ससुर ने अपने घर की दोनों बहुओं के साथ कर दिया कारनामा/
ससुर के घिनौने जाल और बालेश्वर गाँव का खौफनाक अंत
राजस्थान के जोधपुर जिले में घटी एक वास्तविक, दर्दनाक और सामाजिक ताने-बाने को झकझोर देने वाली घटना पर आधारित विस्तृत कहानी
अध्याय 1: जोधपुर का बालेश्वर गाँव और प्रकाश सिंह का परिवार
राजस्थान का जोधपुर जिला अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, रेतीले धोरों और अनूठी संस्कृति के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसी जोधपुर जिले से कुछ दूरी पर बसा है एक बड़ा और संपन्न गाँव—बालेश्वर। बालेश्वर गाँव में दूर-दूर तक फैले हुए खेत, कच्चे-पक्के मकान और पुरानी ग्रामीण परंपराएँ देखने को मिलती हैं। गाँव के मुहाने पर ही 16 एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि फैली हुई थी, जो गाँव के एक संपन्न किसान प्रकाश सिंह की थी।
प्रकाश सिंह बालेश्वर गाँव का एक रसूखदार इंसान माना जाता था। 16 एकड़ जमीन और अच्छी-खासी खेती-बाड़ी होने के कारण उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी। घर में ट्रैक्टर, थ्रेशर और तमाम आधुनिक साधन मौजूद थे। लेकिन धन-दौलत और संपन्नता होने के बावजूद बालेश्वर गाँव के लोग प्रकाश सिंह को सम्मान की नजरों से नहीं देखते थे। गाँव की चौपाल हो या कोई सामाजिक पंचायत, लोग प्रकाश सिंह से दूरी बनाकर ही रखना पसंद करते थे।
इस सामाजिक उपेक्षा के पीछे प्रकाश सिंह का अपना ही चाल-चलन और चरित्र जिम्मेदार था। प्रकाश सिंह की उम्र ढल चुकी थी, लेकिन उसकी आदतें बेहद खराब थीं। वह हर वक्त शराब के नशे में धुत रहता था और उसकी नीयत गाँव की बहू-बेटियों पर हमेशा गंदी रहती थी। गाँव के लोग अक्सर उसे ‘नाड़े का ढीला’ और बदचलन इंसान कहकर पुकारते थे। प्रकाश सिंह की इसी हरकत और आवारा मिजाज के कारण गाँव वाले उसकी जरा भी इज्जत नहीं करते थे।
प्रकाश सिंह के परिवार में उसके दो बेटे थे। बड़े बेटे का नाम शिव कुमार था और छोटे बेटे का नाम हर सिंह था। दोनों बेटे स्वभाव से सीधे-साधे, मेहनती और अपने पिता की आज्ञा मानने वाले इंसान थे। वे दिन-रात अपने खेतों में पसीना बहाते और घर की आर्थिक स्थिति को सँभालने में लगे रहते थे।
लगभग 4 साल पहले प्रकाश सिंह ने अपने बड़े बेटे शिव कुमार की शादी धूमधाम से पास ही के एक गाँव की रहने वाली युवती राखी के साथ करवाई थी। शादी के 6 महीने बाद ही प्रकाश ने अपने छोटे बेटे हर सिंह का विवाह भी सपना नाम की युवती के साथ संपन्न करा दिया। दो-दो नई बहुओं के आने से घर में चहल-पहल बढ़ गई थी। राखी और सपना दोनों ही घर-गृहस्थी सँभालने लगीं। शुरुआत में परिवार में खुशियों का माहौल था।
लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया, घर पर एक अनकही उदासी का साया मँडराने लगा। दोनों बेटों की शादी को 4 साल का लंबा समय बीत चुका था, लेकिन घर में किसी भी बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी। न तो बड़े बेटे शिव कुमार के पास कोई औलाद थी और न ही छोटे बेटे हर सिंह के सिर पिता बनने का सेहरा सजा था।
प्रकाश सिंह हमेशा इसी बात को लेकर परेशान और उदास रहने लगा था। गाँव की चौपाल में जब दूसरे किसान अपने पोते-पोतियों के किस्से सुनाते, तो प्रकाश सिंह का सिर शर्म से झुक जाता था। वह मन ही मन कुढ़ता रहता और सोचता कि उसके दोनों बेटों के पास अपनी कोई औलाद क्यों नहीं है। हालाँकि, वह खुद को यह दिलासा भी देता था कि भविष्य में कभी न कभी भगवान की कृपा होगी और उसके बेटों के यहाँ औलाद जरूर पैदा होगी। लेकिन उसे इस बात का तनिक भी अंदाजा नहीं था कि आगे चलकर यह पारिवारिक शून्यता एक खौफनाक और घिनौने मोड़ पर पहुँचने वाली है।
अध्याय 2: खेत का बंद कमरा और विधवा प्रियंका का प्रसंग
सर्दियों के दिन शुरू हो चुके थे। सुबह के करीब 8:00 बजे का समय था। बालेश्वर गाँव के खेतों पर हल्की-हल्की धुंध छाई हुई थी। प्रकाश सिंह हर रोज की तरह अपने 16 एकड़ वाले खेत में काम करने के लिए चला गया। वह खेत में मवेशियों के लिए चारा काट रहा था और सिंचाई की व्यवस्था देख रहा था।
तभी गाँव की एक विधवा महिला, जिसका नाम प्रियंका देवी था, खेत की मेड़ से होती हुई प्रकाश सिंह के पास पहुँची। प्रियंका के पति का कुछ समय पहले देहांत हो चुका था और वह आर्थिक तंगी से जूझ रही थी। प्रियंका का चाल-चलन भी गाँव में बहुत अच्छा नहीं माना जाता था। प्रियंका ने प्रकाश सिंह के पास पहुँचकर कहा, “प्रकाश जी, मुझे ₹2000 की सख्त जरूरत है। घर में राशन और बच्चों के खर्च के लिए पैसे नहीं हैं। अगर आप मुझे ₹2000 उधार दे देंगे, तो मैं कुछ दिनों में लौटा दूँगी।”
प्रकाश सिंह तो पहले से ही ठरकी और कामुक मिजाज का इंसान था। जैसे ही उसने विधवा प्रियंका को अकेले में देखा, उसके दिमाग में गंदे विचार कौंधने लगे। उसने अपनी मूँछों पर ताव दिया और प्रियंका को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए बोला, “₹2000 क्या, मैं तो तुम्हें इससे ज्यादा भी दे सकता हूँ। लेकिन मेरी एक शर्त है। तुम्हें मेरे साथ खेत में बने उस ट्यूबवेल वाले कमरे के अंदर चलना पड़ेगा। वहाँ थोड़ा वक्त गुजारोगी, तो तुम्हें ₹2000 भी मिल जाएँगे और तुम्हारी जरूरत भी पूरी हो जाएगी।”
प्रियंका देवी की अपनी जरूरतें थीं और उसका चरित्र भी ढीला था। उसने प्रकाश सिंह की इस घिनौनी शर्त का कोई विरोध नहीं किया। दोनों चुपचाप खेत के कोने में बने पक्के कमरे के भीतर चले गए और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। दोनों कमरे के भीतर अपना /गलत-संबंध/ और /अवैध-वक्त/ गुजारने लगे।
इसी बीच, प्रकाश सिंह के दोनों बेटे—शिव कुमार और हर सिंह—भी हाथ में कुदाल और फावड़ा लेकर खेत में काम करने के लिए आ पहुँचे। जैसे ही दोनों भाई खेत के पास पहुँचे, उन्होंने देखा कि ट्यूबवेल वाले कमरे का दरवाजा खुला और उनके पिता प्रकाश सिंह तथा विधवा प्रियंका देवी बाहर निकल रहे थे। प्रियंका अपने कपड़े सँभालती हुई जल्दी-जल्दी मेड़ की तरफ भाग गई।
दोनों बेटों ने अपनी आँखों से अपने पिता को एक विधवा महिला के साथ /अवैध-संबंध/ बनाते हुए कमरे से निकलते देख लिया था। लेकिन शिव कुमार और हर सिंह अपने पिता का बहुत सम्मान करते थे और उनसे डरते भी थे। उन्होंने अपने पिता की इस घिनौनी हरकत को देखकर भी कोई गुस्सा जाहिर नहीं किया।
शिव कुमार ने अपने छोटे भाई हर सिंह के कान में धीमे से कहा, “देख रहे हो भाई? पिताजी इस उम्र में भी गैर औरतों के साथ ऐसा /अवैध-काम/ करते फिर रहे हैं। लेकिन हम क्या कह सकते हैं, आखिर वे हमारे पिता हैं।”
जब प्रकाश सिंह अपने बेटों के करीब आया, तो उसने चेहरे पर जरा भी शर्मिंदगी महसूस नहीं की। दोनों बेटों ने भी अपने पिता से इस बारे में एक शब्द नहीं कहा। लेकिन शिव कुमार और हर सिंह को इस बात का दूर-दूर तक भान नहीं था कि जिस पिता की करतूतों पर वे आज खामोश हैं, वही पिता भविष्य में उनकी अपनी पत्नियों के साथ एक खौफनाक षड्यंत्र रचने वाला है और उनके पूरे हँसते-खेलते परिवार को श्मशान बना देगा।
अध्याय 3: ताने, अस्पताल की जाँच और बाँझपन का कड़वा सच
प्रियंका देवी के जाने के बाद प्रकाश सिंह अपने दोनों बेटों के पास आया और अपने तौलिए से मुँह पोंछते हुए खड़े होकर उन्हें घूरने लगा। बातचीत शुरू हुई तो प्रकाश सिंह ने बड़े कड़वे लहजे में अपने दोनों बेटों से कहा:
“तुम दोनों यहाँ खड़े होकर मेरी तरफ क्या देख रहे हो? तुम्हारी शादियों को 4 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन आज तक तुम दोनों में से कोई भी मुझे बाप या दादा बनाने का सुख नहीं दे सका। गाँव के लोग चौपाल में मुझे ताने मारते हैं कि प्रकाश सिंह के दोनों बेटे नामर्द हैं! तुम दोनों की वजह से मेरी समाज में थू-थू हो रही है!”
पिता के मुँह से सुने गए ये तीखे और कड़वे ताने बड़े बेटे शिव कुमार और छोटे बेटे हर सिंह के कलेजे में तीर की तरह चुभ गए। शिव कुमार को बहुत गहरा धक्का लगा। उसने अपने छोटे भाई हर सिंह को थोड़ा अलग ले जाकर गुप्त रूप से कहा:
“हर सिंह! पिताजी की बातें गलत नहीं हैं। 4 साल हो गए, हमारी पत्नियाँ माँ नहीं बन पाई हैं। गाँव के लोग भी बातें बनाते हैं। आज ही हमें शहर जाकर किसी बड़े डॉक्टर से अपना मेडिकल चेकअप करवाना चाहिए, ताकि पता चले कि कमी किसमें है।”
हर सिंह ने अपने बड़े भाई की बात से सहमति जताई। दोनों भाइयों ने अपने पिता से कहा, “पिताजी, हमें शहर में कुछ जरूरी काम है, हम मोटरसाइकिल लेकर जा रहे हैं।”
प्रकाश सिंह ने उन्हें जाने दिया। दोनों भाई अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करके सीधे जोधपुर शहर के एक नामी अस्पताल में पहुँचे। वहाँ वे एक वरिष्ठ गुप्त रोग विशेषज्ञ (डॉक्टर) से मिले। दोनों भाइयों ने बंद कमरे में डॉक्टर को अपनी पूरी व्यथा सुनाई और बताया कि उनकी शादियों को 4 साल हो चुके हैं, लेकिन उनके यहाँ कोई संतान पैदा नहीं हुई है।
डॉक्टर ने दोनों भाइयों की पूरी बात सुनी और उनके कुछ जरूरी मेडिकल टेस्ट तथा स्पर्म काउंट (शुक्राणु) की जाँचें लिखीं। दोनों भाइयों ने अपने सैंपल दिए और रिपोर्ट का इंतजार करने लगे।
लगभग 2 घंटे बाद जब लैब रिपोर्ट आई, तो डॉक्टर ने दोनों भाइयों को अपने केबिन में बुलाया। डॉक्टर के चेहरे पर गंभीर भाव थे। डॉक्टर ने रिपोर्ट मेज पर रखते हुए कहा:
“देखो भाइयों, मुझे यह बताते हुए बहुत दुख हो रहा है, लेकिन यह कड़वा सच है। दुर्भाग्य से तुम दोनों भाइयों के शरीर में जन्मजात एक ऐसी गंभीर कमी है, जिसकी वजह से तुम दोनों भविष्य में कभी भी पिता नहीं बन सकते। तुम दोनों का स्पर्म काउंट शून्य है। मेडिकल साइंस के हिसाब से तुम दोनों कभी अपनी औलाद पैदा नहीं कर पाओगे।”
डॉक्टर के यह शब्द सुनते ही दोनों भाइयों के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके सिर पर मानो आसमान टूट पड़ा। हर सिंह ने रोते हुए अपने बड़े भाई शिव कुमार का हाथ पकड़ लिया, “भैया! यह क्या हो गया? अब हमारी वंशवृद्धि कैसे होगी? समाज को हम क्या मुँह दिखाएँगे?”
दोनों भाई भारी मन और उदास चेहरे के साथ अस्पताल से बाहर निकले। वापस बालेश्वर गाँव लौटते समय रास्ते में दोनों भाइयों ने आपस में विचार-विमर्श किया। शिव कुमार ने कहा, “हर सिंह, इस कड़वे सच को हम किसी को नहीं बताएँगे—न पिताजी को और न अपनी पत्नियों को। अगर यह बात गाँव में फैल गई, तो हमारी बची-कुची इज्जत भी नीलाम हो जाएगी। हम भविष्य में अनाथ आश्रम से कोई बच्चा गोद ले लेंगे और उसी को अपनी औलाद की तरह पालेंगे।”
दोनों भाइयों ने इस राज को अपने सीने में दफन करने का फैसला कर लिया और शाम को वापस घर लौट आए।
अध्याय 4: राखी की रवानगी और सपना पर ससुर की कुदृष्टि
समय का पहिया घूमता रहा। शाम के लगभग 4:00 बजे का समय था। बड़े बेटे शिव कुमार की पत्नी राखी अपने पति के पास आई और बोली, “सुनिए जी, मेरी माँ का फोन आया था। मायके में कुछ पारिवारिक काम है, इसलिए मुझे कुछ दिनों के लिए अपने मायके जाना पड़ेगा।”
शिव कुमार ने अपनी पत्नी से कहा, “ठीक है राखी, कल सुबह होते ही मैं तुम्हें तुम्हारी मोटरसाइकिल पर बैठाकर तुम्हारे मायके छोड़ आऊँगा।”
पूरी रात गुजर गई। अगला दिन यानी 2 दिसंबर 2025 का सूरज उ Leak हुआ। सुबह के लगभग 8:00 बज रहे थे। शिव कुमार अपनी पत्नी राखी को मोटरसाइकिल पर बैठाकर उसके मायके छोड़ने चला गया।
उधर घर पर छोटे बेटे हर सिंह की पत्नी सपना देवी अकेली रह गई। हर सिंह सुबह-सुबह ही अपने पिता के कहने पर खेत में पानी लगाने चला गया था। घर में केवल दो ही लोग थे—छोटी बहू सपना देवी और उसका ससुर प्रकाश सिंह।
सपना देवी रसोई घर में दोपहर का खाना बना रही थी। प्रकाश सिंह ने जब देखा कि घर में बड़ी बहू और बड़ा बेटा गायब हैं, छोटा बेटा खेत में है और घर में सिर्फ वह और उसकी छोटी बहू सपना अकेली हैं, तो प्रकाश सिंह के भीतर का शैतान फिर से जाग उठा। उसकी कामुक और घिनौनी नजरें अपनी ही छोटी बहू सपना पर टिक गईं।
प्रकाश सिंह मन ही मन सोचने लगा, “मेरे दोनों बेटों के पास कोई औलाद नहीं है। गाँव वाले मुझे ताने देते हैं। अगर मैं अपनी इस बहू सपना के साथ /अवैध-संबंध/ बना लूँ और इसे गर्भवती कर दूँ, तो मेरे घर में बच्चा भी आ जाएगा, मेरी बदनामी भी रुक जाएगी और मेरा काम भी हो जाएगा!”
अपनी घिनौनी सोच को अंजाम देने के लिए प्रकाश सिंह दबे पाँव रसोई घर के पास पहुँचा। उस समय सपना आटा गूँथ रही थी। प्रकाश सिंह ने चौखट पर खड़े होकर कहा:
“सपना! जरा मेरी बात सुनो। इस समय घर में कोई नहीं है। तुम दोनों की शादी को 4 साल बीत चुके हैं, लेकिन तुम्हारे पास कोई औलाद नहीं है। तुम्हारा पति हर सिंह तुम्हें कभी बच्चा नहीं दे सकता।”
सपना शुरुआत में अपने ससुर की बातों का गूढ़ अर्थ नहीं समझ पाई। हालाँकि, सपना देवी का अपना चाल-चलन और चरित्र भी बहुत पवित्र नहीं था। वह भी चंचल और भौतिक सुखों की लालची महिला थी।
प्रकाश सिंह ने जब देखा कि सपना चुप है, तो उसने सीधे-साधे और नंगे शब्दों में बोलना शुरू किया, “सपना, अगर तुम मेरे साथ कमरे में चलकर अपना /अवैध-वक्त/ गुजार लेती हो, तो मैं तुम्हें औलाद का सुख दे सकता हूँ। इससे समाज में मेरे बेटे की इज्जत भी बच जाएगी, तुम्हें बच्चा भी मिल जाएगा और इस घर में तुम्हारी इज्जत भी बहुत बढ़ जाएगी।”
सपना देवी अपने ससुर के इस घिनौने प्रस्ताव को सुनकर जरा भी नहीं झिझकी। उल्टे, उसका जमीर भी पूरी तरह मर गया। सपना मन ही मन हिसाब लगाने लगी, “ससुर जी सही तो कह रहे हैं। अगर मुझे बच्चा हो जाएगा, तो इस घर में मेरा राज चलेगा। सब मेरी इज्जत करेंगे और मुझे कोई बाँझ नहीं कहेगा।”
प्रकाश सिंह ने बिना कोई देर किए घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। इसके बाद उसने अपनी बहू सपना का हाथ पकड़ा। सपना ने जरा सा भी विरोध नहीं किया। प्रकाश सिंह अपनी छोटी बहू सपना को लेकर कमरे के अंदर चला गया।
उस बंद कमरे में ससुर प्रकाश सिंह और बहू सपना ने अपनी रजामंदी से मर्यादा की सारी सीमाएं पार करते हुए /अवैध-शारीरिक-संबंध/ कायम किए। दोनों काफी देर तक उस घिनौने काम में लिप्त रहे।
जब काम खत्म हुआ, तो प्रकाश सिंह ने सपना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “सपना, तुमने मेरा दिल खुश कर दिया। अब से इस घर की सारी धन-दौलत, रुपया-पैसा सब तुम्हारा है।”
सपना बेहद खुश हो गई। उसने सोचा कि अब उसे पैसे भी मिलेंगे, औलाद भी मिलेगी और घर में उसका हुक्म चलेगा। प्रकाश सिंह कमरे से निकला और सीधे खेत में चला गया, जहाँ उसका बेटा हर सिंह काम कर रहा था। प्रकाश सिंह ने हर सिंह से हँसते हुए कहा, “बेटा हर सिंह! तू बहुत जल्द बाप बनने वाला है, चिंता मत कर!”
हर सिंह ने अपने पिता की बात का कोई जवाब नहीं दिया, क्योंकि वह जानता था कि वह खुद कभी पिता नहीं बन सकता। उसे लगा कि उसके पिता यूँ ही मजाक कर रहे हैं।
अध्याय 5: नींद की गोलियाँ, काली रात और सोने की अंगूठी
उस दिन के बाद से ससुर प्रकाश सिंह और छोटी बहू सपना देवी के बीच /अवैध-संबंधों/ का यह घिनौना खेल नियमित रूप से चलने लगा। जब भी हर सिंह और शिव कुमार खेत में जाते या बाहर निकलते, प्रकाश सिंह अपनी बहू सपना के साथ कमरे में बंद हो जाता। दोनों अपनी वासना मिटाते और समाज की आँखों में धूल झोंकते रहे।
दिन बीतते गए और तारीख आ पहुँची 10 दिसंबर 2025।
शाम के करीब 4:00 बजे का समय था। प्रकाश सिंह जैसे ही घर के अंदर आया, उसने देखा कि सपना अकेली आँगन में झाड़ू लगा रही थी। प्रकाश सिंह ने पास जाकर फुसफुसाते हुए कहा, “सपना, आज रात मेरा मन तुम्हारे साथ पूरा वक्त गुजारने का है। आज रात हम एक साथ रहेंगे।”
सपना ने घबराकर आस-पास देखा और बोली, “ससुर जी, आप कैसी बातें कर रहे हैं? आज रात घर में आपके दोनों बेटे—हर सिंह और शिव कुमार मौजूद रहने वाले हैं। उनके रहते हुए हम रात में कैसे मिल सकते हैं? अगर उन्होंने देख लिया तो अनर्थ हो जाएगा!”
प्रकाश सिंह ने शैतानी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, “तुम उसकी चिंता मत करो सपना, मेरे पास सब इंतजाम है।”
प्रकाश सिंह तुरंत घर से निकला और गाँव की एक मेडिकल दुकान पर पहुँचा। वहाँ उसने मेडिकल स्टोर वाले को दोगुने-तिगुने दाम दिए और बिना किसी पर्ची के नींद की तेज असरदार दवाइयाँ (गोलियाँ) खरीद लीं। नींद की गोलियाँ जेब में डालकर प्रकाश सिंह वापस घर लौटा और उसने चुपके से वे गोलियाँ सपना देवी के हाथ में थमा दीं।
प्रकाश सिंह ने सपना से कहा, “आज रात जब तुम सबके लिए खाना बनाओगी, तो शिव कुमार और हर सिंह की सब्जी और दाल में यह नींद की दवाइयाँ पीसकर मिला देना। वे खाते ही घोड़े बेचकर सो जाएँगे। फिर हमारा रास्ता साफ हो जाएगा।”
सपना पाप के दलदल में इतनी गहरी धँस चुकी थी कि उसे अपने पति को धोखा देने में ज़रा भी झिझक महसूस नहीं हुई। रात के लगभग 8:00 बजे सपना ने पूरे परिवार के लिए गरमा-गरम खाना बनाया। उसने चालाकी से शिव कुमार और हर सिंह की थालियों में नींद की गोलियों का पाउडर मिला दिया, जबकि अपने और ससुर प्रकाश सिंह के खाने को अलग रखा।
दोनों भाइयों—शिव कुमार और हर सिंह—ने बिना किसी शक के खाना खा लिया। खाना खाने के महज 1 घंटे के भीतर दवाइयों के तीखे असर के कारण दोनों भाई गहरी, कुंभकर्णी नींद में सो गए।
रात के लगभग 10:30 बज रहे थे। चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। सपना देवी दबे पाँव अपने कमरे से निकली और सीधे अपने ससुर प्रकाश सिंह के कमरे के पास पहुँची। प्रकाश सिंह पहले से ही दरवाजे पर मुस्तैद होकर उसका इंतजार कर रहा था। सपना के अंदर आते ही प्रकाश सिंह ने कुंडी लगा दी।
उस काली रात में ससुर और बहू ने फिर से मर्यादाओं को तार-तार करते हुए अपने /अवैध-संबंध/ कायम किए। पूरी रात दोनों वासना के खेल में डूबे रहे।
सुबह होने से पहले, जब सपना कमरे से बाहर निकलने लगी, तो उसने पलटकर अपने ससुर से कहा, “ससुर जी! मैंने आपके कहे अनुसार सब किया। लेकिन मेरी एक शर्त है। कल के कल मुझे शहर से सोने की एक सुंदर अंगूठी लाकर दो, वरना इसके बाद मैं आपके साथ कभी कमरे में नहीं आऊँगी!”
प्रकाश सिंह अपनी कामुकता के हाथों मजबूर था। उसने तुरंत हाँ कर दी। सपना अपने पति के कमरे में जाकर लेट गई।
अगले दिन सुबह प्रकाश सिंह अपने दोनों बेटों के साथ खेत में गया। 2 घंटे काम करने का नाटक करने के बाद प्रकाश सिंह ने अपने बेटों से कहा, “बेटा, मुझे शहर में घर का कुछ जरूरी सामान खरीदने जाना है।” वह मोटरसाइकिल उठाकर शहर गया और एक सराफा दुकान से सोने की चमचमाती अंगूठी खरीद लाया।
घर लौटकर प्रकाश सिंह ने वह सोने की अंगूठी सपना के हाथ में दे दी। सोने की अंगूठी पाकर सपना देवी फूली नहीं समा रही थी। वह सोचने लगी कि ससुर के साथ इस /अवैध-रिश्ते/ से उसे गहने भी मिल रहे हैं और खुशी भी। लेकिन सपना को इस बात का तनिक भी आभास नहीं था कि यह लालच उसे बहुत जल्द मौत के मुहाने पर खड़ा करने वाला था।
अध्याय 6: राखी की वापसी और बड़ी बहू का नंबर
सोने की अंगूठी मिलने के बाद कुछ दिनों तक यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा। लेकिन इसी बीच एक नया मोड़ आया। बड़े बेटे शिव कुमार की पत्नी राखी देवी अपने मायके से वापस अपने ससुराल बालेश्वर गाँव लौट आई।
राखी के वापस आ जाने के कारण घर में हर वक्त किसी न किसी की मौजूदगी बनी रहती थी। अब ससुर प्रकाश सिंह और छोटी बहू सपना को अकेले में मिलने का मौका नहीं मिल पा रहा था। मौका न मिलने के कारण प्रकाश सिंह काफी परेशान और चिड़चिड़ा रहने लगा। उसकी कामुकता फिर से मचल रही थी।
दिन बीतते गए और तारीख आ पहुँची 28 दिसंबर 2025।
सुबह के लगभग 8:00 बज रहे थे। छोटा बेटा हर सिंह अपने पिता प्रकाश सिंह के पास आया और बोला, “पिताजी! मुझे अपनी पत्नी सपना को लेकर शहर जाना है। कुछ नए कपड़े और घर का सामान खरीदना है। मुझे ₹10,000 की सख्त जरूरत है।”
प्रकाश सिंह ने बिना किसी झिझक के तुरंत अपनी तिजोरी से ₹10,000 निकाले और हर सिंह को थमा दिए। लगभग 9:30 बजे हर सिंह अपनी पत्नी सपना देवी को मोटरसाइकिल पर बैठाकर शहर के बाजार के लिए रवाना हो गया।
अब घर में केवल बड़ी बहू राखी देवी अकेली रह गई थी।
उधर प्रकाश सिंह और उसका बड़ा बेटा शिव कुमार खेत में काम करने चले गए थे। लेकिन खेत में फावड़ा चलाते हुए प्रकाश सिंह के दिमाग में सिर्फ अपनी बड़ी बहू राखी का चेहरा घूम रहा था। प्रकाश सिंह सोचने लगा, “आज छोटा बेटा और छोटी बहू शहर गए हैं। घर पर मेरी बड़ी बहू राखी बिल्कुल अकेली है। आज मुझे इस सुनहरे मौके का फायदा उठाना चाहिए और राखी के साथ भी अपना काम निपटाना चाहिए!”
अपने घटिया इरादे को अंजाम देने के लिए प्रकाश सिंह ने अपने पेट पर हाथ रखा और अपने बड़े बेटे शिव कुमार से रोने जैसा मुँह बनाकर कहा:
“बेटा शिव कुमार! मेरी तबीयत बहुत खराब लग रही है। मैं अपनी बीपी और गैस की दवाइयाँ घर पर ही भूल आया हूँ। मुझे चक्कर आ रहे हैं। मैं घर जाकर दवाइयाँ लेता हूँ और आराम करता हूँ। तुम खेत का सारा काम खत्म करने के बाद ही घर वापस आना।”
भोला-भाला शिव कुमार अपने पिता के छलावे में आ गया। उसने कहा, “कोई बात नहीं पिताजी! आप तुरंत घर जाइए, दवाई लेकर आराम कीजिए। मैं खेत का सारा काम निपटाकर ही आऊँगा।”
प्रकाश सिंह अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करके तेज रफ्तार में घर पहुँचा। उसने घर के मुख्य द्वार पर दस्तक दी।
भीतर से बड़ी बहू राखी देवी ने आकर दरवाजा खोला। राखी ने अपने ससुर को इस तरह अचानक अकेले घर लौटते देखा तो पूछा, “पिताजी! आप इतनी जल्दी खेत से वापस आ गए? सब ठीक तो है?”
प्रकाश सिंह ने अपनी कामुक निगाहों से सुंदर राखी को ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी नीयत पहले से ही राखी पर खराब थी। प्रकाश सिंह ने कमरे में दाखिल होते हुए कहा, “राखी, मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी। जरा मेरे लिए एक गिलास ठंडा पानी लेकर आओ।”
राखी तुरंत रसोई से पानी का गिलास ले आई और ससुर को दिया। प्रकाश सिंह ने पानी पिया और फिर राखी को अपने पास बैठने का इशारा किया।
अध्याय 7: तलाक की झूठी धमकी और राखी का भटकाव
राखी जैसे ही पास की कुर्सी पर बैठी, प्रकाश सिंह ने चेहरे पर बेहद गंभीर और चिंताजनक भाव लाते हुए कहा:
“राखी! मैं तुमसे एक बहुत जरूरी और दुखद बात करने आया हूँ। तुम दोनों की शादी को 4 साल बीत चुके हैं, लेकिन आज तक तुम्हारे पेट से कोई संतान नहीं हुई। आज सुबह खेत में तुम्हारा पति शिव कुमार मुझसे कह रहा था कि अगर अगले एक साल के भीतर राखी मुझे कोई बच्चा नहीं दे पाई, तो मैं उसे तलाक देकर घर से बाहर निकाल दूँगा और दूसरी शादी करूँगा!”
यह सुनते ही राखी के पैर तले से जमीन खिसक गई। उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ने लगीं। राखी रोते हुए बोली, “पिताजी! यह आप क्या कह रहे हैं? क्या शिव कुमार जी मुझे तलाक दे देंगे? मेरा क्या कसूर है इसमें?”
प्रकाश सिंह ने देखा कि तीर निशाने पर लग चुका है। उसने राखी के पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा और झूठी हमदर्दी जताते हुए बोला:
“घबराओ मत राखी! तुम्हारा ससुर अभी जिंदा है। मेरे पास इस मुसीबत से बचने का एक बहुत बड़ा और सबसे अच्छा उपाय है। अगर तुम मेरे साथ कमरे में चलकर थोड़ा वक्त गुजार लेती हो, तो मैं तुम्हें एक बच्चा दे सकता हूँ। जब तुम गर्भवती हो जाओगी, तो शिव कुमार तुम्हें कभी तलाक नहीं देगा और इस घर में तुम्हारी इज्जत हमेशा के लिए पक्की हो जाएगी। वैसे भी, घर की बात घर में ही रह जाएगी, किसी को कानो-कान खबर नहीं होगी।”
ससुर की इस घिनौनी और मनगढ़ंत कहानी को सुनकर राखी देवी के कदम भी डगमगा गए। अपनी गृहस्थी टूटने और तलाक के डर से राखी का जमीर भी कमज़ोर पड़ गया। उसने सोचा कि ससुर बात तो सही कह रहे हैं, अगर मुझे बच्चा हो जाएगा तो मेरा पति मुझे कभी नहीं छोड़ेगा।
राखी ने आँखें नीची करते हुए काँपती आवाज में कहा, “ठीक है पिताजी… जैसी आपकी मर्जी। बस यह बात किसी को पता नहीं चलनी चाहिए।”
प्रकाश सिंह के मन की मुराद पूरी हो गई। उसने राखी से कहा, “जाओ, जाकर घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद कर दो।”
राखी ने खुद जाकर मुख्य द्वार की कुंडी लगा दी। इसके बाद प्रकाश सिंह अपनी बड़ी बहू राखी का हाथ पकड़कर उसे कमरे के भीतर ले गया। उस बंद कमरे में प्रकाश सिंह ने अपनी बड़ी बहू राखी के साथ भी अपनी ही रजामंदी से /अवैध-शारीरिक-संबंध/ बनाए। दोनों काफी देर तक उस घिनौने काम में डूबे रहे।
काम खत्म होने के बाद प्रकाश सिंह ने अपनी मूँछों पर ताव दिया और कहा, “राखी, अब तुम चिंता मत करो। अब जब भी हमें मौका मिलेगा, हम इसी तरह अपने रिश्ते बनाते रहेंगे।”
राखी भी अपने ससुर के इस जाल में पूरी तरह फँस चुकी थी। अब प्रकाश सिंह का दोहरा खेल शुरू हो चुका था। जब भी उसे मौका मिलता, वह छोटी बहू सपना के साथ /अवैध-वक्त/ गुजारता, और जब मौका मिलता, वह बड़ी बहू राखी के साथ अपने /अवैध-संबंध/ बनाता। दोनों बहुएँ अपने-अपने स्वार्थ और लालच में अपने-अपने पतियों को धोखे में रख रही थीं।
अध्याय 8: 1 फरवरी 2026: क्लिनिक का चक्कर और दोहरा सच
इसी तरह अनैतिकता और पाप का यह घिनौना दौर चलता रहा। दिन बीतते गए और नया साल आ गया। तारीख आ पहुँची 1 फरवरी 2026।
सर्दियों की सुबह के करीब 8:00 बज रहे थे। प्रकाश सिंह ने अपने दोनों बेटों—शिव कुमार और हर सिंह—को बुलाकर कहा, “बेटो! आज खेत में फसल की कटाई और सिंचाई का बहुत भारी काम है। आज तुम दोनों को मेरे साथ पूरा दिन खेत में मेहनत करनी पड़ेगी।”
लगभग 9:30 बजे प्रकाश सिंह अपने दोनों बेटों को लेकर खेत में चला गया। तीनों खेत में काम करने लगे। लेकिन हमेशा की तरह, लगभग 1 घंटे काम करने के बाद प्रकाश सिंह ने फिर से अपनी बीमारी का नाटक रचा। उसने अपने बेटों से कहा, “अरे बेटो! आज फिर मेरी दवाइयाँ छूट गईं, सिर में चक्कर आ रहे हैं। मैं घर जाकर दवाई लेता हूँ।”
दोनों बेटों ने कहा, “ठीक है पिताजी, आप घर जाकर आराम कीजिए।”
प्रकाश सिंह अपनी मोटरसाइकिल उठाकर तेज रफ्तार में घर पहुँचा। उसने दरवाजे पर दस्तक दी। छोटी बहू सपना ने दरवाजा खोला। प्रकाश सिंह ने घर में दाखिल होकर देखा कि बड़ी बहू राखी घर पर नहीं थी।
प्रकाश सिंह ने पूछा, “सपना! राखी कहाँ है?”
सपना ने हँसते हुए कहा, “राखी अभी-अभी पड़ोसन के घर किसी काम से गई है। आज हमारे पास बहुत अच्छा मौका है!”
प्रकाश सिंह ने बिना एक पल गँवाए मुख्य दरवाजा बंद कर दिया और अपनी छोटी बहू सपना को लेकर कमरे में चला गया। दोनों ने फिर से /अवैध-संबंध/ बनाए। काम खत्म करने के बाद प्रकाश सिंह बड़ी ही सफाई से घर से निकलकर वापस चला गया।
दोपहर के लगभग 3:00 बज रहे थे। राखी पड़ोसन के घर से वापस लौट आई थी। दोनों देवरानी-जेठानी (सपना और राखी) घर के काम निपटा रही थीं। तभी अचानक सपना देवी के पेट में तेज ऐंठन हुई और उसे उल्टी (जी मिचलाना) आने लगी। सपना का सिर चकराने लगा और वह चक्कर खाकर चौके में बैठ गई।
राखी ने घबराकर अपनी देवरानी को सँभाला और कहा, “सपना! तुम्हारी तबीयत बहुत खराब लग रही है। चलो, तुम्हें पास के किसी अस्पताल दिखा लाते हैं।”
सपना ने कहा, “हाँ दीदी, बहुत घबराहट हो रही है। इस समय घर पर कोई पुरुष नहीं है, चलो हम दोनों चुपके से नजदीकी क्लिनिक होकर आ जाती हैं।”
दोनों देवरानी-जेठानी घर से निकलीं और गाँव के पास ही स्थित एक छोटे से लेडीज क्लिनिक (महिला डॉक्टर के क्लिनिक) में पहुँच गईं।
वहाँ महिला डॉक्टर ने सपना देवी को स्ट्रेचर पर लिटाया और उसका मेडिकल चेकअप तथा यूरिन टेस्ट किया। कुछ ही देर में महिला डॉक्टर मुस्कुराते हुए बाहर आईं और बोलीं, “बधाई हो! सपना तुम गर्भवती (प्रेग्नेंट) हो! तुम माँ बनने वाली हो।”
यह सुनते ही सपना देवी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सपना मन ही मन नाचने लगी कि उसके ससुर की वजह से आखिरकार वह गर्भवती हो गई। अब समाज में उसके पति का नाम होगा और घर में उसकी इज्जत बढ़ जाएगी।
सपना को खुश देखकर राखी देवी के मन में भी एक विचार कौंधा। राखी ने सोचा, “ससुर जी तो मेरे साथ भी पिछले एक महीने से संबंध बना रहे हैं। क्यों न मैं भी अपना मेडिकल चेकअप करवा लूँ?”
राखी ने महिला डॉक्टर से कहा, “डॉक्टर साहिबा! जरा मेरा भी मेडिकल चेकअप कर लीजिए।”
महिला डॉक्टर ने राखी देवी का भी सैंपल लिया और जाँच की। 15 मिनट बाद डॉक्टर ने हैरान होकर कहा, “अरे वाह! आज तो बड़ा शुभ दिन है! राखी, तुम भी गर्भवती हो! तुम दोनों देवरानी-जेठानी एक साथ माँ बनने वाली हो!”
यह सुनते ही राखी और सपना दोनों खुशी से झूम उठीं। दोनों ने डॉक्टर से कुछ जरूरी दवाइयाँ लीं और हँसती-मुस्कुराती हुई वापस अपने घर लौट आईं।
अध्याय 9: खुशियों का ढोंग और पतियों का गहरा संदेह
शाम के लगभग 6:30 बज रहे थे। सूरज ढल चुका था और अंधेरा छाने लगा था। दोनों भाई—शिव कुमार और हर सिंह—दिन भर की कड़ी मशक्कत के बाद खेत से काम खत्म करके घर लौटे।
जैसे ही शिव कुमार अपने कमरे में गया, उसकी पत्नी राखी देवी ने चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान लाकर कहा, “सुनिए जी! आपके लिए बहुत बड़ी खुशखबरी है। मैं माँ बनने वाली हूँ, डॉक्टर ने कहा है कि मैं प्रेग्नेंट हूँ!”
उधर दूसरे कमरे में छोटी बहू सपना देवी ने अपने पति हर सिंह का हाथ पकड़कर चहकते हुए कहा, “आपको पता है? आज मैं क्लिनिक गई थी। डॉक्टर ने कहा है कि मैं गर्भवती हूँ! हमारे घर में नन्हा मेहमान आने वाला है!”
राखी और सपना तो फूली नहीं समा रही थीं। उन्हें लग रहा था कि वे अपने पतियों को दुनिया की सबसे बड़ी खुशी दे रही हैं।
लेकिन यह खबर सुनते ही शिव कुमार और हर सिंह के पैरों तले से जमीन खिसक गई! उनके चेहरों पर खुशी का एक भी भाव नहीं आया, बल्कि उनके चेहरे खौफ और गहरे सदमे से पीले पड़ गए।
शिव कुमार और हर सिंह दोनों चुपचाप कमरे से बाहर निकले। शिव कुमार ने हर सिंह की तरफ देखा और कहा, “हर सिंह, जरा बाहर चलो, मुझे तुमसे बहुत जरूरी बात करनी है।”
दोनों भाई घर के बाहर सुनसान पगडंडी पर आए। हर सिंह की आँखों में आँसू थे, उसने अपने बड़े भाई से कहा:
“भैया! यह कैसे मुमकिन हो सकता है? जोधपुर के डॉक्टर ने हमें साफ-साफ कहा था कि हम दोनों भाइयों का स्पर्म काउंट शून्य है और हम जीवन में कभी पिता नहीं बन सकते! फिर हमारी पत्तियाँ एक साथ कैसे गर्भवती हो सकती हैं? इसका मतलब साफ है कि दोनों ने हमारे साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया है!”
शिव कुमार का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने कहा, “रुक हर सिंह! पहले हम उसी डॉक्टर के पास जाकर एक बार फिर से इस बात की पुष्टि करते हैं। कहीं डॉक्टर से कोई गलती तो नहीं हुई थी?”
दोनों भाई तुरंत अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हुए और रात में ही जोधपुर शहर के उसी अस्पताल में पहुँच गए। उन्होंने डॉक्टर का दरवाजा खटखटाया। डॉक्टर ने उन्हें पहचाना।
शिव कुमार ने घबराकर पूछा, “डॉक्टर साहब! आपने 2 महीने पहले कहा था कि हम कभी बाप नहीं बन सकते। लेकिन आज हमारी दोनों पत्नियाँ कह रही हैं कि वे प्रेग्नेंट हैं! क्या आपकी रिपोर्ट गलत थी?”
डॉक्टर ने अपनी पुरानी फाइलें खोलीं और बड़ी कड़ाई से कहा, “भाइयों! मेडिकल साइंस कभी झूठ नहीं बोलती। तुम्हारी रिपोर्ट 100% सही थी। तुम दोनों भाइयों के शरीर में औलाद पैदा करने वाले शुक्राणु हैं ही नहीं। तुम दोनों कभी बाप नहीं बन सकते। अगर तुम्हारी पत्तियाँ प्रेग्नेंट हैं, तो इसके पीछे किसी और गैर मर्द का हाथ है!”
डॉक्टर की यह बात सुनते ही दोनों भाइयों के भीतर छिपा हुआ शैतान जाग उठा। उनका खून खौल उठा। अपमान, धोखे और बेवफाई की आग में दोनों भाई जलने लगे।
अध्याय 10: घर में कड़कड़ाती सच्चाई और खूनी अंजाम
रात के लगभग 9:00 बज रहे थे। दोनों भाई—शिव कुमार और हर सिंह—आँखों में खून सवार किए मोटरसाइकिल से अपने घर बालेश्वर पहुँचे। उनका दिमागी संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका था।
घर के अंदर दाखिल होते ही शिव कुमार ने अंदर से मुख्य लोहे का दरवाजा बंद कर दिया और कुंडी लगा दी।
हर सिंह ने दौड़कर अपनी पत्नी सपना के बाल पकड़ लिए और उसे घसीटते हुए आँगन में पटक दिया। उधर शिव कुमार ने अपनी पत्नी राखी की गर्दन दबोच ली और उसे लातों-घूँसों से मारना शुरू कर दिया।
दोनों भाई अपनी-अपनी पत्नियों की बेरहमी से /पिटाई/ करने लगे।
“बताओ छिनारो! किसके साथ /अवैध-संबंध/ बनाए हैं तुमने? किसका बच्चा पल रहा है तुम्हारे पेट में?” शिव कुमार दहाड़ रहा था।
हर सिंह ने डंडा उठाकर सपना की पीठ पर दे मारा, “सच बताओ वरना आज तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे! डॉक्टर ने कह दिया है कि हम कभी बाप नहीं बन सकते! फिर यह पाप किसका है?”
राखी और सपना दर्द से चीखने-चिल्लाने लगीं। जब उन्होंने देखा कि उनके पति आज उन्हें जान से मार डालेंगे और बचने का कोई रास्ता नहीं है, तो खौफ के मारे सपना देवी ने रोते-बिलखते हुए पूरी सच्चाई उगल दी:
“हमें छोड़ दो! हमें मत मारो! इसमें हमारी कोई गलती नहीं है! यह सब आपके पिता… हमारे ससुर प्रकाश सिंह का किया-धरा है! उन्होंने ही हमें डराकर, बहलाकर और लालच देकर हमारे साथ यह /अवैध-काम/ किया है!”
यह सुनते ही शिव कुमार और हर सिंह स्तब्ध रह गए। उनके कानों में सन्नाटा छा गया।
राखी ने भी रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई, “हाँ! पिताजी ने मुझसे कहा था कि अगर मैं उनके साथ संबंध नहीं बनाऊँगी तो शिव कुमार मुझे तलाक दे देगा! उन्होंने ही मुझे डराकर कमरे में बुलाया था! सपना को भी उन्होंने नींद की गोलियाँ देकर आपके खाने में मिलवाई थीं!”
अपने सगे पिता की इस नीच, घिनौनी और राक्षस जैसी करतूत को सुनकर दोनों भाइयों का बचा-कुचा संयम भी टूट गया। जिस पिता को वे भगवान की तरह पूजते थे, उसी पिता ने उनकी गृहस्थी में ऐसा ज़हर घोल दिया था!
अंधे गुस्से और हवस के इस भयानक अंजाम में दोनों भाइयों ने आपा खो दिया।
शिव कुमार और हर सिंह दौड़कर कोने में रखी कुल्हाड़ी और गंडासी (चारा काटने वाला तेज धारदार हथियार) उठा लाए।
इससे पहले कि राखी और सपना कुछ समझ पातीं या भाग पातीं, शिव कुमार ने अपनी पत्नी राखी की गर्दन पर गंडासी से ‘धाँय!’ करके पहला वार कर दिया! राखी की चीख आँगन में गूंज गई और खून का फव्वारा छूट पड़ा।
उधर हर सिंह ने अपनी पत्नी सपना के सिर पर गंडासी का करारा प्रहार किया। दोनों भाइयों ने हैवान बनकर अपनी-अपनी पत्नियों पर गंडासी से दर्जनों वार किए। उन्होंने अपनी ही पत्नियों के शरीर के /टुकड़े-टुकड़े/ कर डाले और उनकी गर्दन काटकर धड़ से अलग कर दी!
पूरा आँगन खून से लाल हो चुका था। 20 मिनट के भीतर दोनों बहुओं की दर्दनाक /हत्या/ हो चुकी थी।
अध्याय 11: ससुर का कत्ल, पुलिस की आमद और बालेश्वर का सन्नाटा
हत्याकांड के ठीक 20 मिनट बाद, रात के लगभग 9:45 बजे, ससुर प्रकाश सिंह शराब के नशे में धुत होकर अपने घर का दरवाजा खटखटाने लगा। वह बेखबर था कि अंदर क्या कयामत टूट पड़ी है।
शिव कुमार ने खून से सनी गंडासी हाथ में ली और जाकर चुपचाप दरवाजा खोल दिया।
जैसे ही प्रकाश सिंह ने घर के अंदर कदम रखा, उसने देखा कि आँगन में उसकी दोनों बहुओं—राखी और सपना—की /कटी हुई लाशें/ खून के पोखरे में पड़ी हुई थीं। पूरा घर बारूद और खून की बदबू से भरा हुआ था।
प्रकाश सिंह का नशा एक पल में हिरण हो गया। वह खौफ से काँपते हुए पीछे हटने लगा, “यह… यह क्या कर दिया तुम दोनों ने?”
शिव कुमार और हर सिंह की आँखों में केवल खून और बदले की आग थी।
शिव कुमार ने दहाड़ते हुए कहा, “जिस पिता ने हमारी इज्जत नीलाम कर दी, जो अपने ही घर की बहुओं को नहीं बख्श सका, ऐसे हैवान को जीने का कोई हक नहीं है!”
इससे पहले कि प्रकाश सिंह बाहर की तरफ भाग पाता, हर सिंह और शिव कुमार दोनों अपने पिता पर भूखे शेरों की तरह लपक पड़े। शिव कुमार ने गंडासी का पहला वार सीधे प्रकाश सिंह की गर्दन पर किया। प्रकाश सिंह चीखते हुए जमीन पर गिर पड़ा। हर सिंह ने उसकी छाती और पेट पर गंडासी से ताबड़तोड़ वार कर दिए।
कुछ ही मिनटों में प्रकाश सिंह का भी /कत्ल/ कर दिया गया। उसकी भी /लाश/ उसी आँगन में बिछा दी गई, जहाँ उसकी दोनों बहुओं के शव पड़े थे।
पूरे हत्याकांड को अंजाम देने के बाद लगभग 40 मिनट तक दोनों भाई खून से सने हथियारों के साथ अपने ही पिता और पत्नियों की लाशों के पास गुमसुम बैठे रहे।
गाँव के किसी पड़ोसी ने चीख-पुकार सुनकर पुलिस को सूचना दे दी थी। घटना के लगभग 40 मिनट बाद जोधपुर जिले की बालेश्वर थाना पुलिस भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँची।
जब पुलिस ने घर का दरवाजा ढकेला और अंदर का नजारा देखा, तो सख्त से सख्त पुलिस अफसरों की रूह भी काँप गई! एक ही आँगन में तीन-तीन /लाशें/—दो बहुओं और एक ससुर की—खून में लथपथ पड़ी थीं।
पुलिस ने तुरंत शिव कुमार और हर सिंह को मौके से गिरफ्तार कर लिया और खून से सनी गंडासियों को कब्जे में ले लिया।
थाने ले जाकर जब पुलिस अधिकारियों ने दोनों भाइयों से इस जघन्य हत्याकांड का कारण पूछा, तो दोनों भाइयों ने बिना किसी डर के शुरुआत से लेकर अंत तक की पूरी दास्तान बयान कर दी—डॉक्टर की रिपोर्ट, पिता की व्यभिचारी आदतें, नींद की गोलियाँ, धोखा और अपनी ही बहुओं के साथ ससुर के /अवैध-संबंध/।
शिव कुमार और हर सिंह की यह आपबीती सुनकर पुलिस अधिकारियों के भी होश उड़ गए। पुलिस सोचने पर मजबूर हो गई कि वासना और हवस में अंधा होकर एक ससुर अपनी ही बहुओं के साथ ऐसा खौफनाक और घिनौना कारनामा कैसे कर सकता है।
बालेश्वर गाँव में इस घटना के बाद सन्नाटा पसर गया। एक हँसता-खेलता, संपन्न परिवार वासना, धोखा और मर्यादाहीनता के कारण एक ही रात में पूरी तरह तबाह हो गया।
कहानी से मिलने वाला सामाजिक संदेश:
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अनियोजित वासना और मर्यादा का पतन: परिवार के भीतर रिश्तों की एक पवित्र सीमा रेखा होती है। जब ससुर या कोई भी बड़ा बुजुर्ग वासना में अंधा होकर मर्यादा लांघता है, तो उसका अंत केवल और केवल सर्वनाश होता है।
सत्य की विजय और छल का अंत: अनैतिक संबंधों और छल-कपट की नींव पर खड़ी की गई इमारत कभी टिक नहीं सकती। असत्य का पर्दाफाश एक न एक दिन खूनी रूप लेकर ही सामने आता है।
अंधा कानून हाथ में लेना: यद्यपि ससुर और बहुओं का आचरण घिनौना था, लेकिन कानून को हाथ में लेकर इस तरह /कत्ल/ और नरसंहार करना भी सर्वथा अनुचित और कानूनन अपराध है, जिसकी सजा दोनों भाइयों को ताउम्र जेल में काटकर भुगतनी पड़ी।
समाप्त