बैंगन की वजह से महिला के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/डॉक्टर के भी होश उड़ गए/
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सूरज कुमार की जिंदगी: एक साधारण मजदूर की झलकियाँ और उसके परिवार की गहरी टूटन
गोरखपुर जिले के बेलघाट नाम के छोटे से गांव में एक साधारण परिवार रहता था। गांव की सड़कें हरे-भरे खेतों से घिरी हुई थीं, और सुबह की हल्की हवा में नमकीन सुगंध आती थी। वहां का एक युवक था सूरज कुमार। उम्र करीब बीस पांच साल की, कद मध्यम, शरीर मजबूत लेकिन चेहरे पर थकान के निशान साफ दिखाई देते थे। सूरज ने अपनी जिंदगी को सिर्फ मेहनत से गुजारा था। बीस किलोमीटर दूर एक छोटी सी गत्ता फैक्ट्री में वह मजदूरी करता था। महीने भर की मेहनत से उसे बारह हजार सौ रुपये मिलते थे। पैसे कमाने का तरीका साफ था – सुबह छह बजे उठना, दिन भर मशीनों के पास खड़ा रहना, रात को थककर लौटना। वह अपने काम में ईमानदार था, कभी समय का दुरुपयोग नहीं करता था।

सूरज का परिवार बहुत छोटा था। पत्नी का नाम सुदेश देवी था। सुदेश ने शादी के बाद घर संभालना शुरू किया था। उसके माता-पिता दूर के थाने में रहते थे, इसलिए परिवार के काम में वह अकेली थी। साथ में सूरज की मां रोशनी देवी भी घर में रहती थीं। रोशनी देवी उम्र के साठ के पार थीं लेकिन उनकी आंखों में अभी भी तेजी थी। दोनों बेटे-पुत्री का इंतजार करती थीं लेकिन भगवान की मर्जी थी। सालों से घर में बच्चे का नाम नहीं पड़ा। हर रात सूरज और सुदेश एक ही बिस्तर पर सोते थे लेकिन कभी भी कोई बच्चा न जन्मा। इस बात ने घर में हमेशा छोटी-छोटी बातें पैदा कर दी थीं।
पहले कुछ साल तो सब ठीक चल रहा था। सूरज सुबह काम से लौटते तो घर पर खाना बनता था। सुदेश सुबह से शाम तक रसोई में व्यस्त रहती। मां रोशनी देवी दवाईयां देतीं और कहतीं कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे सब बदलने लगा। सुदेश का स्वभाव बदल गया था। वह पहले से ज्यादा खर्चीली हो गई थी। जो भी सूरज फैक्ट्री से लाता था, वह सब चुटकियों में उड़ा देती। आलू, दाल, मसाले, कपड़े – हर चीज पर वह कहती, “सूरज, पैसे कैसे कमाएगा?” सूरज चुप रहता। वह जानता था कि पैसे की तंगी घर की है लेकिन सुदेश की बातों में उसकी कमजोरी उजागर हो रही थी।
सात साल बीत चुके थे शादी को। अब घर में सिर्फ झगड़े के आवाज गूंजते थे। कभी सूरज ने पूछा, “सुदेश, घर का खर्चा कैसे चल रहा है?” तो सुदेश रोते हुए कहती, “तुम्हें पता नहीं कि खर्चा कितना बढ़ गया है।” सूरज चुपचाप सुन लेता। मां रोशनी देवी भी बीच में आतीं और सुदेश को डांटतीं, “तुम बांझ हो गई हो। बेटा, तुम्हारे अंदर कोई कमी है।” सुदेश भी जवाब देती, “तुम्हारे बेटे को दिन भर फैक्ट्री में मेहनत करनी पड़ती है। रात को थककर आता है तो तकिया लेकर अलग कमरे में लेट जाता है। मुझे समय नहीं दे पाता। इच्छाएं पूरी नहीं करता तो बच्चे कहां से आएंगे?”
सूरज सुनकर सिर्फ सिर झुका लेता। वह जानता था कि मां सही कह रही हैं लेकिन घर की शांति बिगाड़ना नहीं चाहता था। दिन गुजरते गए। परिवार का जो स्वरूप था, वह बदलने लगा। सुदेश अब घर में ज्यादा अकेली महसूस करने लगी थी। पड़ोस में भी लोग बातें कर रहे थे, “सुदेश ने तो शादी के बाद बदल दिया है। पहले तो मुस्कुराती थी, अब सिर्फ रोती रहती है।” सूरज दिन भर काम करता, रात को थका हुआ लौटता। कभी-कभी बातचीत भी नहीं होती थी। सिर्फ दो शब्दों में बात हो जाती।
एक दिन सब्जी वाले की आवाज गली में गूंजी। सुदेश ने कहा, “मां, मैं थोड़ी सी सब्जियां खरीद लाती हूं।” सूरज ने कुछ पैसे दिए। सुदेश ने दो किलो आलू और एक बैंगन खरीदा। बैंगन देखकर मां रोशनी देवी चौंक गईं। “सुदेश, रोज एक बैंगन क्यों खरीदती हो?” सुदेश ने हंसकर कहा, “मां, थोड़ा खाने में मजा आता है।” मां ने कुछ नहीं कहा लेकिन उनकी आंखों में शंका थी।
धीरे-धीरे सुदेश की आदत बढ़ गई। रोज दो किलो आलू और एक बैंगन। वह कहती, “बैंगन तो रोज खरीदना पड़ेगा, कहीं और से नहीं मिलेगा।” सूरज काम से लौटकर पूछता, “आज फिर वही?” सुदेश जवाब देती, “हां, आज की इच्छा है।” घर में शांति का नाम ही नहीं लेता था। मां रोशनी देवी को भी सुदेश की यह आदत पसंद नहीं आती थी। उन्होंने कई बार चेतावनी दी, “सुदेश, यह बैंगन तुम्हारी जान ले सकता है।” सुदेश ने सिर्फ कान से सुनकर दूसरा कान बाहर कर दिया।
समय बीतता गया। सुदेश अब ज्यादा अकेली महसूस करने लगी थी। सूरज फैक्ट्री में दिन भर व्यस्त रहता, मां पड़ोस में चली जातीं। घर में सिर्फ सुदेश रह जाती। एक दिन सुदेश ने सोचा कि अब तो कोई है जो उसकी बात सुन सके। गली में सब्जी बेचने वाला लड़का था मनीष। मनीष उम्र बीस के आसपास का, चेहरा साफ-सुथरा, लेकिन स्वभाव में ढीला। वह सुदेश की दुकान के पास खड़ा हो गया। सुदेश ने पूछा, “मनीष, आज क्या हाल है?” मनीष ने मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, आपकी बात सुनकर अच्छा लगता है।”
धीरे-धीरे बातें बढ़ीं। सुदेश अब सब्जी खरीदने के बहाने दुकान पर जाती। मनीष के साथ घंटों बातें होतीं। सुदेश को लगा कि कोई उसे समझ रहा है। वह अपनी बातें बताती, “मेरा पति दिन भर थकता है लेकिन समय नहीं देता।” मनीष सुनता और कहता, “भाभी, आप आज से कोई चिंता मत करो। मैं हूं ना।” सुदेश खुश होती। उसकी आंखों में एक नई चमक आ गई थी।
दस दिन बाद सुदेश ने मनीष को कहा, “आज शाम को मेरे घर आना। मां और सूरज बाहर हैं।” मनीष खुश हो गया। उसने शटर बंद की और घर पहुंचा। दोनों अंदर चले गए। कमरे में दरवाजा बंद हो गया। उस शाम दोनों का रिश्ता गलत रास्ते पर पहुंच गया। सुदेश को पहली बार ऐसा लग रहा था कि कोई उसे माने और समझे। मनीष ने कहा, “भाभी, मैं आपसे कभी नहीं छोड़ूंगा।” सुदेश ने कहा, “मुझे पैसे भी चाहिए, फ्री में सब्जी भी मिलेगी तो अच्छा है।”
उस रात के बाद सुदेश का जीवन बदल गया। वह अब हर तीसरे चौथे दिन मनीष के पास जाती। पैसे लेती और घर लौट आती। घर में खुशी थी लेकिन पैसे की तंगी भी बढ़ गई। सुदेश अब बिना सोचे पैसे मांगी। मनीष देता और कहता, “भाभी, आपकी खुशी ही मेरी खुशी है।” सुदेश सोचती कि अब तो जिंदगी अच्छी चल रही है।
लेकिन पैसे की लालच और भी बढ़ गई। एक दिन प्रवीण, मनीष का दोस्त, आया। मनीष ने कहा, “प्रवीण, आज सूरज की पत्नी का घर खाली है। आओ, दोनों साथ चलें।” प्रवीण ने सौ रुपये दिए। तीनों कमरे में गए। पैसे की लालच ने सबको बांध लिया। अब हर बार पैसे मिलते और गलत काम होता। सुदेश कहती, “आप दोनों को भी पैसे दो।” लोग खुश होते। दिन गुजरते गए।
आखिरकार एक दिन सब बदल गया। सुदेश की मां रोशनी देवी ने एक पड़ोसी के घर से चली गई। सुदेश ने फोन किया, “मनीष और प्रवीण को बुलाओ। पैसे चाहिए।” दोनों आए। सुदेश ने पैसे लिए और गलत काम शुरू कर दिया। दस मिनट बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। रोशनी देवी अंदर घुसीं। उन्होंने देखा कि दोनों लड़के सुदेश के साथ हैं। रोशनी देवी गुस्से में चीखीं, “सुदेश! यह क्या कर रही हो?” सुदेश ने दरवाजा खोला। रोशनी देवी ने दोनों लड़कों को गाली दी। प्रवीण और मनीष भाग गए। सुदेश रोने लगी, “मां, पति को मत बताना। घर बिगड़ जाएगा।” रोशनी देवी ने कहा, “सुदेश, आज से यह काम बंद। मैं सूरज को बताऊंगी अगर नहीं छोड़ी।” सुदेश ने हां कह दी लेकिन अंदर से नहीं मानी। वह सोचती, “पति को क्यों बताऊं? मैं अकेली हूं।”
मां रोशनी देवी ने चुपचाप मान लिया। लेकिन चेतावनी दे दी, “आज के बाद मत करना।” सुदेश ने सिर्फ कान से सुना।
फिर एक दिन सुदेश ने कपड़े बेचने वाले सुंदर सिंह को पैसे उधार लिए। सुंदर ने कहा, “आज ही दस हजार दो।” सुदेश ने कहा, “पहले कपड़े लो, फिर पैसे दूंगी।” सुंदर ने हां कर दी। सुदेश ने दरवाजा बंद किया और गलत काम शुरू कर दिया। सुंदर ने कहा, “सुदेश, अब हम साथ हैं।” सुदेश खुश हुई। वह अब दो लड़कों से भी ज्यादा मिलने लगी।
धीरे-धीरे आदत और गहरी हो गई। सुदेश अब हर रोज कुछ न कुछ नया खरीदती। एक दिन सूरज की मां रोशनी देवी ने कहा, “आज तुम सब्जी खरीद कर लाओ।” सुदेश ने दो किलो आलू और अच्छे बैंगन खरीदे। मां ने कहा, “बेटा, आज रसोई बनानी है।” लेकिन सुदेश के मन में अब मनीष और सुंदर थे।
रोशनी देवी ने कहा, “मैं पड़ोस चलती हूं, दो घंटे बाद आऊंगी।” सुदेश ने फोन किया, “सुंदर, घर आओ।” सुंदर आया। दोनों कमरे में गए। दस मिनट बाद रोशनी देवी आ गईं। दरवाजा बंद था। रोशनी ने आवाज लगाई लेकिन जवाब नहीं आया। उन्होंने दस्तक दी। सुदेश डर गई। रोशनी ने दरवाजा खोला। नजारा देखकर उनकी आंखें फटीं। सुंदर सिंह बिस्तर पर पड़ा था। रोशनी ने दोनों को गाली दी। सुंदर भाग गया। रोशनी ने सुदेश से कुछ नहीं कहा। सुदेश सोचती रही कि मां चुप है।
शाम को सूरज थककर आया। रोशनी देवी ने सूरज को एकांत कमरे में बुलाया। उन्होंने कहा, “सूरज, तुम्हारी पत्नी गलत रास्ते पर है। मैंने दो लड़कों को पकड़ा है। आज कपड़ा बेचने वाले भी आया। सुदेश रोज बैंगन और सब्जी खरीदती है।” सूरज का गुस्सा आ गया। वह समझ गया कि मां झूठ नहीं बोल रही।
रात को सूरज ने सुदेश को कमरे में बुलाया। उसने बैंगन उठाए और कहा, “सुदेश, अब सब खत्म।” सूरज ने सुदेश के हाथ-पैर बांधे। मुंह पर कपड़ा बांध दिया। फिर बैंगनों को सुदेश के अंदर डालना शुरू किया। दो घंटे तक सूरज ने काम किया। कमरे में डर था। रोशनी देवी सोच रही थीं कि बेटा कुछ गलत कर रहा है या फिर पत्नी के साथ।
रात दस बजे के आसपास रोशनी देवी घबरा गईं। उन्होंने पड़ोसियों को इकट्ठा किया। उन्होंने कहा, “मेरा बेटा अपनी पत्नी को बंद कर रखा है। मैं समझती हूं कि वह गलत काम कर रहा है।” पड़ोसी आए। उन्होंने दरवाजा तोड़ा। देखा – सुदेश मृत हालत में पड़ी थी। खून से सारा कमरा भरा था। सूरज कमरे में बैठा था। पड़ोसियों ने एक ने एक पुलिस को फोन किया।
पुलिस पहुंची। सूरज को गिरफ्तार किया गया। सूरज ने पुलिस को अपनी पूरी कहानी सुनाई। सुदेश की मौत की वजह बताई। पुलिस चौंक गई। चार्जशीट तैयार की गई।
सूरज ने सोचा – क्या जो मैंने किया वह सही था या गलत?