अस्पताल के बाहर एक लड़की सब्जी पूड़ी खाने आई थी
**भिखारी लड़की की कहानी: एक छोटी सी मदद ने जीवन बदल दिया**
दोस्तों, आज मैं आपको वो एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ जो दिल को छू लेगी। यह कहानी है कोलकाता की। एक छोटे से अस्पताल के बाहर सुबह से लोगों की भीड़ लगी रहती थी। कोई अपने किसी रिश्तेदार का इलाज करवाने आया था, कोई दवा लेने के लिए लाइन में खड़ा था, तो कोई अस्पताल के बाहर बैठकर अपने मरीज के ठीक होने का इंतजार कर रहा था। उसी अस्पताल के मुख्य गेट से थोड़ी दूरी पर एक छोटा सा पूरी सब्जी का ठेला लगा करता था। उस ठेले का मालिक था 28 साल का राजू। राजू बहुत गरीब था लेकिन दिल का बहुत अच्छा इंसान था। सुबह करीब 5:00 बजे वह अपने घर से निकल जाता था। पहले आटा गूंथता, फिर पूड़ी तलता और उन्हें गर्म तेल में तलकर एक बड़े डिब्बे में रखता। साथ में वह आलू और मसालेदार सब्जी बनाता था। राजू की दुकान कोई बड़ी दुकान नहीं थी। बस लोहे का एक छोटा सा ठेला था। जिस पर एक बड़ा भगोना, पूरी रखने का डिब्बा, सब्जी का बर्तन और कुछ प्लेट रखी रहती थी। उसकी पत्नी कविता भी कई बार उसका हाथ बटाती थी। दोनों पति-पत्नी की जिंदगी बहुत साधारण थी। उनके पास ज्यादा पैसे नहीं थे लेकिन दोनों मेहनत करके अपना घर चला रहे थे।

राजू की एक आदत थी – अगर उसके पास कोई बहुत गरीब इंसान आ जाता और उसके पास खाने के पैसे नहीं होते तो राजू उसे खाली हाथ नहीं लौटाता था। कई बार अस्पताल के बाहर बैठे मरीजों के रिश्तेदारों के पास पैसे खत्म हो जाते थे। कोई कहता – भैया कल पैसे दे दूंगा। राजू मुस्कुराकर कहता – कल के बाद कल देखेंगे, पहले खाना खा लो। उसका मानना था कि भूखे इंसान को खाना खिलाने से बड़ा कोई काम नहीं। एक दिन दोपहर के करीब राजू अपने ठेले पर पूड़ी तल रहा था। अस्पताल के बाहर काफी भीड़ थी। तभी उसकी नजर सड़क की दूसरी तरफ खड़ी एक लड़की पर पड़ी। वह लड़की करीब 20 साल की थी। उसके बाल पूरी तरह बिखरे हुए थे। कपड़े बहुत गंदे थे और उसके चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी। वह कुछ देर तक सड़क के किनारे खड़ी रही। फिर धीरे-धीरे राजू के ठेले की तरफ बढ़ने लगी। वो ठेले के सामने आकर रुक गई। राजू ने उसकी तरफ देखा और बोला, “क्या हुआ मैडम?” लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस चुपचाप पूड़ियों की तरफ देखने लगी। राजू ने फिर पूछा, “कुछ चाहिए?” लड़की फिर भी कुछ नहीं बोली। उसकी नजर लगातार पूड़ियों पर थी। राजू कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा। फिर उसे समझते देर नहीं लगी कि शायद लड़की बहुत भूखी है। उसने बिना कुछ पूछे एक प्लेट उठाई और उसमें चार पूड़ी डालकर लड़की की तरफ बढ़ा दी। राजू बोला, “लो खाना खा लो।”
लड़की ने प्लेट अपने हाथ में ली। वह इतनी भूखी थी कि राजू को धन्यवाद तक नहीं कह पाई। वह वहीं जमीन पर बैठ गई और बहुत तेजी से पूरी सब्जी खाने लगी। राजू उसे देखता रह गया। कुछ सेकंड बाद उसने कहा, “अरे जमीन पर क्यों बैठ गई? वहां बेंच रखी है। उस पर बैठकर आराम से खाना।” लड़की ने उसकी बात सुनी लेकिन खाना खाने से उसका ध्यान नहीं हटा। राजू ने देखा कि वह हर निवाला बहुत जल्दी निगल रही थी। उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उसने कई दिनों से ठीक से खाना नहीं खाया हो। कुछ ही मिनटों में प्लेट खाली हो गई। लड़की ने खाली प्लेट नीचे रख दी। राजू ने पूछा, “और चाहिए?” लड़की ने धीरे से उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में एक अजीब सी झिझक थी। राजू समझ गया। उसने बिना पूछे फिर से प्लेट में पूरी सब्जी डाल दी और बोला, “पेट भर कर खाओ। यहां किसी चीज की कमी नहीं है।” लड़की ने फिर खाना शुरू कर दिया। इस बार राजू के मन में कई सवाल उठने लगे।
इतनी छोटी उम्र की लड़की अकेली यहां क्या कर रही है? उसके कपड़े इतने गंदे क्यों हैं? वह इतनी परेशान क्यों है? क्या वह किसी मरीज के साथ अस्पताल आई है? लेकिन राजू ने तुरंत सारे सवाल नहीं पूछे। उसे लगा कि पहले लड़की को खाना खा लेने देना चाहिए। कुछ देर बाद लड़की ने खाना खत्म किया और धीरे से उठ खड़ी हुई। राजू ने पूछा, “अच्छा बेटा, तुम रहती कहां हो?” लड़की चुप रही। राजू ने दोबारा पूछा, “तुम्हारा घर कहां है?” लड़की ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं बोली। फिर वह बिना कुछ कहे वहां से चली गई। राजू उसे जाते हुए देखता रहा। उसे समझ नहीं आया कि आखिर वह लड़की थी कौन। उस दिन शाम तक राजू के मन में उसी लड़की का ख्याल घूमता रहा। दुकान बंद करते समय भी उसने सोचा – पता नहीं वह लड़की कहां गई होगी। लेकिन उसे क्या पता था कि अगले दिन वही लड़की दोबारा उसके सामने आने वाली है।
अगली सुबह राजू हमेशा की तरह अस्पताल के बाहर अपना ठेला लगाने पहुंचा। उसने ठेला लगाया और पूड़ी तलने लगा। करीब 10:00 बजे उसकी नजर अचानक उसी लड़की पर पड़ी। वही लड़की कुछ दूरी पर खड़ी थी। वही बिखरे बाल, वही गंदे कपड़े, वही थका हुआ चेहरा। राजू ने उसे देखते ही आवाज लगाई, “अरे बेटा इधर आओ।” लड़की धीरे-धीरे उसके पास आ गई। राजू ने कहा, “कल भी तुम आई थी ना?” लड़की ने सिर हिलाया। राजू ने बिना कुछ पूछे फिर से एक प्लेट में पूरी सब्जी निकाल दी। लड़की ने प्लेट ली और पास में रखी बेंच पर बैठ गई। इस बार राजू ध्यान से उसकी तरफ देखने लगा। लड़की खाना खा रही थी, लेकिन उसकी आंखों में एक डर था। ऐसा डर जो राजू ने पहले कभी किसी के चेहरे पर नहीं देखा था। राजू ने धीरे से पूछा, “बेटा तुम मुझसे डर क्यों रही हो?” लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। राजू बोला, “मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा। बस इतना बताओ कि तुम्हारा घर कहां है?” लड़की चुप रही। राजू ने फिर पूछा, “तुम्हारे माता-पिता हैं।” इस सवाल पर लड़की का हाथ रुक गया। उसने पहली बार राजू की आंखों में देखा। उसकी आंखें भर आई थीं। राजू समझ गया कि मामला सिर्फ भूख का नहीं है। उसने अपना सवाल दोहराया। बोला, “बेटा बताओ क्या हुआ है?” कुछ देर की चुप्पी के बाद लड़की ने धीमी आवाज में कहा, “मेरा नाम रीता है।”
राजू ने कहा, “ठीक है रीता तुम घबराओ मत, आराम से बताओ।” रीता ने नीचे देखते हुए कहा, “मेरी सौतेली मां मुझे बहुत मारती है। मुझसे घर का सारा काम करवाती थी। सुबह से रात तक काम करती थी। अगर कोई काम थोड़े थोड़ा भी गलत हो जाता तो मुझे मारती थी।” राजू ने पूछा, “लेकिन तुम्हारे पिता कुछ नहीं बोलते थे।” रीता ने कहा, “मेरे पापा बहुत अच्छे हैं। वह मुझे बहुत प्यार करते हैं।” राजू थोड़ा हैरान हुआ। उसने पूछा, “फिर तुम्हें घर छोड़कर भागना क्यों पड़ा?” रीता की आंखों से आंसू निकलने लगे। वो बोली, “मेरे पापा चेन्नई में काम करते हैं। बहुत कम घर आते हैं। वह मेरे लिए पैसे और खाने का सामान भेजते थे। लेकिन मेरी सौतेली मां मुझे कुछ नहीं देती थी। वह सब अपने पास रख लेती थी।” राजू ध्यान से उसकी बात सुन रहा था। रीता बोली, “मैं पापा को कुछ बताना चाहती थी। लेकिन सौतेली मां हमेशा मेरे आसपास रहती थी। मुझे डर लगता था कि अगर मैंने पापा को सब बता दिया तो वह मुझे और मारेंगी।” राजू ने पूछा, “तुम्हारी मां कब मर गई थी?” रीता ने कहा, “जब मैं 3 साल की थी।” राजू कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गया। रीता की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।
वह बोली, “मुझे अपनी मां की शक्ल भी ठीक से याद नहीं है। पापा ने ही मुझे बड़ा किया था। फिर घर वालों ने उनसे कहा कि अकेले कैसे रहोगे? बच्ची की देखभाल कौन करेगा? इसीलिए उन्होंने दूसरी शादी कर ली।” रीता ने लंबी सांस ली और बोली, “शुरू में मेरी सौतेली मां मुझे बहुत प्यार करती थी। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई, उनका व्यवहार बदलता गया।” राजू ने पूछा, “और तुम यहां कैसे पहुंची?” रीता ने कहा, “एक दिन उन्होंने मुझे बहुत मारा। उस दिन मैं डर गई थी। मैं घर से निकल आई। मेरे पास पैसे नहीं थे। रास्ते में दो दिन कुछ ठीक से नहीं खाया। फिर यहां आ गई।” राजू का दिल भर आया। उसने कहा, “बेटा तुम्हें अपने पापा का फोन नंबर याद है?” रीता ने कुछ देर सोचा। फिर सिर हिलाते हुए बोली, “नहीं। वह चेन्नई में कहां काम करते हैं इतना ही पता है।” राजू ने कहा, “तुम्हें उनका नाम याद है?” रीता ने अपने पिता का नाम बताया। राजू ने वह नाम अपने मन में याद कर लिया। फिर उसने कहा, “तुम चिंता मत करो, अभी खाना खाओ। बाकी बाद में बाकी बात बाद में सोचेंगे।” रीता ने खाना खत्म किया और उठकर जाने लगी। राजू ने कहा, “आज रात कहां रहोगी?” रीता ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस वहां से चली गई। राजू उसे जाते हुए देखता रहा। उसके मन में अब एक ही सवाल था कि आज रात यह लड़की सोएगी कहां?
उस शाम राजू ने जल्दी दुकान बंद कर दी। ठेला लेकर वह अपने घर की तरफ जा रहा था। रास्ते में अस्पताल से कुछ दूरी पर सड़क के किनारे उसकी नजर अचानक एक जगह पड़ी। वह रुक गया। वहां फुटपाथ के किनारे वही लड़की लेटी हुई थी। रीता के पास कोई सामान नहीं था। ना कोई चादर, ना कोई बैग। बस वह अपने हाथ को सिर के नीचे रखकर सड़क किनारे सोने की कोशिश कर रही थी। राजू कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा। उसका दिल अंदर से कांप गया। उसने मन में सोचा, “मैं इसे ऐसे अकेले सड़क पर कैसे छोड़ दूं?” राजू ने अपना ठेला एक तरफ लगाया और धीरे-धीरे रीता के पास गया। उसने आवाज लगाई, “बेटा।” रीता घबराकर उठ बैठी। उसने डरते हुए राजू की तरफ देखा। राजू ने कहा, “डरो मत। मैं वही हूं जिसके ठेले पर तुमने खाना खाया था।” रीता चुप रही। राजू ने कहा, “तुम यहां क्यों सो रही हो?” रीता ने कहा, “मेरे पास सोने के लिए कोई जगह नहीं है।” राजू कुछ पल शांत रहा। फिर उसने कहा, “तुम मेरे साथ चलो।” रीता डर गई। उसने तुरंत पूछा, “कहां?” राजू बोला, “मेरे घर।” रीता पीछे हट गई। बोली, “नहीं, मैं आपके घर नहीं जा सकती।” राजू ने कहा, “तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है। मेरे घर पर मेरी पत्नी है। तुम वहां सुरक्षित रहोगी।” रीता फिर भी तैयार नहीं हुई। राजू ने कहा, “बेटा सड़क पर अकेले सोना किसी के लिए भी सुरक्षित नहीं है। अगर तुम चाहो तो मेरी पत्नी से मिल लेना। अगर तुम्हें ठीक न लगे तो वापस चली आना।” रीता कुछ देर तक उसे देखती रही। फिर धीरे से खड़ी हो गई। राजू ने अपना ठेला आगे किया और रीता उसके साथ चलने लगी।
उस रात राजू के घर पहुंचते ही उसकी पत्नी कविता दरवाजे पर आ गई। कविता ने रीता को देखा तो हैरान रह गई। उसने राजू से पूछा, “यह कौन है?” राजू ने पूरी कहानी कविता को बताई दी। कविता कुछ देर तक चुप रही। फिर वह रीता के पास गई। उसने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटी अब डरने की जरूरत नहीं है। जब तक तुम्हारे घर वालों का पता नहीं चलता, तुम हमारे घर में रह सकती हो।” रीता ने कविता की तरफ देखा। शायद बहुत दिनों बाद किसी ने उसे इतनी अपनापन भरी आवाज में “बेटी” कहा था। उसकी आंखों से आंसू निकल आए। कविता ने उसे अंदर बुलाया। उस रात पहली बार रीता को सड़क पर नहीं बल्कि एक सुरक्षित घर में सोने की जगह मिली। रीता ने उस रात बहुत दिनों बाद चैन की सांस ली थी।
सुबह जब उसकी आंख खुली तो कुछ पल के लिए वह भूल गई कि वह कहां है। फिर उसकी नजर कमरे की छत पर गई और उसे पिछली रात की सारी बातें याद आ गई। वह धीरे से उठी। बाहर से बर्तन रखने की आवाज आ रही थी। रीता कमरे से बाहर आई तो उसने देखा कि कविता रसोई में नाश्ता बना रही थी। कविता ने उसे देखते ही कहा, “अरे बेटी तुम उठ गई आओ पहले नाश्ता कर लो।” रीता कुछ नहीं बोली। कविता ने उसके सामने रख खाना रख दिया। रीता कुछ देर तक खाने को देखती रही। कविता ने पूछा, “क्या हुआ?” रीता बोली, “मैंने आपके घर का बहुत नुकसान कर दिया।” तो कविता उसकी बात सुनकर मुस्कुराई और बोली, “तुमने कौन सा नुकसान कर दिया बेटी? खाना खाने से किसी का घर छोटा नहीं होता।” रीता की आंखें भर आईं। वो बोली, “लेकिन मैं आपके लिए बोझ बन जाऊंगी।” कविता ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “जिस इंसान को सहारी की जरूरत हो, उसे बोझ नहीं कहते।” रीता ने पहली बार थोड़ा सा मुस्कुराने की कोशिश की। उस दिन राजू ने दुकान पर जाने से पहले कविता से कहा, “इसका ध्यान रखना। जब तक इसके पिता का पता नहीं चलता, इसे अपनी बेटी की तरह रखना।” कविता ने कहा, “तुम चिंता मत करो।”
राजू ठेला लेकर अस्पताल की तरफ चला गया। इधर कविता ने रीता को नहाने के लिए कहा। रीता के पास पहनने के लिए सिर्फ वही पुराने और गंदे कपड़े थे। कविता ने अपनी अलमारी से कुछ पुराने लेकिन साफ कपड़े निकाले और बोली, “बेटी यह कपड़े पहन लो।” रीता ने कपड़े हाथ में लिए और उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसने कहा, “मेरे पास इतने अच्छे कपड़े कभी नहीं थे।” कविता बोली, “यह तो साधारण कपड़े हैं बेटी तुम्हें जरूरत है इसीलिए दे रही हूं।” कुछ देर बाद रीता नहाकर बाहर आई। कविता ने उसके बाल ठीक किए। चेहरा साफ हुआ तो उसकी मासूमियत साफ दिखाई देने लगी। कविता उसे देखकर कुछ पल के लिए चुप हो गई। कल तक जो लड़की धूल मिट्टी में सड़क किनारे बैठी थी आज साफ कपड़ों में बिल्कुल अलग नजर आ रही थी। कविता ने कहा, “देखो तुम कितनी प्यारी लग रही हो।” रीता ने आईने में खुद को देखा। उसे खुद विश्वास नहीं हो रहा था। कई दिनों से उसे सिर्फ डर, भूख और परेशानी दिखाई दे रही थी। आज पहली बार उसे लगा कि शायद जिंदगी में अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।
उधर राजू अपने ठेले पर पहुंच चुका था। उसने दुकान लगाई और काम शुरू कर दिया। लेकिन आज उसका ध्यान-बार घर की तरफ जा रहा था। वह सोच रहा था कि पता नहीं रीता ठीक होगी या नहीं। दोपहर में कविता को फोन आया। उसने कहा, “तुम चिंता मत करना। रीता ठीक है।” राजू ने राहत की सांस ली। इसी तरह कुछ दिन गुजर गए। रीता धीरे-धीरे उस घर में घुलने लगी। वह कविता के साथ घर के छोटे-मोटे काम करने लगी। कभी सब्जी काटती, कभी बर्तन रखने में मदद करती और कभी राजू के लिए खाना पैक कर देती। एक दिन राजू ने उससे कहा, “तुम घर का काम करने के लिए नहीं आई हो। जितना मन करे उतना ही करना।” रीता बोली, “भैया आपने मुझे इतना सहारा दिया है। मैं कुछ काम कर दूंगी तो मुझे अच्छा लगेगा।” राजू ने कहा, “सहारा देने के बदले काम करवाना जरूरी नहीं होता।” रीता चुप हो गई। उसने शायद पहली बार महसूस किया कि कोई उससे बिना किसी स्वार्थ के भी अच्छा व्यवहार कर सकता है।
एक शाम खाना खाने के बाद रीता ने राजू से पूछा, “भैया अगर मेरे पापा मुझे ढूंढ रहे होंगे तो…” राजू बोला, “वह जरूर ढूंढ रहे होंगे।” वो बोली, “लेकिन उन्हें पता कैसे चलेगा कि मैं कहां हूं।” राजू कुछ पल सोचता रहा। फिर बोला, “हम उन्हें ढूंढेंगे।” अगले दिन राजू ने रीता से उसके पिता का नाम, गांव का नाम और चेन्नई में उनके काम से जुड़ी जितनी भी बातें याद थीं सब पूछी। रीता ने बताया कि उसके पिता निर्माण मजदूर के तौर पर चेन्नई में काम करते थे। राजू ने कहा, “अगर कोई सुराग मिला तो तुम्हारे पापा तक जरूर पहुंचेंगे।” लेकिन उन्हें अभी यह नहीं पता था कि उन्हें ज्यादा मेहनत करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी क्योंकि अगले ही दिन किस्मत खुद उनके सामने एक बड़ा सुराग लेकर आने वाली थी।
सुबह राजू हमेशा की तरह ठेला लेकर अस्पताल के बाहर जा रहा था। रास्ते में उसने सड़क के किनारे एक दीवार पर कई पोस्टर लगे देखे। राजू आमतौर पर इन पोस्टरों पर ध्यान नहीं देता था। लेकिन उस दिन न जाने क्यों उसकी नजर एक पोस्टर पर टिक गई। उस पोस्टर पर एक लड़की की तस्वीर लगी थी। राजू आगे बढ़ गया। फिर अचानक वह रुक गया। उसने दोबारा पीछे मुड़कर पोस्टर को देखा। उसके चेहरे का रंग बदल गया। वह लड़की, वही चेहरा, वही आंखें, वही लड़की थी जिसे वह अपने घर पर छोड़कर आया था। राजू पोस्टर के बिल्कुल पास चला गया। उसने ध्यान से तस्वीर देखी। ऊपर लिखा था – गुमशुदा लड़की की तलाश। नीचे लड़की का नाम लिखा था रीता। राजू के हाथ पैर ठंडे पड़ गए। उसने पूरा पोस्टर पढ़ना शुरू किया। उसमें लिखा था कि रीता कई दिनों से लापता है। उसके परिवार वाले उसे अलग-अलग जगहों पर ढूंढ रहे हैं और सबसे नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था – रीता की सही जानकारी देने वाले व्यक्ति को 5 लाख का इनाम दिया जाएगा।
राजू कुछ पल तक पोस्टर को देखता रहा। उसके मन में एक साथ कई सवाल उठने लगे कि इतना बड़ा इनाम रीता के पिता कौन है? उन्होंने अपनी बेटी को ढूंढने के लिए ₹5 लाख का इनाम क्यों रखा? क्या रीता ने मुझे पूरी सच्चाई बताई है? राजू के मन में शक जरूर आया लेकिन उसने तुरंत खुद को समझाया नहीं कि रीता ने जो बताया था उसमें उसने अपने पिता को बहुत अच्छा बताया था। शायद उसके पिता उसे बहुत प्यार करते हैं। राजू ने पोस्टर पर दिए फोन नंबर को अपने मोबाइल में सेव कर लिया। लेकिन उसने तुरंत फोन नहीं किया। वह सोचने लगा कि पहले घर जाकर रीता से बात करेगा।
शाम को दुकान बंद करने के बाद वह सीधे घर पहुंचा। घर पहुंचते ही रीता उसके पास आई। बोली, “भैया आज बहुत देर हो गई।” राजू ने कोई जवाब नहीं दिया। कविता ने भी देखा कि राजू कुछ परेशान है। उसने पूछा, “क्या हुआ?” राजू ने कहा, “आज मुझे कुछ मिला है।” कविता ने पूछा, “क्या?” राजू ने मोबाइल निकाला और पोस्टर की तस्वीर कविता को दिखाई। कविता तस्वीर देखते ही चौंक गई। बोली, “यह तो रीता है।” राजू बोला, “हां।” दोनों कुछ देर तक चुप रहे। फिर कविता ने कहा, “तो उसके घर वाले उसे ढूंढ रहे हैं।” राजू बोला, “और ₹5 लाख का इनाम भी रखा है।” कविता ने कहा, “हमें उसके पिता को फोन करना चाहिए।” राजू ने कहा, “हां लेकिन उससे पहले रीता से बात कर लेते हैं।” दोनों ने रीता को बुलाया। रीता कमरे से बाहर आई। राजू ने अपना मोबाइल उसके सामने रखा। जैसे ही रीता की नजर उस पोस्टर पर पड़ी, उसका चेहरा सफेद पड़ गया। उसके हाथ कांपने लगे। कविता ने तुरंत पूछा, “बेटी, क्या हुआ?” रीता कुछ नहीं बोली। राजू ने धीरे से पूछा, “रीता क्या तुम इस पोस्टर के बारे में जानती हो?” रीता की आंखों से आंसू निकलने लगे। उसने कहा, “नहीं।” राजू ने कहा, “इसमें तुम्हारा नाम है। तुम्हारी तस्वीर है और तुम्हें ढूंढने वाले को ₹5 लाख देने की बात लिखी है।” रीता जमीन पर बैठ गई। उसके होठ कांप रहे थे। वह बोली, “मेरे पापा मुझे ढूंढ रहे होंगे।” राजू ने पूछा, “तो फिर हमें तुम्हारे पापा से संपर्क करना चाहिए।” रीता ने तुरंत कहा, “हां भैया।” राजू ने पोस्टर पर दिए नंबर को देखा। उसने फोन हाथ में लिया। लेकिन फोन मिलाने से पहले उसने रीता से पूछा, “तुम्हें यकीन है कि यही तुम्हारे पापा का नंबर है?” रीता बोली, “मुझे नहीं पता।” राजू ने नंबर मिला दिया।
फोन की घंटी बजने लगी। फिर दूसरी तरफ से किसी आदमी ने फोन उठाया। “हेलो।” राजू ने कहा, “क्या आप रीता के पिता बोल रहे हैं?” कुछ सेकंड के लिए दूसरी तरफ बिल्कुल सन्नाटा छा गया। फिर कांपती हुई आवाज आई। बोला, “आपको रीता के बारे में कैसे पता?” राजू ने कहा, “क्योंकि रीता इस समय मेरे घर में है।” उधर से अचानक आवाज बंद हो गई। कुछ सेकंड बाद उस आदमी ने पूछा, “क्या क्या मेरी बेटी आपके पास है?” राजू बोला, “हां वह बिल्कुल सुरक्षित है।” दूसरी तरफ से रोने की आवाज आने लगी। बोले, “भाई साहब मेरी बेटी को कुछ मत होने देना। मैं उसे लेने आ रहा हूं।” राजू ने कहा, “आप चिंता मत कीजिए। आपकी बेटी सुरक्षित है।” उस आदमी ने सिर्फ इतना कहा, “मैं चेन्नई से निकल रहा हूं।” फोन कट गया। रीता यह सब सुन रही थी। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। वह धीरे से बोली, “मेरे पापा मुझे लेने आ रहे हैं।” कविता ने उसे गले लगा लिया और बोली, “हां बेटी, अब तुम्हें अपने पापा के पास जाना चाहिए। आखिर पिता से बढ़कर अपनी बेटी को कौन समझ सकता है?” रीता ने धीरे से कहा, “मुझे डर लग रहा है।” कविता ने पूछा, “किस बात का?” रीता बोली, “अगर मैं वापस गई, तो मेरी सौतेली मां मुझे फिर से मारेंगी।” कविता ने उसका हाथ पकड़ लिया। बोली, “बेटी इस बार तुम अकेली नहीं हो। तुम्हारे पापा को सब सब पता चल जाएगा।” रीता ने कुछ नहीं कहा।
उस रात उसे ठीक से नींद नहीं आई। वह बार-बार अपने बचपन के बारे में सोचती रही। उसे अपनी मां की मौत तो याद नहीं थी लेकिन पिता का प्यार याद था। वह जब छोटी थी, उसके पिता काम से घर लौटते तो उसके लिए कभी मिठाई लाते, कभी खिलौना लाते। वह पिता के पीछे-पीछे घूमती रहती थी। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, पिता काम के कारण उससे दूर होते चले गए। उन्हें लगता था कि घर में उनकी पत्नी उनकी बेटी का ध्यान रख रही है। उन्हें क्या पता था कि उनकी गैर मौजूदगी में उनकी बेटी किस तरह अकेली होती जा रही है।
अगली सुबह राजू ने दुकान जाने से पहले रीता से कहा, “बेटा, आज तुम्हारे पापा आ सकते हैं। तुम बिल्कुल घबराना मत।” रीता ने सिर हिलाया। राजू दुकान पर चला गया। लेकिन आज उसका मन काम में नहीं लग रहा था। वो बार-बार सोच रहा था कि रीता का रीता के पिता कैसे होंगे? क्या वह सच में उसे बहुत प्यार करते हैं? क्या वह अपनी बेटी की बात समझेंगे या फिर मामला कुछ और है? दोपहर तक राजू के पास एक आदमी का फोन आया। आदमी ने पूछा, “क्या आप राजू बोल रहे हैं?” राजू ने कहा, “हां।” वह आदमी बोला, “मैं रीता का पिता बोल रहा हूं। मैं शहर में पहुंच चुका हूं।” राजू ने राहत की सांस ली। उसने उन्हें अपने घर का पता बता दिया। करीब 1 घंटे बाद उनके घर के बाहर एक कार आकर रुकी। कार से लगभग 50 साल का एक आदमी उतरा। उसके चेहरे पर थकान थी, आंखें लाल थीं। ऐसा लग रहा था जैसे वह कई रातों से सोया नहीं हो। वह तेजी से घर के अंदर आया। दरवाजे पर पहुंचते ही उसकी नजर रीता पर पड़ी। कुछ पल के लिए वह वहीं खड़ा रह गया। रीता भी उसे देखती ही देखते ही पहचान गई। बोली, “पापा, इतना कहते ही वह दौड़कर अपने पिता से लिपट गई। उसके पिता ने उसे कसकर गले लगा लिया। दोनों बहुत देर तक रोते रहे। उस आदमी ने बार-बार अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरा। वह कह रहा था, “बेटी मुझे माफ कर दो।” रीता रोते हुए बोली, “पापा आपकी कोई गलती नहीं है।” उसके पिता ने कहा, “गलती मेरी है बेटी। मुझे तुम्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहिए था।” राजू और कविता थोड़ी दूरी पर खड़े यह सब देख रहे थे।
रीता के पिता ने राजू की तरफ देखा। वह उसके पास आए और दोनों हाथ जोड़कर बोले, “भाई साहब, आपने मेरी बेटी को बचा लिया। मैं आपका एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगा।” राजू ने तुरंत उनके हाथ नीचे कर दिए। बोला, “ऐसा मत कीजिए। मैंने सिर्फ इंसानियत का काम किया है।” रीता के पिता की आंखों में फिर आंसू आ गए। उन्होंने कहा, “आप नहीं जानते कि मेरी बेटी मेरे लिए क्या है।” फिर उन्होंने रीता की तरफ देखा और कहा, “जब यह 3 साल की थी तब इसकी मां हमें छोड़कर चली गई थी। मैं टूट गया था।” उन्होंने कुछ पल रुक कर कहा, “मैंने दोबारा शादी इसलिए की थी कि मेरी बेटी को मां का प्यार मिल सके। मुझे लगा था कि मेरी पत्नी मेरी बेटी का ध्यान रखेगी। लेकिन मुझे क्या पता था कि मेरी गैर मौजूदगी में मेरी बेटी पर क्या गुजर रही है।” रीता चुपचाप अपने पिता को देख रही थी। राजू ने पूछा, “आपको कब पता चला कि रीता घर से चली गई है?” रीता के पिता ने कहा, “कई दिन पहले…” राजू ने हैरानी से पूछा, “इतने दिन?” वह बोले, “मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि रीता किसी बात पर नाराज होकर घर से चली गई है और शायद किसी रिश्तेदार के यहां गई होगी।” राजू ने कहा, “लेकिन आपने उसे ढूंढने के लिए 5 लाख का इनाम क्यों रखा?” रीता के पिता कुछ पल चुप रहे। फिर बोले, “क्योंकि मुझे डर था कि मेरी बेटी कहीं मुसीबत में ना हो।” उन्होंने बताया कि जब कई दिनों तक रीता का कोई पता नहीं चला तो उन्होंने पुलिस में गुमशुदगी की शिकायत की। फिर शहर और आसपास के इलाकों में पोस्टर लगवाए। उन्होंने कहा, “मैंने अपनी बेटी को हर जगह ढूंढा। बस अड्डे, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, बाजार जहां भी उम्मीद थी वहां गया।” उनकी आंखों से आंसू निकल रहे थे। बोले, “मुझे डर था कि कहीं उसके साथ कुछ गलत ना हो गया हो।” रीता अपने पिता के पास बैठ गई। उसने कहा, “पापा मुझे माफ कर दीजिए।” उसके पिता ने कहा, “माफी मुझे मांगनी चाहिए।” फिर उन्होंने पूछा, “तुमने मुझे फोन क्यों नहीं किया?” रीता ने कहा, “मुझे आपका नंबर याद नहीं था।” उसके पिता ने सिर पकड़ लिया। उन्हें अपने ऊपर गुस्सा आने लगा। उन्होंने कहा, “मैं कैसा पिता हूं जिसे अपनी बेटी को अपना नंबर याद करवाने तक का समय नहीं मिला।” राजू ने कहा, “ऐसा मत सोचिए गलती किसी एक की नहीं है। कभी-कभी इंसान रोजी-रोटी के पीछे इतना भागता है कि उसे पता ही नहीं चलता कि उसके अपने लोग उससे दूर होते जा रहे हैं।”
रीता के पिता ने राजू की तरफ देखा। उन्होंने कहा, “आप सही कह रहे हैं।” फिर उन्होंने अपनी बेटी से पूछा, “रीता तुम्हारी सौतेली मां तुम्हारे साथ क्या करती थी?” रीता कुछ देर तक चुप रही। फिर उसने धीरे-धीरे सारी बातें बतानी शुरू की। सुबह जल्दी उठना, घर का काम, पूरा काम करना, खाना समय पर ना मिलना, छोटी-छोटी बातों पर डांट और कई बार मारपीट उसके पिता सुनते रहे। जैसे-जैसे रीता बोलती गई उनके चेहरे का रंग बदलता गया। उन्हें पूछा उन्होंने पूछा, “तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?” रीता बोली, “मैं बताना चाहती थी पापा लेकिन मुझे डर लगता था।” वो बोले, “किस बात का?” रीता बोली, “वह कहती थी कि अगर मैंने आपको कुछ बताया तो वह मुझे घर से निकाल देगी।” उसके पिता की मुट्ठियां भी गईं। लेकिन उन्होंने खुद को संभाला। उन्होंने कहा, “मैंने जिस इंसान पर भरोसा किया उसने मेरी बेटी के साथ ऐसा किया।” कविता ने धीरे से कहा, “भाई साहब गुस्से में कोई फैसला मत लीजिए। पहले अपनी बेटी को सुरक्षित घर ले जाइए।” रीता के पिता ने सिर हिलाया। उन्होंने कहा, “आप सही कह रही हैं।” फिर उन्होंने राजू की तरफ देखा और बोला, “बोले मैं अपनी बेटी को चेन्नई ले जाना चाहता हूं। अब वह मेरे साथ रहेगी। मैं उसे दोबारा अकेला नहीं छोड़ूंगा।” रीता ने अपने पिता का हाथ पकड़ लिया। उसके चेहरे पर पहली बार सुकून दिखाई दिया। लेकिन तभी उसके पिता ने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला। उन्होंने राजू की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “यह आपके लिए है।” राजू ने पूछा, “इसमें क्या है?” उन्होंने कहा, “वही ₹5 लाख जो मैंने अपनी बेटी की जानकारी देने वाले के लिए इनाम रखा था।” राजू पीछे हट गया। बोला, “नहीं साहब मुझे पैसे नहीं चाहिए।” रीता के पिता बोले, “कृपया मना मत कीजिए।” राजू ने कहा, “मैंने आपकी बेटी की मदद पैसे के लिए नहीं की। अगर मैं पैसे के लिए मदद करता तो शायद उस दिन उसे खाना भी नहीं खिलाता।” उसकी बात सुनकर रीता के पिता की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा, “आप जैसे लोग ही इस दुनिया को इंसानियत पर भरोसा कराना सिखाते हैं।” राजू फिर भी पैसे लेने को तैयार नहीं हुआ। लेकिन उसके पिता ने कहा, “यह इनाम नहीं है। इसे मेरी बेटी के लिए आपकी तरफ से मिली दुआ समझकर रख लीजिए।”
कविता ने भी राजू से कहा, “ले लो शायद भगवान ने हमारी मदद के लिए ही यह मौका भेजा है।” राजू ने आखिरकार वह लिफाफा ले लिया। उसने कहा, “ठीक है लेकिन मैं इसे अपने लिए नहीं रखूंगा।” रीता के पिता ने पूछा, “तो फिर राजू…” बोला, “मैं अपनी छोटी सी दुकान को थोड़ा बड़ा करूंगा ताकि ज्यादा लोगों को खाना खिला सकूं।” रीता के पिता मुस्कुरा दिए। उन्होंने कहा, “अब समझ समझ आया कि मेरी बेटी आपके घर में सुरक्षित क्यों थी।” अगले दिन रीता अपने पिता के साथ चेन्नई जाने की तैयारी करने लगी। जाने से पहले वह कविता के पास गई। उसने कविता के पैर छुए। कविता ने उसे गले लगाकर कहा, “बेटी जहां भी रहना खुश रहना।” रीता रोते हुए बोली, “आप दोनों को मैं कभी नहीं भूलूंगी।” फिर वह राजू के पास गई। बोली, “भैया।” राजू ने कहा, “हां बेटा।” रीता बोली, “अगर उस दिन आपने मुझे खाना नहीं दिया होता तो पता नहीं मैं आज कहां होती।” राजू मुस्कुराया और बोला, “मैंने कुछ बड़ा नहीं किया। बस एक भूखे इंसान को खाना दिया था।” रीता ने कहा, “आपने मुझे खाना नहीं जिंदगी दी है।” राजू ने उसके सिर पर हाथ रखा। फिर रीता अपने पिता के साथ कार में बैठ गई। कार धीरे-धीरे वहां से चली गई। रीता पीछे मुड़कर राजू और कविता को देखती रही। राजू भी हाथ हिलाता रहा।
लेकिन दोस्तों, कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी। रीता के जाने के बाद राजू ने ₹5 लाख वाला लिफाफा खोला। उसके अंदर सच में ₹5 लाख थे। राजू कुछ देर तक उन पैसों को देखता रहा। फिर उसने कविता से कहा, “अब हमारा सपना पूरा हो सकता है।” कविता ने पूछा, “कौन सा सपना?” राजू मुस्कुराया और बोला, “अपनी पूरी सब्जी की दुकान को इतना बड़ा करना कि कोई गरीब इंसान भूखा आए तो उसे वापस ना जाना पड़े।” और दोस्तों यही वह फैसला था जिसने राजू की जिंदगी की दिशा बदल दी। लेकिन दूसरी तरफ चेन्नई पहुंचने के बाद रीता के पिता ने भी एक बड़ा फैसला ले लिया। जैसे ही रीता अपने पिता के साथ घर पहुंची, उसके पिता ने अपनी पत्नी से जवाब मांगने का फैसला कर लिया। उन्होंने अपनी बेटी की एक-एक बात याद आ रही थी। उन्हें याद आ रहा था कि रीता ने किस तरह डरते हुए बताया था कि उसके साथ घर में कैसा व्यवहार किया जाता था। उस रात रीता अपने कमरे में सो रही थी। उसके पिता हॉल में बैठे थे। उनकी पत्नी भी सामने बैठी थी। कमरे में काफी देर तक सन्नाटा रहा। आखिर रीता के पिता ने कहा, “मैंने तुम पर भरोसा किया था।” उसकी पत्नी चुप रही। उन्होंने फिर कहा, “जब मैं चेन्नई में मेहनत करता था, मुझे लगता था कि मेरी बेटी घर पर सुरक्षित है। मैं हर महीने उसके लिए पैसे भेजता था। मैं सोचता था कि उसे मां का प्यार मिल रहा होगा। लेकिन मेरी बेटी सड़क पर सोने को मजबूर हो गई और मुझे इसकी खबर तक नहीं हुई।” उनकी पत्नी ने कहा, “वह खुद घर छोड़कर गई थी।” रीता के पिता ने तुरंत कहा, “नहीं उसने मुझे सब बता दिया है।” पत्नी बोली, “उसने झूठ बोला है।” रीता के पिता कुछ पल उसे देखते रहे। फिर बोले, “अगर उसने झूठ बोला है तो मेरे सामने उसका सामना करो।” उनकी पत्नी चुप हो गई।
उन्होंने आगे कहा, “तुमने उसे मारा।” वो बोली, “मैंने बस उसे अनुशासन में रखने के लिए डांटा था।” वह बोले, “और घर का सारा काम वो…” बोली, “घर का काम तो उसे करना ही था।” रीता के पिता ने गहरी सांस ली और बोले, “घर का काम करना अलग बात है और किसी बच्ची को नौकर की तरह रखना अलग बात है।” उनकी पत्नी चुप रही। फिर उन्होंने एक और सवाल पूछा। जो पैसे मैं रीता के लिए भेजता था वह कहां जाते थे? उसकी पत्नी ने कहा, “घर के खर्च में वो…” बोले, “झूठ मत बोलो।” पहली बार उनकी आवाज तेज हुई। उन्होंने कहा, “मैंने हर महीने अलग से पैसे भेजे थे। फिर रीता के पास खाने तक के पैसे क्यों नहीं थे?” उसकी पत्नी के पास कोई जवाब नहीं था। कुछ देर बाद उसने कहा, “मैंने पैसे अपने पास रखे थे।” रीता के पिता ने पूछा, “क्यों?” वह बोली, “मुझे डर था कि अगर उसे पैसे दे दिए, तो वह उन्हें खर्च कर देगी।” रीता के पिता ने कहा, “तुम्हें अपनी बेटी पर भरोसा नहीं था, लेकिन मुझे तुम पर भरोसा था।” फिर वह कुछ देर चुप रहे। उन्होंने कहा, “मेरी सबसे बड़ी गलती यही थी कि मैंने अपनी बेटी की जिंदगी किसी और के भरे हो छोड़ दी।” अगली सुबह उन्होंने वकील से संपर्क किया। उन्होंने साफ कहा कि वह अब अपनी पत्नी के साथ नहीं रहना चाहते। वह अपनी बेटी के लिए अलग और सुरक्षित जिंदगी चाहते थे।
उधर रीता को इस बात की जानकारी नहीं थी। वह अपने कमरे में बैठी थी। उसके पिता उसके पास आए। उन्होंने पूछा, “बेटी तुम मुझसे एक बात का वादा करोगी।” रीता ने पूछा, “क्या पापा?” वह बोले, “अब जिंदगी में कभी किसी मुसीबत को अकेले मत सहना। मुझे सब बताना।” रीता ने कहा, “वादा करती हूं।” उसके पिता ने उसे गले लगा लिया। उन्होंने कहा, “अब मैं तुम्हारा पिता होने के साथ-साथ तुम्हारा दोस्त भी बनूंगा।” रीता रोने लगी। दोस्तों, कभी-कभी बच्चों को बहुत बड़े घर या बहुत ज्यादा पैसे की जरूरत नहीं होती। उन्हें बस यह भरोसा चाहिए होता है कि कोई ऐसा इंसान है जिसके सामने वह अपनी परेशानी खुलकर बता सके। रीता को यह भरोसा बहुत देर से मिला। लेकिन आखिरकार मिला।
कुछ दिनों बाद रीता अपने पिता के साथ चेन्नई चली गई। वहां उसके पिता ने उसके लिए एक अच्छे स्कूल में दोबारा पढ़ाई शुरू करवाने का फैसला किया। रीता पढ़ाई में अच्छी थी। घर के हालात की वजह से उसकी पढ़ाई बीच में रुक गई थी। लेकिन उसके पिता ने कहा, “तुम जितना पढ़ना चाहो पढ़ो। अब तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।” रीता के चेहरे पर खुशी आ गई। उसने कहा, “पापा मैं पढ़ लिखकर कुछ बनना चाहती हूं।” उसके पिता बोले, “तुम जो बनना चाहो बनो।” उधर राजू की जिंदगी में भी बदलाव शुरू हो चुका था। उसके पास ₹5 लाख थे। लेकिन राजू ने पैसे को देखकर अपनी जिंदगी बदलने के बजाय अपने काम को बदलने का फैसला किया। उसने सबसे पहले अपने पुराने ठेले की मरम्मत करवाई। फिर उसने अस्पताल के बाहर एक छोटी सी दुकान किराए पर ले ली। दुकान बहुत बड़ी नहीं थी लेकिन अब उसके पास बैठने की जगह थी। उसने दुकान के बाहर एक बोर्ड लगवाया। राजू – पूरी सब्जी वाला मेहनत का खाना प्यार से सेवा। कविता ने दुकान संभालने में उसका साथ दिया। पहले दिन दुकान खुली तो राजू के मन में थोड़ा डर था। उसे चिंता थी कि लोग आएंगे या नहीं। लेकिन कुछ ही देर में अस्पताल के कर्मचारी, मरीजों के रिश्तेदार और आसपास के लोग उसकी दुकान पर आने लगे। कई पुराने ग्राहक उसे पहचानते थे। एक आदमी ने खाना खाने के बाद कहा, “राजू, तुम्हारी पूरी पहले से भी अच्छी हो गई है।” राजू हंसकर बोला, “भैया, दुकान बड़ी हो गई है, लेकिन स्वाद वही रखा है।” धीरे-धीरे उसकी दुकान चल पड़ी। लेकिन राजू ने एक नियम बनाया। अगर कोई बहुत गरीब इंसान दुकान पर आता और उसके पास पैसे नहीं होते तो राजू उसे खाना खिलाता। कविता कभी-कभी कहती, “अगर तुम ऐसे ही मुफ्त में खाना खिलाते रहे तो बचत कैसे होगी?” राजू मुस्कुराकर कहता, “जिस दिन भूखे को खाना खिलाने में हमें नुकसान दिखाई देने लगेगा। उस दिन यह दुकान सिर्फ दुकान रह जाएगी।” कविता उसकी बात सुनकर मुस्कुरा देती। कुछ महीनों में राजू की दुकान अच्छी चलने लगी। उसने दो लड़कों को काम पर रख लिया। एक दिन उनमें से एक लड़का दुकान पर आया और बोला, “भैया आज एक बूढ़े आदमी के पास पैसे नहीं है।” राजू ने कहा, “उन्हें खाना दे दो।” लड़के ने पूछा, “पैसे?” राजू बोला, “पैसे नहीं है तो क्या हुआ? भूखा तो है।” वो बूढ़ा आदमी खाना खाकर जाने लगा। उसने राजू से कहा, “बेटा भगवान तुम्हें बहुत आगे बढ़ाए।” राजू ने मुस्कुराकर कहा, “बस दुआ करते रहिए।” दोस्तों, राजू को नहीं पता था कि उसकी यह छोटी सी दुकान आने वाले समय में पूरे शहर में उसकी पहचान बनने वाली है।
एक दिन एक स्थानीय पत्रकार अस्पताल में किसी खबर के सिलसिले में आया। उसने देखा कि राजू की दुकान पर एक गरीब आदमी को मुफ्त खाना दिया जा रहा है। उसने राजू से पूछा, “आप रोज कितने लोगों को मुफ्त खाना खिलाते हैं?” राजू ने कहा, “गिनती नहीं रखता। जिसे जरूरत होती है, उसे खाना दे देता हूं।” पत्रकार ने पूछा, “आपको इसकी प्रेरणा कहां से मिली?” राजू कुछ पल चुप रहा। फिर उसने रीता की कहानी सुनाई। उसने कहा, “एक दिन मेरे ठेले पर एक लड़की आई थी। बहुत भूखी थी। मैंने उसे खाना दिया। बाद में पता चला कि वह अपने घर से परेशान होकर निकली थी। मैंने उसे अपने घर में रखा और उसके पिता तक पहुंचाया।” पत्रकार ने पूछा, “और आपको ₹5 लाख का इनाम मिला।” राजू मुस्कुराया। बोला, “हां।” फिर आपने उन पैसों का क्या किया? राजू ने अपनी दुकान की तरफ इशारा किया। बोला, “इस दुकान को बड़ा किया।” पत्रकार ने पूछा, “क्यों?” राजू ने कहा, “क्योंकि मैंने सोचा कि अगर मेरे पास थोड़ा ज्यादा साधन होगा तो मैं ज्यादा जरूरतमंद लोगों की मदद कर पाऊंगा।” पत्रकार उसकी बात सुनकर बहुत प्रभावित हुआ। अगले दिन उस पत्रकार ने राजू की कहानी अखबार में छाप दी। शीर्षक था – पूरी सब्जी वाले ने बचाई लड़की की जिंदगी। इनाम के पैसों से खोली गरीबों के लिए उम्मीद की दुकान। यह खबर तेजी से फैल गई। लोग राजू की दुकान पर आने लगे। कई लोग सिर्फ उससे मिलने आते। कुछ लोग गरीबों के लिए खाना खिलाने में उसका सहयोग करने लगे। राजू ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन उसका छोटा सा ठेला इतनी बड़ी पहचान बन जाएगा। लेकिन दोस्तों, कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा अभी बाकी था।
करीब एक साल बाद एक दिन राजू अपनी दुकान पर बैठा था। तभी एक कार उसकी दुकान के सामने आकर रुकी। कार से एक युवा युवती उतरी। उसने साधारण लेकिन साफ कपड़े पहने थे। वह दुकान के सामने आकर खड़ी हो गई। राजू ने पूछा, “क्या चाहिए?” वह लड़की मुस्कुराई। उसने कहा, “एक प्लेट पूरी सब्जी।” राजू ने प्लेट में पूरी और सब्जी रखी। लड़की ने प्लेट ली और कुछ कदम आगे जाकर बैठ गई। राजू उसे देखता रहा। उस लड़की ने पहला निवाला खाया। फिर उसकी आंखों में आंसू आ गए। राजू हैरान होकर उसके पास गया। बोला, “क्या हुआ बेटी? खाना अच्छा नहीं है।” लड़की ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोली, “भैया खाना तो बहुत अच्छा है लेकिन मुझे वह दिन याद आ गया जब आपने पहली बार मुझे यही खाना खिलाया था।” राजू कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा। फिर अचानक उसके चेहरे पर पहचान की खुशी दिखाई दी। बोला, “रीता रीता!” मुस्कुरा दी। बोली, “हां भैया।” राजू की आंखों में भी आंसू आ गए। कविता भी बाहर आ गई। रीता ने कविता को देखते ही गले लगा लिया। तीनों की आंखों में खुशी के आंसू थे। रीता ने कहा, “मैं आपको बताने आई हूं कि मैंने पढ़ाई फिर से शुरू कर दी है।” कविता ने पूछा, “और तुम्हारे पापा?” रीता बोली, “वह बहुत खुश हैं। उन्होंने कहा है कि मेरी जिंदगी में जो भी अच्छा हुआ उसमें आपका बहुत बड़ा हाथ है।” राजू ने कहा, “तुमने अपनी जिंदगी खुद बदली है। मैंने तो बस रास्ते में थोड़ा सहारा दिया था।” रीता मुस्कुराई। फिर उसने अपने बैग से एक कागज निकाला। राजू ने पूछा, “यह क्या है?” रीता बोली, “मैंने एक योजना बनाई है।” राजू ने कागज देखा उसमें लिखा था कि वह भविष्य में जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई में मदद करना चाहती है। राजू ने उसकी तरफ देखा और कहा, “तुमने यह सब कब सोचा?” रीता बोली, “जिस दिन मैं भूखी थी आपने मुझे खाना दिया था। उस दिन मुझे समझ आया था कि किसी मदद करने के लिए हमेशा करोड़पति होना जरूरी नहीं। कभी-कभी एक प्लेट खाना भी किसी की जिंदगी बदल सकता है।” राजू की आंखों में आंसू आ गए। दोस्तों, यही इस कहानी की सबसे बड़ी सीख है कि किसी इंसान की मदद करने के लिए हमारे पास करोड़ों रुपए होना जरूरी नहीं है। हमारे पास अगर साफ दिल और मदद करने की इच्छा है तो हम किसी की जिंदगी में उम्मीद की एक छोटी सी रोशनी जरूर जला सकते हैं।
लेकिन दोस्तों रीता के आने के बाद राजू को एक ऐसी खबर मिलने वाली थी जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। रीता ने उसे बताया कि उसके पिता ने अपनी पूरी संपत्ति उसके नाम करने का फैसला किया है। लेकिन रीता खुद उस संपत्ति को अपने लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहती थी। वह उस पैसे से कुछ ऐसा करना चाहती थी जिससे उसके जैसे दूसरे जरूरतमंद बच्चों को भी जिंदगी में आगे बढ़ने का मौका मिल सके। समय बीतता गया। रीता अपनी पढ़ाई में मेहनत करने लगी। वह सुबह कॉलेज जाती और शाम को अपने पिता के साथ समय बिताती। उसके पिता भी अब पहले जैसे नहीं रहे थे। पहले वह काम के कारण हमेशा बाहर रहते थे। लेकिन बेटी के साथ जो हुआ उसके बाद उन्हें समझ आ गया था कि जिंदगी में पैसा जरूरी है मगर परिवार के लिए समय देना उससे भी ज्यादा जरूरी है। वह अक्सर रीता से कहते, “बेटी मैंने जिंदगी भर पैसे कमाने के लिए मेहनत की। लेकिन अब समझ आया कि सबसे बड़ी दौलत अपने लोगों का साथ है।” रीता अपने पिता की बात सुनकर मुस्कुरा देती। कुछ समय बाद रीता की पढ़ाई पूरी होने लगी। उसके पिता चाहते थे कि वह आगे की पढ़ाई करें। लेकिन रीता के मन में कुछ और था। वह उन बच्चों के लिए काम करना चाहती थी जिनके पास पढ़ने के लिए पैसे नहीं थे। एक दिन उसने अपने पिता से कहा, “पापा क्या मैं आपसे एक बात कह सकती हूं?” पिता ने कहा, “हां बेटी बोलो।” वो बोली, “आपने मेरे नाम जो संपत्ति करने की बात कही है मैं उसका कुछ हिस्सा गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए लगाना चाहती हूं।” उसके पिता कुछ देर तक उसे देखते रहे। फिर बोले, “तुम ऐसा क्यों करना चाहती हो?” रीता ने कहा, “क्योंकि मैंने खुद परेशानी देखी है। मुझे पता है कि जब किसी इंसान के पास सहारा नहीं होता तो एक छोटी सी मदद भी कितनी बड़ी लगती है।” उसके पिता की आंखें नम हो गई। उन्होंने कहा, “तुम्हें जितना करना हो करो। मैं तुम्हारे साथ हूं।” रीता ने अपने पिता को गले लगा लिया। कुछ महीनों बाद उन्होंने मिलकर एक छोटी सी संस्था शुरू की। उस संस्था का उद्देश्य था गरीब और जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाई की सुविधा देना। किसी को किताबें दी जाती, किसी की स्कूल फीस जमा की जाती। किसी बच्चे को कपड़े और जरूरी सामान दिया जाता। रीता खुद उन बच्चों से मिलती। उनसे बातें करती। उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करती। वह हमेशा उनसे एक बात कहती, “गरीबी आपकी गलती नहीं है। लेकिन मेहनत छोड़ देना आपकी जिंदगी बदलने की सबसे बड़ी गलती हो सकती है।” धीरे-धीरे यह काम बढ़ने लगा। लेकिन रीता हर बार एक बात जरूर कहती कि मेरी जिंदगी बदलने की शुरुआत किसी बड़े संस्था से नहीं हुई थी। मेरी जिंदगी एक प्लेट पूरी सब्जी से बदलनी शुरू हुई थी। जब भी वह यह बात कहती उसके मन में राजू का चेहरा आ जाता।
एक दिन उसने अपने पिता से कहा, “पापा मैं राजू भैया के लिए कुछ करना चाहती हूं।” उसके पिता मुस्कुराए बोले, “क्या करना चाहती हो?” रीता बोली, “उन्होंने मेरे लिए जो किया उसका बदला मैं कभी नहीं चुका सकती। लेकिन मैं चाहती हूं कि उनकी दुकान ऐसी बने कि वहां हर जरूरतमंद को सम्मान के साथ खाना मिल सके।” उसके पिता ने कहा, “बिल्कुल।” अगले ही महीने रीता और उसके पिता राजू के शहर पहुंचे। राजू को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वह अपनी दुकान पर काम कर रहा था। तभी उसके सामने एक गाड़ी आकर रुकी। रीता और उसके पिता उसमें से उतरे। राजू ने देखा तो बहुत खुश हुआ। बोला, “अरे साहब आप लोग अचानक रीता ने मुस्कुराते हुए कहा, “भैया आपको एक काम देना है।” राजू हंसकर बोला, “कैसा काम?” रीता ने कहा, “आपकी दुकान को और बड़ा करना है।” राजू ने कहा, “अब तो दुकान ठीक चल रही है।” रीता के पिता बोले, “इसे सिर्फ दुकान मत समझिए। इसे एक ऐसी जगह बनाइए जहां कोई गरीब भूखा ना जाए।” राजू चुप हो गया। रीता ने कहा, “भैया आप यहां रोज कितने लोगों को मुफ्त खाना खिलाते हैं?” राजू बोला, “जितने जरूरतमंद आते हैं उन्हें खिला देता हूं।” रीता ने कहा, “तो अब यह काम और बड़ा कीजिए।” उसके पिता ने राजू को एक योजना दिखाई। वह चाहते थे कि दुकान के साथ एक छोटा सा भोजन केंद्र बनाया जाए जहां जरूरतमंद लोगों को मुफ्त भोजन मिल सके। राजू ने कहा, “लेकिन इसका खर्चा?” रीता के पिता बोले, “उसकी चिंता आप मत कीजिए।” राजू की आंखें भर आईं। उसने कहा, “मैंने उस दिन रीता की मदद इंसानियत के लिए की थी। मुझे कभी उम्मीद नहीं थी कि एक दिन उसी मदद से इतना बड़ा काम खड़ा हो जाएगा।” रीता मुस्कुराई और बोली, “भैया आपने उस दिन सिर्फ मुझे खाना नहीं खिलाया था। आपने मुझे यह विश्वास दिया था कि दुनिया में अच्छे लोग अभी भी हैं।” धीरे-धीरे राजू की दुकान के साथ एक छोटा सा भोजन केंद्र भी बन गया। सुबह और दोपहर वहां जरूरतमंद को खाना मिलने लगा। अस्पताल के बाहर आने वाले मरीजों के गरीब रिश्तेदार भी वहां खाना खा सकते थे। राजू ने एक नियम बनाया जिसके पास पैसे नहीं है उससे पैसे नहीं लिए जाएंगे। कुछ लोग पैसे देकर खाना खाते, कुछ लोग मुफ्त में लेकिन खाने की गुणवत्ता सबके लिए एक जैसी रहती। राजू कहता, “गरीब आदमी की थाली छोटी क्यों होनी चाहिए? भूख तो सबकी बराबर होती है।” यह बात लोगों के दिल को छू गई। धीरे-धीरे शहर के दूसरे लोग भी इस काम से जुड़ने लगे। कोई राशन देने लगा, कोई सब्जी देने लगा, कोई गरीब बच्चों की फीस भरने लगा। राजू ने अपनी दुकान के बाहर एक छोटी सी तस्वीर लगाई। वह रीता की तस्वीर नहीं थी। वह किसी भगवान की तस्वीर भी नहीं थी। उसमें एक साधारण सी प्लेट में पूरी सब्जी रखी थी। नीचे लिखा था, “कभी-कभी किसी की जिंदगी बदलने के लिए बहुत कुछ नहीं, सिर्फ एक छोटी सी मदद काफी होती है।”
एक दिन एक पत्रकार फिर राजू की दुकान पर आया। उसने राजू से पूछा, “आपकी जिंदगी में इतना बदलाव कैसे आया?” राजू मुस्कुराया। उसने कहा, “एक दिन एक भूखी लड़की मेरे ठेले पर आई थी। मैंने उसे खाना दिया। बस वहीं से मेरी जिंदगी बदलनी शुरू हुई।” पत्रकार ने पूछा, “आपको ₹5 लाख का इनाम मिला था।” राजू ने कहा, “अगर उस दिन वह लड़की आपके पास नहीं आती तो शायद मेरी जिंदगी एक छोटी दुकान तक ही रहती। लेकिन भगवान ने मेरे सामने एक मौका रखा और मैंने उसे इंसानियत समझकर स्वीकार कर लिया।” पत्रकार ने पूछा, “आपको उस घटना से क्या सीख मिली?” राजू ने कहा, “यह सीख मिली कि हम नहीं जानते कि हमारी छोटी सी मदद किसी की जिंदगी में कितना बड़ा बदलाव ला सकती है। इसीलिए जब भी किसी जरूरतमंद को देखें और मदद करने की क्षमता हो तो मदद जरूर करनी चाहिए।” उधर रीता ने भी अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी। उसने अपने पिता के साथ मिलकर जरूरतमंद बच्चों की मदद का काम जारी रखा। लेकिन उसने कभी अपने अतीत को नहीं बुलाया। एक दिन वह उसी अस्पताल के बाहर गई जहां से उसकी जिंदगी बदलनी शुरू हुई थी। वो कुछ देर सड़क किनारे खड़ी रही। उसे वह दिन याद आ गया – बिखरे बाल, गंदे कपड़े, भूख से परेशान शरीर और राजू का वह छोटा सा ठेला। उस दिन अगर राजू भी बाकी लोगों की तरह उसे देखकर आगे बढ़ जाता, तो शायद उसकी कहानी कुछ और होती। रीता की आंखों में आंसू आ गए। उसने राजू से कहा, “भैया, उस दिन आपने मुझे सिर्फ पूरी सब्जी नहीं दी थी। आपने मुझे जीने की वजह दी थी।” राजू मुस्कुराया। “बेटी मैंने तो बस अपना फर्ज निभाया था।” रीता बोली, “लेकिन हर कोई अपना फर्ज नहीं निभाता।” राजू ने कहा, “तो हमें कोशिश करनी चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा लोग निभाएं।”
दोस्तों समय आगे बढ़ता गया। रीता की संस्था से सैकड़ों बच्चों की पढ़ाई से पढ़ाई में मदद मिलने लगी। राजू का भोजन केंद्र भी बढ़ता गया और कविता हमेशा कहती, “अगर उस दिन राजू ने रीता को सड़क पर छोड़ दिया होता तो आज यह सब कुछ नहीं होता।” राजू हंसकर कहता, “नहीं कविता अगर रीता उस दिन मेरे ठेले पर नहीं आती तो शायद मुझे भी पता नहीं चलता कि मेरे अंदर किसी की मदद करने की कितनी क्षमता है।” एक दिन रीता अपने पिता के साथ राजू की दुकान पर बैठी थी। उसने अपने पिता से कहा, “पापा आपने मुझे बचपन में बहुत प्यार दिया। राजू भैया ने मुझे मुश्किल समय में सहारा दिया और आपने दोनों ने मुझे एक बात सिखाई है।” पिता ने पूछा, “क्या?” रीता बोली, “इंसान की असली पहचान उसके पास कितने पैसे हैं इससे नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह दूसरों के लिए क्या करता है?” उसके पिता ने मुस्कुराकर कहा, “आज मुझे तुम पर गर्व है।” रीता ने कहा, “मुझे भी आप पर गर्व है पापा क्योंकि आपने अपनी गलती स्वीकार की और खुद को बदला।” दोस्तों इस कहानी में सिर्फ रीता की जिंदगी नहीं बदली। राजू की जिंदगी भी बदली। एक भूखी लड़की को दी गई एक प्लेट पूरी सब्जी ने एक छोटे से ठेले को बड़े भोजन केंद्र में बदल दिया। और एक परेशान लड़की जो कभी सड़क पर सोने को मजबूर थी। आगे चलकर उन बच्चों की मदद करने लगी जो उसकी तरह किसी मजबूर मजबूरी में अपना भविष्य खो सकते थे। इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि जिंदगी में हम नहीं जानते कि हमारा कौन सा छोटा सा अच्छा काम कब किसी की पूरी जिंदगी बदल देगा। किसी भूखे को खाना खिलाना छोटा काम लग सकता है। किसी परेशान इंसान की बात सुन लेना छोटा काम लग सकता है। किसी जरूरतमंद को रास्ता दिखा देना छोटा काम लग सकता है। लेकिन दोस्तों जिसके पास कोई सहारा नहीं होता उसके लिए आपकी छोटी सी मदद भी बहुत बड़ी हो सकती है। इसीलिए अगर कभी आपके सामने कोई जरूरतमंद इंसान आए और आप उसकी मदद करने की स्थिति में हो तो अपनी क्षमता के अनुसार उसकी मदद जरूर कीजिए क्योंकि हो सकता है आपके लिए वह सिर्फ एक छोटी सी मदद हो लेकिन किसी दूसरे इंसान के लिए वही उसकी जिंदगी की नई शुरुआत बन जाए।
और राजू की कहानी हमें एक और बात सिखाती है कि पैसा जिंदगी बदल सकता है लेकिन सही जगह लगाया गया पैसा कड़ियाँ बदल सकता है। राजू को मिले ₹5 लाख खत्म हो सकते थे। वह उनसे कोई महंगी चीज खरीद सकता था। अपनी जिंदगी आराम से गुजार सकता था। लेकिन उसने उन पैसों को अपने काम को बढ़ाने में लगाया और उसी फैसले ने उसे सिर्फ एक पूड़ी सब्जी बेचने वाला नहीं रहने दिया। वो लोगों के लिए उम्मीद बन गया। रीता ने भी यही सीखा। उसे अपने पिता से मिला सहारा मिला। राजू से इंसानियत मिली और फिर उसने वही इंसानियत आगे बढ़ाने का फैसला किया। दोस्तों जिंदगी में हमारे पास जितना है उतने से ही किसी की मदद की जा सकती है। जरूरी नहीं कि हमारे पास लाखों रुपए हो। कभी किसी को एक वक्त का खाना चाहिए होता है। कभी किसी को सिर्फ दो मीठे शब्द चाहिए होते हैं और कभी किसी को सिर्फ इतना सुनना होता है – “डरो मत मैं तुम्हारे साथ हूं।” शायद यही इंसानियत की सबसे बड़ी ताकत है। तो दोस्तों, यहां पर कहानी का अंत होता है और यह कहानी आपको कैसी लगी कमेंट में जरूर बताइएगा।