PART 3: मुझे दादाजी की कब्र के पास ही दफनाना” सायद ऑस्ट्रेलिया से जिंदा वापस न लौटूं | उसे सब पता था!
सैम अब्राहम मामला (भाग 3): अपील का ड्रामा, पुलिस का ‘गुप्त ऑपरेशन’, जेल की सलाखें और अनाथ मासूम का भविष्य
सैम अब्राहम की ह/त्या केवल एक अपराध नहीं थी, बल्कि यह आधुनिक न्यायशास्त्र और फॉरेंसिक इतिहास के सबसे जटिल मामलों में से एक बन गई। भाग 1 और भाग 2 में हमने देखा कि कैसे सोफिया और अरुण कमलासन ने साइ/नाइड देकर सैम की जान ली और कैसे अदालत ने उन्हें सलाखों के पीछे भेजा।
भाग 3 में हम इस मामले के उन पहलुओं पर गहराई से प्रकाश डालेंगे जिन्हें अदालत के कमरों से बाहर आम दुनिया में बहुत कम लोग जानते हैं: विक्टोरियन पुलिस का गुप्त ऑपरेशन, विक्टोरियन कोर्ट ऑफ अपील का ड्रामा, जेल में सोफिया की नई जिंदगी और भारत में पल रहे मासूम बच्चे की कानूनी लड़ाई।
विक्टोरियन पुलिस का गुप्त ऑपरेशन: ‘ऑपरेशन चारैड’
जब फॉरेंसिक लैब से साइ/नाइड की पुष्टि हुई, तो विक्टोरियन पुलिस ने इस जांच को एक विशेष कोड नेम दिया। पुलिस को पता था कि अगर सोफिया या अरुण में से किसी को भी ज़रा सा भी शक हुआ, तो वे ऑस्ट्रेलिया छोड़कर भारत भाग सकते हैं, जहाँ से प्रत्यर्पण (Extradition) एक लंबी कानूनी प्रक्रिया बन जाती।
पुलिस ने निम्नलिखित रणनीतियों पर काम किया:
- मॉल और सिनेमाघरों में पीछा: मेलबर्न के प्रसिद्ध चैडस्टोन शॉपिंग सेंटर (Chadstone Shopping Centre) और मेलबर्न सेंट्रल सिनेमा हॉल में अंडरकवर एजेंट आम नागरिकों के रूप में सोफिया और अरुण के पीछे रहते थे। पुलिस ने उनकी ऐसी कई तस्वीरें खींचीं जिनमें सैम की म/ौत के महज कुछ हफ्तों बाद वे दोनों हंसते-खिलखिलाते नजर आ रहे थे।
- गुप्त फोन इंटरसेप्शन: पुलिस ने सोफिया और अरुण के फोन कॉल को चौबीसों घंटे सुनना शुरू किया। जब सोफिया मेलबर्न में अपने घर पर अकेली होती, तो वह अरुण से घंटों बातें करती। इन कॉल्स में दोनों सैम के बैंक अकाउंट, कार और वेस्टर्न यूनियन से भारत पैसे भेजने की बातें खुलकर करते थे।
- झूठी तसल्ली: पुलिस हर हफ्ते सोफिया को फोन करके आधिकारिक रूप से यही कहती थी कि “फॉरेंसिक रिपोर्ट में देरी हो रही है, लेकिन घबराएं नहीं, हम इसे प्राकृतिक म/ौत मानकर फाइल बंद करने वाले हैं।” इस चाल से दोनों का बचा-कुचा डर भी खत्म हो गया।
विक्टोरियन कोर्ट ऑफ अपील (2019): कानूनी दांव-पेच
2018 में सजा सुनाए जाने के बाद, 2019 में अरुण कमलासन और सोफिया दोनों ने ‘सुप्रीम कोर्ट ऑफ विक्टोरिया – कोर्ट ऑफ अपील’ में अपनी सजा के खिलाफ याचिका दायर की।
- सोफिया की अपील: सोफिया के वकीलों ने दलील दी कि 22 साल की सजा अत्यधिक सख्त है और सोफिया ने खुद अपने हाथों से सैम को ज़/हर नहीं दिया था (क्योंकि ज़/हर चम्मच से अरुण ने पिलाया था)।
- अदालत का कड़ा रुख: अपील जज ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि सोफिया ही इस पूरे सा/जिश की मुख्य सूत्रधार (Mastermind) थी। उसने अपने पति के लिए एवोकैडो मिल्क में नींद की गोलियां मिलाईं, अपने घर का दरवाजा अरुण के लिए खोला और संतरे का जूस तैयार रखा। इसलिए उसकी सजा (22 साल) को बरकरार रखा गया।
- अरुण कमलासन की अपील: अरुण के वकीलों ने तर्क दिया कि उसकी सजा (27 साल) सोफिया की तुलना में बहुत अधिक है, जबकि सोफिया सैम की पत्नी थी और उसका विश्वासघात अधिक गंभीर था।
- अदालत का फैसला: तीन जजों की पीठ ने माना कि यद्यपि अरुण ने ही ज़/हर पिलाया था, लेकिन सोफिया के उकसावे और योजना के बिना यह संभव नहीं था। इस आधार पर अदालत ने अरुण की सजा को 27 साल से घटाकर 24 साल की जेल (बिना पैरोल के 17.5 साल अनिवार्य) कर दिया।
जेल की सलाखों के पीछे: सोफिया और अरुण का आज का जीवन
सजा के बाद सोफिया और अरुण दोनों को विक्टोरिया की अलग-अलग उच्च-सुरक्षा (High-Security) जेलों में भेज दिया गया।
- सोफिया (डेम फिलिस फ्रॉस्ट सेंटर – Dame Phyllis Frost Centre): यह मेलबर्न के डियर पार्क में स्थित महिलाओं की जेल है। जेल सूत्रों के अनुसार, शुरुआती दिनों में सोफिया बहुत अलग-थलग रहती थी। उसे अन्य कैदियों से अलग विशेष निगरानी में रखा गया था क्योंकि ऑस्ट्रेलिया की जेलों में अपने बच्चों के पिता की ह/त्या करने वाली महिलाओं को अन्य महिला कैदी बेहद नफरत की निगाह से देखती हैं।
- अरुण कमलासन (पोर्ट फिलिप जेल – Port Phillip Prison): अरुण को पुरुषों की अधिकतम सुरक्षा वाली जेल में रखा गया। उसकी मानसिक स्थिति की निगरानी के लिए उसे मनोवैज्ञानिक देखरेख में रखा गया था।
ऑस्ट्रेलियाई कानून के अनुसार, अपनी सजा (कम से कम पैरोल अवधि) पूरी करने के बाद दोनों को तुरंत भारत डिपोर्ट (देशनिकाला) कर दिया जाएगा, क्योंकि उनका वीजा रद्द कर दिया गया है।
मासूम बेटे की कानूनी कस्टडी और जीवन का संघर्ष
सैम और सोफिया का 7 साल का मासूम बेटा इस पूरी खौ/फनाक दास्तान का सबसे बड़ा पीड़ित रहा।
- केरल वापसी और कस्टडी की जंग: सोफिया की गिर/फ्तारी के बाद ऑस्ट्रेलियाई बाल कल्याण विभाग (Child Protection Services) ने बच्चे को अपनी सुरक्षा में ले लिया था। इसके बाद सैम के बूढ़े माता-पिता (सैमुअल और लीलम्मा) ने कानूनी लड़ाई लड़ी और ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों से संपर्क करके बच्चे को केरल लाने की अनुमति प्राप्त की।
- ट्रॉमा और सामाजिक ताने: बच्चे ने उस रात अपने पिता को तड़पते देखा था और फिर अपनी माँ को जेल जाते देखा। केरल के गाँव में उसे सामान्य जीवन में वापस लाने के लिए सैम के माता-पिता ने अपनी बची-कुची जमापूंजी लगा दी।
- दादा-दादी का संकल्प: सैम के पिता सैमुअल कहते हैं— “हमारे बेटे को तो हम वापस नहीं ला सकते, लेकिन उसकी आखिरी निशानी (हमारे पोते) को सही रास्ता दिखाना और सैम का सपना पूरा करना ही अब हमारी जिंदगी का एकमात्र मकसद है।”
अपराध मनोविज्ञान (Psychological Insight): बेवफाई और लालच का नतीजा
सैम अब्राहम मामला केवल एक क्राइम स्टोरी नहीं है, बल्कि यह मानव मन के काले पन्नों का अध्ययन है:
- नार्सिसिज्म और सहानुभूति की कमी: सोफिया में एक भी पल पछतावे का भाव नहीं दिखा। जिस रात उसका पति ज़/हर से तड़पकर म/र गया, उसी रात वह अपने मासूम बच्चे के साथ म/ृत पति के बगल में सो गई।
- सच्चे प्यार की बलि: सैम सोफिया से बेहद प्यार करता था। जब जुलाई 2015 में रेलवे स्टेशन पर उस पर पहला ह/मला हुआ, तब भी उसने अपनी पत्नी का घर बचाने के लिए पुलिस से पूरी बात छिपाई थी। लेकिन उसकी इसी अच्छाई का फायदा उसकी पत्नी ने उठाया।
अंतिम निष्कर्ष
सैम अब्राहम की दुखद कहानी हमें यह सिखाती है कि जब इंसान के दिल में बेवफाई, लालच और अंधा प्यार घर कर लेता है, तो वह सबसे पवित्र रिश्तों की ब/लि देने में भी नहीं हिचकिचाता।
कानून की लाठी देर से सही, लेकिन बेहद मजबूती से पड़ी। आज सोफिया और अरुण जेल की सलाखों के पीछे अपनी जवानी के सबसे बेहतरीन साल गिन रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, केरल के एक शांत गाँव में सैम की क/ब्र के पास उसका बूढ़ा परिवार उसके बेटे के साथ अपनी जिंदगी के बिखरे पन्नों को समेटने की कोशिश कर रहा है।
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