कंडोम की वजह से महिला की दर्दनाक मौत हो गई, वजह जानकर पुलिस भी रह गई हैरान। – News

कंडोम की वजह से महिला की दर्दनाक मौत हो गई, वजह जानकर पुलिस भी रह गई हैरान।

कंडोम की वजह से महिला की दर्दनाक मौत हो गई, वजह जानकर पुलिस भी रह गई हैरान।

कंडोम की वजह से महिला की दर्दनाक मौत हो गई, वजह जानकर पुलिस भी रह गई हैरान।

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नमस्कार दोस्तों। यह कहानी गुजरात के गांधीनगर जिले के कलोल गांव से शुरू होती है। वहाँ सुमन देवी रहती थीं। पाँच वर्ष पहले पति के साँप काटने से निधन के बाद वे विधवा हो गईं। दो छोटे बच्चे और देवर कमल उनके घर में थे। सुमन दस किलोमीटर दूर कारखाने में मजदूरी कर घर चलाती थीं। कमल जमींदारों के खेतों में काम करता, पर कमाई का बड़ा हिस्सा जुए और शराब में उड़ा देता। भाभी उसे पसंद नहीं करती थीं। कमल की शादी भी नहीं हुई थी और उसकी नजरें कई बार गलत दिशा में जाती थीं।

सुमन थक चुकी थीं। हर सुबह आठ बजे कारखाना, शाम सात बजे घर। अकेलापन बढ़ने लगा। एक दिन पाँच मई दो हजार छब्बीस को कारखाने में उनकी मुलाकात आरती देवी से हुई। आरती का चाल-चलन ठीक नहीं था। उसने कहा कि कल से वह काम नहीं करेगी। कारण यह था कि गाँव के अमीर युवक सोनू को उसने अपने जाल में फँसा लिया था। सोनू रात को आता, पैसे देता और चला जाता। सुमन ये बातें सुनकर सोचने लगीं कि उन्हें भी कोई युवा और साधनसंपन्न व्यक्ति मिल जाए।

उसी शाम गाँव लौटते हुए घर के पास नई मेडिकल दुकान दिखी। वहाँ दीपक बैठा था—लंबा, सुंदर, युवा। सुमन आकर्षित हुईं और दुकान में घुस गईं। उस समय कोई ग्राहक नहीं था। उन्होंने कंडोम का पैकेट मांगा। दीपक चौंक गया, पर पैकेट दे दिया। सुमन पैसे देकर चली गईं। दीपक सोचता रहा कि विधवा स्त्री यह क्यों खरीद रही है।

रात साढ़े सात बजे कमल नशे में घर आया। सुमन ने दरवाजा खोला और कहा कि शराब पीकर घर में मत आओ। कमल बोला यह उसका घर है। सुमन ने आज रात अंदर न आने को कहा। गुस्से में कमल दोस्त अरुण के घर चला गया और वहीं सो गया। सुमन बच्चों को खिलाकर सो गईं।

अगली सुबह सुमन जानबूझकर कारखाना नहीं गईं। सज-धजकर दीपक की दुकान पहुँचीं और फिर कंडोम मांगा। दीपक ने पूछा कि इतने पैकेट का क्या करती हो। सुमन मुस्कराईं और कहा कि रात दस बजे घर आ जाना, तब बताऊँगी। दीपक मान गया। शाम को सुमन ने बच्चों को जल्दी सुला दिया। साढ़े नौ बजे दीपक दुकान बंद कर मोटरसाइकिल से पहुँचा। सुमन ने दरवाजा खोला, उसे अंदर लिया और मुख्य द्वार बंद कर दिया। बच्चे दूसरे कमरे में सो रहे थे।

दीपक ने फिर वही सवाल किया। सुमन ने अलमारी से रखे पैकेट निकाले और कहा कि दुकान इसलिए आती थी कि तुमसे मिल सकूँ। पति नहीं रहे, कमाने वाला सिर्फ देवर है जो सब शराब-जुए में गँवाता है। दीपक ने जेब से कुछ पैसे निकाले। सुमन ने लिए। फिर दोनों ने सहमति से एकांत में समय बिताया। बाद में सुमन ने कहा कि खाली पैकेट दूर फेंक देना। दीपक लापरवाही से उसे घर के दरवाजे के सामने ही छोड़ गया और चला गया।

सुबह साढ़े आठ बजे कमल घर आया तो खाली पैकेट दिख गया। उसने सोचा कोई और फेंक गया होगा और बात टाल दी। अंदर जाकर भाभी से कहा कि आज से शराब और जुआ छोड़ दूँगा, कारखाने में काम करूँगा। सुमन को विश्वास नहीं हुआ, पर कमल ने माता-पिता की कसम खाई। खाना खाकर वह साइकिल लेकर कारखाने चला गया और काम मिल गया।

घर पर सुमन अकेली रह गईं। ग्यारह बजे बच्चों को सुलाकर उन्होंने दीपक को फोन किया—जल्दी आओ, दो हजार रुपये लेकर। दीपक दस मिनट में पहुँचा, पैसे दिए और कहा कि घर खाली है। फिर दोनों ने फिर समय बिताया। सुमन ने कहा पैकेट दूर फेंको। दीपक फिर सामने ही फेंककर चला गया।

शाम सात बजे कमल थका हुआ आया तो दो खाली पैकेट दिखे। आँखें फटी रह गईं। शक हुआ कि भाभी गलत रास्ते पर तो नहीं चल पड़ीं। उसने कुछ नहीं पूछा, खाना खाकर अलग कमरे में लेट गया, पर नींद नहीं आई। वह सोचता रहा कि रोज कोई आता है और चला जाता है, पर पूछने की हिम्मत नहीं हुई।

सुमन अब इसी रास्ते से पैसे कमाने लगी थीं। अठारह मई को दीपक की दुकान पर दोस्त रूपेश आया। दोनों ने पार्टी का प्लान बनाया। शराब खरीदकर रूपेश के खाली खेत में बैठे। नशा चढ़ने पर एक विधवा करुणा दिखी। रूपेश ने सुझाव दिया, पर दीपक बोला उसके पास और सुंदर स्त्री है। उसने सुमन को फोन किया—दोस्त के साथ आना चाहते हैं। सुमन ने पैसे मांगे। दीपक ने कहा रूपेश के पास काफी हैं। सुमन ने कहा देवर कारखाने गया है, आ सकते हो।

दोनों मोटरसाइकिल से घर पहुँचे। सुमन ने द्वार खोला, अंदर लिया, ताला लगाया। दोनों बारी-बारी समय बिताकर पैसे देकर निकले। पड़ोस का अरुण—कमल का दोस्त—उन्हें देख गया। उसने सोचा भाभी गलत राह पर हैं। शाम को कमल से मिला और बताया कि दीपक रातों को घर आता-जाता देखा गया है, आज रूपेश भी साथ था। कमल पहले न माना, फिर गुस्सा आया। उसने कहा जब वे आएँ तो फोन कर देना। घर जाकर भाभी से एक शब्द नहीं कहा।

चौबीस मई की सुबह कमल कारखाने चला गया। दोपहर बारह बजे सुमन ने दीपक को फोन किया—रूपेश को लेकर आओ, घर खाली है। दीपक और रूपेश पहुँचे। अरुण पहले से नजर रखे था। उसने कमल को फोन किया। कमल मालिक से मोटरसाइकिल लेकर गाँव आया, अरुण से बात की, कुल्हाड़ी ली और दीवार फाँदकर घर घुसा। कमरे का दरवाजा बंद था। गुस्से में उसने तोड़ दिया।

अंदर जो दृश्य था, उसे देखकर कमल ने तीनों को संभलने का समय नहीं दिया। झगड़ा हिंसक हो गया। दीपक और रूपेश मौके पर गिर गए। सुमन को भी कमरे से बाहर घसीटा गया। तीनों की मृत्यु हो गई। खून से सनी कुल्हाड़ी लिए कमल बाहर निकला। लोग डर गए। वह अरुण के पास गया और कहा पुलिस बुलाओ, मैं सरेंडर करना चाहता हूँ।

एक घंटे बाद पुलिस पहुँची। तीनों शव अपने कब्जे में लिए, पोस्टमॉर्टम के लिए भेजे। पूछताछ में कमल ने कहा कि भाभी दो युवकों के साथ समय बिता रही थीं, इसलिए मैंने यह कदम उठाया। पुलिस ने चालान दाखिल किया। आगे अदालत क्या फैसला सुनाएगी, वह भविष्य के गर्भ में है।

दोस्तों, इस घटना में कमल ने जो किया वह सही था या गलत—यह सोचने वाली बात है। परिवार, गरीबी, अकेलापन और शक जब एक साथ मिलते हैं तो गाँव की दीवारें भी चुप नहीं रह पातीं। जय हिंद, वंदे मातरम।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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