“साहब, मेरा एक गाना खरीद लो…” 12 साल की अंधी बच्ची की आवाज़ ने सबको रुला दिया 😭 – News

“साहब, मेरा एक गाना खरीद लो…” 12 साल की अंधी बच्ची की आवाज़ ने सबको रुला दिया 😭

“साहब, मेरा एक गाना खरीद लो…” 12 साल की अंधी बच्ची की आवाज़ ने सबको रुला दिया 😭

“साहब, मेरा एक गाना खरीद लो…”
12 साल की अंधी बच्ची की आवाज़ ने सबको रुला दिया 😭

संगीत की दुनिया में नाम कमाना आसान है।
लेकिन उस नाम के पीछे की खामोशी को सुनना बहुत मुश्किल।

मुंबई की चमक दमक वाली सड़कों पर हर कोई अपनी किस्मत आजमाने आता है। वहीं कुछ आवाजें ऐसी भी होती हैं जो भीड़ के शोर में कहीं दबकर रह जाती हैं।

शेखर मल्होत्रा – भारतीय संगीत जगत का एक जाना-पहचाना नाम। अनगिनत अवॉर्ड्स, करोड़ों की संपत्ति, लाखों फैंस। लेकिन पिछले कुछ महीनों से उनका दिल खालीपन से भर गया था। स्टूडियो की चार दीवारों और मशीनी साझों में उन्हें वो असली संगीत नहीं मिल रहा था जो रूह को छू ले।

उस शाम शेखर जूहू के पास अपनी लग्जरी कार के बोनट पर टेक लगाकर खड़े थे। समुद्र की लहरों की आवाज सुन रहे थे। शहर की भागदौड़ से दूर शांति चाहते थे। तभी उनकी नजर फुटपाथ पर पड़ी।

बारिश की हल्की बूंदें गिर रही थीं। सड़क किनारे जल रही स्ट्रीट लाइट की मध्यम रोशनी में एक छाया कांप रही थी। शेखर ने गौर से देखा – एक 12-13 साल की बच्ची। कपड़े फटे हुए, बाल बिखरे, हाथ में टूटी प्लास्टिक की छड़ी। आंखें बंद – वह अंधी थी।

शेखर ने सोचा – शायद भीख मांगने आई होगी।

लेकिन तभी…

एक मासूम, सहमी हुई आवाज कानों से टकराई।

“बाबूजी… क्या आप संगीत समझते हैं?”

शेखर चौंक गए। एक भिखारी बच्ची से ऐसे सवाल की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी।

बच्ची का चेहरा भूख से पीला पड़ चुका था। होंठ सूखे। लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सा स्वाभिमान था। वह हाथ नहीं फैला रही थी।

शेखर ने चुप्पी के बाद पूछा, “तुम यह क्यों पूछ रही हो?”

बच्ची ने सूखी उंगलियां आपस में फंसाईं। डरते-डरते आगे बढ़ी।

“बाबूजी… मैं भीख नहीं मांगना चाहती। मेरी मां कहती थी – मुफ्त की रोटी जहर होती है। लेकिन आज पेट की आग बर्दाश्त नहीं हो रही। बाबूजी… क्या आप मेरा एक गाना खरीदेंगे? बस एक वड़ा पाव के बदले। मैं बहुत अच्छा गाती हूं।”

ये शब्द शेखर के कानों में हथौड़े की तरह लगे।

एक गाना खरीदेंगे… यह प्रस्ताव इतना अनोखा और दर्दनाक था कि करोड़ों की डील करने वाले शेखर निशब्द रह गए।

उस बच्ची ने अपनी एकमात्र पूंजी – अपनी कला – को भूख मिटाने के लिए सौदा करने की पेशकश की थी।

शेखर की आंखों में अनायास नमी आ गई। उन्होंने उस बच्ची के पास जाकर घुटनों के बल बैठकर पूछा, “तुम्हें गाना किसने सिखाया? क्या नाम है तुम्हारा?”

बच्ची ने कांपते हुए कहा, “मेरा नाम गौरी है बाबूजी। मेरी मां सिखाती थी। अब वो नहीं है। बस यह गाना ही बचा है मेरे पास। क्या आप सुनेंगे?”

शेखर ने अपना भारी गला साफ किया, “हां गौरी… मैं सुन रहा हूं।”

जैसे ही गौरी ने पहली तान छेड़ी, शेखर के लिए दुनिया का बाकी शोर मानो थम सा गया।

गौरी की आवाज में भूख की तड़प, अकेलेपन का दर्द, और मां की याद – सब कुछ सुरों में ढलकर बाहर आ रहा था।

“सूखी रोटी, प्यासा पानी… कोई ना सुने मेरी कहानी…”

उसकी आवाज कच्ची थी। शास्त्रीय रियाज नहीं था। लेकिन उसमें वो सच्चाई थी जो बड़े-बड़े गायकों की आवाज में भी नहीं मिलती।

बारिश की बूंदों के बीच वह आवाज किसी घायल पक्षी की पुकार जैसी लग रही थी – अपने घोंसले की तलाश में भटक रही।

गाते-गाते गौरी का गला भर आया। आंसू बह रहे थे। लेकिन उसने गाना नहीं रोका। उसने अपनी पूरी जान लगाकर अंतरा गाया।

जब उसने आखिरी सुर लगाया, तो उसमें से गुजर रहे कुछ और लोग भी रुक गए थे। हर किसी की आंखों में नमी और सहानुभूति थी।

गाना खत्म करके गौरी ने फिर डरा हुआ चेहरा बनाया और टूटी लाठी पकड़ ली।

शेखर की आंखों से आंसू बह रहे थे। उन्होंने शर्म शर्म महसूस की कि वे अपनी छोटी-मोटी परेशानियों के लिए दुखी थे, जबकि इस बच्ची के पास जीने का कोई सहारा नहीं था।

फिर भी उसकी आवाज में इतनी जान थी।

शेखर आगे बढ़े और गौरी का नन्हा, मैला हाथ अपने रेशमी कपड़ों की परवाह किए बिना अपने हाथों में ले लिया।

“नहीं गौरी… गाना बुरा नहीं था। यह तो अब तक का सबसे बेहतरीन सौदा है जो मैंने अपनी जिंदगी में किया है। तुम्हारा यह गाना एक वड़ा पाव का नहीं… बल्कि अनमोल है।”

शेखर ने गौरी का हाथ थामे रखा और उसे अपनी महंगी कार की पिछली सीट पर बैठने का इशारा किया।

गौरी हिचकिचाई और पीछे हट गई। “मेरे कपड़े गंदे हैं बाबूजी। आपकी इतनी सुंदर गाड़ी खराब हो जाएगी।”

शेखर का दिल पसीज गया।

“गाड़ी साफ क्यों हो सकती है बेटा? लेकिन अगर आज मैंने तुम्हें यहां छोड़ दिया तो मेरी आत्मा कभी साफ नहीं हो पाएगी।”

वे जिद करके गौरी को गाड़ी में बैठाया।

गाड़ी एक आलीशान रेस्तरां की तरफ मोड़ी गई। वॉचमैन ने दरवाजा खोला, लेकिन गौरी को देखकर उसका चेहरा तन गया।

मैनेजर ने सख्ती से कहा, “माफ कीजिएगा मिस्टर मल्होत्रा… हम ऐसे लोगों को यहां अनुमति नहीं देते।”

शेखर की आंखों में चिंगारी कौंधी। उन्होंने ठंडी सर्द आवाज में कहा,

“यह बच्ची ऐसे लोग नहीं है। यह आज मेरी सबसे खास मेहमान है। और अगर इस शहर के सबसे बेहतरीन संगीतकार को यहां बैठने की जगह नहीं मिल सकती क्योंकि उसके साथ एक भूखी बच्ची है… तो मुझे लगता है कि मैं गलत जगह आ गया हूं।”

मैनेजर घबरा गया। तुरंत माफी मांगी और सबसे अच्छी टेबल पर बैठाया।

शेखर ने मेन्यू नहीं देखा। “दाल, मखनी, पनीर, रोटियां, पुलाव – सब जल्दी आना चाहिए।”

जब तक खाना नहीं आया, गौरी सिर झुकाए बैठी रही। उसकी हथेलियां मेजपश पर रगड़ रही थीं।

खाना आया। उसकी खुशबू गौरी की नाक तक पहुंची। उसका पेट ने जोर से आवाज की।

वह शर्म से और सिकुड़ गई। शेखर ने खुद उसके लिए थाली परोसी। “शुरू करो गौरी… यह सब तुम्हारे लिए है।”

गौरी ने पहले एक निवाला तोड़ा। उसके हाथ कांप रहे थे। जैसे ही खाना मुंह में डाला, उसकी आंखों से आंसुओं की धार फूट पड़ी।

एक हाथ से खाना खा रही थी और दूसरे हाथ से लगातार बहते आंसुओं को पोंछ रही थी।

वह दृश्य इतना मार्मिक था कि शेखर का अपना गला रंध गया।

भूख इंसान को कितना बेबस बना देती है…

जब गौरी ने पेट भरकर खाना खा लिया और पानी पिया, तो उसके चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति थी जो करोड़ों का सौदा करके भी शेखर को कभी नहीं मिली थी।

पेट भर गया।

शेखर ने कोमलता से पूछा, “गौरी… तुम्हारी मां को क्या हुआ था? और तुम्हारी आंखों की रोशनी? यह कैसे गई?”

गौरी का चेहरा उदास हो गया। उसने बताया कि कैसे एक बीमारी ने पहले उसकी आंखों की रोशनी छीनी क्योंकि उनके पास इलाज के पैसे नहीं थे। फिर पिछले साल सड़क दुर्घटना में उसकी मां उसे अकेला छोड़ गई। तब से वह सड़कों पर गाकर लोगों की दया पर जिंदा थी।

उसकी कहानी सुनकर शेखर ने मेज पर मुट्ठी भी ली।

नियति ने इस बच्ची के साथ कितना क्रूर मजाक किया था। लेकिन फिर भी उसने उसे एक अनमोल तोहफा दिया था।

उसकी आवाज ने मन ही मन एक फैसला कर लिया।

उन्होंने वेटर को बिल दिया और गौरी का हाथ थामते हुए कहा, “तुम्हें अब और गाना बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गौरी… चलो मेरे साथ।”

“कहां बाबूजी?” गौरी ने घबराते हुए पूछा।

“जहां तुम्हारी आवाज को वह सम्मान मिलेगा जिसकी वह हकदार है।”

गौरी का घर… शेखर की गाड़ी जब जूहू के एक पौष इलाके में स्थित उनके आलीशान बंगले ‘स्वर सदन’ के गेट से अंदर दाखिल हुई तो रात काफी हो चुकी थी।

गाड़ी के रुकते ही गौरी ने हवा में गहरी सांस ली।

यहां की हवा में गीली मिट्टी और रात की रानी के फूलों की खुशबू थी जो मुंबई के गटर और धुएं की बदबू से कोसों दूर थी।

शेखर ने गौरी का हाथ पकड़कर उसे उतारा।

घर के नौकर, जो अपने मालिक के आने का इंतजार कर रहे थे, एक मैले-कुचैले कपड़ों वाली अंधी बच्ची को देखकर हक्के-बक्के रह गए।

जैसे ही वे लिविंग रूम में पहुंचे, सीढ़ियों से उतरती हुई एक महिला की आवाज आई।

“शेखर… आज इतनी देर कैसे? और यह कौन है?”

यह शेखर की पत्नी नंदिनी थी।

नंदिनी एक व्यावहारिक महिला थी और समाज के ऊंचे तबके से ताल्लुक रखती थी। अपनी इटालियन मार्बल के फर्श पर कीचड़ सने पैरों वाली एक अनजान बच्ची को देखकर उनके माथे पर लकीरें उभर आई।

शेखर ने गौरी के कंधे पर हाथ रखा। “नंदिनी… यह गौरी है। आज से यह हमारे साथ रहेगी।”

नंदिनी की आंखें आश्चर्य से फैल गईं।

“शेखर… क्या मजाक है? तुम सड़क से किसी को भी उठाकर घर ले आओगे? हम इसे नहीं जानते। इसकी पृष्ठभूमि क्या है? कौन है? और तुम कह रहे हो कि यह यहां रहेगी। क्या तुम कोई एनजीओ चला रहे हो?”

नंदिनी का स्वर कड़क था – चिंता और नाराजगी दोनों।

गौरी ने नंदिनी के गुस्से को भांपकर शेखर के पीछे छिपने की कोशिश की। उसे लगा कि उसका सपना टूटने वाला है।

शेखर ने बेहद संजीदगी से जवाब दिया,

“नंदिनी… मैंने इसे सड़क से नहीं उठाया। इसने मुझे उठाया। अजीमुखी। मेरी खोई हुई प्रेरणा मुझे इसी बच्ची में मिली है। यह सिर्फ एक बेघर बच्ची नहीं है। यह एक ऐसा हीरा है जिस पर बस थोड़ी धूल जमी है। अगर आज हमने इसे वापस भेज दिया तो ऊपर वाला हमें कभी माफ नहीं करेगा.”

शेखर की आवाज में एक ऐसा दृढ़ निश्चय था जो नंदिनी ने बरसों बाद देखा था।

आखिरकार नंदिनी का दिल भी पसीज गया।

उसने लंबी सांस ली और घर की मुख्य नौकरानी को आवाज दी,

“कांताबाई… इसे ले जाओ। इसे अच्छे से नहलाओ और रिया के पुराने कपड़े जो स्टोर रूम में रखे हैं, इसे पहनाओ। जल्दी करो।”

गौरी को जब कांताबाई ले जाने लगी, उसने डरते हुए पीछे मुड़कर देखा। हालांकि वह देख नहीं सकती थी, लेकिन उसका चेहरा शेखर की आवाज की दिशा में था।

शेखर ने प्यार से कहा, “जाओ बेटा… डरो मत। अब यह तुम्हारा ही घर है।”

करीब एक घंटे बाद जब गौरी नहा-धोकर और साफ कपड़ों में बाहर आई, तो उसे पहचानना मुश्किल था।

उसका सांवला रंग निखर आया था। बाल सुलझे हुए थे और चेहरे पर जमी धूल की परत हटने के बाद उसकी मासूमियत देखते ही बनती थी।

वह अब एक भिखारिन नहीं बल्कि किसी अच्छे घर की बच्ची लग रही थी।

शेखर उसे देखकर मुस्कुराए।

और सीधे अपने सबसे पवित्र स्थान – अपने म्यूजिक रूम, संगीत कक्ष की ओर ले गए।

यह कमरा पूरी तरह साउंड प्रूफ था। जैसे ही वे अंदर गए, बाहरी दुनिया का बचा-कुचा शोर भी खत्म हो गया।

वहां सिर्फ एक गहरी रूहानी खामोशी थी।

शेखर ने गौरी को एक बड़े से ग्रैंड पियानो के पास स्टूल पर बैठाया।

“गौरी… तुमने अब तक दर्द गाया है। अब तुम्हें संगीत को जीना होगा। क्या तुम तैयार हो?”

शेखर ने अपनी सारी रिकॉर्डिंग और बाहरी प्रोजेक्ट्स को रोक दिया था। उनका पूरा दिन और रात सिर्फ एक ही मकसद पर केंद्रित था – गौरी को दुनिया के सामने लाना।

गौरी सुबह 4 बजे का रियाज, फेफड़ों की कसरत और सुरों की बारीकियां सीख रही थी। शुरुआत में उसे बहुत दिक्कत हुई। शास्त्रीय संगीत के कड़े अनुशासन में बंधने से डरती थी। लेकिन शेखर ने एक गुरु की नहीं, बल्कि एक पिता की तरह उसका हाथ थामे रखा।

गौरी देख नहीं सकती थी, इसलिए वह सुनकर सीखती थी। उसकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। शेखर जो धुन एक बार पियानो पर बजाते, गौरी उसे हूबहू अपनी आवाज में उतार देती।

धीरे-धीरे उस घर की दीवारों में संगीत गूंजने लगा। यहां तक कि नंदिनी जो शुरू में इस फैसले के खिलाफ थी, अक्सर छिपकर गौरी का रियाज सुनती और उसकी आंखों में भी नमी आ जाती।

उसे अपने पति में वह पुराना जुनून वापस दिखाई दे रहा था जो दौलत की दौड़ में कहीं खो गया था।

आखिरकार वह दिन आ गया जब शेखर को लगा कि गौरी अब दुनिया के सामने आने के लिए तैयार है।

उन्होंने शहर के सबसे बड़े म्यूजिक प्रोड्यूसर और रियलिटी शो के जज मिस्टर खन्ना को अपने घर आमंत्रित किया।

शेखर का सपना था – गौरी को एक बड़े मंच से लॉन्च किया जाए ताकि उसकी कला को वह सम्मान मिले जिसकी वह हकदार है।

ड्राइंग रूम में मिस्टर खन्ना सोफे पर पैर के ऊपर पैर रखकर बैठे थे। उन्होंने अपनी महंगी घड़ी देखी और कहा,

“शेखर… तुम जानते हो मेरा वक्त कितना कीमती है। तुमने कहा था कि तुम्हारे पास एक कोहिनूर है। हिंसा दिखाओ। कहां है वह?”

शेखर ने इशारा किया और गौरी एक सुंदर सफेद सलवार कमीज में, कांताबाई का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे सीढ़ियों से उतर आई।

उसे देखकर मिस्टर खन्ना के चेहरे पर निराशा साफ छलकने लगी।

“शेखर… तुम मजाक कर रहे हो। यह तो देख भी नहीं सकती। म्यूजिक इंडस्ट्री अब ऑडियो नहीं – विजुअल है। लोग सिर्फ सुनते नहीं… देखते हैं। ग्लैमर, स्टाइल, डांस। इसमें वह एक्स फैक्टर कहां है? सॉरी दोस्त… यह मार्केट में नहीं बिकेगी।”

गौरी जो एक कोने में खड़ी सब सुन रही थी, का चेहरा पीला पड़ गया।

उसे लगा जैसे वह फिर से उसी फुटपाथ पर खड़ी है और कोई उसे धुत्कार रहा है।

शेखर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

उन्होंने खड़े होकर कहा, “मिस्टर खन्ना… आप जा सकते हैं। जिसे आप आज जोखिम कह रहे हैं, कल पूरी दुनिया उसके लिए कतार में खड़ी होगी। यह मेरा वादा है।”

खन्ना के जाने के बाद शेखर ने देखा कि गौरी फर्श पर बैठकर रो रही थी।

“बाबूजी… वह सही कह रहे थे। मैं आपके लिए सिर्फ एक बोझ हूं। मेरी वजह से आपकी बेइज्जती हुई। मुझे वापस जाने दीजिए।”

शेखर ने गौरी के कंधों को मजबूती से पकड़ा और कहा,

“आंसू पोंछ लो गौरी… अब हमें किसी प्रोड्यूसर की जरूरत नहीं है। अब तुम्हारी परीक्षा किसी बंद कमरे में नहीं… सीधे जनता की अदालत में होगी। शहर में सबसे बड़ा संगीत महोत्सव ‘सुर संगम’ होने वाला है। तुम वहां गाओगी और लाइव गाओगी। सुर संगम।”

महोत्सव की शाम मुंबई का सबसे बड़ा स्टेडियम रोशनी से नहाया हुआ था। 500 से ज्यादा दर्शकों की भीड़ समुद्र की लहरों की तरह शोर मचा रही थी।

मंच पर तेज रोशनी, लेजर लाइट्स और कानों को फाड़ देने वाले साउंड सिस्टम का राज था।

बैक स्टेज में एक कोने में गौरी सिकुड़ी हुई बैठी थी।

स्टेडियम का शोर उसके कानों में तूफान की तरह गूंज रहा था।

उसके हाथ बर्फ की तरह ठंडे थे।

जिस लड़की ने फुटपाथ के शोर में भी आत्मविश्वास से गाया था, आज इस विशाल मंच की गड़गड़ाहट ने उसे डरा दिया था।

शेखर उसके पास आए और उसके सिर पर हाथ रखा।

“गौरी… तुम कांप रही हो।”

“बाबूजी…” गौरी की आवाज रुंध गई थी। “एतने सारे लोग… इतना शोर। अगर मैं भूल गई तो… अगर किसी को पसंद नहीं आया तो… मिस्टर खन्ना सही थे। मैं इस जगह के लायक नहीं हूं।”

शेखर ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और कहा,

“नो गौरी… यह शोर भीड़ का है। संगीत का नहीं। तुम्हें इन 500 लोगों के लिए नहीं गाना है। तुम्हें सिर्फ उस एक इंसान के लिए गाना है जो आज बादलों के पार बैठकर तुम्हें सुन रही है। तुम्हारी मां और उस भूख के लिए गाना है जिसने तुम्हें मजबूत बनाया।

आंखें बंद करो और सोचो कि तुम अभी भी उसी समुद्र किनारे हो और मैं वहीं खड़ा हूं। बस हम दोनों हैं।”

तभी अनाउंसर की आवाज गूंजी –

“और अब एक ऐसी आवाज जो सीधे रूह से आती है… पेश हैं शेखर मल्होत्रा और उनकी खोज – गौरी!”

शेखर ने गौरी का हाथ थामकर उसे मंच की ओर बढ़ाया।

जैसे ही वे मंच पर पहुंचे, अचानक भीड़ का शोर थोड़ा थम गया। लेकिन तालियां नहीं बजीं।

दर्शकों को उम्मीद थी किसी ग्लैमरस स्टार की। लेकिन एक साधारण सी सलवार कमीज पहने, आंखों पर काला चश्मा लगाए और हाथ में माइक पकड़े – एक दुबली-पतली लड़की को देखकर सब हैरान थे।

भीड़ में से कुछ फुसफुसाहटें शुरू हो गईं।

“अरे, यह क्या बोरिंग प्रोग्राम है? रॉक बैंड कहां है?”

कुछ लोग होटिंग करने लगे।

गौरी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

शेखर ने पियानो पर अपनी जगह ली। उन्होंने माइक में कुछ नहीं कहा। बस पियानो की एक बहुत ही धीमी और दर्द भरी धुन छेड़ी।

वह धुन इतनी मार्मिक थी कि होटिंग करने वालों की आवाजें धीरे-धीरे कम होने लगीं।

शेखर ने गौरी की तरफ देखा।

हालांकि वह देख नहीं सकती थी, लेकिन उसने उस धुन को महसूस किया।

यह वही धुन थी जो शेखर ने उसे पहली बार स्टूडियो में सिखाई थी।

गौरी ने कांपते हाथों से माइक को अपने होंठों के करीब किया। उसने एक गहरी सांस ली। अपनी मां का चेहरा याद किया और आंखें बंद कर ली।

जैसे ही उसने पहला आलाप लिया –

“ओ रे मालिक…”

उसकी आवाज ने पूरे स्टेडियम को चीरकर रख दिया।

वह आवाज इतनी साफ, इतनी बुलंद और इतनी दर्दनाक थी कि स्टेडियम के आखिरी कोने में बैठे शख्स के रोंगटे भी खड़े हो गए।

गौरी का गाना जैसे-जैसे आगे बढ़ा, स्टेडियम में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जो शायद उस जगह ने पहले कभी महसूस नहीं किया था।

यह सन्नाटा बोरियत का नहीं, बल्कि श्रद्धा का था।

गौरी अब डर नहीं रही थी। वह अपनी धुन में खो चुकी थी। उसने वह सब कुछ अपने सुरों में उंडेल दिया जो उसने फुटपाथ पर सहा था – ठिठुरती रातें, अपमान, भूख और मां की याद।

उसकी आवाज में कोई बनावट नहीं थी। वह सीधे रूह को चीरती हुई निकल रही थी।

वीआईपी बॉक्स में बैठे मिस्टर खन्ना का मुंह खुला-खुला रह गया था।

उनकी आंखों से अश्रु बह निकले।

भीड़ में जो लोग कुछ देर पहले होटिंग कर रहे थे, वे अब अपनी कुर्सियों से खड़े होकर मंत्रमुग्ध होकर उस नन्ही सी जान को सुन रहे थे।

जब गौरी ने गाने की आखिरी लंबी तान ली, तो उसकी आवाज पतली होकर हवा में विलीन हो गई।

पियानो का आखिरी नोट गूंजा और फिर शांत।

एक पल… दो पल… तीन पल।

पूरा स्टेडियम खामोश था।

गौरी डर गई। उसे लगा शायद उसने कुछ गलत कर दिया है।

वह घबराहत में अपने हाथ मलने लगी।

तभी भीड़ के एक कोने से ताली की एक तेज आवाज आई।

फिर दूसरी, फिर तीसरी।

और देखते-देखते तालियों की गड़गड़ाहट एक तूफान में बदल गई।

500 लोग अपने पैरों पर खड़े थे।

सीटियां, तालियां और गौरी गौरी वजा… किनारे स्टेडियम की छत को हिला रहे थे।

यह शोर उस रात के तूफान से भी तेज था। लेकिन इस बार यह डरावना नहीं, बल्कि स्वागत करने वाला था।

शेखर अपनी जगह से उठे और दौड़कर गौरी के पास आए।

“सुन रही हो गौरी? यह शोर तुम्हारे लिए है। पूरी दुनिया तुम्हारे कदमों में है।”

गौरी रो पड़ी। “बाबूजी… क्या? क्या उन्हें सच में पसंद आया?”

शेखर ने भीड़ की तरफ देखा।

लोगों ने अपने मोबाइल की फ्लैशलाइट जला ली थी। पूरा स्टेडियम जुगनुओं की तरह चमक रहा था।

शेखर ने गौरी के कान में कहा,

“गौरी… तुम देख नहीं सकती लेकिन आज 500 लोग तुम्हारे लिए सितारे बनकर चमक रहे हैं। तुमने अंधेरे को हरा दिया है बेटा।”

शो के बाद वही मिस्टर खन्ना जो उसे रिजेक्ट कर चुके थे, बैक स्टेज सबसे पहले दौड़ कर आए।

उनके हाथ में एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट था।

“शेखर… मुझे माफ कर दो।” खन्ना ने झुककर कहा और फिर गौरी की ओर मुड़े।

“बेटा… तुम सिर्फ एक सिंगर नहीं। तुम एक जादू हो। क्या तुम मेरे साथ काम करोगी?”

गौरी ने कॉन्ट्रैक्ट नहीं देखा। उसने बस शेखर का हाथ कसकर पकड़ लिया।

उसे पता था कि उसकी असली दौलत यह कागज नहीं… बल्कि वो हाथ है जिसने उसे कीचड़ से उठाकर आसमान तक पहुंचाया था।

उस रात शेखर मल्होत्रा ने सिर्फ एक स्टार को जन्म नहीं दिया था… बल्कि अपनी खुद की खोई हुई आत्मा को भी पा लिया था।

उन्होंने दुनिया को साबित कर दिया था कि हुनर किसी की आंखों की रोशनी का मोहताज नहीं होता।

वह तो दिल की धड़कनों में बसता है।

The End… Par yeh kahani shuru hui hai.

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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