक मुफ्त स्कूल भी खुलवाया — “लक्ष्मी-आरव प्राथमिक विद्यालय” — जहां बच्चों को शिक्षा के साथ मुफ्त भोजन भी मिलता।
इधर रमेश का हाल बुरा था। पत्नी-बच्चे उसे छोड़ गए, कर्ज में डूबा, और एक दिन लकवे ने उसे अधमरा बना दिया। अकेलेपन और पछतावे में डूबा रमेश आखिरकार बैसाखी के सहारे घिसटते हुए मां के दरवाजे पर आ पहुंचा — “मां, मुझे माफ कर दो।” लक्ष्मी देवी ने न शिकायत की, न ताना मारा। बस इतना कहा, “उठ जा बेटा, जमीन ठंडी है।” उसी दिन से वे हर दिन बीमार बेटे के लिए खिचड़ी बनाकर ले जाने लगीं।
महीनों बाद एक टीवी चैनल ने लक्ष्मी देवी का साक्षात्कार लिया। जब रिपोर्टर ने पूछा कि क्या उन्हें अपने बेटे से नफरत है, तो उनका जवाब सबको चौंका गया — “नहीं, मुझे न नफरत है, न पछतावा। अगर उस दिन घर से न निकाला जाता, तो मैं बरगद के नीचे भटकती न होती, और अगर न भटकती तो मुझे मेरा आरव कैसे मिलता?” यह सुनकर दूर खड़ा रमेश घुटनों पर गिर पड़ा।
आगे चलकर दोनों भाइयों — गोद लिया आरव और सगा बेटा रमेश — ने मिलकर मां की सेवा की। रमेश ठीक होकर उसी स्कूल में चौकीदार बन गया जो उसकी मां के नाम पर बना था। अपने आखिरी दिनों में लक्ष्मी देवी ने दोनों बेटों को पास बुलाकर आशीर्वाद दिया और शांति से आंखें मूंद लीं।
उनकी डायरी में एक आखिरी पंक्ति मिली — “मेरे पास तुम दोनों को देने के लिए कोई संपत्ति नहीं। बस एक वसीयत है — कोई तब तक गरीब नहीं होता जब तक उसके दिल में प्यार है।”
आज उस स्कूल के गेट पर लक्ष्मी देवी की एक प्रतिमा खड़ी है, जिसके नीचे लिखा है — “जहां प्यार है, वहां चमत्कार है।”