Part 6 पति प्रदेश में नौकरी करता था और पत्नी घर पर बेटी के साथ रहती थी / ये कहानी बिहार की हैं
भाग छह
कविता की उम्र जब पैंतीस के पार निकली, तो शरीर ने साथ देना कम कर दिया।
आँखें और कमजोर हो गईं। हाथ काँपने लगे। सिलाई अब घंटों नहीं हो पाती थी। अंजलि शहर में नौकरी करने लगी थी, लेकिन हर महीने आती, दवाई लाती, घर साफ करती और वही पुरानी कॉपी निकालकर दो पन्ने पढ़ जाती।
एक दिन अंजलि ने कहा, “दीदी, आप मेरे साथ चलिए। शहर में रहिए। अकेली मत रहिए।”
कविता ने सिर हिलाया। “यह कमरा मेरी आखिरी जगह है। यहाँ कोई मेरी कहानी नहीं जानता। वहाँ लोग पूछेंगे। मैं अब और नहीं बताना चाहती।”
अंजलि ज्यादा नहीं बोली। बस हर महीने आने का वादा करके चली गई।
उस साल बारिश बहुत हुई। कमरे की छत टपकने लगी। कविता ने टिन लगवाया, लेकिन रात को बूँदें गिरती रहीं जैसे कोई पुरानी बात दोहरा रहा हो। वह उठकर खिड़की के पास बैठ जाती और सोचती—अगर उस दोपहर वह स्कूल से देर से लौटती, तो क्या सब कुछ अलग होता? अगर माँ एक बार रुक जाती? अगर पिता घर रहते? अगर वह चाकू की जगह सिर्फ दरवाजा बंद करके भाग जाती?
सवालों का जवाब कभी नहीं आया। सिर्फ बारिश आती रही।
एक सुबह डाकिए ने एक छोटा सा पैकेट दिया। कोई नाम नहीं था। अंदर एक पुरानी तस्वीर थी—मनीषा, रामेश, छोटी कविता और पीछे खड़ा मुकेश। तस्वीर धुंधली पड़ चुकी थी। साथ में एक अधूरा पत्र था, जैसे लिखने वाला बीच में रुक गया हो—
“अगर कभी मौका मिला तो…”
बाकी पंक्ति गायब थी। कविता ने तस्वीर देर तक देखी। माँ मुस्कुरा रही थी उस दिन। घर अभी बचा हुआ था। फिर उसने तस्वीर दराज में रख दी, पत्र के ऊपर। न फाड़ी, न संभाली पूरी तरह। बस रख दी।
अंजलि जब अगली बार आई, तो कविता ने उससे कहा, “अगर मैं एक दिन उठूँ और जवाब न दूँ, तो तू ज्यादा मत ढूँढना। कुछ लोग चुपचाप चले जाते हैं क्योंकि उनके पास कहने को कुछ बचता नहीं।”
अंजलि डर गई। “दीदी, ऐसी बात मत करो।”
कविता मुस्कुराई। वह मुस्कान थकी हुई थी। “मैं डर नहीं रही। मैं बस थक गई हूँ याद करते-करते।”
उस महीने के बाद अंजलि की नौकरी में व्यस्तता बढ़ गई। दो महीने वह नहीं आ सकी। फोन पर बात होती रही। कविता हर बार कहती, “ठीक हूँ।” आवाज कमजोर होती जा रही थी, लेकिन अंजलि दूर से पूरा अंदाजा नहीं लगा सकी।
तीसरे महीने जब अंजलि पहुँची, कमरे का दरवाजा खुला था। दीया बुझा पड़ा था। मशीन पर एक अधूरा ब्लाउज पड़ा था। कविता चारपाई पर लेटी थी। साँस चल रही थी, लेकिन आँखें बंद थीं। बुखार था। पड़ोस की औरत ने बताया कि दो दिन से उठ नहीं पा रही थीं, खाना नहीं बनाया।
अंजलि ने अस्पताल पहुँचाया। डॉक्टर ने कहा कमजोरी और पुरानी थकान है, जानलेवा कुछ नहीं, लेकिन शरीर ने जवाब दे दिया है। कविता कुछ दिन बाद होश में आई। अंजलि का हाथ पकड़ा।
“तू आई।”
“हाँ दीदी।”
कविता ने धीरे कहा, “मेरी कॉपी संभालना। और वह तस्वीर… दराज में है। रखना या फेंक देना, तेरी मर्जी। मैं तय नहीं कर पाई।”
अंजलि रोई। कविता ने उसका सिर सहलाया जैसे कभी माँ ने उसका सहलाया होगा—उससे पहले कि सब कुछ टूट जाए।
कुछ हफ्ते बाद कविता घर वापस आ गई। चलना कम हो गया था। अब वह दरवाजे पर एक छोटी सी कुर्सी डालकर बैठती। कस्बे के बच्चे पास से गुजरते तो देखते, कोई नमस्ते कह देता। कोई नहीं जानता था कि यह औरत कभी एक मुकदमे की केंद्रीय किरदार रही थी। कोई नहीं जानता था कि उसके हाथों ने एक बार गुस्से में वह काम किया था जिसके बाद कई जिंदगियाँ हमेशा के लिए बदल गईं।
एक शाम अंजलि ने पूछा, “दीदी, आप माँ को माफ कर पाईं?”
कविता देर तक चुप रही। फिर बोली, “माफ करना और शांत हो जाना एक नहीं होता। मैं शांत हो गई हूँ। माफ… अभी भी पूरा नहीं हुआ। शायद कभी न हो।”
यह आखिरी साफ बात थी जो उसने उस विषय पर कही।
इसके बाद दिन सामान्य जैसे बीतने लगे। कभी अच्छा, कभी बुरा। कविता कभी कॉपी के नए पन्ने लिखती, कभी फाड़ देती। एक पन्ना बचा रह गया, अधूरा—
“अगर अंजलि की बेटी कभी उसी दोपहर घर लौटे, तो काश कोई बड़ा इंसान उस दिन दरवाजे पर खड़ा हो।
काश कोई चाकू से पहले बात करे।
काश…”
वाक्य यहीं टूट जाता है।
आज भी वह कमरा मौजूद है।
कविता उसमें रहती है या नहीं, अंजलि ठीक-ठीक नहीं बताती। कभी कहती है दीदी आराम कर रही हैं, कभी कहती है वह नदी किनारे बैठना पसंद करती हैं, कभी कहती है फोन नहीं उठातीं।
तस्वीर अभी भी दराज में है।
पत्र अभी भी अधूरा है।
और गाँव में जो पंचायत भवन बना है, उसकी नींव के नीचे कोई पुरानी दीवार होगी—शायद वही दीवार जिसके उस पार एक लड़की ने एक दिन वह दृश्य देखा था।
नदी अब भी बह रही है।
घर अब भी खाली पड़ते हैं।
बाप अब भी बाहर जाते हैं।
और कोई न कोई बच्ची अब भी समय से पहले घर लौट आती है।
क्या उस दिन कोई दरवाजे पर खड़ा होगा—
या फिर वही दोपहर एक बार और दोहराई जाएगी—
यह बात अभी लिखी नहीं गई।
समाप्त नहीं।