(PART 4) देहरादून में शहीद आर्मी कर्नल के इकलौते बेटे के कत्ल में करोड़पति सगी मां की भूमिका की पूरी कहानी!
भाग 4: कोर्ट की सख्ती, जेल का अंधेरा और अंतिम सबक
कोर्ट की सुनवाई अब सिर्फ एक प्रॉपर्टी के झगड़े की नहीं, बल्कि पूरे परिवार को नष्ट करने की साजिश की बात में बदल चुकी थी। देहरादून के हाईकोर्ट के जज साहब ने 17 सितंबर 2026 की सुबह बेंच में बैठते ही सभी चारों आरोपियों – विनोद उनियाल, डॉक्टर अजय खन्ना, बिना शर्मा और दोनों शूटर पंकज राणा तथा राजीव उर्फ राजू – को सामने बुलाया। जज साहब की आवाज़ में कड़क थी, “यह केस अब सिर्फ हत्या का नहीं है। यह परिवार के अंदरूनी बवंडर का केस है। पैसे, अहंकार और रिश्तों की कीमत का केस है।” पूरे कोर्टहॉल में सन्नाटा छा गया। अभिलाषा, अर्जुन की विधवा पत्नी, लाल साड़ी में बैठी रो रही थीं। उनके छोटे बेटे विक्रम और बेटी प्रिया उनके गोद में थे। विक्रम ने साफ कहा, “मम्मी, पापा को बचाओ।” अभिलाषा ने उन्हें चुप कराया और कोर्ट में कहा, “जज साहब, मेरा पति अर्जुन शर्मा बहुत समझदार था। वह कभी झगड़ा नहीं करता था। लेकिन बिना शर्मा का डर उसको अंधा कर गया था।”

जज साहब ने सभी को एक-एक करके बुलाया। पहले विनोद उनियाल को। विनोद, 50 साल का रसूखदार, कलाई पर सिलिकॉन का हिरासत का कफ पहने हुए खड़ा था। उसकी पत्नी संगीता भी साथ बैठी थी। जज साहब ने सीधे पूछा, “विनोद, तुमने अर्जुन शर्मा की हत्या में हाथ क्यों डाला? 38 साल पहले कर्नल रमेश चंद शहीद हुए थे, उसके बाद गैस एजेंसी से शुरू हुआ सिलसिला, लेकिन तुमने कभी मां के साथ अपने रिश्ते को सही नहीं समझा।” विनोद ने पहले झुककर जवाब दिया, “जज साहब, मां ने मुझे कभी बेटा नहीं माना। वह सिर्फ अर्जुन के पिताजी के नाम की जमीन चाहती थी। मैंने सोचा कि अगर अर्जुन हट जाए, तो सब अपने नाम कर लूँगा।” जज साहब ने सख्ती से कहा, “यह साजिश है। तुमने डॉक्टर अजय खन्ना से कहा था, ‘अब समय आ गया है। अर्जुन को खत्म कर दो।’ तुम्हारे फोन में 10 लाख का ट्रांसफर था। सीडीआर से सबूत साफ है।”
पुलिस ने कोर्ट में सीडीआर फाइल रखी। हर बातचीत, हर कॉल, हर जगह दिख रहा था। जज साहब ने सीधे डॉक्टर अजय खन्ना की तरफ देखा। डॉक्टर, जो देहरादून का प्रसिद्ध निजी डॉक्टर था, साफ-साफ बैठा था। जज ने पूछा, “डॉक्टर, तुमने 14 करोड़ में सौदा किया, लेकिन शर्त रखी 16 करोड़ की। यह शर्त विनोद ने बनाई थी। तुम जानते थे कि बिना शर्मा कभी पैसे नहीं लौटाएगी। तुमने साजिश में साथ दिया।” डॉक्टर ने कहा, “जज साहब, मैंने सिर्फ पैसे के लिए काम किया। लेकिन अर्जुन को हटाने का फैसला विनोद और बिना शर्मा का था।” जज साहब ने तुरंत कहा, “यह गैंगस्टर एक्ट के तहत फरमान लगता है। 15 साल की सजा।”
अब बारी बिना शर्मा की थी। बिना शर्मा, 64 वर्षीय विधवा, सफेद साड़ी में बैठी थीं। उनका चेहरा पीला पड़ चुका था। जज साहब ने सख्ती से पूछा, “बिना शर्मा, 38 साल से विनोद को पैसे दिए, लेकिन कभी उसे बेटा नहीं माना। तुमने अर्जुन को हत्या का साजिश रचा।” बिना शर्मा ने आँखें बंद कर लीं और धीरे से कहा, “जज साहब, मैंने गलती की। अर्जुन हर दिन कहता था, ‘मां, हम कमाते हैं, लेकिन तुम्हारे खाते से पैसा कहाँ जाता है?’ मैंने इंकार कर दिया। मैंने सोचा कि जमीन मेरे नाम है, सब मेरे नाम है। लेकिन अब अहसास हो रहा है कि मैंने अपने बेटे को इतना परेशान किया।” जज साहब ने उन्हें सीधे 25 साल की सजा सुनाई। “तुम्हारा रिश्ता अजीब था। परिवार को तोड़ने की साजिश में तुम्हारा हाथ है।”
अब दोनों शूटर। पंकज राणा और राजीव उर्फ राजू। जज साहब ने कहा, “तुम दोनों सिर्फ काम के लिए थे। विनोद ने 10 लाख दिए थे। तुमने अर्जुन का सीना पर तमंचा लगाकर गोली चलाई।” दोनों ने कहा, “हमने मना किया था।” जज साहब ने कहा, “मना करने के बाद भी तुमने गोली चलाई। 10 साल की सजा।”
सुनवाई में अभिलाषा ने एक और बयान दिया। उन्होंने डायरी पेश की जिसमें अर्जुन ने लिखा था, “मां का रिश्ता गलत है, लेकिन मैं हार नहीं मानूँगा।” अभिलाषा रोते हुए बोलीं, “मेरा पति बहुत समझदार था। वह कभी झगड़ा नहीं करता था। लेकिन बिना शर्मा का डर उसको अंधा कर गया था। मैंने उन्हें समझाया था कि अर्जुन का बाप शहीद हुए थे, उनकी आत्मा शांति पाए, लेकिन वे शांति नहीं पा रहे थे।” जज साहब ने कहा, “तुम्हारा बयान बहुत महत्वपूर्ण है। तुमने सबूत दिए हैं।”
अब विनोद जेल की ओर ले जाया गया। जेल के अंदर भी उसके साथी उसे घूरते थे। उन्होंने कहा, “विनोद, तुमने अर्जुन को क्यों मारा?” विनोद ने जवाब दिया, “मां ने मुझे कभी नहीं माना। वह सिर्फ अर्जुन के पिताजी के नाम की जमीन चाहती थी। मैंने सोचा कि अर्जुन को हटाकर सब अपने नाम कर लूँगा।” जेल के अंदर ही विनोद ने एक और बात कही, “मैंने अर्जुन को पहले से ही धमकी दी थी। ‘अगर तुम मां के साथ मतलब नहीं रखोगे, तो मैं सब संभाल लूँगा।’ लेकिन अर्जुन ने इनकार कर दिया।”
देहरादून में लोग इस घटना पर चर्चा करते थे। बसंत विहार के रिश्तेदार शाम को छत पर बैठकर कहते, “पैसे ने परिवार तोड़ दिया।” कई लोग कहते, “बिना शर्मा की अहंकार ने सब बर्बाद कर दिया।” कुछ कहते, “अर्जुन समझदार था, लेकिन मां के डर से अंधा हो गया।” अर्जुन की दादी, कर्नल रमेश चंद की माँ, जो अब देहरादून के एक छोटे से फ्लैट में अकेली रहती थीं, हर शाम अर्जुन के फोटो को देखतीं। वे रोतीं और कहा, “मेरा पोता समझदार था। लेकिन मां का अहंकार उसको अंधा कर गया। अर्जुन हर दिन कहता, ‘दादी, मैं मां के साथ बात करूँगा, लेकिन वो नहीं मानतीं।’” दादी ने पुलिस को एक पुराना फोन कॉल दिया जिसमें अर्जुन ने कहा था, “दादी, मैं विनोद पर एफआईआर कर रहा हूँ। मां का रिश्ता गलत है।” दादी ने कहा, “बेटा, मैंने भी कहा था कि वह रिश्ता अजीब है। लेकिन बिना शर्मा ने दादी को भी धमकी दी थी।”
अब परिवार टूट चुका था। अभिलाषा और उसके बच्चे बेसुध हैं। बिना शर्मा जेल में बैठी सोचती हैं कि अगर उन्होंने अर्जुन से बात की होती, तो शायद यह हत्याकांड नहीं होता। अर्जुन की याद में हर रात वे रोती हैं। उनके बच्चे अब बड़े हो रहे हैं, लेकिन उनके दादा नहीं हैं। विक्रम अब स्कूल में कहता, “मेरा पापा शहीद है, लेकिन मैं मां के साथ रहूँगा।” प्रिया भी वही कहती। लेकिन दिल में सदमा था। अभिलाषा ने सोचा, “मैंने अर्जुन को समझाया था कि बिना शर्मा से बात करो, लेकिन वो नहीं मानता था।”
पुलिस और कोर्ट ने अपना काम किया। सबूत साफ हो गए। विनोद उनियाल, डॉक्टर अजय खन्ना, बिना शर्मा और दोनों शूटर को सजा सुनाई गई। जून 2026 तक सभी जेल में थे। लेकिन अब यह घटना सिखाती है कि परिवार में कोई भी झगड़ा गलत रास्ते की ओर ले जाता है। पैसे, जमीन और रिश्तों को सही तरीके से समझना जरूरी है। अगर मां और बेटे ने एक-दूसरे को समझ लिया होता, तो शायद यह हत्याकांड नहीं होता।
आज भी देहरादून में लोग इस घटना की चर्चा करते हैं और कहते हैं कि हर विवाद को समझदारी से हल करना चाहिए। अगर कोई विवाद हो तो वकील या रिश्तेदारों से बात करो, कोर्ट तक न पहुँचो। यही सीख आज भी कई परिवार ले रहे हैं। पैसे से ज्यादा रिश्ते की कीमत है। रिश्तों को तोड़ने से पहले समझो।
अर्जुन की पत्नी अभिलाषा ने फिर कहा, “मेरा पति बहुत समझदार था। लेकिन मां का डर उसको अंधा कर गया था। मैंने कोर्ट में सबूत दिए हैं कि बिना शर्मा ने साजिश रची थी।” उनके बच्चे अब उसके साथ रहते हैं। वे हर दिन अर्जुन की याद में जीते हैं। बिना शर्मा को अपनी गलती का अहसास हुआ। वे जेल में बैठी खुद को सजा देती हैं कि उन्होंने अपने बेटे को इतना परेशान किया। लेकिन कानून ने सब ठीक कर दिया।
यह घटना सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है। यह परिवार के रिश्तों, पैसे और अहंकार की कहानी है। आज भी कई लोग इस घटना से सीख रहे हैं कि रिश्तों को तोड़ने से पहले समझो। अगर मां और बेटे ने एक-दूसरे को समझ लिया होता, तो शायद अर्जुन आज भी जीवित होते और परिवार खुशहाल होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
पुलिस और कोर्ट ने अपना काम किया। विनोद उनियाल को अब जेल में सालों गुजरने पड़ेंगे। डॉक्टर अजय खन्ना ने अपनी नौकरी और सत्ता गंवा दी। बिना शर्मा की नई जिंदगी बसंत विहार में साधारण और उदास हो गई। बच्चे अर्जुन के अब उनके दादा नहीं रह गए, लेकिन वे उन्हें याद करते थे।
इस कहानी का अंत सदमा का है, लेकिन सबक अच्छा है। परिवार में एक-दूसरे को समझो, झगड़ो मत। पैसे से ज्यादा रिश्ते की कीमत है। अगर कोई विवाद हो तो वकील या रिश्तेदारों से बात करो, कोर्ट तक न पहुँचो। यही सीख आज भी कई परिवार ले रहे हैं।