पति की एक कमी की वजह से पत्नी ने कर दिया कां@ड/असली वजह जानकर S.P साहब के होश उड़ गए/
पति की एक कमी की वजह से पत्नी ने कर दिया कांड/: असली वजह जानकर S.P. साहब के होश उड़ गए
भूमिका: राजस्थान का हनुमानगढ़ जिला और सामाजिक जागरूकता
नमस्कार दोस्तों, मैं कुलदीप राणा। आज की हमारी यह सच्ची और दिल दहला देने वाली घटना राजस्थान राज्य के ऐतिहासिक और कृषि प्रधान जिले हनुमानगढ़ से ताल्लुक/ रखती है। हनुमानगढ़ जिला, जो अपनी उपजाऊ भूमि, शांत वातावरण और मेहनती किसानों के लिए जाना जाता है, वहीं कभी-कभी समाज के भीतर पनप रही असीमित तृष्णा, बदचलन रवैये और लालच की वजह से ऐसी खौफनाक वारदातें जन्म ले लेती हैं, जो इंसानियत को शर्मसार कर देती हैं।
आज की यह घटना एक ऐसी महिला, उसके लाचार पिता, दो-दो नाकाम शादियों, शारीरिक आकर्षण/ और एक निर्दयी षड्यंत्र/ के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसने न केवल पुलिस प्रशासन बल्कि पूरे इलाके को स्तब्ध करके रख दिया। जब इस वारदात की पूरी सच्चाई निकलकर सामने आई, तो जांच कर रहे S.P. (पुलिस अधीक्षक) साहब के भी होश उड़ गए।
इस कहानी को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का हमारा मुख्य उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या किसी की सामाजिक मर्यादा पर चोट करना बिल्कुल नहीं है, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों के पतन, असीमित वासना/ और अपराध/ के दुष्परिणामों के प्रति आप सभी को जागरूक, सजग और सतर्क करना है। तो चलिए, बिना किसी विलंब के शुरू करते हैं आज की यह बेहद रोमांचक और विचारणीय कहानी।
अध्याय 1: पूर्ण सिंह का अनवरत संघर्ष और कजरी की नाकामी
हमारी कहानी की शुरुआत होती है हनुमानगढ़ जिले के एक छोटे और शांत गाँव से, जिसका नाम है धीरखेड़ा। धीरखेड़ा गाँव आम भारतीय देहात की तरह खेतों, कच्चे-पक्के मकानों और सादगी भरे जीवन से सराबोर था। इसी धीरखेड़ा गाँव की एक बेहद संकरी गली में बना दो कमरों का एक साधारण सा मकान स्थित था, जिसमें पूर्ण सिंह नाम का एक अत्यंत मेहनती और सीधा-साधा व्यक्ति रहता था।
पूर्ण सिंह की उम्र लगभग 55 वर्ष के आसपास थी। उनके जीवन का मुख्य ध्येय अपने परिवार का भरण-पोषण करना और अपनी संतानों को एक सुखद भविष्य देना था। धीरखेड़ा गाँव से लगभग 5 किलोमीटर दूर एक औद्योगिक क्षेत्र में एक गत्ता (कार्डबोर्ड) बनाने की बड़ी फैक्ट्री थी। पूर्ण सिंह पिछले 25 वर्षों से उसी गत्ता फैक्ट्री में दिन-रात कड़ा शारीरिक श्रम और मजदूरी किया करते थे। सुबह की पहली किरण फूटने से लेकर शाम के ढलने तक, पूर्ण सिंह धूल और मशीनों के शोर के बीच पसीना बहाते थे।
इन 25 वर्षों की हाड़-तोड़ मेहनत से पूर्ण सिंह ने जो भी पाई-पाई जोड़ी थी, उसे उन्होंने अपनी तीनों बेटियों के लालन-पालन, शिक्षा और विवाह में लगा दिया था। पूर्ण सिंह ने बड़े ही मान-सम्मान और अपनी बिरादरी के रीति-रिवाजों के अनुसार अपनी तीनों बेटियों का विवाह धूमधाम से कर दिया था। दो बड़ी बेटियाँ अपने-अपने ससुराल में खुशहाल जीवन गुज़ार रही थीं, लेकिन पूर्ण सिंह की सबसे छोटी बेटी—कजरी की किस्मत और उसके विचार बिल्कुल अलग थे।
कजरी की उम्र लगभग 22 से 23 वर्ष के आसपास थी। देखने में वह काफी सुंदर, सुडौल और आकर्षक थी, परंतु स्वभाव से अत्यधिक चंचल, हठी और मनचली प्रवृत्ति की महिला थी। कजरी का पहला विवाह जिस परिवार में हुआ था, वहाँ शुरुआत में सब ठीक चला। लेकिन धीरे-धीरे कजरी का चाल-चलन और चरित्र/ डगमगाने लगा। वह अपने ससुराल में घरेलू ज़िम्मेदारियों से जी चुराती थी और गाँव के अन्य लड़कों से बातचीत व अवांछित संबंध/ बढ़ाने में रुचि रखती थी।
कजरी की इस अवांछित हरकतों और खराब चरित्र/ से तंग आकर उसके पहले पति ने उसे साफ़ चेतावनी दी। लेकिन जब कजरी के रवैये में कोई सुधार नहीं आया, तो दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ा और अंततः कजरी के पहले पति ने उसे वैधानिक रूप से तलाक/ देकर अपने घर से निकाल दिया।
ससुराल से निकाली जाने के बाद कजरी वापस अपने पिता पूर्ण सिंह के घर धीरखेड़ा आ गई। बूढ़े पिता पूर्ण सिंह के लिए यह बात बहुत बड़े सदमे जैसी थी। समाज के ताने और अपनी बेटी का उजड़ा हुआ घर देखकर पूर्ण सिंह भीतर से टूट चुके थे। वे रात-दिन इसी चिंता में घुलने लगे कि समाज के लोग क्या कहेंगे और कजरी का पूरा जीवन अकेले कैसे कटेगा?
पूर्ण सिंह ने मन ही मन निर्णय लिया कि वे अपनी बेटी को इस तरह घर पर बिठाकर नहीं रख सकते। वे कजरी का दूसरा विवाह करवाएँगे। परंतु शादी के लिए भारी पैसों की आवश्यकता थी, जो गत्ता फैक्ट्री की मामूली मजदूरी से संभव नहीं था। अपनी लाचारी और सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए पूर्ण सिंह ने गाँव के ही एक साहूकार से ऊँचे ब्याज/ पर भारी कर्ज उठाया। कर्ज/ के पैसों का इंतज़ाम करके पूर्ण सिंह ने कजरी का दूसरा विवाह एक अन्य गाँव में संपन्न करा दिया।
लेकिन अफ़सोस! कजरी के सिर पर तो किसी और ही वासना/ का भूत सवार था। दूसरे ससुराल में पहुँचने के मात्र कुछ ही हफ़्तों बाद कजरी फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई। उसकी अवांछित गतिविधियों, देर रात तक फोन पर बातचीत करने की आदत और गैर-पुरुषों/ की तरफ झुकाव ने उसके दूसरे पति के सब्र का बाँध तोड़ दिया। दूसरे पति को जब लगा कि कजरी के चरित्र/ को सुधारना असंभव है, तो उसने भी कजरी से अपना नाता तोड़ लिया और उसे तलाक/ दे दिया।
इस तरह दूसरी बार भी तलाक/ खाकर कजरी वापस अपने पिता पूर्ण सिंह के घर आ धमकी।
अब तो पूर्ण सिंह के सिर पर दुखों और ब्याजी कर्ज/ का पहाड़ टूट पड़ा था। फैक्ट्री में दिन भर काम करने के बाद जब वे घर लौटते, तो कजरी को घर में बेफिक्र होकर फोन चलाते और आराम करते देखते। पूर्ण सिंह सोचने लगे कि कजरी घर के छोटे-मोटे बर्तन-चौका करने के बाद पूरे दिन खाली बैठी रहती है और मोबाइल में मसरूफ रहती है। खाली दिमाग शैतान का घर होता है, इसीलिए इसे किसी न किसी काम में व्यस्त रखना बेहद ज़रूरी है।
अपनी बेटी को काम में लगाने और घर का खर्च निकालने के उद्देश्य से पूर्ण सिंह ने एक जमींदार से थोड़ा कर्ज/ और लिया और दो दुधारू गायें खरीद लीं।
पूर्ण सिंह ने कजरी से कड़क लेकिन बाप वाले स्नेह से कहा: “कजरी बेटी! अब तुम घर पर खाली मत बैठा करो। मैंने ये दो गायें खरीदी हैं। इनकी पूरी देखभाल, नहलाना, दूध निकालना और इनके लिए चारा लाने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है। हर रोज़ सुबह उठकर खेतों से चारा काटकर लाओ और गायों को खिलाओ।”
कजरी के पास पिता की बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं था। अब कजरी की नित्य दिनचर्या बदल गई। वह हर रोज़ सुबह लगभग 8:00 बजे दरांती और बोरा लेकर गाँव के बड़े-बड़े जमींदारों के लहलहाते खेतों में पशुओं के लिए हरा चारा काटने जाने लगी। चारा काटकर घर लाती, गायों को चारा डालती और दूध निकालकर गाँव के डेयरी वाले को बेच देती। दूध की बिक्री से हर रोज़ थोड़े-बहुत पैसे आने लगे, जिससे घर का चूल्हा-चौका सुचारू रूप से चलने लगा।
सब कुछ कुछ समय के लिए शांत दिख रहा था, परंतु गाँव के चतुर लोग कजरी के हाव-भाव, उसकी मटकती चाल और आँखों की चंचलता से भली-भांति परिचित थे। गाँव के कुछ बुजुर्गों ने पूर्ण सिंह को एक दिन चौपाल पर रोककर कहा: “पूर्ण सिंह! तुम अपनी बेटी कजरी को खेतों में अकेली क्यों भेजते हो? उसका चाल-चलन और नीयत ठीक नहीं लगती। अगर तुमने जल्दी से उसका तीसरा विवाह नहीं कराया या उस पर सख्त पहरा नहीं लगाया, तो एक दिन यह लड़की पूरे धीरखेड़ा गाँव में कोई बहुत बड़ा कांड/ कर देगी और तुम्हारी इज़्ज़त मिट्टी में मिला देगी!”
जब पूर्ण सिंह ने गाँव वालों की यह तीखी बात सुनी, तो वे बेबसी से अपना सिर पकड़कर बैठ गए। पूर्ण सिंह ने गमगीन आवाज़ में कहा: “भाइयों! मैं क्या करूँ? मैं तो एक गरीब मजदूर हूँ। अपनी क्षमता से ज़्यादा कर्ज/ उठाकर दो-दो बार इसकी शादी करा चुका हूँ। दोनों जगह से इसका तलाक/ हो गया। अब मेरे पास इतने पैसे कहाँ से आएँ कि मैं इसकी तीसरी शादी रचा सकूँ?”
यह कहकर पूर्ण सिंह ने अपना पल्ला झाड़ लिया और ऊपर वाले के भरोसे सब छोड़ दिया। परंतु पूर्ण सिंह को इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि गाँव वालों की कही आशंका शत-प्रतिशत सच साबित होने वाली थी। कजरी शादी से पहले ही अपने गाँव धीरखेड़ा में दो ऐसे बड़े-बड़े कांड/ करने वाली थी, जिसकी भनक न तो उसके असहाय पिता को थी और न ही गाँव के किसी व्यक्ति को!
अध्याय 2: टूटा मोबाइल, सहदेव की दुकान और खेत का अवांछित खेल/
बात है 2 जनवरी 2026 की सुबह की।
शीतकाल की हल्की धुंध धीरखेड़ा गाँव पर छाई हुई थी। सुबह के लगभग 8:00 बजे का समय था। कजरी अपने घर के आँगन में बैठकर प्लास्टिक के टब में कपड़े धो रही थी। कपड़े धोते-धोते कजरी का एक हाथ साबुन के झाग से सना हुआ था और दूसरे हाथ से वह अपने सस्ते एंड्रॉइड मोबाइल फोन पर कोई वीडियो/ देख रही थी।
अचानक कजरी के गीले और साबुन से सने हाथों से मोबाइल फिसल गया और सीधे ज़मीन पर बिछे पक्के पत्थरों पर जा गिरा। एक तेज़ आवाज़ हुई—’चटाक!’
मोबाइल का स्क्रीन पूरी तरह चकनाचूर हो गया और फोन बंद हो गया। कजरी ने झटपट फोन उठाया, बटन दबाने की कोशिश की, लेकिन फोन पूरी तरह डेड (खराब) हो चुका था।
मोबाइल के टूटते ही कजरी के माथे पर सिलवटें पड़ गईं। वह दौड़कर अपने पिता पूर्ण सिंह के पास पहुँची, जो फैक्ट्री जाने के लिए अपने जूते पहन रहे थे।
कजरी ने मुँह बनाते हुए कहा: “पिताजी! देखिए मेरा मोबाइल फोन हाथ से छूटकर गिर गया और टूट गया। अब यह चालू नहीं हो रहा है। मुझे तुरंत एक नया स्मार्टफोन खरीदकर दीजिए!”
पूर्ण सिंह ने अपनी बेटी को ऊपर से नीचे तक देखा और गहरी साँस छोड़कर बोले: “कजरी! क्या तुम होश में हो? मैं फैक्ट्री में दिन-रात पसीना बहाकर मुश्किल से दो वक्त की रोटी और गायों का किश्त भर पाता हूँ। मेरे पास इतने फालतू पैसे नहीं हैं कि मैं तुम्हें हर दूसरे महीने नया मोबाइल खरीदकर दूँ। अब जैसा है वैसा ही रहेगा, मेरे पास पैसे नहीं हैं।”
यह कहकर पूर्ण सिंह अपनी साइकिल उठाकर गत्ता फैक्ट्री के लिए रवाना हो गए।
पिता के साफ़ इनकार ने कजरी के भीतर एक अजीब सी खीझ और जिद्द भर दी। कजरी अपने खाली कमरे में खड़ी होकर सोचने लगी: “स्मार्टफोन के बिना तो मेरा दिन ही नहीं कटता। मुझे तो नया फोन हर हाल में चाहिए, चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े!”
सुबह लगभग 10:00 बजे कजरी हमेशा की तरह अपने खेतों में चारा काटने चली गई। दोपहर 1:00 बजे चारा काटकर लौटी, गायों को खाना दिया और घर के बाकी काम निपटाए। शाम के लगभग 4:00 से 5:00 बजे के आसपास का वक्त हो चला था। कजरी के दिमाग में लगातार नया फोन पाने की तरकीबें घूम रही थीं।
धीरखेड़ा गाँव के मुख्य बाज़ार के चौराहे पर एक मोबाइल रिपेयरिंग और बिक्री की छोटी सी दुकान थी। उस दुकान पर सहदेव नाम का एक 24-25 साल का युवक काम करता था। सहदेव स्वभाव से काफी शौकीन, रंगीन मिज़ाज और मनचला लड़का था। उसकी एक बहुत बुरी आदत थी—वह महिलाओं और लड़कियों के प्रति अत्यधिक कामातुर/ नज़रों से देखता था। जब भी गाँव की कोई सुंदर महिला या युवती उसकी दुकान के सामने से गुज़रती, तो सहदेव अपनी पलकें झपकाए बिना उसकी सुंदरता और शारीरिक बनावट को तब तक ताकता रहता था, जब तक वह महिला उसकी नज़रों से ओझल न हो जाए।
कजरी ने सहदेव की इस कमज़ोरी को पहले ही ताड़ लिया था।
शाम लगभग 5:00 बजे कजरी अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा व्यवस्थित करते हुए सीधे सहदेव की मोबाइल दुकान के भीतर दाखिल हुई।
सहदेव दुकान के काउंटर पर बैठा लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। जैसे ही कजरी ने दुकान के भीतर कदम रखा और सहदेव की नज़रें कजरी के आकर्षक चेहरे, खुले बालों और सुगठित शरीर पर पड़ीं, सहदेव की आँखें फटी की फटी रह गईं! सहदेव स्तब्ध होकर कजरी के रूप-सौंदर्य को निहारने लगा। उसके शातिर दिमाग में कामुक/ विचार दौड़ने लगे।
कजरी ने अपनी आँखों को मटकाते हुए और मधुर मुस्कान बिखेरते हुए कहा: “सहदेव भाई! मुझे एक नया ब्रांडेड स्मार्टफोन खरीदना है। लेकिन समस्या यह है कि मेरे पास अभी नकद पैसे नहीं हैं। क्या तुम मुझे किस्तों (Installments) पर या उधार में एक अच्छा स्मार्टफोन दे सकते हो?”
सहदेव ने अपने होंठों पर एक कुटिल मुस्कान लाते हुए कहा: “अरे कजरी भाभी! हम किसी को भी उधार या किस्तों पर नया फोन नहीं देते। आज के ज़माने में बिना पूरे पैसों के फोन कौन देता है?”
कजरी थोड़ा और करीब झुकी और धीमी, मादक आवाज़ में बोली: “सहदेव! तुम तो गाँव के ही हो। मेरी मजबूरी समझो ना! तुम मुझे अभी नया फोन दे दो, मैं धीरे-धीरे करके तुम्हारे सारे पैसे चुकता/ कर दूँगी… पैसों के अलावा भी अगर तुम्हें कुछ चाहिए, तो हम बैठकर बात कर सकते हैं।”
कजरी के इस इशारे और उसकी कामुक/ बोली ने सहदेव के भीतर छिपी हवस/ को पूरी तरह जगा दिया।
सहदेव ने तुरंत दुकान के शोकेस से एक सील पैक ₹15,000 का चमचमाता हुआ नया स्मार्टफोन निकाला और काउंटर पर कजरी के हाथों के ऊपर रख दिया। सहदेव ने कजरी की उंगलियों को सहलाते हुए कहा: “कजरी! यह नया स्मार्टफोन तुम्हारा हुआ! लेकिन मेरी एक शर्त है। तुम्हें मेरी शारीरिक ज़रूरतें/ पूरी करनी होंगी। अगर तुम मुझे खुश/ रखोगी, तो मैं तुमसे एक पैसा भी नहीं माँगूँगा।”
कजरी मंद-मंद मुस्कुराई। वह सहदेव के जाल को समझ चुकी थी, या यूँ कहें कि सहदेव खुद कजरी के जाल में फँस चुका था।
सहदेव ने उतावली आवाज़ में कहा: “तो फिर देर किस बात की? आज रात मेरी दुकान बंद होने के बाद यहीं आ जाओ!”
कजरी ने अपनी चतुर चाल चलते हुए कहा: “नहीं सहदेव, रात को दुकान पर आना खतरनाक हो सकता है, गाँव वाले देख लेंगे तो आफ़त आ जाएगी। ऐसा करते हैं, कल सुबह 8:30 बजे जब मैं खेतों में चारा काटने जाऊँगी, तुम अपनी मोटरसाइकिल लेकर खेतों की तरफ आ जाना। वहाँ कोई नहीं होता, मैं तुम्हारी सारी इच्छाएं/ पूरी कर दूँगी।”
सहदेव खुशी से फूला न समाया और इस योजना पर तुरंत सहमत हो गया। कजरी नया स्मार्टफोन अपनी जेब में डालकर इतराती हुई घर लौट आई।
अगली सुबह का खौफनाक खेल/: अगले दिन (3 जनवरी 2026) की सुबह लगभग 8:30 बजे पूर्ण सिंह फैक्ट्री के लिए निकल चुके थे। कजरी ने तुरंत अपने नए फोन से सहदेव को कॉल मिलाया और कहा कि वह खेतों की तरफ बढ़ रही है।
सहदेव ने झटपट अपनी मोबाइल दुकान का शटर गिराया, अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की और गाँव के बाहरी इलाके की तरफ निकल पड़ा।
कजरी दरांती और बोरा लिए खेतों की पगडंडी पर पैदल चल रही थी। पीछे से सहदेव मोटरसाइकिल लेकर पहुँचा। कजरी चुपचाप सहदेव की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठ गई। सहदेव उसे लेकर धीरखेड़ा गाँव के एक बड़े जमींदार आलोक सिंह के घने सरसों और ज्वार के खेतों के बीच ले गया। चूँकि कजरी के अपने कोई खेत नहीं थे, इसलिए वह हमेशा दूसरों के खेतों में ही काम किया करती थी।
आलोक सिंह के सुनसान और घने खेतों के बीच मोटरसाइकिल खड़ी करके दोनों एक घने कोने में बैठ गए। शुरुआत में थोड़ी बहुत बातचीत हुई और उसके बाद दोनों के बीच अवांछित/ और अनैतिक/ शारीरिक संबंध/ कायम होने लगे। कजरी और सहदेव दोनों अपनी-अपनी रज़ाबंदी से उस खेत के भीतर इस गलत कृत्य/ को अंजाम देने लगे। दोनों ने काफी देर तक अपनी हवस/ को शांत किया।
जब उनका यह गंदा खेल/ खत्म हुआ, तो दोनों खेत में बैठकर सुस्ताने लगे। तभी सहदेव ने अपना फोन निकाला और कजरी से कहा: “कजरी! मेरा एक बहुत पक्का दोस्त है—प्रवीण। मैंने उसे भी फोन करके यहाँ बुला लिया है। वह भी आ रहा है।”
कजरी यह सुनकर अचानक डर गई और बिफरकर बोली: “क्या? तुमने प्रवीण को क्यों बुलाया? प्रवीण बहुत ही आवारा और खराब किस्म का लड़का है! मैं उसके साथ कोई संबंध/ नहीं बनाऊँगी!”
सहदेव ने कजरी का हाथ पकड़कर सहलाते हुए कहा: “अरे कजरी, गुस्सा मत हो! प्रवीण मेरा जिगरी यार है। वह तुम्हें कुछ नकद पैसे भी देगा। बस थोड़ी देर की तो बात है, उसे भी खुश/ कर दो ना!”
सहदेव की चिकनी-चुपड़ी बातों और पैसों के लालच में आकर कजरी मान गई। कुछ ही देर में प्रवीण भी अपनी मोटरसाइकिल से आलोक सिंह के खेत में पहुँच गया। प्रवीण ने कजरी को देखते ही उसकी तरफ कुछ नकद रुपये बढ़ाए और कजरी को लेकर खेत के और घने हिस्से में चला गया।
परंतु नियति का खेल देखिए! दुर्भाग्य से उसी समय खेत का असली मालिक जमींदार आलोक सिंह अपनी मोटरसाइकिल से खेतों का मुआयना करने पहुँच गया!
जैसे ही आलोक सिंह की मोटरसाइकिल की गड़गड़ाहट सुनाई दी, बाहर खड़ा सहदेव घबरा गया। सहदेव ने ज़ोर से आवाज़ लगाई: “प्रवीण! बाहर निकल! खेत का मालिक आ गया है!”
आवाज़ सुनते ही प्रवीण और कजरी अस्त-व्यस्त कपड़ों में घबराते हुए खेत से बाहर निकल आए।
आलोक सिंह ने जब अपनी आँखों से देखा कि उसके खेत के भीतर पूर्ण सिंह की बेटी कजरी, सहदेव और प्रवीण जैसे दो आवारा लड़कों के साथ आपत्तिजनक/ अवस्था में मौजूद है, तो आलोक सिंह का खून खौल उठा!
आलोक सिंह कड़ककर बोला: “तुम नीच लोगों ने मेरे पावन खेत को अयाशी का अड्डा बना रखा है! भागो यहाँ से, वरना अभी लाठी मारकर तुम्हारी टाँगें तोड़ दूँगा!”
डर के मारे सहदेव और प्रवीण अपनी-अपनी मोटरसाइकिलें लेकर रफूचक्कर हो गए, और कजरी भी अपना बोरा उठाकर सर झुकाए घर की तरफ भाग खड़ी हुई।
अध्याय 3: आलोक सिंह की सलाह और तीसरे पति राकेश का प्रस्ताव
आलोक सिंह कोई आम जमींदार नहीं था, बल्कि वह कजरी के पिता पूर्ण सिंह का पुराना और सच्चा शुभचिंतक दोस्त था।
आलोक सिंह ने मन ही मन सोचा: “मेरा दोस्त पूर्ण सिंह कितना सीधा और मेहनती इंसान है। दिन-रात फैक्ट्री में पसीना बहाता है और उसकी यह बदचलन बेटी गाँव के आवारा लड़कों के साथ खेतों में अनैतिक काम/ कर रही है! अगर मैंने पूर्ण सिंह को आगाह नहीं किया, तो यह लड़की एक दिन अपने पिता की नाक कटवा देगी और उसे कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगी।”
शाम के लगभग 7:00 बजे जब पूर्ण सिंह फैक्ट्री से थककर घर लौटे और अपने आँगन में बैठे, तो कुछ ही देर में आलोक सिंह उनके घर आ पहुँचा।
आलोक सिंह ने पूर्ण सिंह को एकांत में ले जाकर कहा: “पूर्ण भाई! जो बात मैं तुम्हें बताने जा रहा हूँ, उसे सुनकर रोना मत, बल्कि कड़ा फैसला लो। आज मैंने तुम्हारी बेटी कजरी को अपने खेत में सहदेव और प्रवीण नाम के लड़कों के साथ रंगे हाथों पकड़ा है! तुम्हारी बेटी गलत रास्ते पर चल पड़ी है। अगर तुमने समय रहते इसका इलाज नहीं किया, तो समाज में तुम्हारी बची-खुची इज़्ज़त भी नीलाम हो जाएगी!”
यह सुनते ही पूर्ण सिंह के हाथों से पानी का गिलास छूट गया। उनकी आँखों से आँसू छलक आए। पूर्ण सिंह ने सिर पकड़कर कहा: “आलोक भाई! मैं क्या करूँ? दो-दो शादियाँ करके टूट चुका हूँ। कर्ज/ में डूबा हूँ। अब तीसरी शादी किसके साथ करूँ?”
आलोक सिंह ने पूर्ण सिंह के कंधे पर हाथ रखा और एक योजना बताई: “देख पूर्ण! निराश मत हो। धीरखेड़ा से पास वाले ही गाँव में एक लड़का रहता है, जिसका नाम राकेश है। राकेश उम्र में थोड़ा बड़ा है और शरीर से बहुत ही अत्यधिक मोटा (स्थूलकाय) है। परंतु राकेश के पास धन-दौलत, जमीन-जायदाद और एक बड़ी किराने की दुकान है। उसके माता-पिता की कई साल पहले मौत हो चुकी है और वह घर में बिल्कुल अकेला रहता है। उसे एक पत्नी की तलाश है। अगर तुम कहो, तो मैं कजरी का रिश्ता राकेश से पक्का करवा देता हूँ।”
पूर्ण सिंह ने उम्मीद की किरण देखते हुए कहा: “आलोक भाई! अगर ऐसा हो जाए तो मेरे सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर जाएगा। तुम कल ही मुझे उस लड़के से मिलवा दो!”
5 जनवरी 2026 की मुलाकात: अगले दिन सुबह 10:00 बजे आलोक सिंह और पूर्ण सिंह दूसरे गाँव पहुँचे और राकेश के घर पहुँचे।
जब पूर्ण सिंह ने पहली बार राकेश को देखा, तो वे भौंचक्के रह गए! राकेश का शरीर अत्यधिक भारी-भरकम, थुलथुला और बेडौल था। उसका पेट बाहर निकला हुआ था और उसे चलने-फिरने में भी साँस फूलती थी।
पूर्ण सिंह ने आलोक के कान में फुसफुसाकर कहा: “भाई आलोक! लड़का तो बहुत ही ज़्यादा मोटा और बेडौल है। क्या कजरी इसके साथ रह पाएगी?”
आलोक सिंह ने कड़े स्वर में फुसफुसाया: “पूर्ण भाई! तुम अपनी बेटी की स्थिति भूलो मत! दो-दो बार तलाक/शुदा है, चरित्र/ पर दाग लग चुका है। तुम्हें राज करने वाला घर मिल रहा है, पैसे वाला पति मिल रहा है। मोटापे से तुम्हें क्या लेना-देना? बस हाथ पीले करो और फुर्सत पाओ!”
पूर्ण सिंह को आलोक की बात न्यायसंगत लगी। जब राकेश से बात की गई, तो राकेश अपनी जिंदगी में अकेलेपन से तंग आ चुका था। उसे घर सँभालने के लिए एक सुंदर पत्नी चाहिए थी। कजरी की तस्वीर और उसकी सुंदरता देखकर राकेश तुरंत शादी के लिए तैयार हो गया।
शादी की तारीख तय हुई 25 जनवरी 2026।
25 जनवरी को बड़े ही सादगी लेकिन रीती-रिवाजों के साथ राकेश और कजरी का विवाह संपन्न हो गया। पूर्ण सिंह ने राहत की साँस ली कि चलो, आखिरकार उनकी बेटी का तीसरा घर बस गया।
अध्याय 4: सुहागरात का हादसा और पति की घिनौनी कमी/
25 जनवरी 2026 की शाम लगभग 7:00 बजे, राकेश अपनी नई-नवेली दुल्हन कजरी को विदा कराकर अपने बड़े से मकान में ले आया।
रात के लगभग 9:30 बजे का समय हो चला था।
राकेश अपने मन में असीम उत्साह और उमंग महसूस कर रहा था। इतने सालों बाद उसके सूने घर में एक बेहद सुंदर पत्नी आई थी। राकेश अपनी सुहागरात (पहली रात) को यादगार बनाना चाहता था। वह सज-धजकर, गुलाब जल छिड़ककर अपने बेडरूम की ओर बढ़ा, जहाँ कजरी लाल जोड़े में घूंघट काढ़े बिस्तर पर बैठी हुई थी।
परंतु नियति को कुछ और ही मंज़ूर था! राकेश की शारीरिक संरचना और अत्यधिक मोटापे की वजह से उसका संतुलन वैसे ही कम रहता था।
जैसे ही राकेश ने बेडरूम का दरवाजा खोला और उत्साह में पहला कदम भीतर रखा, फर्श पर किसी वजह से थोड़ा सा पानी गिरा हुआ था। राकेश का भारी-भरकम पैर सीधे उस पानी पर पड़ा और उसका संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया!
‘धड़ाम!’ की एक भयानक आवाज़ हुई! राकेश 120 किलो के अपने वजन के साथ पीठ के बल फर्श पर जा गिरा!
“आहहह! मेरी पीठ! मेरी कमर टूट गई!” राकेश दर्द के मारे चीखने-चिल्लाने लगा।
कमरे में बैठी कजरी घबराकर उठी। राकेश की चीख सुनकर घर के बाहर वाले कमरे में सो रहा उसका पुराना नौकर दौड़कर कमरे में आया। नौकर और कजरी ने बड़ी मुश्किल से खींचतान करके 120 किलो के राकेश को फर्श से उठाया और बिस्तर पर लिटाया।
गिरावट इतनी तेज़ थी कि राकेश की रीढ़ की हड्डी और पीठ में भयंकर मोच आ गई थी। राकेश दर्द से कराह रहा था। उसने रोते हुए कजरी से कहा: “कजरी! मुझे माफ़ कर दो… मेरी पीठ में असह्य दर्द हो रहा है। मैं हिल भी नहीं पा रहा हूँ। आज की रात हमारी सुहागरात नहीं हो सकती। मुझे सीधे लेटे रहना होगा।”
कजरी का मुँह बन गया। शादी की पहली ही रात इस तरह चौपट होने से उसके मन में खीझ भर गई।
जैसे-तैसे कजरी भी उसी बेड के एक कोने में मुँह फेरकर लेट गई।
परंतु असली नारकीय यातना तो अब शुरू होने वाली थी! राकेश के अत्यधिक मोटापे, खराब पाचन तंत्र और शारीरिक कमज़ोरी/ की वजह से उसके पेट में भयंकर गैस/ बनने की गंभीर बीमारी थी।
रात के लगभग 11:00 बजे जैसे ही राकेश गहरी नींद में सोया, उसके पेट से अत्यधिक बदबूदार और निरंतर गैस/ पास (छूटने) होने लगी!
कमरे के खिड़की-दरवाजे बंद थे। मात्र 15 से 20 मिनट के भीतर ही उस बंद बेडरूम का वातावरण इतना विषैला और दुर्गंधयुक्त हो गया कि कजरी का दम घुटने लगा! बदबू इतनी भयानक और असह्य थी कि कजरी को उल्टी (वमिटिंग) की शिकायत होने लगी।
कजरी ने अपना मुँह तकिये से ढका, चादर ओढ़ी, लेकिन बदबू रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
कजरी मन ही मन भड़कती हुई सोचने लगी: “हे भगवान! यह कैसा मरे पड़े शरीर वाला पति मुझे मिल गया? एक तो इतना मोटा, ऊपर से पहली ही रात गिरकर अपाहिज हो गया और अब पूरे कमरे को अपने पेट की सड़न से गंदा कर रहा है! इसके साथ एक रात बिताना भी नरक भोगने जैसा है!”
कजरी पूरी रात सो नहीं सकी। वह करवटें बदलती रही और सुबह होने का इंतज़ार करने लगी।
अध्याय 5: हैंडसम नौकर शंकर का आगमन और अनैतिक आकर्षण/
अगली सुबह (26 जनवरी 2026) के लगभग 7:00 बजे जब कजरी उस बदबूदार कमरे से बाहर निकली, तो उसे भयंकर चक्कर आ रहे थे और उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था।
कजरी ने आँगन में बैठे राकेश से चिढ़कर कहा: “देखिए! मुझसे इस घर का कोई बर्तन-चौका या खाना बनाने का काम नहीं होने वाला। मेरी तबीयत बहुत खराब है।”
राकेश ने अपनी पीठ सहलाते हुए बड़े प्यार से कहा: “कजरी! तुम चिंता क्यों करती हो? तुम्हें घर का कोई भारी काम करने की ज़रूरत नहीं है। हमारे घर में पिछले दो सालों से एक नौकर काम करता है, उसका नाम शंकर है। वह सुबह 8:00 बजे तक आ जाता है। वह झाड़ू-पोछा, कपड़े धोने से लेकर खाना बनाने तक का सारा काम खुद करता है।”
यह सुनते ही कजरी के चेहरे पर थोड़ी सी राहत आई। उसने सोचा कि चलो, कम से कम काम करने से तो मुक्ति मिली। परंतु कजरी को इस बात का तनिक भी ज्ञान नहीं था कि राकेश का नौकर शंकर कैसा दिखता है।
सुबह के ठीक 8:00 बजे घर के मुख्य दरवाजे पर दस्तक हुई—’खट-खट’।
आज राकेश की पीठ में दर्द होने के कारण वह बिस्तर से नहीं उठा। कजरी खुद ही मुख्य दरवाजा खोलने गई।
जैसे ही कजरी ने घर का लकड़ी वाला बड़ा दरवाजा खोला, सामने खड़े युवक को देखकर कजरी की आँखें फटी की फटी रह गईं! उसके कदम वहीं थम गए!
दरवाजे पर खड़ा युवक कोई और नहीं, बल्कि राकेश का नौकर शंकर था!
शंकर की उम्र लगभग 22 से 23 वर्ष थी। वह लंबे कद, गठीले व बलिष्ठ शरीर, चौड़ी छाती और बेहद हैंडसम चेहरे वाला नौजवान था। शंकर ने साधारण सूती शर्ट और पैंट पहन रखी थी, लेकिन उसकी कद-काठी किसी मॉडल जैसी लग रही थी।
दूसरी ओर, जब शंकर की नज़र अपनी नई मालकिन कजरी की सुंदरता, उसकी रसीली आँखों और ढीले नाईटगाउन पर पड़ी, तो शंकर भी एकटक नज़रों से कजरी को ऊपर से नीचे तक निहारने लगा।
दोनों की नज़रें आपस में टकराईं और हवा में एक अजीब सी अनैतिक/ उत्तेजना और आकर्षण/ की चिंगारी कौंध गई!
कजरी ने अपने मन में सोचा: “वाह! कहाँ तो मेरा पति वो 120 किलो का बदबूदार ढोर है, और कहाँ यह नौकर इतना हैंडसम, गठीला और ताकतवर नौजवान! इस घर में रहना अब बेकार नहीं जाएगा!”
शंकर घर के भीतर दाखिल हुआ और रसोई में जाकर नाश्ता बनाने लगा। कजरी बिना किसी काम के भी बार-बार रसोई में जाने लगी। कभी पानी पीने के बहाने, कभी डिब्बे ढूँढने के बहाने वह शंकर के करीब जाकर खड़ी हो जाती और अपनी साड़ी का पल्लू सरकाकर शंकर को अपने सुडौल शरीर की तरफ आकर्षित/ करने की कोशिश करती।
शंकर भी कोई दूध पीता बच्चा नहीं था। उसने अपनी मालकिन के इन इशारों को तुरंत भांप लिया। शंकर भी नाश्ता बनाते समय कजरी से मीठी-मीठी बातें करने लगा और दोनों के बीच हँसी-मजाक का दौर शुरू हो गया।
शाम 7:00 बजे शंकर अपना काम खत्म करके अपने घर चला गया।
जब दूसरी रात आई, तो फिर से राकेश की पीठ का दर्द और पेट की भयंकर बदबूदार गैस/ का सिलसिला शुरू हो गया। आज कजरी ने एक पल भी उस कमरे में गुज़ारना उचित नहीं समझा। वह अपना तकिया और चादर उठाकर सीधे दूसरे खाली गेस्ट रूम (अतिथि कक्ष) में जाकर सो गई।
15 दिनों का अनैतिक/ खेल: दिन बीतते गए। बीते 15 दिनों के भीतर कजरी और नौकर शंकर के बीच की दूरियाँ पूरी तरह मिट चुकी थीं।
जब भी राकेश अपनी किराने की दुकान पर जाता, घर में कजरी और नौकर शंकर अकेले होते। दोनों घंटों बैठकर बातें करते, एक-दूसरे के करीब आते और हाथ पकड़कर प्यार जताते। नौकर और मालकिन के बीच घोर अनैतिक/ प्रेम प्रसंग/ पूरी तरह परवान चढ़ चुका था। कजरी अब अपने पति राकेश से सख्त नफरत करने लगी थी और शंकर के शारीरिक मोह में पूरी तरह अंधी हो चुकी थी।
अध्याय 6: 5 मार्च की नशीली रात और 10 मार्च की होटल डील/
तारीख आई 5 मार्च 2026।
सुबह के लगभग 11:00 बजे राकेश अपनी किराने की दुकान पर काम कर रहा था। तभी राकेश ने कजरी को फोन मिलाया और कहा: “कजरी! आज रात मेरे बहुत पुराने दोस्त की बेटी का जन्मदिन (Birthday Party) है। मुझे दूसरे शहर जाना पड़ेगा और लौटने में काफी देर हो जाएगी या हो सकता है मुझे वहीं रुकना पड़े। क्या तुम मेरे साथ चलोगी?”
कजरी ने मन ही मन खुशी से ताली बजाई, लेकिन फोन पर बीमार होने का ढोंग करते हुए कहा: “नहीं-नहीं! आज मेरे पेट में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है, मुझसे सफर नहीं होगा। आप अकेले ही चले जाइए।”
राकेश ने कहा: “ठीक है, तुम घर पर आराम करो और अंदर से कुंडी बंद कर लेना।”
जैसे ही दोपहर में राकेश अपनी गाड़ी लेकर दोस्त के जन्मदिन में शामिल होने के लिए दूसरे शहर रवाना हुआ, कजरी का दिल खुशी से झूम उठा! उसने मन ही मन कहा: “आज की पूरी रात मैदान साफ़ है!”
रात के लगभग 8:00 बजे कजरी ने तुरंत अपने नौकर शंकर को कॉल किया।
कजरी ने कामुक स्वर में कहा: “शंकर! आज तुम्हारा मालिक शहर से बाहर गया हुआ है और मैं घर में बिल्कुल अकेली हूँ। अगर तुम आज रात मेरे साथ वक्त गुज़ारना चाहते हो, तो बिना देर किए तुरंत आ जाओ!”
यह सुनते ही शंकर की बाँछें खिल गईं। वह तुरंत अपने घर से निकला और चुपचाप दबे पाँव कजरी के घर पहुँच गया।
कजरी ने दरवाजा खोला, शंकर को भीतर खींचा और तुरंत मुख्य दरवाजा और बेडरूम का दरवाजा अंदर से बंद (लॉक) कर लिया।
उस रात बंद बेडरूम में कजरी और नौकर शंकर के बीच मर्यादा की सारी सीमाएं टूट गईं। दोनों ने अपनी-अपनी रज़ाबंदी से रात भर अनैतिक शारीरिक संबंध/ कायम किए और घोर गलत कृत्य/ में लिप्त रहे। भोर होने से पहले शंकर चुपचाप पीछे के दरवाजे से निकलकर अपने घर चला गया।
10 मार्च 2026 – शहर का होटल और कत्ल/ की डील: अब कजरी और शंकर का दुस्साहस बढ़ता जा रहा था।
10 मार्च 2026 की सुबह लगभग 8:00 बजे कजरी ने अपने पति राकेश से कहा: “मुझे अपने लिए कुछ नए कपड़े और साड़ियाँ खरीदनी हैं, मुझे शहर जाना है।”
राकेश ने कहा: “चलो, मैं अपनी दुकान बंद करके तुम्हारे साथ चलता हूँ।”
कजरी ने तुरंत नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा: “नहीं! आपके साथ जाने में मुझे शर्म आती है! आप इतने मोटे हैं कि लोग हमें देखकर हँसते हैं। मैं अकेली ही बस से चली जाऊँगी।”
राकेश का दिल थोड़ा दुःखा, लेकिन उसने पैसे निकालकर कजरी को दे दिए।
राकेश के दुकान जाने के बाद कजरी ने शंकर से कहा: “शंकर! आज हम शहर चलेंगे और किसी होटल में कमरा लेकर दिन गुज़ारेंगे।”
शंकर ने घबराते हुए कहा: “मालकिन! दिन के उजाले में शहर जाना ठीक नहीं है, कोई देख लेगा तो आफ़त आ जाएगी।”
लेकिन कजरी की हवस/ के आगे शंकर की एक न चली। योजना के अनुसार कजरी पहले बस स्टैंड पहुँची। कुछ देर बाद शंकर भी वहाँ पहुँच गया। दोनों बस में बैठकर पास के मुख्य शहर पहुँच गए।
शहर में पहुँचकर दोनों ने एक मध्यम दर्जे का होटल ढूँढा, जिसका मालिक सुरेंद्र कुमार था। कजरी और शंकर ने बिना सही पहचान पत्र (ID) दिखाए होटल के मालिक सुरेंद्र कुमार को कमरे के वास्तविक किराए से तीन गुना ज़्यादा नकद पैसे थमा दिए। पैसों के लालच में होटल मालिक सुरेंद्र कुमार ने उन्हें एक गुप्त कमरा दे दिया।
होटल के बंद कमरे में दोनों ने फिर से अवांछित शारीरिक संबंध/ बनाए।
संबंध/ बनाने के बाद जब दोनों बिस्तर पर लेटे थे, तो कजरी ने शंकर की छाती पर सिर रखा और एक खौफनाक षड्यंत्र/ का नकाब हटाया।
कजरी ने शंकर की आँखों में देखते हुए कहा: “शंकर! हम कब तक इस तरह छुप-छुपकर मिलते रहेंगे? मुझे उस 120 किलो के बदबूदार सांड (राकेश) से सख्त नफरत है। क्यों न हम उसे हमेशा के लिए अपने रास्ते से हटा दें?”
शंकर यह सुनकर चौंक गया और डरते हुए बोला: “क्या? मालिक को मार दें? नहीं मालकिन, यह बहुत बड़ा अपराध/ है, पुलिस हमें पकड़ लेगी!”
कजरी ने शंकर को लालच का नशा/ चखाते हुए कहा: “अरे बेवकूफ! डर मत! मेरे पति के पास 20 बीघा ज़मीन है, बड़ा मकान है, किराने की दुकान है और बैंक में लाखों रुपये हैं। उसके आगे-पीछे रोने वाला कोई रिश्तेदार नहीं है। जैसे ही राकेश मरेगा, उसकी सारी संपत्ति और पैसा कानूनन मेरा हो जाएगा! और फिर मैं और तुम शादी करके उस पूरे धन पर राज करेंगे। अगर तुम इस काम में मेरा साथ दोगे, तो मैं तुम्हें नकद ₹5 लाख (पांच लाख रुपये) तुरंत दूँगी!”
₹5 लाख नकद और संपत्ति की अयाशी का लालच सुनते ही नौकर शंकर की नीयत पूरी तरह डोल गई! उसके सिर पर भी खून/ का भूत सवार हो गया।
शंकर ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहा: “ठीक है मालकिन! बताइए, क्या करना होगा?”
कजरी ने योजना बनाई: “हम उसे ज़हर/ या गोलियाँ देकर मारेंगे और उसकी लाश/ को ठिकाने लगा देंगे।”
अध्याय 7: नशीला खाना, कुल्हाड़ी का वार और आंगन में कब्र
योजना के अनुसार, दोनों होटल से बाहर निकले और बस से वापस अपने गाँव धीरखेड़ा आ गए।
गाँव पहुँचकर नौकर शंकर ने एक मेडिकल स्टोर से चोरी-छिपे तेज़ नींद और बेहोशी की गोलियाँ (Sleeping Pills) खरीदीं और उन्हें पीसकर पाउडर बना लिया।
शाम के लगभग 7:30 से 8:00 बजे का वक्त हो चला था।
शंकर हमेशा की तरह राकेश के घर खाना बनाने पहुँचा। कजरी रसोई में निगरानी कर रही थी। शंकर ने रात के स्वादिष्ट भोजन और दाल में बेहोशी की गोलियों का भयंकर पाउडर मिला दिया।
रात 9:00 बजे जब राकेश दुकान से थककर घर लौटा, तो कजरी ने बड़े प्यार से उसे खाना परोसा। बेखबर राकेश को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उसकी अपनी ही पत्नी और उसका वफादार नौकर उसकी मौत का सामान परोस रहे हैं।
राकेश ने पेट भरकर खाना खाया। खाना खाने के मात्र 20 से 30 मिनट के भीतर ही बेहोशी की गोलियों का असर शुरू हो गया। राकेश का सिर भारी होने लगा और वह बेसुध होकर अपने बेडरूम के बेड पर घोड़े बेचकर सो गया। वह इतनी गहरी नींद में था कि उसे अपनी देह का भी होश नहीं था।
नौकर शंकर अपना काम खत्म करने का ढोंग करके रात 9:30 बजे घर से बाहर निकला, लेकिन वह कहीं दूर नहीं गया, बल्कि गली के अंधेरे कोने में छिपा रहा।
रात के ठीक 10:00 बजे कजरी ने शंकर के फोन पर मिस कॉल दी।
शंकर चुपचाप दबे पाँव वापस आया। कजरी ने घर का मुख्य दरवाजा खोला और शंकर को भीतर बुला लिया।
कजरी ने घर के स्टोर रूम से लकड़ी काटने वाली एक बेहद तेज़ धारदार कुल्हाड़ी (Axe) निकाली।
कजरी और नौकर शंकर हाथ में कुल्हाड़ी लेकर बेसुध पड़े राकेश के बेडरूम में दाखिल हुए। कमरा बिल्कुल शांत था, केवल राकेश के खर्राटों की आवाज़ आ रही थी।
कजरी की आँखों में कोई दया या मानवीय संवेदना नहीं थी, केवल हवस/ और लालच की खौफनाक आग जल रही थी।
कजरी ने कुल्हाड़ी उठाई और अपनी पूरी ताकत से सोए हुए पति राकेश की गर्दन पर पहला भयंकर वार किया!
‘छपाक!’
रक्त की धार बेडरूम की दीवार और बिस्तर पर छिटक गई! राकेश के मुँह से केवल एक हल्की सी कराह निकली, लेकिन नशीली गोलियों के असर से वह उठ नहीं सका। इसके बाद कजरी और नौकर शंकर ने मिलकर कुल्हाड़ी से राकेश की गर्दन पर ताबड़तोड़ कई वार किए और उसकी गर्दन को धड़ से पूरी तरह अलग कर दिया!
राकेश की तड़प-तड़पकर मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। बेडरूम का फर्श खून/ से लाल हो चुका था।
लाश/ के टुकड़े और तीन बोरियाँ: राकेश की हत्या/ करने के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती उसकी 120 किलो वजनी विशाल लाश/ को ठिकाने लगाने की थी। इतना भारी शव बाहर ले जाना असंभव था।
कजरी के शातिर दिमाग ने एक खौफनाक विचार दिया: “शंकर! हम इसकी लाश/ को साबुत बाहर नहीं ले जा सकते। इसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े/ कर देते हैं!”
कजरी और शंकर ने कुल्हाड़ी से निर्दयतापूर्वक राकेश के हाथों, पैरों, धड़ और सिर को काटकर अलग-अलग टुकड़ों (Pieces) में विभाजित कर दिया।
इसके बाद कजरी घर के भीतर से प्लास्टिक की 3 बड़ी बोरियाँ (Plastic Sacks) ले आई। दोनों अपराधियों ने राकेश के कटे हुए शव के टुकड़ों को उन तीनों बोरियों में ठूँस-ठूँसकर भर दिया और बोरियों के मुँह रस्सी से कसकर बाँध दिए।
बोरियाँ भरने के बाद कजरी ने आँगन की तरफ इशारा करते हुए कहा: “शंकर! बाहर ले जाना खतरनाक है। हम अपने घर के आँगन के कच्चे कोने में ही गड्ढा खोदकर इन तीनों बोरियों को दफ़न/ कर देते हैं। ऊपर से पक्की मिट्टी और गमले रख देंगे, किसी को कभी पता नहीं चलेगा!”
शंकर ने कसी (फावड़ा) उठाई और दोनों मिलकर तीनों भारी बोरियों को घसीटकर आँगन में ले आए और रात के अंधेरे में ज़मीन खोदना शुरू कर दिया।
अध्याय 8: किसान अमृत सिंह की सतर्कता और खाकी का धावा
रात के लगभग 11:30 से 12:00 बजे का समय हो चुका था। पूरा धीरखेड़ा गाँव गहरी नींद के आगोश में समाया हुआ था।
उसी समय धीरखेड़ा गाँव का एक मेहनती किसान अमृत सिंह अपने दूर स्थित खेतों में देर रात पानी (सिंचाई) देकर अपनी साइकिल से घर लौट रहा था।
जब अमृत सिंह साइकिल से राकेश के घर के सामने वाली संकरी गली से गुज़रा, तो उसकी नज़र राकेश के घर के कम ऊँचे आँगन पर पड़ी।
अमृत सिंह ने देखा कि रात के 12:00 बजे, घनघोर अंधेरे में राकेश के आँगन में दो साये टॉर्च की हल्की रोशनी में तेज़ी से कसी/फावड़े से गड्ढा खोद रहे हैं!
अमृत सिंह ने साइकिल रोकी और ध्यान से देखा। गड्ढा खोदने वाले कोई और नहीं, बल्कि राकेश की पत्नी कजरी और उसका नौकर शंकर थे! और उनके ठीक पास ज़मीन पर तीन बड़ी प्लास्टिक की बोरियाँ पड़ी थीं, जिनसे लाल रंग का खून/ रिसकर ज़मीन पर फैल रहा था!
अमृत सिंह का माथा तुरंत ठनका। उसने मन ही मन कहा: “रात के 12:00 बजे आँगन में गड्ढा खोदना और खून/ से सनी बोरियाँ? दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है!”
अमृत सिंह ने बिना एक पल गंवाए अपनी साइकिल नीचे गिराई और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया: “दौड़ो! दौड़ो! गाँव वालों बाहर निकलो! राकेश के घर में कोई बहुत बड़ा कांड/ हो गया है! बचाओ! पकड़ो!”
अमृत सिंह की बुलंद चीखें रात के सन्नाटे में गूँज उठीं। देखते ही देखते पास के मकानों के दरवाजे खुले और दर्जनों पड़ोसी लाठी और टॉर्च लेकर राकेश के घर के आँगन में कूद पड़े!
गाँव वालों को अपनी तरफ आता देख कजरी और शंकर के हाथ से कसी छूट गई। उनके पसीने छूट गए।
गाँव के लोगों ने कजरी और शंकर को चारों तरफ से घेर लिया। जब पड़ोसियों ने ज़मीन पर पड़ी खून/ से लथपथ तीन बोरियों को देखा और रस्सी खोलकर भीतर झाँका, तो बोरियों के अंदर इंसानी शरीर के कटे हुए टुकड़े/ और राकेश का कटा हुआ सिर देखकर पूरे गाँव के होश उड़ गए! महिलाओं की चीखें निकल गईं!
किसान अमृत सिंह ने तुरंत अपने मोबाइल से नजदीकी पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी और S.P. (पुलिस अधीक्षक) साहब के सीयूजी नंबर पर कॉल मिलाया और पूरी खौफनाक वारदात की सूचना दी।
सूचना मिलते ही क्षेत्र में हड़कंप मच गया! मात्र 30 मिनट के भीतर सायरन बजाती हुई पुलिस की तीन गाड़ियाँ और फॉरेंसिक (Forensic) टीम घटनास्थल पर आ पहुँचीं।
पुलिस ने तुरंत मौके से खून/ से सनी कुल्हाड़ी, कसी, 3 बोरियों में बंद राकेश के शव के टुकड़े/ और कजरी व नौकर शंकर को रंगे हाथों गिरफ्तार/ कर लिया!
अध्याय 9: थाने में कबूलनामा और S.P. साहब के उड़े होश
पुलिस जीप कजरी और शंकर को घसीटते हुए सीधे जिला पुलिस मुख्यालय (थाने) ले आई।
थाने के विशेष पूछताछ कक्ष में हनुमानगढ़ के S.P. (पुलिस अधीक्षक) साहब खुद टेबल के सामने बैठे थे। उनके चेहरे पर गंभीर तनाव और गुस्सा था।
S.P. साहब ने मेज़ पर हाथ मारते हुए कड़क आवाज़ में पूछा: “कजरी! तुम एक पढ़े-लिखे घर की महिला हो। तुमने अपने ही पति की इतनी बेरहमी से हत्या/ करके उसके टुकड़े-टुकड़े/ क्यों किए? क्या दुश्मनी थी तुम्हारी उससे?”
शुरुआत में कजरी ने पुलिस को गुमराह करने और रोने का ढोंग करने की कोशिश की, लेकिन जब फॉरेंसिक सबूत, खून/ से सने कपड़े, होटल की रसीद और नौकर शंकर का कुबूलनामा सामने रखा गया, तो कजरी का सारा ढोंग ढह गया।
कजरी ने सिर झुकाकर थर-थर काँपते हुए पुलिस के सामने अपने एक-एक घिनौने अपराध/ का सच उगलना शुरू किया।
कजरी ने बताया: “साहब! मेरे पति राकेश के शरीर में एक बहुत बड़ी कमी/ थी। वह अत्यधिक मोटा (120 किलो) था। शादी की पहली ही रात वह गिरकर अपाहिज हो गया और मुझसे सुहागरात नहीं मना सका। इसके अलावा उसके पेट में भयंकर बदबूदार गैस/ बनती थी, जिससे पूरे कमरे में सड़न फैल जाती थी। मुझे उस अपाहिज और बदबूदार पति के साथ रहने में घुटन होती थी।”
कजरी ने आगे बताया: “इसी बीच मुझे उसके हैंडसम नौकर शंकर से प्यार हो गया। हम दोनों ने अवांछित शारीरिक संबंध/ बनाए। लेकिन राकेश हमारे बीच की दीवार बन रहा था। राकेश के पास 20 बीघा ज़मीन, बड़ा मकान और लाखों रुपये थे। मैंने ₹5 लाख का लालच देकर शंकर को अपने साथ मिलाया और नशीली गोलियाँ खिलाकर कुल्हाड़ी से राकेश की गर्दन काट दी ताकि उसकी सारी धन-दौलत मेरी हो जाए और मैं शंकर के साथ ऐश कर सकूँ!”
जब S.P. साहब ने एक पत्नी के मुँह से पति की शारीरिक कमी/ और धन-दौलत की हवस/ के लिए किए गए इस खौफनाक कत्ल/ की पूरी दास्तान सुनी, तो S.P. साहब के भी होश उड़ गए!
S.P. साहब सन्न रह गए कि कोई महिला अपनी शारीरिक वासना/ और लालच में इस हद तक दरिंदा कैसे बन सकती है कि अपने ही सोए हुए पति को कुल्हाड़ी से काटकर 3 बोरियों में भर दे!
पुलिस ने कजरी और उसके प्रेमी नौकर शंकर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की अत्यंत गंभीर धाराओं—हत्या/ (Murder), आपराधिक षड्यंत्र/ (Criminal Conspiracy), साक्ष्य मिटाने (Disappearance of Evidence) और नशीला पदार्थ देने के तहत मजबूत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की। फॉरेंसिक जांच और साक्ष्यों के आधार पर एक अटूट चार्जशीट अदालत में दाखिल की गई।
मामला अदालत में प्रस्तुत किया गया, जहाँ से न्यायाधीश ने दोनों जघन्य अपराधियों को बिना किसी ज़मानत के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। भविष्य में अदालत द्वारा दोनों को कठोरतम सज़ा (आजीवन कारावास या मृत्युदंड) दिया जाना पूरी तरह तय है।
उपसंहार और सामाजिक सीख
दोस्तों, धीरखेड़ा गाँव का यह झकझोर देने वाला कांड/ हमें समाज और मानव चरित्र/ के एक बहुत ही काले पक्ष से रूबरू कराता है।
इस घटना को आपके सामने प्रस्तुत करने का हमारा मुख्य ध्येय किसी को दुःखी करना नहीं था, बल्कि समाज को सतर्क करना था। इस दुखद घटनाक्रम से हमें तीन अत्यंत महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं:
- असीमित वासना/ और लालच का भयानक अंत: चरित्र/ का पतन और क्षणिक शारीरिक आकर्षण/ इंसान को हैवान बना देता है। कजरी ने अपने लालच और अवांछित इच्छाओं/ के कारण अपने पति की जान ले ली और खुद अपनी जिंदगी हमेशा के लिए सलाखों के पीछे बर्बाद कर ली।
- पारिवारिक सचेतता: पूर्ण सिंह ने अपनी बेटी के चरित्र/ की चेतावनियों को बार-बार नज़रअंदाज़ किया। यदि समय रहते उस पर कड़ा नियंत्रण रखा जाता, तो यह त्रासदी रुक सकती थी।
- सतर्क नागरिकता: किसान अमृत सिंह की सतर्कता और बहादुरी के कारण यह खौफनाक अपराध/ रातों-रात बेनकाब हो गया, वरना अपराधी साक्ष्य मिटाने में सफल हो जाते।
आशा है कि आपको इस वास्तविक घटनाक्रम से एक बहुत बड़ी सीख और सामाजिक चेतना मिली होगी। जल्द ही मिलते हैं किसी नई, रोमांचक और जागरूकता फैलाने वाली कहानी के साथ। तब तक के लिए सावधान रहें, सुरक्षित रहें। जय हिंद! जय भारत!