राजकुमार पर लगा राजकोष चोरी का झूठा आरोप — राजा ने दिया देश निकाला, फिर हुआ चौंकाने वाला खुलासा – News

राजकुमार पर लगा राजकोष चोरी का झूठा आरोप — राजा ने दिया देश निकाला, फिर हुआ चौंकाने वाला खुलासा

राजकुमार पर लगा राजकोष चोरी का झूठा आरोप — राजा ने दिया देश निकाला, फिर हुआ चौंकाने वाला खुलासा

राजकुमार पर लगा राजकोष चोरी का झूठा आरोप — राजा ने दिया देश निकाला, फिर हुआ चौंकाने वाला खुलासा

सूर्यगढ़ के भव्य दरबार में उस दिन सन्नाटा पसरा हुआ था। राजा ने अपने ही पुत्र, युवराज देवव्रत को कठघरे में खड़ा कर रखा था। “ठहरो देवव्रत, एक कदम भी आगे मत बढ़ाना,” राजा की कड़क आवाज़ गूंजी।

“पिताजी, मुझसे कोई गलती हुई है तो बताइए। लेकिन मुझे दरबार से जाने का आदेश क्यों दिया जा रहा है?” देवव्रत ने हैरानी से पूछा।

“राजकोष से 500 स्वर्ण मुद्राएं गायब हैं, और उसकी चाबी तुम्हारे पास थी,” राजा ने आरोप लगाया। मंत्री ने भी गवाही दी कि चोरी वाली रात युवराज को राजकोष के पास देखा गया था। देवव्रत ने बार-बार सच बताने की कोशिश की — “मैंने राजकोष को हाथ तक नहीं लगाया” — पर राजा, अपने ही बेटे से ज्यादा सबूतों पर भरोसा करते हुए, अडिग रहे। फैसला सुनाया गया — देवव्रत को तुरंत राज्य की सीमा छोड़नी होगी, जब तक सच सामने न आए।

देवव्रत ने शांति से सिर झुकाया — “ठीक है पिताजी, मैं चला जाऊंगा। पर एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब आपको पता चलेगा कि आपका बेटा अपराधी नहीं था।”

महल लौटकर जब उसने अपनी पत्नी मालविका को यह खबर सुनाई, तो मालविका ने बिना एक पल गंवाए फैसला कर लिया — “मैं भी आपके साथ जाऊंगी।” देवव्रत ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की — जंगल, भूख, खतरा — पर मालविका अडिग रही। “कठिन समय में पति को छोड़ देना ही मेरे लिए सबसे कठिन होगा,” उसने कहा। “तुमने आज मुझे हरा दिया मालविका,” देवव्रत ने भर्राई आवाज़ में कहा।

सूर्यास्त से पहले दोनों ने राज्य की सीमा पार की। रास्ते में एक सुनसान जगह पर रात बिताने का फैसला हुआ। देवव्रत लकड़ियां लेने गया, तो एक रहस्यमयी बाबा वहां आ पहुंचे। मालविका से बातचीत में बाबा ने कहा — “जिस आदमी ने अपराध नहीं किया, उसका रास्ता चाहे कितना भी लंबा हो, मंजिल आखिर सच की ही होती है।”

रात को बाबा ने देवव्रत से एक चौंकाने वाली बात कही — “तुम्हारे पीछे सिर्फ राजमहल का इल्जाम नहीं, किसी की बहुत बड़ी चाल भी चल रही है।” देवव्रत हैरान रह गया — आखिर कौन उसे राज्य से बाहर करवाना चाहता था? बाबा ने आशीर्वाद देते हुए कहा — “सत्य का साथ मत छोड़ना। एक दिन वही तुम्हें वापस वहीं ले जाएगा जहां से आज तुम जा रहे हो।”

आगे बढ़ते हुए दोनों एक नगर पहुंचे। देवव्रत ने एक सेठ की दुकान पर हिसाब-किताब संभालने का काम मांगा। सेठ ने उसकी ईमानदारी और पढ़ाई-लिखाई देखकर तुरंत नौकरी दे दी, और मालविका को भी घर में जगह मिल गई। समय के साथ देवव्रत सेठ का सबसे भरोसेमंद मुनीम बन गया, और मालविका की मधुर आवाज़ पूरे नगर में मशहूर होने लगी।

एक दिन राज दरबार का गायक माधव मालविका का गीत सुनकर मंत्रमुग्ध हो गया और उसे राजदरबार में गाने का न्योता दिया। मालविका ने विनम्रता से कहा कि वह पहले अपने पति से पूछेगी। माधव ने ताना मारा — “आपका पति आपके लायक नहीं है।” मालविका ने दृढ़ता से जवाब दिया — “मेरे पति गरीब हो सकते हैं, लेकिन मेरे लिए उनकी कीमत किसी राजा से कम नहीं।”

देवव्रत ने खुशी-खुशी इजाज़त दी, और मालविका ने राजदरबार में अपनी आवाज़ से सबको मोहित कर दिया। खुद राजा ने भी उसकी तारीफ़ की और हर सप्ताह गाने का न्योता दिया।

लेकिन खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी। अचानक एक दिन सेठ के पास एक फरमान आया — “देवव्रत नाम का मुनीम कौन है? राजकोष से जुड़ी एक बड़ी चोरी के मामले में इसे राजा के सामने पेश करने का आदेश है।” देवव्रत हैरान रह गया — वही पुराना इल्जाम, एक नए रूप में, फिर उसका पीछा कर रहा था।

मालविका ने इस बार साथ चलने की ज़िद की, पर देवव्रत ने उसे रोका, वचन दिया कि जल्दी लौटेगा — और सच की तलाश में एक बार फिर आगे बढ़ चला, यह जानते हुए कि इस बार वह चुप नहीं बैठेगा, बल्कि उस साज़िश की जड़ तक पहुंचकर रहेगा जिसने उसे उसके ही राज्य से बेदखल करवाया था।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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