दबंग सरपंच को 3 गोलियां मारी/असली वजह जानकर कर पुलिस के होश उड़ गए/
दबंग सरपंच को 3 गोलियां मारी/असली वजह जानकर कर पुलिस के होश उड़ गए/
न्याय का खूनी हिसाब: मिर्जापुर में अपराध, पंचायत का पक्षपात और नाबालिग के बदले की खौफनाक दास्तान
विशेष रिपोर्ट | उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले का शांत माना जाने वाला आदलपुरा गांव आज एक ऐसी खौफनाक और हृदयविदारक वारदात का गवाह बन चुका है, जिसने समाज के दोहरे चरित्र, कानून व्यवस्था की लाचारगी और सत्ता के नशे में चूर दबंगों की मानसिकता को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। गरीबी, लाचारी, यौन उत्पीड़न, पुलिस की संवेदनहीनता और अंततः कानून हाथ में लेकर किए गए दोहरे हत्याकांड की यह घटना केवल एक अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि जब कोई पीड़ित समाज और तंत्र से पूरी तरह निराश हो जाता है, तो आक्रोश किस रूप में विस्फोटित होता है।
इस पूरे घटनाक्रम में गांव के सरपंच किशन सिंह और साहूकार करमपाल सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या का आरोप किसी पेशेवर अपराधी पर नहीं, बल्कि उसी गांव के एक नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले नाबालिग छात्र शिव और उसके चाचा रघु पर लगा है। पुलिस ने दोनों को मौके से गिरफ्तार कर कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है।

1. एक असहाय परिवार की कहानी और संघर्ष की शुरुआत
आदलपुरा गांव की रहने वाली मंजू देवी एक विधवा महिला हैं। अपने पति के गुजर जाने के बाद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करती रहीं। मंजू घर पर ही अचार बनाकर बेचती थीं, जिससे उनके घर का चूल्हा जलता था। उनके परिवार में उनकी 12वीं पास बेटी दीपा, नौवीं कक्षा में पढ़ने वाला छोटा बेटा शिव और उनका अविवाहित देवर रघु शामिल थे।
रघु एक स्थानीय कारखाने में मजदूरी करता था और अपनी मेहनत की पूरी कमाई अपनी भाभी मंजू के हाथों में सौंप देता था ताकि बच्चों का पालन-पोषण सही ढंग से हो सके। मंजू की बेटी दीपा पढ़ने में होशियार थी, लेकिन घर की अत्यधिक गरीबी के कारण 12वीं के बाद उसकी पढ़ाई छूट गई। वहीं छोटा बेटा शिव पढ़ाई-लिखाई में काफी तेज था और अपनी मां तथा बहन का सहारा बनने के सपने देख रहा था।
सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन कारखाने के मालिक द्वारा समय पर वेतन न दिए जाने के कारण रघु बेहद परेशान रहने लगा। उसने मजदूरी छोड़कर गांव में ही एक ऑटो रिक्शा चलाकर आजीविका कमाने की योजना बनाई। ऑटो रिक्शा खरीदने के लिए लगभग डेढ़ लाख रुपये की आवश्यकता थी। रघु के पास महज पचास हजार रुपये जमा थे। भाभी मंजू ने बाकी के एक लाख रुपये का इंतजाम करने का भरोसा दिया।
2. साहूकार की गंदी नीयत और स्वाभिमान की जंग
पैसों का इंतजाम करने के लिए मंजू देवी ने गांव के कई पड़ोसियों और जान-पहचान वालों के दरवाजे खटखटाए, लेकिन किसी ने भी उनकी मदद नहीं की। अंततः मजबूर होकर मंजू देवी ने गांव के साहूकार करमपाल सिंह के पास जाने का फैसला किया।
करमपाल सिंह गांव का एक रसूखदार और चरित्रहीन व्यक्ति था। अपनी धन-शक्ति और प्रभाव के बल पर वह कमजोर महिलाओं का शारीरिक व मानसिक शोषण करने के लिए कुख्यात था। मंजू देवी उसकी इस काली सच्चाई से पूरी तरह वाकिफ नहीं थीं। जब मंजू पैसों की मदद मांगने करमपाल के घर पहुंची, तो करमपाल की नीयत खराब हो गई। उसने मदद के बदले मंजू के सामने अपनी हवस की घिनौनी शर्त रख दी।
करमपाल ने कहा कि यदि मंजू उसके साथ रात बिताने को तैयार हो जाए, तो वह डेढ़ लाख नहीं बल्कि दो लाख रुपये देने को तैयार है। मंजू देवी ने जब इस घिनौने प्रस्ताव को ठुकरा दिया, तो करमपाल ने उनके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए मंजू ने साहूकार के मुंह पर थप्पड़ जड़ दिए। शोर-शराबा सुनकर आसपास के लोग इकट्ठा हो गए और बीच-बचाव किया। लेकिन जाते-जाते साहूकार करमपाल ने सार्वजनिक रूप से मंजू को अंजाम भुगतने और अपने बिस्तर तक खींच लाने की धमकी दी।
मंजू देवी बेहद डरी हुई थीं। उन्होंने सामाजिक लोक-लाज और परिवार में विवाद बढ़ने के डर से यह पूरी बात अपने देवर रघु या बच्चों को नहीं बताई—और यही चुप्पी आगे चलकर एक बड़े तूफान की वजह बन गई।
3. साजिश, छल और खेत में हैवानियत
20 मई 2026 की सुबह साहूकार करमपाल सिंह ने अपने सबसे करीबी मित्र और गांव के वर्तमान सरपंच किशन सिंह से संपर्क किया। दोनों ने खेत में बैठकर शराब पी। नशीले दौर के बीच करमपाल ने सरपंच को अपने साथ हुई थप्पड़ वाली घटना के बारे में बताया और बदला लेने की योजना बनाई।
सरपंच किशन सिंह ने मंजू को अपने जाल में फंसाने की जिम्मेदारी ली। उसी शाम सरपंच किशन सिंह मंजू के घर पहुंचा और बहुत ही सहानुभूतिपूर्ण लहजे में बात करते हुए मंजू को अपने खेत में तीन दिन की मजदूरी का काम देने का प्रस्ताव रखा। उसने मजदूरी के पैसे एडवांस में देने की बात भी कही। गरीबी से जूझ रही मंजू को लगा कि देवर के पास काम नहीं है और यह कमाई उनके काम आएगी, इसलिए उसने खुशी-खुशी सहमति दे दी।
अगले दिन सुबह लगभग 9:00 बजे मंजू देवी काम करने सरपंच के खेत पर पहुंची। कुछ देर बाद सरपंच ने योजना के मुताबिक साहूकार करमपाल को फोन करके खेत में बुला लिया। करमपाल शराब की बोतल लेकर मोटरसाइकिल से खेत पर पहुंचा। दोनों ने फिर से जमकर शराब पी और फिर सरपंच ने अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर निकालकर मंजू पर तान दी।
दोनों हैवानों ने मंजू के हाथ-पैर उसकी ही चुन्नी से एक पेड़ के पीछे बांध दिए, मुंह में कपड़ा ठूंस दिया और बारी-बारी से उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। वारदात को अंजाम देने के बाद सरपंच ने अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर का डर दिखाते हुए धमकी दी कि यदि उसने गांव में किसी से मुंह खोला, तो उसके पूरे परिवार को जान से मार दिया जाएगा। पीड़िता मंजू देवी गिड़गिड़ाती हुई अपने घर लौट आई और खौफ के मारे इस घिनौनी वारदात को भी अपने दिल में दबा लिया।
4. दरिंदगी की हद: बेटी और उसकी सहेली बनीं शिकार
साहूकार और सरपंच का दुस्साहस यहीं नहीं रुका। 30 मई 2026 को सुबह लगभग 10:00 बजे मंजू की बेटी दीपा अपनी सहेली पिंकी के साथ शहर से दवाइयां लेने गई थी। दोपहर में जब दोनों लड़कियां बस से वापस गांव के मुख्य बस अड्डे पर उतरीं, तो उन्हें गांव जाने के लिए कोई ऑटो नहीं मिला। मजबूरी में दोनों पैदल ही गांव की तरफ चलने लगीं।
तभी पीछे से सरपंच किशन सिंह अपनी गाड़ी लेकर आया, जिसमें साहूकार करमपाल भी मौजूद था। दोनों ने बच्चियों को गांव छोड़ने के बहाने अपनी गाड़ी में बिठा लिया। थोड़ी दूर आगे बढ़ते ही सरपंच ने अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर निकाल ली और दोनों बच्चियों को गोली मारने की धमकी देते हुए गाड़ी को अपने सुनसान खेत की तरफ मोड़ दिया।
खेत में ले जाकर दोनों दरिंदों ने फिर से शराब पी। जब मासूम बच्चियों ने रोते हुए दया की भीख मांगी, तो सरपंच ने हंसते हुए कहा कि उसने और करमपाल ने मिलकर उनकी मां को भी नहीं छोड़ा था और आज वे दोनों वही खेल उनकी बेटी के साथ दोहराएंगे। अपनी मां के साथ हुई दरिंदगी की बात सुनकर दीपा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
दोनों हैवानों ने गाड़ी के अंदर ही दीपा और उसकी सहेली पिंकी के साथ घंटों तक बर्बरता की और सामूहिक दुष्कर्म किया। इसके बाद वे दोनों को जान से मारने की धमकी देकर गांव के बाहर फेंककर फरार हो गए।
5. पुलिस का अमानवीय रवैया और पंचायत का पक्षपात
रोती-बिलखती दीपा और पिंकी जब घर पहुंचीं, तो उन्होंने अपनी मां को पूरी आपबीती सुनाई। मां मंजू देवी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उन्होंने तुरंत अपने देवर रघु को बुलाया। पूरी बात सुनकर रघु और मंजू दोनों बच्चियों को लेकर पास के पुलिस थाने पहुंचे।
थाने में तैनात दरोगा दिलीप कुमार ने पीड़ितों की सहायता करने के बजाय उनके जख्मों पर नमक छिड़का। दरोगा ने पीड़ितों की शिकायत दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया और उल्टा उन पर झूठा आरोप लगाते हुए कहा, “तुम गरीब लोग अमीर लोगों को फंसाकर पैसे ऐंठने के लिए ऐसे ही झूठे आरोप लगाते हो।” पुलिस ने बिना कोई कानूनी कार्रवाई किए पीड़ित परिवार को थाने से खदेड़ दिया।
कानून से निराश होकर रघु गांव के एक वरिष्ठ पंच रमेश कुमार के पास गया और पंचायत बुलाने की मांग की। अगले दिन सुबह 10:00 बजे गांव में पंचायत बैठी। पंचायत के सामने दीपा और पिंकी ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई। जब पंच रमेश कुमार ने आरोपी सरपंच किशन सिंह और साहूकार करमपाल से पूछताछ की, तो सरपंच ने बड़ी बेशर्मी से झूठ बोला।
सरपंच ने कहा कि लड़कियां खुद गाड़ी में बैठी थीं और बाद में पैसे मांगने लगीं, न देने पर झूठा आरोप लगा रही हैं। हैरानी और दुख की बात यह रही कि पंच रमेश कुमार और अन्य पंचों ने भी सच का साथ देने के बजाय दबंगों का पक्ष लिया और कह दिया कि “लड़कियां पैसे हड़पने के लिए जानबूझकर झूठ बोल रही हैं।”
6. न्याय का खूनी विस्फोट: दोहरी हत्या और अंत
पंचायत के इस अन्यायपूर्ण और शर्मनाक फैसले को पीड़ित परिवार का 15 वर्षीय लड़का शिव चुपचाप सुन रहा था। अपनी मां और बहन के साथ हुई हैवानियत, पुलिस की अंधी व्यवस्था और पंचायत के इस नंगे पक्षपात को देखकर मासूम शिव का सब्र का बांध पूरी तरह टूट गया।
अपनी बहन दीपा को बिलख-बिलखकर रोते देख शिव के अंदर का गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फूटा। उसने बिना कुछ सोचे-समझे जमीन से एक भारी पत्थर उठाया और पूरी ताकत से सरपंच किशन सिंह के माथे पर दे मारा।
माथे से खून बहते ही बौखलाए सरपंच ने तुरंत अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर निकाल ली और नाबालिग शिव की तरफ तानते हुए उसे जान से मारने की धमकी दी। अपने भतीजे की जान खतरे में देख पास खड़े चाचा रघु ने गुस्से में आकर एक भारी डंडे से सरपंच के हाथ पर जोर से वार किया। डंडा लगते ही सरपंच के हाथ से रिवॉल्वर छूटकर नीचे गिर गई।
इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, 15 साल के शिव ने फुर्ती से जमीन से रिवॉल्वर उठाई और बिना झिझके दो गोलियां सरपंच किशन सिंह के सीने में दाग दीं। इसके तुरंत बाद उसने रिवॉल्वर का रुख साहूकार करमपाल सिंह की तरफ किया और दो गोलियां उसे भी मार दीं। दोनों आरोपी तड़प-तड़पकर मौके पर ही ढेर हो गए।
7. पुलिस की कार्रवाई और उठते गंभीर सवाल
घटना के बाद पूरी पंचायत में भगदड़ और हड़कंप मच गया। पंच रमेश कुमार ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। लगभग आधे घंटे में पुलिस बल मौके पर पहुंचा और दोनों शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा। पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त लाइसेंसी रिवॉल्वर जब्त करते हुए नाबालिग शिव और उसके चाचा रघु को मौके से ही गिरफ्तार कर लिया।
थाने में जब रघु से कड़ाई से पूछताछ की गई, तो उसने मंजू देवी और बच्ची दीपा के साथ हुए शोषण और पुलिस द्वारा शिकायत न सुने जाने का पूरा चिट्ठा खोलकर रख दिया। इसके बाद पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया।
इस पूरी घटना ने समाज और न्याय प्रणाली के सामने कई कड़े और अनसुलझे सवाल खड़े कर दिए हैं:
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कानून व्यवस्था की विफलता: यदि थाना प्रभारी दिलीप कुमार ने समय पर पीड़िता की शिकायत सुनकर कार्रवाई की होती, तो क्या यह दोहरा हत्याकांड होता?
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सत्ता और धन का अहंकार: क्या ग्रामीण भारत में आज भी गरीब महिलाओं की अस्मत दबंगों की हवस और पैसों के आगे इतनी लाचार है?
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पंचायत की भूमिका: जब गांव की पंचायतें ही न्याय देने के बजाय अपराधियों और रसूखदारों की ढाल बन जाएंगी, तो आम नागरिक न्याय के लिए कहां जाएगा?
फिलहाल पुलिस ने शिव और रघु के खिलाफ हत्या की धाराओं में मामला दर्ज कर उन्हें अदालत में पेश करने की तैयारी कर ली है। भविष्य में अदालत का क्या फैसला होगा, यह तो वक्त बताएगा; लेकिन आदलपुरा गांव की यह खौफनाक रात हमेशा इस बात की गवाही देगी कि जब-जब जुल्म की इंतहा होती है और कानून अंधा हो जाता है, तब-तब न्याय का रास्ता हिंसा के खूनी मोड़ से होकर गुजरता है।