Ujjain Murder Case: लव मैरिज के 2 साल बाद Biwi ने प्रेमी के साथ किया कुछ ऐसा..
Ujjain Murder Case: लव मैरिज के 2 साल बाद Biwi ने प्रेमी के साथ किया कुछ ऐसा..
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18 अगस्त 2015 की सुबह मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर के सबसे व्यस्त इलाके टावर चौक पर अचानक सब कुछ ठहर जाता है। एक उभरते हुए युवा बिजनेसमैन मनीष मीना पर दिन दहाड़े कुछ ही दूरी से अचानक जानलेवा हमला होता है। हैरानी की बात थी कि इस हमले से ठीक 5 मिनट पहले ही उनकी पत्नी मीनाक्षी उन्हें अपनी लाल स्कूटी से उसी चौक पर ड्रॉप करके गई थी। अस्पताल के बाहर वही पत्नी मीडिया के कैमरे के सामने फूट-फूट कर रोती है। पुलिस की धीमी कारवाही पर तीखे सवाल उठाती है और इंसाफ की गुहार लगाती है। तुमको यह भी पता नहीं चल रहा है कि उस पर क्या कार्यवाही चल रही है। कुछ भी नहीं पता चल रहा है।

पूरे शहर उस बेबस पत्नी के दर्द से हमदर्द जता रहा था। लेकिन किसी को नहीं पता था कि घटना के समय वो वहीं सड़क के किनारे कोने में खड़ी होकर सब कुछ अपनी नजरों से देख रही थी। आखिर कैसे एक छोटे से चाय के ठेले पर खड़े चश्मदीद ने पुलिस की पूरी थ्योरी को पलट कर रख दिया। मैं हूं आपका होस्ट इरफान। तो फिर चलिए बिल्कुल शुरुआत से समझते हैं इस सस्पेंस से भरी दास्तान को।
इस पूरी पहेली को समझने के लिए हमें करीब 2 साल पीछे जाना होगा। जब उज्जैन के रहने वाले 32 साल के मनीष मीना की जिंदगी पूरी तरह एक नए मोड़ पर आ रही थी। मनी स्वभाव से बेहद शांत, मिलनसार और अपने काम को लेकर बेहद संजीदा इंसान थे। वह प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करते थे और उनकी मेहनत का ही नतीजा था कि उन्होंने शहर में Tata Finance की एक फ्रेंचाइजी भी हासिल कर ली थी। उज्जैन के फ्रीगंज और टावर चौक जैसे प्राइम लोकेशन पर उनका रोज का आना-जाना था। उनका बिजनेस तेजी से तरक्की की ओर जा रहा था, और आसपास के कारोबारी भी उनकी ईमानदारी की मिसाल दिया करते थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात मीनाक्षी नाम की एक आधुनिक और महत्वाकांक्षी लड़की से हुई।
मीनाक्षी एक लोकल गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ में काम करती थी। दोनों के बीच पहले बातचीत शुरू हुई। मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा और देखते ही देखते यह दोस्ती गहरे प्यार में बदल गई। दोनों ने मिलकर अपनी एक खुशहाल दुनिया के सपने देखे और परिवार की रजामंदी से लव मैरिज करने का डिसाइड कर लिया। शादी के बाद शुरुआती दिन किसी सपने जैसे थे। मनीष अपनी पत्नी को बेहद चाहते थे और उन्होंने मीनाक्षी को हर तरह की आजादी दे रखी थी। मीनाक्षी का एनजीओ में काम करना, शहर भर में लोगों से मिलनाजुलना और सामाजिक कामों में भाग लेना मनीष को हमेशा अच्छा लगता था। मनीष खुद सुबह जल्दी उठकर अपने ऑफिस के काम, प्रॉपर्टी क्लाइंट्स की मीटिंग्स और अपने फाइनेंस बिजनेस के पेपर सुलझाने में लग जाते थे।
घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी। नया घर बन चुका था। कारोबार भी बहुत तेजी से बढ़ रहा था। मनीष के लिए उसका परिवार ही उसकी पूरी दुनिया थी। वह अपने पत्नी के हर छोटी बड़ी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। आसपास के पड़ोसी और रिश्तेदार भी इस कपल को देखकर यही सोचते कि दोनों की जोड़ी कितनी परफेक्ट है। लेकिन किसी को पता नहीं था कि इस खुशहाल जिंदगी की सतह के नीचे एक ऐसा भयानक तूफान आकर ले रहा था जो बहुत जल्द सब कुछ तबाह करने वाला था। वक्त बीतता है और आता है 18 अगस्त 2015 का वह मनहूस मंगलवार। सुबह के करीब 10:00 बज रहे थे। मीनाक्षी ने मनीष से कहा कि उसे एनजीओ के कुछ जरूरी सामान की खरीदारी करने के लिए मार्केट जाना है। और क्योंकि मनीष का ऑफिस भी उसी रास्ते पर पड़ता था इसलिए वह खुद उन्हें अपनी लाल रंग की स्कूटी पर ड्रॉप कर देगी। मनीष खुशी-खुशी अपनी पत्नी के साथ स्कूटी पर बैठ गए। करीब 10:30 बजे मीनाक्षी ने टावर चौक के पेट्रोल पंप के पास मनीष को उतारा। मनीष स्कूटी से उतर कर पैदल अपनी दुकान की तरफ बढ़ने लगा और मीनाक्षी ने वहीं से अपनी स्कूटी मोड़ ली। लेकिन इससे पहले कि मनीष अपनी दुकान तक पहुंच पाते काले रंग की एक Pulsar बाइक पर सवार दो लड़के पीछे से उनके बिल्कुल करीब आते हैं। पीछे बैठे लड़के ने हाथ में छिपाया हुआ हथियार निकाला और बिना किसी चेतावनी के मनीष पर बिल्कुल करीब से हमला कर दिया। गोली की तेज आवाज से पूरा बाजार दहल उठा और मनीष वहीं डिवाइडर के पास गिर पड़े। चारों तरफ चीख पुकार मच गई। दुकानदार अपनी दुकानों के शटर गिराने लगे और भीड़ में अफरातफरी का माहौल बन गया। हमलावर उसी तेज रफ्तार बाइक से संखरी गलियों की तरफ फरार हो गए। लोगों ने देखा कि लहूलुहान हालत में जमीन पर पड़ा शख्स कोई और नहीं बल्कि उनके अपने परिचित व्यापारी मनीष मी थे। इसके बाद लोगों ने पुलिस को कॉल किया और मनीष को नजदीकी अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने मनीष की नाजुक हालत को देखते हुए उन्हें फौरन सीएचएल हॉस्पिटल के लिए रेफर कर दिया। जहां उन्हें आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। उनके सिर में गंभीर चोट आई और वह कोमा में चले गए थे। जिंदगी और मौत के बीच यह जंग अगले 4 दिनों तक चलती रही। लेकिन 22 अगस्त को आखिरकार मनीष ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद ली। इस खबर ने पूरे उज्जैन शहर को हिला कर रख दिया था। वारदात की खबर मिलते ही मीनाक्षी अस्पताल पहुंची और वहां उसने रो-रो कर आसमान से पर उठा लिया। वो वहां मौजूद लोगों और पुलिस अफसरों के सामने बार-बार दोहरा रही थी कि उसने तो अभी 10:30 बजे मनीष को बिल्कुल सही सलामत चौक पर छोड़ा था। फिर अचानक यह कैसे हो गया? कौन थे वह लोग? और मनीष की उनसे क्या दुश्मनी थी? मीनाक्षी ने पुलिस के सामने खुलकर अपना गुस्सा जाहिर किया और जांच पर सवाल खड़े किए। उसने मीडिया के कैमरों के सामने आकर बयान दिया कि उज्जैन पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है और अगर जल्द कातिल नहीं पकड़े गए तो शहर में कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि शहर के पुलिस कप्तान यानी एसपी ने हमलावरों की जानकारी देने वालों को ₹10,000 का इनाम तक घोषणा कर दिया। पुलिस की कई टीमें सीसीटीवी फुटेज और पुरानी रंजिश के एंगल से तफ्तीश में जुट गई। लेकिन मुश्किल यह थी कि उस समय उस खास स्पॉट पर कोई एक्टिव सीसीटीवी कैमरा मौजूद नहीं था जिससे बाइक का नंबर या हमलावरों का चेहरा साफ देखा जा सके। शुरुआती तीन दिनों तक पुलिस बिल्कुल अंधेरे में तीर चला रही थी। मनीष की किसी से भी कोई कारोबारी दुश्मनी सामने नहीं आई। तभी जांच टीम के एक अनुभवी सिपाही ने ग्राउंड लेवल पर जाकर आसपास के छोटे दुकानदारों और ठेलों पर पूछताछ शुरू की। इसी दौरान टावर चौक के किनारे चाय की टफरी लगाने वाले लड़के के पास से एक बेहद अहम सुराग मिला। उस चाय की दुकान के पास नाली के किनारे दो स्थानीय लड़के खड़े थे। जिन्होंने उस सुबह पूरी वारदात को अपनी आंखों से देखा था। पुलिस ने जब उन दोनों गवाहों को भरोसे में लेकर पूछताछ की, तो उन्होंने एक ऐसा खुलासा किया, जिसने जांच की सारी दिशा ही बदल दी। उन लड़कों ने बताया कि जब बाइक मनीष के पास से गुजरी तो पीछे बैठे लड़कों ने अपना चेहरा पूरी तरह नहीं ढका था। एक गवाह ने साफ शब्दों में कहा कि सर हम उस लड़के को पहचानते हैं। वो इसी इलाके के पास रहता है और उसका नाम हनीफ है। हनीफ नाम का सामने आते ही पुलिस के कान खड़े हो गए। पुलिस ने बिना कोई वक्त गवाए अपनी एक स्पेशल टीम तैयार की और शहर के एक रियाशी इलाके से हनीफ को उसके ठिकाने से हिरासत में ले लिया। थाने लाकर जब हनीफ से पूछताछ शुरू हुई तो शुरुआत में उसने खुद को बिल्कुल इनोसेंट दिखाने की कोशिश की। उसने कहा कि वह मनीष मीना को जानता तक नहीं और उस सुबह वो अपने काम पर था। लेकिन जैसे ही पुलिस ने उन दोनों चश्मदीद गवाहों को उसके सामने लाकर खड़ा किया हनीफ के चेहरे का रंग उड़ गया। पुलिस की सख्त पूछताछ के सामने वह ज्यादा देर तक टिक नहीं पाया और टूट गया। उसने कबूल किया कि बाइक पर पीछे बैठा इंसान और कोई नहीं बल्कि वह खुद था। साथ ही हनीफ ने बताया कि बाइक चलाने वाला उसका ही एक साथी रिजवान था। हनीफ की निशानानदेही पर पुलिस ने फौरन रिजवान को दबोच लिया। इसके बाद कड़ तेजी से जुड़ने लगी। पता चला कि वारदात में इस्तेमाल की गई काली बाइक किसी शख्स से कुछ देर के लिए मांगी गई थी। जबकि हथियार का इंतजाम किसी और लड़के के जरिए हुआ था। पुलिस ने एक-एक करके चारों को गिरफ्त में ले लिया। मामला सुलझा हुआ नजर आ रहा था। लेकिन पुलिस अफसरों के दिमाग में सबसे बड़ा सवाल अब भी चल रहा था। इन लड़कों की मनीष मीना से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी। ना ही उन्होंने मनीष से कोई लूटपाट की थी। तो फिर सुपारी किसने दी? इनका असली मकसद क्या था? जब पुलिस ने हनीफ को अलग कमरे में ले जाकर कड़ाई से पूछताछ की कि तुम्हें मनीष को निशाना बनाने के लिए किसने कहा था? तो हनीफ ने जो नाम लिया उसने कमरे में खड़े हर पुलिस वाले के होश उड़ा दिए। हनीफ ने सीधे तौर पर कहा कि यह सब कुछ किसी बाहरी दुश्मन ने नहीं बल्कि मनीष की अपनी पत्नी मीनाक्षी के कहने पर किया गया था। यह सुनते ही पुलिस की पूरी टीम सन रह गई। हनीफ के मुंह से मीनाक्षी का नाम सुनते ही पुलिस स्टेशन में सन्नाटा पसर गया। किसी भी पुलिस अफसर के लिए इस बात पर तुरंत यकीन करना नामुमकिन था क्योंकि वह वही मीनाक्षी थी जो 4 दिन अस्पताल में आंसू बहा रही थी। मीडिया में पुलिस को नकारा बता रही थी और अपने पति के लिए इंसाफ की भीख मांग रही थी। लेकिन तफ्तीश में भावना नहीं सिर्फ सबूत मायने रखता है। पुलिस ने बिना कोई जल्दबाजी किए सबसे पहले पर्दे के पीछे की डिजिटल कड़ियों को जोड़ना शुरू किया। करीब 300 घंटे तक चली इस बाइक जांच में पुलिस ने जब मीनाक्षी का पर्सनल फोन रिकॉर्ड चेक किया तो वह बिल्कुल साफ नजर आया। उसमें सिर्फ मनीष और उसके कुछ रिश्तेदारों के आम कॉल्स थे। लेकिन जब पुलिस ने हनीफ के पास से मिले दूसरे सीक्रेट फोन की कॉल डिटेल खंगाली तो जांच अधिकारियों की आंखें खुली की खुली रह गई। हनीफ के उस फोन पर एक अनजान नंबर से लगातार कॉल्स आ रहे थे। पुलिस जब उस नंबर के पते पर पहुंची तो पता चला कि वो सिम कार्ड एक बेहद गरीब महिला के नाम पर रजिस्टर था। उसने कभी अपनी जिंदगी में मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं किया था। दरअस्त मीनाक्षी और हनीफ दोनों एक ही एनजीओ में काम करते थे और उन्होंने वहीं जमा किए गए आधार व पहचान पत्र का गलत इस्तेमाल करके फर्जी नाम पर सिम एक्टिवेट करवाया था। जब पुलिस ने 18 अगस्त की सुबह की कॉल डिटेल्स का टाइम स्टैंप निकाला तो सारा सच शीशे की तरह साफ हो गया। सुबह 10:30 बजे मनीष को सड़क पर छोड़ने के ठीक बाद फोन पर बातें होती रही। हर कॉल 30 से 40 सेकंड का था। जिसमें मीनाक्षी यह कंफर्म कर रही थी कि मनीष पर हमला हुआ या नहीं। वो किस हालत में है और हमलावर सुरक्षित भागे या नहीं। जब पुलिस ने दोनों के फोन का डाटा रिकवर किया तो एक ऐसा डिजिटल सबूत हाथ लगा जिसने इस केस की पूरी नींव रख दी। उनके फोन से मीटिंग ऑफ माइंड नाम की एक 20 मिनट की कॉल रिकॉर्डिंग बरामद हुई। उसमें वारदात से ठीक 1 दिन पहले मनीष को रास्ते से हटाने की पूरी प्लानिंग तय की गई थी। स्कूटी से ड्रॉप करने का समय, टावर चौक के लोकेशन और भागने का रूट सब कुछ उसी रिकॉर्डिंग में पहले से फिक्स था। हनीफ ने अपने बचने के लिए एनजीओ के रजिस्टर में छेड़छाड़ करके अपनी एंट्री 10:30 बजे दिखाने की कोशिश की थी। लेकिन ऑफिस के गार्ड ने साफ गवाही दी कि दोनों उस दिन काफी देर से ऑफिस पहुंचे थे। जब मीनाक्षी को भनक लगी कि पुलिस उस तक पहुंच चुकी है। तो उसने हड़बड़ाहट में अपना सीक्रेट सिम कार्ड चबाकर नष्ट करने की कोशिश की। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब सबसे बड़ा सवाल यह था कि जिस पति के साथ 2 साल पहले लव मैरिज हुई थी जो मनीष अपने पत्नी के हर खुशी का ख्याल रखता था। आखिर मीनाक्षी ने उसी को मिटाने का खौफनाक फैसला क्यों लिया? पूछताछ में जब परतें खुली तो एक ऐसा सच सामने आया जिसने रिश्तों के विश्वास को झकझोर कर रख दिया। एनजीओ में काम करने के दौरान मीनाक्षी और हनीफ की दोस्ती धीरे-धीरे एक अवैध रिश्ते में बदल चुकी थी। वारदात से कुछ महीने पहले हनीफ के मोहल्ले वालों ने एक दिन मीनाक्षी को उसके घर में बेहद आपत्तिजनक हालत मेंंगे हाथों पकड़ लिया था। मोहल्ले के लोगों ने हंगामा किया और तुरंत मनीष को वहां बुला लिया। जब मनीष ने अपनी आंखों से अपनी पत्नी की यह हरकत देखी तो उसका दिल टूट गया। उस दिन के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। मनीष लगातार सदमे में था और दोनों के बीच रोज तीखी बहस होने लगी। मनीष ने गुस्से में यह तक कह दिया था कि वह मीनाक्षी और हनीफ दोनों को कभी माफ नहीं करेंगे और इसका अंजाम बहुत बुरा होगा। मीनाक्षी को लगने लगा कि उसका शादीशुदा जीवन और समाज में उसकी प्रतिष्ठा हमेशा के लिए खत्म हो चुकी है और उसे डर था कि मनीष कोई सख्त कानूनी या निजी कदम उठा सकता है। अपनी गलती को मानने और सुधारने के बजाय मीनाक्षी ने अपने प्रेमी हनीफ के साथ मिलकर एक ऐसा भयानक कदम उठाने का फैसला किया जिससे वह मनीष को ही रास्ते से हटाकर हमेशा के लिए आजाद हो सके। जब पुलिस ने मीनाक्षी को हिरासत में लेकर ऑडियो रिकॉर्डिंग्स, फर्जी सिम के पेपर्स और कॉल टाइमिंग्स के सबूत उसके सामने रखे, तो उसका सारा आत्मविश्वास निखर गया। मीडिया के सामने बेकसूर और बेबस पत्नी का जो नकाब उसने पहना था, वो एक झटके में उतर गया। उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया कि उसी ने पूरी साजिश रची थी, ताकि वह कानूनी तौर पर खुद को विक्टिम दिखा सके, और किसी को उस पर रत्ती भर भी शक ना हो। पुलिस ने मामले की चार्जशीट इतनी मजबूती से तैयार की कि अदालत में बचाव पक्ष की कोई भी दलील टिक नहीं पाई। सीसीटीवी ना होने के बावजूद चाय के ठेले वाले चश्मदीदों की गवाही, जब्त की गई बाइक, हथियार और कॉल डाटा रिकॉर्ड्स ने आरोपियों के बचने का हर रास्ता बंद कर दिया था। मामला जब अदालत पहुंचा तो उज्जैन की सेशन कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर और सुनियोजित साजिश करार दिया। अदालत ने मुख्य साजिशकर्ता मीनाक्षी और गोली चलाने वाले हनीफ को मीना की जान लेने के जुर्म में उम्र कैद यानी आजीवन कारावास की सख्त सजा सुनाई। वहीं बाइक चलाने वाले रिजवान ने अदालत में कई बार दलील दी कि वह मुख्य साजिश में शामिल नहीं था और सिर्फ गाड़ी चला रहा था। बरसों तक चली कानूनी याचिकाओं और लगभग 10 साल की सजा पूरी करने के बाद कानूनी प्रावधानों के तहत उसकी रिहाई की प्रक्रिया आगे बढ़ी। लेकिन इस पूरे प्लानिंग की मास्टरमाइंड मीनाक्षी और शूटर हनीफ आज भी सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी काट रहे हैं। यह दास्तान सिर्फ एक सनसनीखेज वारदात की नहीं है बल्कि इस बात का कड़वा सबूत है कि इंसान जब लालच और फरेब के रास्ते पर चलता है तो वह अपने सबसे करीबी इंसान का भरोसा भी बेरहमी से तोड़ सकता है। मीनाक्षी ने सोचा था कि उसका झूठा रोना और मीडिया के सामने ड्रामा उसे कानून की नजर से बचा लेगा। लेकिन एक छोटी सी चाय के दुकान पर खड़े दो अनजान गवाहों और पुलिस की डिजिटल जांच ने इस परफेक्ट लगने वाले अपराध को हमेशा के लिए बेनकाब कर दिया। दोस्तों, इस दिल दहला देने वाले मामले पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट करके जरूर बताएं और साथ ही अगर आप हर रोज इस तरह की क्राइम स्टोरीज देखना पसंद करते हैं, तो अभी हमारे चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन को जरूर दबाएं। दिल्ली के द्वारका इलाके का एक शांत अपार्टमेंट। जहां 21 अगस्त की सुबह 4:30 बजे एक अनजान सन्नाटा अचानक फोन की घंटी से टूटती है। देश के मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर के पद पर तैनात एक 30 साल की काबिल होनार ऑफिसर नाजिया अपने ही ससुराल के कमरे में संदिग्ध और बेजान हालत में पाई जाती है। शादी के महज 4 महीने ही बीते थे और नाजिया के साथ बंद दरवाजे के अंदर एक ऐसी अनहोनी हो जाती है। बिहार से बदहवास हालत में पहुंचे नाजिया के परिवार का सीधा आरोप था कि यह कोई साधारण घटना नहीं बल्कि महीनों से चले आ रहे दबाव, लालच और मानसिक यातना का नतीजा है। क्या वाकई एक मजबूत इरादों वाली क्लास वन ऑफिसर यूं ही अपने और अपने अजन्मे बच्चे की जिंदगी से हार मान सकती है या फिर उस बंद कमरे की चार दीवारी के पीछे कोई ऐसा गहरा राज छिपा था जिसे दबाने की कोशिश की जा रही थी। तो फिर चलिए बिल्कुल शुरुआत से समझते हैं आज की इस सस्पेंस से भरी दास्तान को। एक बेहद साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी नाजिया शुरू से ही आम बच्चों से बिल्कुल अलग थी। जिस उम्र में अक्सर लड़कियां सिर्फ सामान्य भविष्य के सपने देखती है, उस उम्र में नाजिया की आंखों में कुछ बड़ा कुछ असाधारण करने का जुनून था। उनके पिता और भाइयों ने हमेशा उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और नाजिया ने भी अपनी पूरी ताकत पढ़ाई में झोंक दी। घंटों लालटेन और टेबल लैंप की रोशनी में बैठकर किताबें पढ़ना उनकी रोजमर्रा की आदत बन चुकी थी। परिवार की आर्थिक स्थिति कोई मजबूत नहीं थी लेकिन नाजिया के हौसले इतने बुलंद थे कि कोई भी रुकावट उनके रास्ते को रोक नहीं पाई। उनकी कड़ी मेहनत और लगन का ही नतीजा था कि उन्होंने अपनी पहली ही कोशिश में बेहद कठिन माने जाने वाली प्रतियोगी परीक्षा पास की और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में अपनी जगह बनाकर पूरे इलाके का नाम रोशन कर दिया। पूरे गांव और रिशेदारी में नाजिया की इस कामयाबी की मिसालें दी जाने लगी। लेकिन नाजिया का लक्ष्य यही खत्म नहीं हुआ। वह अपने मुकाम को और ऊंचा ले जाना चाहती थी। दिन में नौकरी की जिम्मेदारियां निभाना और रात में फिर से कड़ी इम्तिहान यानी कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल की पढ़ाई करना उनका डेली रूटीन बन चुका था। नाजिया ने एक बार फिर अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया और देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में शानदार रैंक हासिल करके मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस यानी रक्षा मंत्रालय में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर के पद पर चुनी गई। यह वही रक्षा मंत्रालय है जहां देश की संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े बेहद अहम और गोपनीय दस्तावेज तैयार होते हैं। नाजिया अपने ऑफिस में बेहद अनुशासित, समझदार और जिम्मेदार ऑफिसर के रूप में पहचानी जाने लगी। वह हर सुबह मुस्कुराते हुए अपने दफ्तर निकलती और अपने काम को पूरी निष्ठा से अंजाम देती और शाम को घर आकर अपने परिवार से लंबी बातें करती। वह अपने भाइयों की सबसे लाडली थी और अपनी मां की सबसे गहरी राजदार भी थी। जब नाजिया अपने करियर के सबसे बेहतरीन मुकाम पर पहुंच गई तो परिवार ने उनके लिए उनके लिए एक अच्छे जीवन साथी की तलاش शुरू की। परिवार चाहता था कि नाजिया जैसी समझदार और आत्मनिर्भर लड़की को एक ऐसा जीवन साथी मिले जो उसकी कामयाबी की कद्र करे। तभी रिश्ता आया दिल्ली के द्वारका इलाके में रहने वाले अमजद अली खान के परिवार से। पहली नजर में यह रिश्ता हर किसी को बिल्कुल परफेक्ट लगा। अमजद का परिवार दिल्ली के वेल सेटल्ड और आर्थिक रूप से बेहद संपन्न परिवारों में से गिना जाता था। उनके परिवार का बैकग्राउंड पुलिस और प्रशासन महकमे से जुड़ा हुआ था। जिसके चलते समाज में उनका काफी दबदबा और रसूख माना जाता था। पैसों की कोई कमी नहीं थी और लड़का भी दिल्ली के एक पौस इलाके में सेटल था। नाजिया के परिवार को लगा कि देश के रक्षा मंत्रालय में काम करने वाली उनकी होनार बेटी के लिए इससे बेहतर रिश्ता और कोई नहीं मिल सकता। दोनों परिवारों की रजामंदी के बाद 11 अप्रैल को दिल्ली में दोनों की शादी बेहद धूमधाम और खुशी के माहौल में संपन्न हुई। शादी में नाजिया के परिवार ने अपनी हैसियत से बढ़कर हर रस्म को पूरा किया ताकि उनकी बेटी का आने वाला कल खुशहाल रहे। शादी के बाद नाजिया दिल्ली के द्वारका स्थित अपने ससुराल में रहने लगी। शुरुआती दिनों में सब कुछ बहुत सामान्य और सुखद लग रहा था। नाजिया अपनी सरकारी नौकरी की जिम्मेदारियों को भी बखूबी संभाल रही थी और ससुराल में नए रिश्तों को भी दिल से अपनाने की पूरी कोशिश कर रही थी। कुछ ही हफ्तों बाद जब घर में यह खुशखबरी आई कि नाजिया 3 महीने की प्रेग्नेंट है तो नाजिया की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं रहा। वो मां बनने के इस नए एहसास को लेकर बेहद उत्साहित थी और एक नन्हे मेहमान के स्वागत के लिए अपने भविष्य के सपने बुनने लगी थी। लेकिन बाहर से जितनी खूबसूरत और परफेक्ट यह जिंदगी दिख रही थी, असल में वैसा नहीं था। उस चार दीवारी के अंदर धीरे-धीरे एक अजीब माहौल अपनी जड़े जमा रही थी। शादी की चमक-धमक जैसे-जैसे फीकी पड़ी, उस घर के अंदर का माहौल बहुत तेजी से बदलने लगा। नाजिया के परिवार के मुताबिक रिश्ते की शुरुआत में जो परिवार बेहद सुलझा हुआ और आधुनिक नजर आ रहा था, उनके अंदर से एक अजीब तरह के लालच और गैरवाजिब उम्मीदों की परतें खुलने लगी थी। असल में शादी के समय ही लड़के की तरफ से कुछ बेहद महंगी फरमाइशें रखी गई थी। जैसे करीब ₹60,000 की ब्रांडेड घड़ी और ₹17,000 के जूते। उस वक्त लड़की के परिवार ने इसे शादी का उत्साह समझकर नजरअंदाज कर दिया और बिना किसी शिकायत के सब कुछ पूरा किया। लेकिन शादी के बाद पति का यह डिमांडिंग नेचर और भी तीखा हो गया। ससुराल पक्ष को शायद यह बात हजम नहीं हो रही थी कि नाजिया खुद एक स्वतंत्र समझदार और क्लास वन सरकारी अफसर है जो अपने आत्मसम्मान से कभी भी समझौता नहीं करती थी। नाजिया के साथ घर के अंदर लगातार मानसिक खिंचाव और इमोशनल तनाव का माहौल बनाया जाने लगा। प्रेगनेंसी के उन बेहद नाजुक और शुरुआती महीनों में जब एक महिला को सबसे ज्यादा शारीरिक आराम, मेडिकल केयर और अपने लाइफ पार्टनर के इमोशनल सपोर्ट की जरूरत होती है। उस वक्त नाजिया को लगातार तानों, उपेक्षा और झगड़ों का सामना करना पड़ता था। नौकरी की थकान और प्रेगनेंसी की शारीरिक परेशानियों के बीच जब नाजिया घर लौटती तो उन्हें सुकून के बजाय मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता। नाजिया अपनी यह पीड़ा किसी बाहरी इंसान को साझा नहीं कर पाती थी। लेकिन वो अक्सर अपने मायके फोन करके घंटों अपनी मां के सामने रोया करती थी। वह अपने मां को बताती थी कि कैसे उनके साथ हर छोटी बातों पर बदसलूकी की जाती है। उनकी सेहत और इलाज को लेकर ससुराल में कोई गंभीरता नहीं दिखाई जाती और कैसे उन पर हर कदम पर मानसिक दबाव बनाया जाता है। लेकिन बिहार में बैठे परिवार को उस वक्त यह लगा कि शायद यह शादी के शुरुआती महीनों का सामान्य एडजस्टमेंत है। माता-पिता और भाई नाजिया को समझाते रहे कि हर नई शादी में थोड़ा वक्त लगता है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा और दोनों के बीच समझदारी बन जाएगी। परिवार उसे हिम्मत बंधाता रहा और थोड़ा सब्र रखने की सलाह देता रहा। लेकिन उन्हें इस बात का जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि नाजिया हर दिन अपने फर्ज, अपनी नौकरी और अपने अजन्मे बच्चे के भविष्य के बीच संतुलन बनाने के लिए अकेले ही गहरी मानसिक संघर्ष झेल रही थी। फिर तारीख आती है 21 अगस्त। उस दिन शाम के वक्त द्वारका के उस फ्लैट में दोनों के बीच किसी बात को लेकर बहुत तीखी बहस होती है। इसके बाद जो कहानी पति अमजद द्वारा रखी गई, वह बेहद अजीब और संदेहजनक थी। अमजद के बयानों के मुताबिक बहस के बाद नाजिया ने उसे एक कमरे में बाहर से बंद कर दिया और खुद दूसरे कमरे में चली गई। अमजद का दावा था कि उसे शक हुआ कि नाजिया कोई गलत कदम उठा सकती है। इसलिए उसने सीधे पुलिस या इमरजेंसी को कॉल करने के बजाय अपने मकान मालिक को फोन किया और बालकनी के रास्ते सीढ़ी मंगवाकर किसी तरह कमरे से बाहर निकला। अमजद का कहना था कि जब उसने खिड़की से देखा तब तक बहुत देर हो चुकी थी और नाजिया की सांसे थम चुकी थी। अगले दिन सुबह 4:30 बजे बिहार में सो रहे नाजिया के पिता के फोन की घंटी बजती है। दूसरी तरफ नाजिया के ससुर थे जिन्होंने बिना किसी भूमिका के बेहद सपाट और ठंडे लहजे में सिर्फ इतना कहा कि आपकी बेटी इस दुनिया में नहीं है। यह खबर सुनते ही परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस बेटी ने कुछ घंटों पहले ही अपनी मां से बातें की थी, जो अपने होने वाले बच्चे के लिए सपने देख रही थी, वो अचानक इस तरह कैसे खामोश हो सकती थी। परिवार ने बिना एक पल गवाए तुरंत पहली फ्लाइट पकड़ी और दिल्ली के लिए रवाना हो गए। दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते ही भाई और पिता सीधे थाने और मोर्चरी की तरफ भागे। लेकिन वहां पहुंचते ही उनके सामने जो सच्चाई आई, उसने उनके होश पूरी तरह उड़ा दिए। ससुराल का कोई भी सदस्य वहां मौजूद नहीं था। पति का फोन लगातार बंद आ रहा था और पुलिस की तरफ से भी उन्हें अपनी बेटी का चेहरा तक देखने के लिए घंटों कानूनी उलझनों में उलझाया जाने लगा। परिवार को समझ आ चुका था कि यह मामला उतना सीधा नहीं है जितना दिखाया जा रहा है बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी लीपापोती और अनसुलझी मिस्ट्री छुपी हुई थी। उस वक्त करीब दोपहर के 3:00 बज रहे थे। तपती धूप में उनके जहन में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी कि जो लाडली कुछ दिनों पहले तक रक्षा मंत्रालय के साउथ ब्लॉक जैसे सुरक्षित गलियारे में सिर उठाकर जाती थी। आज उसी दिल्ली की एक ठंडी मोर्चरी में खामोश पड़ी थी। जिस बेटी को महज 4 महीने पहले लाल जोड़े में विदा किया गया था। आज उसके आखिरी दीदार के लिए सिस्टम के सामने हाथ फैलाना पड़ रहा था। थाने के भीतर उन्हें सिर्फ कानूनी प्रक्रियाओं का जटिल चक्रव्यूह मिला। ड्यूटी ऑफिसर और केस के आईओ ने सपाट लहजे में कहा कि क्योंकि यह एक विवाहिता की संदिग्ध मौत का मामला है। इसलिए जब तक एसडीएम की मौजूदगी में पूरी इंक्वायरी और बयान दर्ज नहीं हो जाते तब तक किसी को भी मोर्चरी के अंदर जाने की इजाजत नहीं मिलेगी। घंटों थाने के बरामदे में मिठाई रखने के बाद जब नाजिया के छोटे भाई को बयान दर्ज करने के लिए ले जाया गया तो एसडीएम की गैर मौजूदगी में कुर्सी पर तहसीलदार बैठे थे। उस बेबस भाई ने अपने बहन के साथ हुए अन्याय की दास्ता बयां की। उसने बताया कि कैसे एक क्लास वन ऑफिसर को मानसिक रूप से तोड़ा जा रहा था। कैसे लगातार पैसों और फरमाइशों का दबाव बनाया जा रहा था और कैसे 3 महीने की प्रेगनेंसी के दौरान भी उसे जरूरी मेडिकल केयर तक नहीं दी गई। तहसीलदार ने परिवार को भरोसा दिलाया कि कानून सबके लिए बराबर है और इन बयानों के आधार पर पुलिस सख्त धाराओं में तुरंत एक्शन लेगी। लेकिन थाने की हकीकत इन आश्वासनों से बिल्कुल उलट थी। दिन ढलकर रात हुई और फिर अगली सुबह। लेकिन 48 घंटे से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी उस पिता को अपनी बेटी का चेहरा तक देखने का मौका नहीं मिला। थाने से मोर्चरी के चक्कर काटते-काटते परिवार के सब्र का बांध पूरी तरह से टूटने लगा। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे संदिग्ध बात यह थी ससुराल पक्ष का सीन से पूरी तरह गायब हो जाना। जिस पति अमजद को इस दुख की घड़ी में सबसे आगे होना चाहिए था वो अस्पताल से लेकर थाने तक कहीं नजर नहीं आया। अमजद के पिता बाबर खान जिन्होंने सुबह फोन पर मौत की खबर दी थी, उनका और पूरे परिवार का फोन लगातार स्विच ऑफ आने लगा। परिवार का आरोप था कि ससुराल का बैकग्राउंड पुलिस और प्रशासन से जुड़ा हुआ था। इलाके में उनका भारी रसूख और पैसे का दबदबा था। परिवार का दावा था कि इस प्रभाव का इस्तेमाल करके घटना के बाद फ्लैट के भीतर मौजूद जरूरी सुरागों और परिस्थितियों को अपने हक में मोड़ने की कोशिश की गई। बिहार से दिल्ली पहुंचने में परिवार को जो 4- 5 घंटे का वक्त लगा, उस दौरान मौके पर क्या-क्या बदला गया, यह आज भी एक बड़ा अनसुलझा सवाल बन चुका है। सिस्टम का असली खेल तब सामने आया जब मामले में पहली आधिकारिक एफआईआर दर्ज करने का वक्त आया। परिवार ने अपने लिखित शिकायत में साफ दर्ज कराया था कि शादी को केवल 4 महीने हुए थे और नाजिया को लगातार मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनाया गया। कानून के स्पष्ट नियमों के मुताबिक शादी के 7 साल के भीतर किसी भी संदिग्ध परिस्थिति में जान जाने पर प्राथमिकता के तौर पर सख्त और गैर जमानती धाराएं लागू होती है। लड़की के परिवार ने जब भी धाराओं के बारे में पूछता उन्हें यह कहकर चुप करा दिया जाता कि कागज तैयार हो रहे हैं और वक्त आने पर कॉपी मिल जाएगी। तीन दिनों की भारी जिद्दोजहद के बाद आखिरकार आधी रात के करीब 1:30 बजे पुलिस ने एफआईआर की कॉपी भाई के हाथों में थमाई। जब भाई ने उस दस्तावेज को देखा तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। एफआईआर में केवल वीएनएस की धारा 85 और 108 दर्ज की गई जो घरेलू क्रूरता और उकसाने के संबंधित है। शादी के 7 साल के भीतर संदिग्ध मौत वाली सख्त धाराओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था। हैरानी की बात यह थी कि शिकायत की जो रिसीविंग दी गई थी उस पर थाने की कोई आधिकारिक सील तक नहीं थी। सिर्फ पेन से एक साधारण नंबर दर्ज था। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब एफआईआर में पीड़ित परिवार के बयानों से ज्यादा आरोपी पति अमजद की कहानी को दी गई। जिनमें उसने खुद को लाचार और कमरे में बंद दिखाने का दावा किया था। यह साफ इशारा कर रहा था कि कानूनी पहलू को शुरुआत में ही हल्के करने की कोशिश कर दी गई है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस पूरे मामले का असली मोटिव क्या था? उस घर के भीतर ऐसा कौन सा लालच था जिसने कामयाब ऑफिसर को इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। परिवार के मुताबिक रिश्ते की शुरुआत में ही लड़के की तरफ से 60 की लग्जरी घड़ी और 17,000 के ब्रांडेड जूते जैसी बेतुकी फरमाइशें की गई थी। उस वक्त परिवार ने रिश्ते की खातिर सब कुछ पूरा किया। लेकिन जब परिवार वालों ने देखा कि नाजिया अपने वसूलों पर चलने वाली एक मजबूत लड़की है और वह किसी भी दबाव के आगे झुकती नहीं तो उस घर में ईगो और वर्चस्व की जंग शुरू हो गई। नाजिया जैसी मजबूत लड़की जिसने बिहार के गांव से निकलकर बिना कोचिंग के अपनी मेहनत से पहले इनकम टैक्स और फिर रक्षा मंत्रालय में मुकाम हासिल किया हो वो किसी छोटी बहस से टूटने वाली नहीं थी। मगर प्रेगनेंसी एक ऐसा दौर होता है जहां हर महिला अपने भीतर पल रहे जीवन के लिए बेहद संवेदनशील हो जाती है। नाजिया साउथ ब्लॉक की जिम्मेदारियों और घर के तानों के बीच पीस रही थी। वो मां को रो-रो कर सब बताती थी। लेकिन मायके वालों ने रिश्ते को बचाने के लिए उन्हें सब्र रखने को कहा और यही बात आगे चलकर उनके परिवार वालों के सीने में खंजर की तरह चुभने लगी। पति अमजद की बालकनी और सीढ़ी वाली कहानी कई गंभीर सवाल खड़ा करती है। अमजद का दावा था कि नाजिया ने उसे कमरे में बंद कर दिया और उसने सीढ़ी मंगवाकर बाहर निकलकर खिड़की से देखा। अब सवाल यह उठता है कि अगर कोई अपनी पत्नी को किसी खतरे में देखता है तो पहला रिएक्शन 112 नंबर पर कॉल करना या पड़ोसियों को पुकारना होता है ना कि चुपचाप सीढ़ी का इंतजार करना। बाहर आने के बाद उसने तुरंत दरवाजा तोड़कर नाजिया को अस्पताल ले जाने की कोशिश क्यों नहीं की। यह घटना रात की थी तो मायके वालों को सुबह 4:30 बजे खबर क्यों दी गई? और अगर अमजद बेकसूर था तो वह और उसका परिवार जांच में शामिल होने के बजाय फरार क्यों हो गया? नाजिया का परिवार आज किसी बदले की नहीं बल्कि सिर्फ सच और निष्पक्ष न्याय की मांग कर रहा है। उनकी साफ मांग यह है कि मामले की जांच स्थानीय पुलिस से हटाकर सीबीआई को सौंपा जाए या हाईकोर्ट की निगरानी में एसआईटी बनाई जाए ताकि सच सामने आ सके। दोस्तों, यह अभी ऑनगोइंग केस है। इसलिए अगर आपको इस केस का अंत जानना है, तो एक या दो हफ्ते में आप इस वीडियो को फिर से चेक आउट कर सकते हैं। आपको कमेंट बॉक्स पर अपडेट मिल जाएगी। द्वारका का यह मामला हम सभी के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है कि क्या किसी बेटी का आत्मनिर्भर होना भी उसे इस तरह से दबाव और सुरक्षित रखने के लिए काफी नहीं है? दोस्तों, इस वीडियो के बारे में आपकी क्या राय है? हमें कमेंट करके जरूर बताएं। अगर आपको इस तरह की 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