सरपंच ससुर के खिलाफ बहू की जंग | गांव की पंचायत का सबसे बड़ा फैसला |
सरपंच ससुर के खिलाफ बहू की जंग | गांव की पंचायत का सबसे बड़ा फैसला |
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दोस्तों, आज हम आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहे हैं जो पूरे भारत में चली। कहानी है अनन्या देवी की। गांव का नाम था ठाकुरपुर। वहां एक बड़ी हवेली थी ठाकुर साहब की। वे सरपंच थे। बूढ़े शरीर में थकान थी, लेकिन दिल में अहंकार।
कमली काकी गांव की एक गरीब बुढ़िया थी। उनके पति एक सप्ताह पहले गुजर चुके थे। पेंशन का फॉर्म सरपंच जी के पास आया था। कमली काकी ने कहा, सरपंच जी मेरे बुढ़ापा पेंशन के फॉर्म पर दस्तखत कर दीजिए। मुझे इसकी बहुत जरूरत है। तेरे घर में अनाज नहीं है तो मैं क्या करूं? क्या अपनी हवेली बेचकर तेरा पेट भरूं? मेरे पति को गुजरे एक सप्ताह ही हुआ है। अब मेरा कोई सहारा नहीं बचा। पेंशन मिल जाएगी तो कम से कम दो वक्त की रोटी खा सकूंगी।

तेरे पति ने पंचायत से पचास रुपये का कर्ज लिया था। पहले वो पैसा चुका उसके बाद पेंशन मांगना। वो कर्ज उनके इलाज के लिए लिया था। लेकिन मैं उन्हें बचा नहीं सकी। मेरे पास तो उनके अंतिम संस्कार के पैसे भी नहीं थे। अपनी दुख भरी कहानी किसी और को सुनाना। जब तक कर्ज नहीं चुकाएगी तेरे फॉर्म पर दस्तखत नहीं होंगे। मैं मेहनत करके धीरे-धीरे कर्ज चुका दूंगी। अभी पेंशन रोक दी तो भूख से मर जाऊंगी। मरना है तो मर जा। यह पंचायत है। गरीबों को खैरात बांटने वाला आश्रम नहीं।
सरपंच जी इस पर दस्तखत कर दीजिए। पेंशन मिल जाएगी तो मुझे बहुत मदद मिलेगी। लखा इसे यहां से घसीट कर बाहर फेंक। इसने मेरा बहुत समय खराब कर दिया। चल बुढ़िया बहुत हो गया तेरा नाटक। मुझे मत घसीटो बेटा। मेरे पैरों में दर्द है। मैं खुद चली जाऊंगी। रुक जाओ। कमली काकी को तुरंत छोड़ दो। अनन्या तुम यहां क्या कर रही हो? यह मर्दों की पंचायत है। घर वापस जाओ। वहां एक बेसहारा मां का अपमान हो रहा है। वहां चुप रहना सबसे बड़ा पाप है। बहू रानी पंचायत के काम में दखल मत दो।
मैंने कहा काकी को छोड़ दो। अब किसी ने इन्हें हाथ लगाया तो अच्छा नहीं होगा। बेटी मेरी वजह से अपने परिवार से मत लड़। आप कहीं नहीं जाएंगी काकी। पेंशन आपका अधिकार है। किसी की खैरात नहीं। बहू तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे आदेश का विरोध करने की? आपका आदेश सही होता तो मैं विरोध नहीं करती। एक भूखी औरत को धूल में घसीटना अन्याय है। भूल गई तू किस घर की बहू है। सिर पर पल्लू रख और घर के अंदर चली जा। मैं नहीं भूली कि आपके घर की बहू हूं।
इसीलिए शर्मिंदा हूं कि मेरे घर के लोग एक असहाय औरत के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं। इस पंचायत में औरतों को बोलने का अधिकार नहीं है। अन्याय के खिलाफ बोलने के लिए स्त्री या पुरुष होना जरूरी नहीं। इंसान होना जरूरी है। तू मुझे इंसानियत और कानून सिखाएगी। कमली काकी के पति का कर्ज अलग है और उनकी पेंशन अलग। सरकारी पेंशन रोकने का अधिकार आपको नहीं है। इस गांव का कानून मैं हूं। मेरे दस्तखत के बिना यहां पत्ता भी नहीं हिलता। यहां पत्ता भी नहीं हिलता।
आप सरपंच हैं। भगवान नहीं। कानून संविधान से चलता है। आपकी इच्छा से नहीं। बस करो अनन्या। बाबूजी के पैर पकड़ के पैर पकड़ कर माफी मांगो। माफ़ी गलती करने वाला मांगता है। मैंने केवल एक गरीब औरत का अधिकार मांगा है। परिवार की इज्जत मिट्टी में मत मिलाओ। इज्जत मैंने नहीं कमली काकी को घसीटने वालों ने मिट्टी में मिलाई है। अगर मैंने दस्तखत नहीं किए तो तू मेरा क्या बिगाड़ लेगी? फिर फिर सरपंच चुनाव में आपके सामने एक नया उम्मीदवार खड़ा होगा। कौन है जो मुझसे मुकाबला करेगा? मैं आपके खिलाफ सरपंच का चुनाव लडूंगी।
गजराज सिंह की बहू उनके खिलाफ चुनाव लड़ेगी। आज तक किसी ने ठाकुर साहब को ऐसी चुनौती नहीं दी। एक औरत मेरे खिलाफ चुनाव लड़ेगी। तूने राजनीति को खेल समझा है। मैंने इसे खेल नहीं समझा। इसीलिए मैदान में उतर रही हूं। जिस दिन तूने पर्चा भरा उसी दिन हवेली से तेरा रिश्ता खत्म हो जाएगा। आओ तो दरवाजे खुले रखिएगा क्योंकि चुनाव का पर्चा अब हर हाल में भरा जाएगा। आज से तू मेरे घर की बहू नहीं है।
सरपंच जी मेरी वजह से बहू को घर से मत निकालिए। काकी यह लड़ाई आपकी पेंशन से शुरू हुई थी। लेकिन अब पूरे गांव के अधिकार की लड़ाई है। तुम सच में घर छोड़कर जा रही हो? आपके बाबूजी ने फैसला सुना दिया है और मैंने भी अपना रास्ता चुन लिया है। एक भिखारिन बुढ़िया के लिए अपना बसा बसाया घर तोड़ रही हो। गरीबी किसी को भिखारी नहीं बनाती। दूसरों का अधिकार अधिकार छीनने वाला असली भिखारी होता है।
चुनाव किसके पैसों से लड़ोगी? गांव में कौन तुम्हारा साथ देगा? सच्चाई की लड़ाई हमेशा पैसों से नहीं लड़ी जाती। लोगों का विश्वास सबसे बड़ी ताकत है। लोग बाबूजी से डरते हैं। कोई तुम्हारे साथ नहीं आएगा। लोग उनसे डरते हैं। उनका सम्मान नहीं करते। डर और सम्मान में बहुत अंतर होता है। अगर इस दरवाजे से बाहर गई तो मेरे लिए हमेशा के लिए मर जाऊंगी।
जिस पति को पत्नी का सच दिखाई नहीं देता उसके लिए वो पत्नी पहले ही मर चुकी होती है। तुम्हें मेरे और उस बुढ़िया में से किसी एक को चुनना होगा। मैं किसी इंसान को नहीं सच्चाई को चुन रही हूं। काश आप भी न्याय को चुन पाते। मैं अपने पिता के खिलाफ नहीं जा सकता। और मैं अपनी आत्मा के खिलाफ नहीं जा सकती। इस चौखट से बाहर जाकर बहुत पछताओगी।
अन्याय के सामने झुकने का अपने का पछतावा घर छोड़ने के दुख से कहीं बड़ा होता है। सुबह तक इसी दरवाजे पर लौट कर मेरे पैरों में गिरोगी। इस हवेली में तभी लौटूंगी जब चौपाल पर सरपंच की उसी कुर्सी पर मैं बैठूंगी। पर्चा भरने के लिए एक प्रस्तावक चाहिए। मेरे डर से कोई अंगूठा नहीं अंगूठा नहीं लगाएगा। डर कितना भी बड़ा हो किसी एक दिल में हिम्मत जरूर जीवित रहती है।
रामू काका मेरे पर्चे पर प्रस्तावक के रूप में अंगूठा लगा दीजिए। मुझे माफ कर दे बेटी। ठाकुर से दुश्मनी लेकर अपने परिवार को खतरे में नहीं डाल सकता। मैं आपके खेत, पानी और अधिकारों के लिए लड़ रही हूं। अगर मैंने साथ दिया तो वह मेरी फसल जला देगा। कब तक अपनी फसल बचाने के लिए, फसल बचाने के लिए अपना सम्मान जलाते रहेंगे। मेरे छोटे बच्चे हैं। आज मुझ में तेरे साथ खड़े होने की हिम्मत नहीं है।
मैं आपकी मजबूरी समझती हूं। जिस दिन हिम्मत जागे स्वयं को मत रोकिएगा। ताई आपने मुझे हमेशा अपनी बेटी माना है। चुनाव में खड़ी हो रही हूं। बस अपना आशीर्वाद दे दीजिए। ना बेटी ठाकुर के आदमी मेरी झोपड़ी जला देंगे। अगर हम सभी अलग-अलग डरते रहे तो उसका अत्याचार कभी खत्म नहीं होगा। मेरी छोटी पोतियां हैं। उनकी जिंदली दांव पर नहीं लगा सकती। तू भी जिद छोड़ दे।
अगर मैं लौट गई तो आने वाली हर बहू को चुप रहने की सीख दी जाएगी। क्या हुआ सरपंचनी जी? पूरा गांव घूम लिया। कोई प्रस्तावक नहीं मिला। अभी नामांकन का समय समाप्त नहीं हुआ है। सिर्फ आधा घंटा बचा है। औरत हो घर संभालो राजनीति नहीं। घर संभालने वाली औरत गांव भी संभाल सकती है। गांव ठाकुर साहब का है। गांव यहां रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का है।
तेरा सपना टूट जाएगा। अनन्या का सपना नहीं टूटेगा। उसके पर्चे पर अंगूठा मैं लगाऊंगी। काकी आप यहां कैसे आईने? जिस बेटी ने मेरे लिए अपना घर छोड़ दिया, उसके लिए मैं अपनी झोपड़ी का डर कैसे रख सकती हूं? अगर तूने अंगूठा लगाया तो आज रात तेरी झोपड़ी में आग लगवा दूंगा। लगा देना सरपंच जी।
जब गरीब के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचता तब वो मौत से भी नहीं डरता। तेरे सिर से एकमात्र छत भी चली जाएगी। वो छत किस काम की जिसके नीचे डर और अपमान के साथ जीना पड़े। मेरे खिलाफ जाकर इस गांव में कोई चैन से नहीं रह सकता। हम अब तक जीवित कहां थे? हम तो आपकी दहशत में केवल सांस ले रहे थे।
काकी खतरा बहुत बड़ा है। आप चाहे तो पीछे हट सकती हैं। कल तू मेरे लिए खड़ी हुई थी। आज मैं तेरे लिए खड़ी हंगी। कमली आखिरी बार चेतावनी दे रहा हूं। आज आपकी धमकी से अधिक मेरी बेटी की सच्चाई शक्तिशाली है। ला बेटी अपना कागज दे। मेरा अंगूठा अन्याय की नींव हिला देगा। आपका यह विश्वास मैं जीवन भर नहीं भूलूंगी।
जीतने के बाद किसी गरीब को पंचायत से खाली मत लौटाना। मैं आपको वचन देती हूं। अनन्या देवी का नामांकन सही समय पर प्राप्त हुआ है। उनका पर्चा स्वीकार किया जाता है। ठाकुर साहब कमली ने सच में अंगूठा लगा दिया। गांव वालों को ऐसा दर्द दो कि वे चुनाव का नाम भूल जाएं।
क्या करना है? पानी की मुख्य लाइन काट कर टंकी के वाल्व पर ताला लगा दो। इस गर्मी में पूरा गांव प्यास से तड़प जाएगा। जब बच्चे रोएंगे तो गांव वाले खुद अनन्या को बाहर निकाल देंगे। पानी नहीं आ रहा। मेरा बच्चा सुबह से प्यासा है। पूरे गांव के नल सूख गए हैं और टंकी पे ताला लगा है।
पानी की लाइन किसने काटी? जब तक अनन्या नाम वापस नहीं लेती, गांव को एक बूंद पानी नहीं मिलेगा। अनन्या मेरा बच्चा प्यास से रो रहा है। अपनी जिद छोड़ दो। यह मेरी जिद नहीं हम सभी के अधिकार की लड़ाई है। लेकिन हमारे बच्चों का क्या होगा? पानी रोकने वाले से सवाल कीजिए। अपराधी मैं नहीं वो है। पानी ठाकुर साहब का है।
वो जिसे चाहे देंगे। यह सरकारी पानी गांव वालों के लिए है। किसी ठाकुर की निजी संपत्ति नहीं निजी संपत्ति नहीं। अनन्या बाबूजी तुम्हें मरवा देंगे। मेरे साथ घर वापस चलो। मुझे बचाना चाहते हैं तो अपने पिता से पानी खुलवाइए। मैं उनके विरुद्ध नहीं जा सकता।
फिर फिर मेरी चिंता करने का दिखावा मत कीजिए। मैं तुम्हारा पति हूं। पति होने का अधिकार जताने से पहले पति का कर्तव्य निभाइए। गांव छोड़कर चली जा वरना अच्छा नहीं होगा। टंकी का ताला अभी खुलेगा। कोई टंकी के पास गया तो उसकी हड्डियां तोड़ दूंगा।
जिसका अधिकार छीना गया हो उसे तुम्हारी लाठी नहीं रोक सकती है। बेटी लोहे की रड लेकर कहां जा रही है? टंकी का ताला तोड़ने। वहां लखा और उसके आदमी लाठियां लेकर खड़े हैं। ठाकुर ने केवल पानी नहीं रोका। हमारी हिम्मत कैद की है। आज ताला नहीं टूटा तो कल वो हमारी सांसों पर ताला लगाएगा।
एक कदम आगे बढ़ाया तो लाठी तेरे सिर पर पड़ेंगी। आज मेरा खून गिरा तो कल पूरा गांव तुम्हारे विरुद्ध खड़ा होगा। कोई तेरे साथ नहीं आएगा। अनन्या अकेली नहीं है। रामू काका उसके साथ हैं। बूढ़े अपनी मौत को बुलावा मत दे। डरते हुए जीने से सच के लिए मरना बेहतर है।
हम भी अनन्या दीदी के साथ हैं। गांव का पानी किसी की जागीर नहीं है। हमारे बच्चों के हिस्से का पानी खोलो। तुम ठाकुर साहब से बगावत कर रहे हो। बगावत अन्याय करने वाला करता है। हम अपना अधिकार मांग रहे हैं। मैं किसी को ताला नहीं तोड़ने दूंगा। रास्ते से हट जाओ। आज गांव जाग चुका है।
तुम लोग अपनी भलाई इसी में समझो कि पीछे हट जाओ। अनन्या पर खरोच आई तो पूरा गांव जवाब देगा। काका रड मुझे दीजिए। ताला मैं तोडूंगी। लड़ाई तूने शुरू की। लेकिन अब यह हम सबकी लड़ाई है। पहला वार कमली काकी के अपमान के लिए। दूसरावार बच्चों की प्यास के लिए। और अंतिम वार गांव के वर्षों पुराने डर पर। ताला टूट गया, पानी आ गया।
बेटी तूने हमारी प्यास ही नहीं बुझाई। हमारी मरी हुई आत्मा भी जगा दी। यह पानी आपकी जागी हुई हिम्मत ने खोला है। अब गांव ठाकुर की धमकी से नहीं डरेगा। आज टंकी का ताला टूटा है। चुनाव में उसका अहंकार भी टूटेगा। एक औरत ने पूरे गांव को मेरे खिलाफ खड़ा कर दिया।
मालिक रामू और सारे नौजवान उसके साथ आ गए थे। उसकी कमजोरी उसका पति है। अब वो मेरे सामने घुटनों पर आएगी। अनन्या इन कागजों पर हस्ताक्षर कर दो। यह तलाक के कागज हैं। हां। कल नामांकन वापस लेने का आखिरी दिन है। आप मुझसे क्या चाहते हैं? अपने सुहाग और सरपंच की कुर्सी में से किसी एक को चुन लो।
आप हमारे विवाह को अपने पिता की कुर्सी बचाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। नाम वापस नहीं लिया तो तो हमारा रिश्ता हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। रिश्ता उस दिन टूट गया था जब आपने मुझे अन्याय के सामने अकेला छोड़ दिया। मैं अभी भी तुम्हें घर वापस ले जाने आया हूं। किस शर्त पर? मैं अपनी आत्मा और स्वाभिमान मारकर आपके पिता के सामने झुक जाऊं।
पत्नी को अपना घर बचाने के लिए पति के सामने झुकना पड़ता है। पत्नी प्रेम के सामने झुक सकती है। अपमान और अन्याय के सामने नहीं। गांव की राजनीति हमारे विवाह से अधिक जरूरी हो गई। यह राजनीति नहीं कमली काकी की भूख, बच्चों की प्यास और गांव के सम्मान की लड़ाई है। नाम वापस लो वरना तलाक निश्चित है।
क्या आपने एक बार भी अपने पिता से कहा कि वो गलत हैं? मैं बाबूजी पर सवाल नहीं उठा सकता। तो मुझसे अपने स्वाभिमान की बलि मांगने का अधिकार आपको नहीं है। तुम्हें बहुत पछतावा होगा। पछतावा है कि मैंने इतने समय तक आपके अंदर साहस खोजा। हस्ताक्षर करोगी या नहीं? करूंगी लेकिन नामांकन वापसी पर नहीं तलाक के कागज पर। एक बार फिर सोच लो।
आपको उस दिन सोचना चाहिए था जब आपने पत्नी के बजाय पिता का अहंकार चुना। इसके बाद हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं बचेगा। जिस रिश्ते में सम्मान और विश्वास नहीं उसे कागज पर जीवित रखने का अर्थ नहीं। लीजिए हस्ताक्षर कर दिए। बाबूजी से कहिए कि उन्होंने घर की बहू खो दी लेकिन गांव पर अधिकार नहीं बचा पाएंगे। क्या तुम क्या तुम मुझसे प्रेम नहीं करती? प्रेम करती थी इसलिए चाहती थी कि आप सच के साथ खड़े हो।
प्रेम का अर्थ स्वाभिमान मिटाना नहीं होता। आज तुमने हमारा रिश्ता खत्म कर दिया। आपने इसे उस दिन खत्म किया था जब मेरा हाथ छोड़कर अन्याय का हाथ थामा था। बेटी क्या विक्रम तलाक के कागज देकर गया है? हां काकी लेकिन चिंता मत कीजिए। मेरी वजह से तेरा घर उजड़ गया। आपकी वजह से नहीं।
जो घर स्त्री के स्वाभिमान की बलि मांगे उसका टूटना अच्छा है। तू बहुत बड़ी कीमत चुका रही है। मैं पीछे हट गई तो गांव की बेटियां सदियों तक कीमत चुकाएंगी। अब पूरा गांव तेरे साथ है। मुझे केवल वोट नहीं लोगों की जागी हुई चेतना चाहिए। इस बार तुम्हें दोनों मिलेंगे। मतगन पूरी हो चुकी है। गजराज सिंह को कुल तीन सौ बीस वोट मिले हैं। यह झूठ है। दोबारा गिनती करो।
गिनती दो बार जांची जा चुकी है। अनन्या बेटी के वोट्स बताइए। अनन्या देवी को एक हजार दो सौ पचास वोट मिले हैं। उन्हें भारी बहुमत से नई सरपंच घोषित किया जाता है। अनन्या देवी जिंदाबाद। हमारी नई सरपंच जिंदाबाद। अनन्या देवी जिंदाबाद। हमारी नई सरपंच जिंदाबाद।
तू जीत गई बेटी। तेरी सच्चाई जीत गई। यह मेरी नहीं पूरे गांव की जीत है। आज पहली बार हमने डर के बजाय अपनी इच्छा से वोट दिया है। जीत गई तू मेरी कुर्सी छीन कर खुश होगी? मैंने आपकी कुर्सी छीनी है बाबूजी आपका सम्मान नहीं। अब मुझे बाबूजी कहने का नाटक मत कर। रिश्ते टूटने से संस्कार नहीं टूटते।
लेकिन आपका अन्याय स्वीकार करना संभव नहीं था। तुमने यह साबित कर दिया कि गांव तुम्हारे साथ खड़ा है। यह जीत मेरी नहीं इस गांव के हर एक व्यक्ति के विश्वास की है। मैंने तीस सालों तक इस गांव पर राज किया। इसीलिए लोग आपसे डरते थे। मैं गांव की सेवा करूंगी ताकि लोग पंचायत पर विश्वास करें। आज नारे लगाने वाले लोग कल तेरे खिलाफ हो सकते हैं।
अगर मैं अन्याय करूंगी तो उन्हें मेरे खिलाफ खड़े होने का पूरा अधिकार होगा। कुर्सी पर बैठने से पहले मेरे फॉर्म पर दस्तखत कर दे बेटी। आपका फॉर्म इस पंचायत का पहला काम होगा। आज मेरे पति की आत्मा को शांति मिलेगी। अब किसी बुजुर्ग को पेंशन के लिए किसी के पैरों में नहीं गिरना पड़ेगा और गांव के पानी पर कोई ताला नहीं लगेगा। पानी, राशन, पेंशन और सरकारी सहायता का पूरा हिसाब सार्वजनिक होगा।
क्या अब पंचायत में हमारी आवाज भी सुनी जाएगी? पंचायत पर सबका बराबर का अधिकार होगा। अनन्या, मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। क्या मुझे क्षमा कर सकती हो? क्षमा मांगना आसान है लेकिन टूटा हुआ विश्वास जोड़ना कठिन होता है। मैं अपने कर्मों से साबित करूंगा कि बदलना चाहता हूं। पहले गांव वालों से क्षमा मांगिए जिनके अधिकार छीनते समय आप मौन रहे।
मैं सबके सामने अपनी गलती स्वीकार करता हूं। बाबूजी का साथ देकर मैंने भी अपराध किया। विक्रम तू भी मेरे खिलाफ बोल रहा है। आपका सम्मान करने का अर्थ हर गलत काम को सही कहना नहीं है। मेरे लिए अब क्या बचा है? कुर्सी, बहू और बेटा सब चले गए। इंसानियत अभी बची है। उसे अपना लीजिए तो बहुत कुछ लौट सकता है।
जिसे मैंने धक्के देकर निकलवाया वही मुझे समझा रही है। दर्द सहने वाला ही दया की असली कीमत समझता है। अपनी गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं। सबसे बड़ा साहस है। क्या गांव वाले मुझे क्षमा करेंगे? आपका बदलाव सच्चा होगा तो जरूर करेंगे। मैंने सबको डरा कर झुकाया और उसे अपनी ताकत समझता रहा।
डर से झुका सिर अवसर मिलते ही उठ जाता है। सम्मान से झुका सिर जीवन भर साथ रहता है। आज समझ आया कि मेरे पास सत्ता थी लोगों का विश्वास नहीं। विश्वास पाने की शुरुआत कमली काकी से क्षमा मांगकर कीजिए। कमली तेरी गरीबी और मजबूरी का अपमान करके मैंने पाप किया। मुझे क्षमा कर दे।
अगर पश्चाताप सच्चा है तो क्षमा करती हूं। फिर किसी गरीब को मत सताइएगा। मैं वचन देता हूं कि अब किसी गरीब का अधिकार नहीं छीनूंगा। काकी यह रहा आपका स्वीकृत पेंशन फॉर्म। आज इस कागज पर नहीं मेरे जीने की उम्मीद पर मुर लगी है। नई सरपंच अनन्या देवी की जय। मेरी नहीं अपने साहस और एकता की जय बोलिए। हमारी एकता की हमारे गांव की जय।
आज से यह पंचायत किसी एक व्यक्ति की अदालत नहीं पूरे गांव का न्यायालय होगी। यहां गरीब को डराया नहीं जाएगा और किसी स्त्री की आवाज दबाई नहीं जाएगी। अब समझ आया कि कुर्सी इंसान को बड़ा नहीं बनाती। इंसान अपने कर्म, दया, न्याय और सेवा से बड़ा बनता है। घर धन, दौलत और ऊंची दीवारों से बड़ा नहीं होता। घर इंसानियत से बड़ा होता है।
आज तुमने केवल चुनाव नहीं जीता। गांव को उसकी खोई आवाज लौटा दी। इस बदलाव की शुरुआत कमली काकी के एक अंगूठे से हुई थी। ताकत मेरे अंगूठे में नहीं उस विश्वास में थी जो तुमने मेरे अंदर जगाया। आज हम सभी वचन लें कि अन्याय देखकर कोई चुप नहीं रहेगा। हम वचन देते हैं।
अन्याय करने वाला तभी शक्तिशाली बनता है जब उसे देखने वाले लोग मौन रहते हैं। अब हमारा गांव मौन नहीं रहेगा। आज से यह गांव डर और अहंकार से नहीं अधिकार, समानता, न्याय और इंसानियत से चलेगा। अनन्या देवी जिंदाबाद। अनन्या देवी जिंदाबाद। एकता जिंदाबाद। इंसानियत जिंदाबाद।
आप अनन्या की जगह होते तो क्या करते? अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ लड़कर भी क्या उन गांव वालों की मदद करते? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताना। अगर आपको अनन्या और कमली काकी की इस कहानी ने आपके दिल को छुआ है तो इस वीडियो को लाइक करें और हमारे चैनल एसके स्टोरीज को सब्सक्राइब करें और आप अपना प्यार जरूर दें हमको। फिर मिलेंगे एक दिल को छू देने वाली कहानियों के साथ। तब तक के लिए अपना और अपना परिवार का ख्याल रखो। जय हिंद।
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