अफ्रीकन आदमी दिल्ली के जीबी रोड गया, वहां मिली सबसे कम उम्र की लड़की, फिर जो हुआ।
अफ्रीकन आदमी दिल्ली के जीबी रोड गया, वहां मिली सबसे कम उम्र की लड़की, फिर जो हुआ।
दिल्ली की जीबी रोड, कोठा नंबर 62 और एक असमिया लड़की की वापसी: विक्टर की उस रात से शुरू हुई रेस्क्यू की कहानी
दिल्ली की शाम जैसे-जैसे ढलती है, शहर की कई गलियां काम से लौटते लोगों से भर जाती हैं। कुछ गलियां और भी व्यस्त हो जाती हैं—उनमें जीबी रोड की संकरी पंक्तियां शामिल हैं, जहां गली नंबर गिने जाते हैं और सीढ़ियां ऊपर कोठों तक ले जाती हैं। यहीं कोठा नंबर 62 की चर्चा पुरानी है। इसी पते पर एक दक्षिण अफ्रीकी युवक विक्टर की मुलाकात सना से हुई। कहानी के अनुसार सना को आए तीन-चार दिन ही हुए थे। वे स्कूल जाती थीं, असम के गरीब घर की सबसे बड़ी बेटी थीं, छोटा भाई था, माता-पिता परेशान थे। नौकरी के झांसे में उन्हें दिल्ली लाया गया और बेच दिया गया। फोन छीन लिया गया था। घर से बात नहीं हो पाती थी।
यह लेख उसी घटनाक्रम को समाचार-शैली में रखता है—लाल बत्ती क्षेत्र की भीड़, तस्करी का जाल, एक विदेशी कर्मचारी की भूमिका, महिला संस्था और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई, तथा दर्जनों अन्य लड़कियों तक फैली जांच। उद्देश्य जगह का ग्लैमराइजेशन नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि जब कोई व्यक्ति सिर्फ “देखने” जाता है और एक उदास चेहरा पहचान लेता है, तो व्यवस्था भी हिल सकती है।
जीबी रोड की वह शाम और भीड़ का चेहरा
विक्टर लगभग 35 वर्ष के थे, दिल्ली की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत। शहर में करीब एक वर्ष हो चुका था। दोस्त जीबी रोड की चर्चा करते रहते थे—अलग-अलग राज्यों से लड़कियां, नेपाल तक से आने की बातें, पैसे से सब कुछ मिल जाने का दावा। तीन-चार महीने जानकारी जुटाने के बाद एक शाम साढ़े सात-आठ बजे वे उन गलियों में पहुंचे।
नीचे दलाल ग्राहक बैठा रहे थे, खिड़कियों से इशारे हो रहे थे, लोग ऊपर-नीचे आ-जा रहे थे। कोठा 62 पर रंगीन रोशनी, शराब, नाच और सौदेबाजी का माहौल था। संचालन करने वाली तीन-चार महिलाएं रेट तय कर रही थीं। विक्टर चारों ओर देखते रहे। भीड़ में एक कोने की लड़की अलग थी—साधारण कपड़े, हल्का मेकअप, उदासी, किसी को नहीं बुला रही थी। संचालन करने वाली महिला ने बताया कि नई है, तीन दिन हुए हैं, रेट ज्यादा लगेगा। विक्टर तैयार हो गए। लड़की का नाम सना था।
सना अफ्रीकी व्यक्ति देखकर डर गईं। मना करने की छूट नहीं थी। आंखों के सामने तीन दिन में देख चुकी थीं कि इनकार करने वालों के साथ क्या होता है। वे इस सोच से कमरे में गईं कि जो होगा देखा जाएगा—शायद इसी रास्ते नर्क से निकला भी जा सके।

कमरे के अंदर सौदा नहीं, सवाल थे
अंदर सना की आंखें भर आईं। विक्टर ने कहा कि गलत इरादे से नहीं आए, कोठे का जायजा और जानकारी लेने आए हैं—लड़कियां यहां कैसे पहुंचती हैं, यातना होती है या नहीं, निकलने का रास्ता है या नहीं। सना डरीं कि कोई सुन लेगा तो मारी जाएंगी। विक्टर ने मदद का भरोसा दिया। “यहां से निकलना” शब्द सुनते ही वे फूट-फूटकर रोईं। हाथ पकड़कर कहा—हां, निकलना चाहती हूं। जबरदस्ती गुमराह करके लाया गया है। घर वाले परेशान होंगे। मां परेशान होगी। फोन नहीं है। यहां जेल से भी बदतर है। ग्राहक के साथ न जाओ तो टॉर्चर है।
उन्होंने बताया कि असम की हैं। एक व्यक्ति ने नौकरी दिलाने का झांसा दिया, दिल्ली लाकर एक महिला के हाथ बेच दिया, वही महिला उन्हें यहां ले आई। विक्टर थाने का नाम और बाकी विवरण नोट करते रहे। करीब पंद्रह-बीस मिनट बाद बाहर आए। मालकिन से कहा जा रहे हैं, अपने कमरे लौटे। रात भर नींद नहीं आई। सना का चेहरा बार-बार याद आता रहा। उम्मीद उनके चेहरे पर दिख रही थी, और उसी उम्मीद को बचाना अब जिम्मेदारी लगने लगा।
सुबह संस्था, फिर दो पुलिस तंत्र
अगले दिन विक्टर एक महिला संस्था से जुड़े जो गुमराह कर लाई गई महिलाओं को निकालने का काम करती है। पूरी डिटेल दी गई। संस्था ने असम पुलिस और दिल्ली पुलिस दोनों से संपर्क किया। शिकायत के आधार पर बड़ी टीम बनी। असम से भी पुलिस आई। करीब एक सप्ताह तैयारी में निकल गया। विक्टर ने सना से कहा था कि एक हफ्ते कोई भागने की कोशिश न करें, स्थिति के अनुसार अपने को संभालें, ताकि वे लौटकर उन्हें ढूंढ सकें। सना ने उसी उम्मीद पर इंतजार किया।
घर असम में परिवार पहले ही एफआईआर कर चुका था। जांच चल रही थी, सुराग नहीं मिला था।
आठ बजे की रेड: सिविल ड्रेस में टीम
एक सप्ताह बाद रात आठ बजे कोठा 62 पर टीम सिविल ड्रेस में पहुंची। अंदर वालों को ग्राहक ही लगे। सना फिर उसी दरवाजे के पास खड़ी थीं। विक्टर और सना की नजर मिली, दोनों को राहत हुई। विक्टर ने पुलिस से कहा—यही लड़की है। संगीत बंद हुआ, चीख-पुकार मची, संचालन करने वाली महिलाएं भागने लगीं। एक उम्रदराज महिला ने टोका—तुम लोग कौन हो? कार्ड दिखे तो होश उड़ गए। चार महिलाओं को गिरफ्तार किया गया। सना समेत बड़ी संख्या में लड़कियों को थाने लाया गया।
पूछताछ में संचालन करने वाली महिलाएं समझौते की भाषा बोलने लगीं—पैसा ले लो, मामला रफा-दफा कर दो। महिला आयोग और संस्था की टीम पैसे पर राजी नहीं हुई। सैकड़ों में से करीब बीस ऐसी लड़कियां निकलीं जिन्हें जबरदस्ती या धोखे से लाया गया था। दलाल को इसके एवज में पैसे मिले थे।
सना को लाने वाला कोई अनजान गिरोह नहीं, जान-पहचान का व्यक्ति था—नौकरी का झांसा, दिल्ली की संपर्क महिला के हाथ बिक्री, फिर कोठा। पुलिस ने सना के पिता को फोन किया: बेटी सुरक्षित है, दिल्ली में है। मां-बाप और छोटा भाई जैसे नई जान पा गए। फोन पर सना शब्द नहीं निकाल पा रही थीं, रो रही थीं। पुलिस ने कहा कागजी कार्यवाही निपटते ही घर पहुंचाएंगे। सना विक्टर और टीम के सामने कृतज्ञता में टूट गईं—अगर आप न होते तो पता नहीं क्या होता।
चार महिलाओं के खिलाफ संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा गया। जो स्वेच्छा से इस काम से जुड़ी बताई गईं और जिनके पीछे परिवार नहीं था, उन्हें हिदायत देकर छोड़ा गया। जिन्हें दलालों ने फंसाया था, उन्हें परिवार से संपर्क कर सुरक्षित घर पहुंचाया गया। सना घर लौटीं। परिवार मिला। उन्होंने संकल्प किया कि पढ़ाई जारी रखेंगी, कुछ नया काम करेंगी।
जब माता-पिता ने पूछा दिल्ली में क्या कर रही थीं, कैसे पहुंचीं—डर-डर कर, रो-रो कर कहानी बताई तो घर में सन्नाटा छा गया।
तस्कर का जाल सिर्फ एक कोठा नहीं था
पुलिस ने उस व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया जिसके संपर्क में सना आई थीं और दिल्ली जाने की योजना बनी थी। कड़ी पूछताछ में खुलासे हुए—उन्होंने कई लड़कियों को बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली जैसी जगहों पर ऐसे ही ठिकानों तक पहुंचाया था। जिन पतों का नाम आया, वहां पुलिस सक्रिय हुई और छुड़ाने की कार्रवाई आगे बढ़ी। कहानी का दावा है कि विक्टर उस शाम न जाते तो कई जिंदगियां उसी दलदल में रह जातीं।
यही बात इस प्रकरण को सिर्फ “एक ग्राहक की नेक नीयत” से बड़ा बनाती है। तस्करी अक्सर परिचित चेहरे से शुरू होती है—नौकरी, शहर, बेहतर कमाई। फोन छीन लेना, परिवार से काटना, इनकार पर यातना—ये तरीके बार-बार दोहराए जाते हैं। कोठे का संचालन कई बार महिलाओं के हाथ में होता है; पीड़िता और कारोबारी के बीच की रेखा बाहर से दिखती नहीं। पुलिस जब सिर्फ “धंधा” देखती है तो तस्करी दब जाती है। जब संस्था, आयोग और दो राज्यों की पुलिस एक साथ आती है तो बीस अन्य चेहरे भी निकल आते हैं।
जो सबक इस घटना में है
पहला, लाल बत्ती क्षेत्र की भीड़ का मतलब सहमति नहीं होता। नई, उदास, इशारा न करती लड़की अक्सर सबसे ज्यादा जोखिम में होती है। दूसरा, विदेशी या बाहरी व्यक्ति की उपस्थिति अपने आप संदेह पैदा करती है, लेकिन वही व्यक्ति गवाह और सेतु भी बन सकता है—बशर्ते वह संस्था और पुलिस के पास जाए, स्वयं कानून हाथ में न ले। तीसरा, पीड़िता से कहा गया “एक हफ्ता इंतजार करो, भागना मत”—यह सलाह खतरनाक भी हो सकती है, लेकिन इस ब्योरे में उसी इंतजार ने रेड के दिन पहचान संभव बनाई। चौथा, समझौते का दबाव थाने तक आता है; आयोग और रेस्क्यू संस्थाएं अगर न हों तो मामला पैसे पर खत्म हो सकता है।
सना की उम्र कहानी में बार-बार “कम” और स्कूल से जुड़ी बताई गई है। ऐसे मामलों में कानून की नजर नाबालिग तस्करी और यौन शोषण पर सबसे कठोर होती है। परिवार की गरीबी, बड़ी बेटी होने का बोझ और नौकरी का सपना—यही तीन दरवाजे तस्कर के लिए काफी होते हैं। असम से दिल्ली तक का फासला सिर्फ ट्रेन का नहीं, सूचना और सुरक्षा के अभाव का भी है। एफआईआर हो चुकी थी, फिर भी सुराग कोठे के अंदर तब मिला जब कोई अंदर जाकर नाम और थाना नोट कर लाया।
आज की कहानी का अंत घर की दहलीज पर है—सना वापस हैं, पढ़ने का वादा है, तस्कर जेल की ओर है, और जीबी रोड की गलियां फिर शाम होते ही भर जाएंगी। एक रेड से पूरा जाल नहीं टूटता। टूटता है तब, जब उदास चेहरे को सिर्फ पसंद की वस्तु न माना जाए। विक्टर उस रात जिस मकसद से गए थे, कहानी उसे “विशेष उद्देश्य” कहती है। नतीजा यह निकला कि एक स्कूल जाती लड़की परिवार के पास लौटी और जांच ने और पते खोल दिए। बाकी जिंदगियां अभी भी उन्हीं सीढ़ियों पर इंतजार कर सकती हैं—किसी और की नजर लगने का, या फिर कभी न लगने का।