अखिलेश Vs योगी कौन जीतेगा चुनाव?
अखिलेश Vs योगी कौन जीतेगा चुनाव?
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उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का सरप्राइज टिकट और दिल्ली की राजनीति का नया समीकरण
उत्तर प्रदेश की दस राज्यसभा सीटों के चुनाव ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। समाजवादी पार्टी ने रामगोपाल यादव के अलावा धनराज परिमल नाथवानी का नाम अचानक सामने रखा। यह नाम कल तक आम चर्चा में नहीं था। परिमल नाथवानी रिलायंस समूह से जुड़े रहे हैं और कॉर्पोरेट मामलों में उनकी पहचान है। हाल में वे भाजपा के समर्थन से झारखंड से राज्यसभा पहुंचे थे। अब उनके सुपुत्र समाजवादी पार्टी के टिकट पर उत्तर प्रदेश से जा रहे हैं। इसी एक नाम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—समाजवाद की पुरानी छवि, अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग की उम्मीदें, और पार्टियों व उद्योग जगत के रिश्ते।
इंडिया टीवी के कार्यक्रम कॉफी पर कुरुक्षेत्र में सौरभ शर्मा के साथ राजनीतिक संपादक देवेंद्र पराशर, लेखक-कमेंटेटर शांतनु गुप्ता और प्रदीप सिंह ने इसी पहेली को खोला। चर्चा की शुरुआत दो खबरों से हुई। एक, उत्तर प्रदेश राज्यसभा में अखिलेश यादव कितनी सीटें जिताएंगे और भाजपा कितनी। दूसरी, दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में करीब बीस विपक्षी दलों की बैठक। मेजबान ने कहा कि तस्वीर बड़ी थी, कुछ लोगों ने इसे फोटो अपॉर्चुनिटी कहा, लेकिन अंदर कही गई बातें चर्चा के लायक हैं।
सूत्रों के हवाले से कार्यक्रम में राहुल गांधी के बैठक वाले बयान रखे गए। कहा गया कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को लॉस्ट मैन और कमजोर व्यक्ति बताया, एजेंसियों से संकेत मिलने की बात कही कि कुछ बड़ा होने वाला है, और इसे सामान्य लड़ाई नहीं बल्कि सर्वाइवल व फाइनल बैटल बताया। साथ ही अंतर्विरोधों का जिक्र हुआ—कांग्रेस और लेफ्ट कई राज्यों में एक साथ नहीं हैं, केरल का उदाहरण दिया गया। राहुल गांधी के मुताबिक बैनर अलग हों तो भी नारे एक हो सकते हैं। आम आदमी पार्टी बैठक में नहीं थी, अरविंद केजरीवाल ने अलग से कहा कि इस मुद्दे पर साथ हैं। उद्धव ठाकरे ऑनलाइन जुड़े। भाजपा की ओर से शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा जोड़कर राहुल गांधी को लीडर बनाने की कोशिश है और उनकी लीडरशिप अभी भी कई दलों को स्वीकार्य नहीं।

अखिलेश यादव दिल्ली बैठक में इसलिए नहीं थे क्योंकि कांग्रेस ने बताया कि वे नामांकन करवा रहे हैं। रामगोपाल यादव का नामांकन हुआ। चाचा पहले से राज्यसभा में थे, कार्यकाल खत्म होने पर फिर टिकट मिला। असली सरप्राइज धनराज परिमल नाथवानी था। पैनल में कहा गया कि कई लोग उम्मीद लगाए बैठे थे कि कोई अल्पसंख्यक चेहरा या पिछड़े समाज का उम्मीदवार होगा। पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन का नाम भी चर्चा में था। प्रदीप सिंह का तर्क था कि अखिलेश शादी का कार्ड नहीं बांट रहे, पार्टी चलानी और चुनाव लड़ना है। पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम के बाद अखिलेश सबसे पहले पहुंचे थे और लौटकर कहा था कि अब आईपैक से कॉन्ट्रैक्ट नहीं करेंगे, पैसा नहीं है। पैनल ने इसे संकेत माना कि पुराना दरवाजा बंद हुआ तो नया खोलना था। किसी ने कहा कि लोहिया की आत्मा कराह रही होगी, पूंजीवाद और समाजवाद का अंतर मिटता दिख रहा है।
नाम कैसे तय हुआ, इस पर भी अटकलें आईं। एक दावा यह रहा कि नाथवानी पक्ष ने राज्यसभा जाने की इच्छा जताई, किसी ने कहा अखिलेश के पास चले जाओ, और मामला सरल हो गया। तुलना कपिल सिब्बल से की गई जो समाजवादी समर्थन से स्वतंत्र जीते लेकिन कांग्रेस से जुड़े माने जाते हैं। सवाल उठा कि क्या यह भाजपा का नौवां उम्मीदवार जैसा समीकरण है। पैनल का जवाब था कि उद्योगपति विचारधारा से कम और व्यापार से ज्यादा जुड़े होते हैं, हर पार्टी को पैसा देते हैं। मुकेश अंबानी के पुराने बयान का हवाला दिया गया कि दोनों दुकानें अपनी हैं। कहा गया कि रिलायंस ने भाजपा को फंडिंग एक हजार नौ सौ इक्यानवे में शुरू की, मुंबई में प्रमोद महाजन की बैठक, मुरली मनोहर जोशी अध्यक्ष थे, वसुंधरा राजे और राजमाता सिंधिया भी जुड़ी रहीं। नाना देसाई जैसे नेताओं के उद्योगपतियों से पुराने संबंध भी याद किए गए। स्पष्टीकरण यह रहा कि पार्टियां चंदे से चलती हैं, चंदा वही देता है जिसके पास पैसा है, यह चोरी या राज नहीं।
फिर सवाल उठा कि सत्ताधारी दल आमतौर पर विपक्ष का पैसा काटने की कोशिश करता है, फिर भाजपा इस नामांकन से क्यों सहज दिख रही है। जवाब था कि कांग्रेस सत्ता में थी तब भी भाजपा को पैसा मिलना पूरी तरह नहीं रोका जा सका। सबको पता है कि पैसा कम-ज्यादा सबको जाता है। देवेंद्र पराशर ने कहा कि भाजपा यदि खुद ऐसे व्यक्ति को भेजती तो राहुल गांधी के कॉर्पोरेट आरोप और मजबूत होते। समाजवादी पार्टी ने भेजा तो आरोप की हवा निकलती दिखती है। कुछ दिन पहले तक स्क्रीन पर तस्वीरें लगाई जाती थीं, फिर हटा दी गईं। अब सहयोगी दल उसी घराने से जुड़े व्यक्ति को राज्यसभा भेज रहा है। अखिलेश का पक्ष यह रखा गया कि सभी दलों में कॉर्पोरेट का दबदबा है, व्यवसायी चाहते हैं कि कोई भी सरकार आए नीतियां व्यापार के अनुकूल रहें। सरकार की जिम्मेदारी यह है कि संसाधन लेकर भी हितों के आगे पूरी तरह न झुक जाए।
तीसरे उम्मीदवार को लेकर अनुमान यह रहा कि समाजवादी पार्टी आठ सीटें सुरक्षित करना चाहेगी। नाथवानी जैसे उम्मीदवार को सुरक्षित मानकर तीसरा नाम सिर्फ औपचारिकता या शहीद करने के लिए हो सकता है। मुस्लिम मतदाताओं में उम्मीद थी कि कम से कम एक टिकट मिलेगा। पैनल का आकलन था कि राजनीतिक रूप से दूसरा टिकट अल्पसंख्यक चेहरे को देना बेहतर होता। नतीजों का मोटा चित्र यह दिखाया गया कि भाजपा आठ और सपा दो दिख सकते हैं। भाजपा सूची में ब्राह्मण चेहरों पर जोर, तीन नाम शॉर्टलिस्ट, कम से कम दो ब्राह्मण रखने की कोशिश और ओबीसी-एससी संतुलन की चर्चा हुई।
कार्यक्रम यूजीसी दिशानिर्देशों तक गया। पहले कॉफी पर कुरुक्षेत्र में नवंबर वाली चर्चा वायरल हुई थी। पैनल ने कहा कि पूर्ण रोलबैक और नई गाइडलाइन आएगी, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप अधिक न्यायसंगत ढांचा बनेगा। चंद्रशेखर आजाद रावण के आंदोलन वाले बयान का भी जिक्र हुआ।
विधानसभा सीट बंटवारे पर ताजा खबर यह बताई गई कि अखिलेश ने सांसदों-विधायकों की बैठक में करीब तीन सौ पचास सीटें चिह्नित की हैं। कांग्रेस प्रभारी आधी सीटें मांगते दिखे, व्यवहार में एक सौ पचास प्लस की चर्चा रही। दस दिन पहले कांग्रेस का हिसाब सत्रह लोकसभा सीटों के आधार पर पचासी से सौ विधानसभा सीटों का था, सपा पचास देने को तैयार बताई जा रही थी। अनुमान है कि अक्टूबर में बातचीत तेज होगी और गाड़ी पचास से सौ के बीच बैठेगी। कांग्रेस के पास खोने को कम है, पांच-छह प्रतिशत वोट है, अकेले लड़ने का जोखिम इस समय नहीं लेगी। राज्यसभा में ग्यारहवें उम्मीदवार पर क्रॉस वोटिंग की संभावना पर बहस हुई। यदि ग्यारह नाम हुए तो न्यूनतम समर्थन सूत्र प्रभावित हो सकता है। पुराना उदाहरण राजीव शुक्ला का दिया गया जब अंबानी समर्थन वाले नामांकन से सुषमा स्वराज की सीट खतरे में पड़ी थी।
इंडिया गठबंधन बैठक के छह फैसलों को पैनल ने नया नहीं माना—रैलियां, विरोध, जिला मुख्यालयों पर धरने। बैलेट पेपर वापसी और पुरानी वोटर सूची की मांग को हास्यास्पद बताया गया। कहा गया कि मतदाता खुद जानता है कि यह नहीं होगा। दो हजार चौबीस में जब दांव बड़ा था तब भी संगठन नहीं जुटा, अब मुंगेरी लाल के सपने जैसे दिखते हैं। समाजवादी नेताओं से बात कर पैनल ने कहा कि चुनाव से ठीक पहले ईवीएम-एसआईआर उठाने से हारा हुआ चेहरा बनता है। अखिलेश इसे बड़ा मुद्दा नहीं बनाएंगे, प्रवक्ता हल्के बोल सकते हैं। उत्तर प्रदेश में एसआईआर पहले हो चुका, करोड़ों नाम कटे और बहुत लौटे। केरल के गृह मंत्री वाले बयान का हवाला दिया गया कि प्रक्रिया से बोगस वोट कम होने का लाभ भी हुआ।
राहुल गांधी के एजेंसी वाले इनपुट पर कहा गया कि दिल्ली के पावर कॉरिडोर में षड्यंत्र की कहानियां महीने-दो महीने चलती रहती हैं। एजेंसियां गोल-मटोल संकेत भी फैलाती हैं। हर सरकार में असंतुष्ट लोग विपक्ष को फीड करते हैं। शेखर गुप्ता के कॉलम का जिक्र हुआ कि पांच साल के कार्यकाल में तीसरा साल खतरनाक होता है—इंदिरा गांधी चौहत्तर, राजीव गांधी सत्ताईस, यूपीए-दो। पैनल ने कहा कि मोदी का तीसरा कार्यकाल चल रहा है, हर सरकार को हर समय चुनौती रहती है, मुद्दा कब बड़ा बनेगा कोई नहीं जानता। लाभ उठाने वाला चेहरा भी चाहिए। राहुल गांधी की फाइनल बैटल वाली भाषा को राज्य चुनाव बनाम लोकसभा युद्ध के रूप में पढ़ा गया।
संचार की नाकामी पर लंबी चर्चा रही। जंतर-मंतर प्रदर्शन, आधा सच वाली खबरें और राज्य सरकारों के विज्ञापन को उदाहरण बनाया गया। भाजपा बैठक में अमित शाह और संगठन महामंत्रियों ने विपक्षी हमलों के नए जवाब पर विचार किया। कहा गया कि सत्ता मिलने के बाद केवल सरकारी कार्यक्रम बताने की complacency आ जाती है। बंगाल जैसी बड़ी जीत के बाद भी कांड सरकार को घेर सकता है। राजीव गांधी की चार सौ चौदह सीटें और जासूसी कांड याद किया गया—कई मंत्रालयों में जासूसी, क्लर्क जेल गए, बड़े अधिकारी बाद में पद पर लौटे। निष्कर्ष यह कि कोई भी जीत हमेशा के लिए कवच नहीं।
विदेश नीति पर जयशंकर के अमेरिका बयान को घुमाया जा रहा बताया गया। पैनल ने इसे साहसिक माना—आतंकवाद पर संतोष नहीं हुआ तो रिश्तों पर असर पड़ेगा, ऊर्जा खरीद पर समझौता नहीं। यूपीआई पर पंद्रह अक्टूबर से एमडीआर को लेकर आशंकाओं का जवाब यह रहा कि छियानबे प्रतिशत छोटे लेनदेन पर लागू नहीं, डेबिट-क्रेडिट पर व्यापारी पहले से शुल्क देते हैं, दो हजार सोलह से बीस तक शुल्क था, कोविड में सरकार ने सब्सिडी दी, अब खर्च बढ़ने पर वापस नहीं ले सकती क्योंकि सब्सिडी भी करदाता की जेब से जाती है।
अंत में सर्वे वाली हल्की बहस हुई। एक अनुमान तीन सौ पार, दूसरा ढाई सौ पार, तीसरा दो हजार सत्रह और बाईस के बीच। नाथवानी नामांकन के बाद छह महीने उद्योगपतियों को गाली देने का स्वर कम पड़ सकता है—यह टिप्पणी भी आई कि उद्यमी नौकरियां देते हैं और राष्ट्र निर्माण से जुड़े हैं।
कुल मिलाकर यह चर्चा राज्यसभा के एक नाम से शुरू होकर भारतीय राजनीति के उस पुराने सच तक गई जहां चुनाव लड़ने के लिए संसाधन चाहिए, संसाधन उद्योग से आते हैं, और विचारधारा कभी-कभी समीकरण के आगे झुक जाती है। अदालत या चुनाव आयोग नहीं, जनता और विधायक तय करेंगे कि उत्तर प्रदेश में दस में से कितनी सीटें किसके खाते में जाती हैं। फिलहाल सरप्राइज उम्मीदवार की चर्चा जितनी गहरी है, उतनी ही गहरी है विपक्ष की एकता और सत्ता पक्ष के संचार की परीक्षा।