ससुर ने बहू के साथ अपराध किया; पुलिस और गाँव वाले भी रह गए स्तब्ध…
ससुर ने बहू के साथ अपराध किया; पुलिस और गाँव वाले भी रह गए स्तब्ध…
दोस्तों, आज हम एक ऐसी कहानी सुनाने वाले हैं जो दिल को दहला देती है। राजस्थान के बीकानेर जिले में कोलायत नाम का एक छोटा सा गांव है। इसी गांव में रहता था भंवर सिंह। भंवर सिंह के पास चार एकड़ जमीन थी। वह खेती किसानी से ठीक-ठीक पैसे कमा लेता था। इस जमीन की आय से उसका घर का गुजारा चलता था। भंवर सिंह के दो बेटे थे – बड़ा बेटा नसीब सिंह और छोटा बेटा सुमित। नसीब सिंह जन्म से ही एक आंख से अंधा था। इस वजह से उसकी शादी तक नहीं हुई। फिर भी नसीब सिंह ने गांव के अंदर ही एक छोटी सी किराना की दुकान चलाना शुरू कर दिया। दुकान अच्छी चलती थी और उसने अच्छे पैसे भी कमा लिए थे।

छोटे बेटे सुमित की शादी तीन साल पहले कांता के साथ हुई थी। सुमित और कांता की शादी के बाद दोनों पति-पत्नी बहुत अच्छे तरीके से रहने लगे थे। लेकिन कुछ दिनों बाद सुमित हर तीसरे-चौथे दिन अपने पिता भंवर सिंह से यही कहने लगता, “पिताजी, मुझे विदेश में जाना है। विदेश जाकर पैसे कमाने हैं।” भंवर सिंह हमेशा मना करता, “बेटा, हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि तुम्हें विदेश भेज सकूं।” लेकिन सुमित नहीं मानता था। वह बार-बार कहता, “पिताजी, मेरे हिस्से वाली जमीन बेच दीजिए। उस जमीन को बेचकर मुझे विदेश भेज दीजिए।” भंवर सिंह थक-हारकर हार मान गया। उसने सोचा कि इसकी दो एकड़ जमीन है। अब इसकी इच्छा पूरी करनी पड़ेगी।
तीन-चार दिनों बाद भंवर सिंह ने गांव के सरपंच के पास अपनी दो एकड़ जमीन बेच दी और सुमित को ऑस्ट्रेलिया भेज दिया। जैसे ही सुमित ऑस्ट्रेलिया पहुंच गया, वह रोज वीडियो कॉल पर अपने पूरे परिवार से बात करने लगा। अपनी पत्नी कांता से भी बात करता। लेकिन कांता देवी अब काफी परेशान रहने लगी थी। वह सोचती, “मेरा पति तो विदेश में बैठ गया है और मैं घर पर अकेली हूं। मैं गरीब परिवार की लड़की हूं, अपने ससुर को कुछ कह नहीं सकती और जेठ नसीब को भी कुछ नहीं कह सकती।” फिर भी कांता देवी अपने ससुर और जेठ को बहुत अच्छे से सेवा करती रहती थी।
कुछ दिन बाद सुमित का रवैया बदलने लगा। वह फोन कॉल करना बंद कर देता। न तो परिवार से बात करता था, न ही कांता देवी से। लगभग छह महीने बीत गए। कांता देवी अब इस परिवार के अंदर ज्यादा परेशान रहने लगी थी। लेकिन वह नहीं जानती थी कि आगे उसके ससुर और जेठ के साथ क्या होने वाला है।
दिन गुजरते चले गए और एक तारीख आ गई – 10 दिसंबर 2025। सुबह करीब सात बजे के आसपास नसीब सिंह अपनी दुकान पर जाने की तैयारी कर रहा था। कांता देवी ससुर-जेठ के लिए रसोई में खाना बना रही थी। तभी नसीब सिंह की नियत खराब हो गई। उसने मन में ठान लिया कि कांता देवी को हासिल करके रहेगा। नसीब सिंह ने दुकान का शटर बंद कर दिया और घर की तरफ चल पड़ा। कांता देवी दरवाजा खोलते ही नसीब सिंह ने कहा, “मैं अपना मोबाइल फोन भूल गया हूं।” कांता ने कहा, “घर के अंदर पड़ा होगा, ले लीजिए।” नसीब ने कमरे के अंदर जाकर मोबाइल उठाया, लेकिन चुपके से कांता की तरफ देखता रहा।
जब कांता कपड़े धो रही थी, नसीब सिंह की नजर उसकी खूबसूरती पर पड़ गई। वह उतना ही देख रहा था कि देखता रह जाता। नसीब ने मन में फैसला कर लिया कि मौका मिले तो कांता को हासिल कर लेगा। उसने घर का मुख्य दरवाजा बंद कर लिया, कांता के मुंह पर हाथ रखा और उसे घसीटकर कमरे के अंदर ले गया। कमरे में पहुंचकर उसने कांता की चुन्नी से उसके मुंह को बांध दिया, फिर दूसरे कपड़ों से उसके हाथ-पैर बांध दिए। अब कांता के साथ नसीब सिंह बिना किसी रजामंदी के गलत काम करने लगा। कांता रोती रही, लड़ती रही, लेकिन नसीब किसी बात को नहीं माना। जब नसीब का मन भर गया तो उसने कांता को धमकी दी, “अगर तुमने यह बात मेरे पिता को बताई या किसी को बताई तो मैं तुम्हें जान से मार दूंगा।” फिर नसीब बाहर निकल गया।
कांता देवी इतनी डर गई कि वह किसी को कुछ नहीं बता सकी। उसका मन कहता, “अगर मैंने बता दिया तो नसीब मुझे मार डालेगा।” वह चुपचाप रह गई। नसीब ने दुकान पर काम शुरू कर दिया। कांता ने सारा दिन घर संभाला। उसका मन टूटा हुआ था, लेकिन कोई नहीं जानता था।
दूसरी तरफ भंवर सिंह भी अपनी दो एकड़ जमीन बेचकर सुमित को ऑस्ट्रेलिया भेज दिया था, लेकिन उसके पास काफी अच्छे पैसे बच गए थे। वह बैंक में जमा करके रखता और थोड़े-थोड़े पैसे निकालता। उसकी शराब की आदत पड़ गई। हर दूसरे-तीसरे दिन वह दोस्तों के साथ बैठकर शराब पीने लग गया। उसकी हद तक पहुंच गई कि वह खेत में भी गांव की किसी महिला को ले जाने लगा।
एक तारीख आ गई – 25 दिसंबर 2025। सुबह करीब आठ बजे भंवर सिंह और नसीब सिंह दोनों घर में बैठकर खाना खा रहे थे। नसीब ने पिता से कहा, “पिताजी, दुकान का सामान खत्म हो चुका है। मुझे दुकान के लिए शहर जाना पड़ेगा।” भंवर सिंह ने अलमारी से सौ हजार रुपये निकालकर बेटे को दे दिए और कहा, “जल्दी से ले आना।” नसीब खाना खाने के बाद सौ हजार रुपये लेकर शहर चला गया। घर पर भंवर सिंह और कांता देवी रह गए। भंवर सिंह कांता की खूबसूरती देखकर उसकी इच्छा भी बदल गई। उसने सोचा कि सुमित तो ऑस्ट्रेलिया में है और कांता अकेली है।
भंवर सिंह ने कहा, “मैं डेढ़ घंटे में खेत से लौट आऊंगा।” खेत में जाकर उसका दोस्त गुलाब सिंह आया। दोनों ने नजदीकी शराब के ठेके से अच्छी शराब खरीदी और खेत में बैठकर पीने लगे। नशे में भंवर सिंह के मन में ख्याल आने लगे। उसने गुलाब से कहा, “मुझे गांव में जाना है, भूख लगी है।” गुलाब घर चला गया। भंवर सिंह घर आया। कांता दरवाजा खोलती ही भंवर सिंह ने कहा, “जल्दी से खाना लाकर दे दो, भूख लगी है।” भंवर सिंह रसोई में चला गया, वहां से एक चाकू उठाया और कांता के गले पर रख लिया। कांता घबरा गई। भंवर सिंह ने कहा, “जल्दी से कमरे के अंदर चलो।” घर का दरवाजा बंद कर लिया और कांता के साथ गलत काम करने लगा। भंवर सिंह का मन बिल्कुल मर चुका था। कांता हाथ जोड़कर रोती रही, लेकिन भंवर सिंह मानने को तैयार नहीं था। जब भंवर सिंह का मन भर गया तो उसने भी वही धमकी दी, “अगर तुमने यह बात किसी को बताई तो मैं तुम्हें जान से मार दूंगा।”
कांता अब दोनों से छुटकारा चाहती थी, लेकिन वह पुलिस या पड़ोसियों का सहारा नहीं लेती थी। वह डर जाती थी कि ससुर-जेठ उसे घर से बाहर नहीं निकालेंगे। यही उसकी सबसे बड़ी गलती थी।
दिन गुजरते चले गए। 10 जनवरी 2026 को भंवर सिंह और नसीब दोनों खेत में काम कर रहे थे। भंवर सिंह ने कहा, “मेरी तबीयत खराब है, डॉक्टर के पास दवा लेने चलता हूं।” नसीब ने कहा, “ठीक है पिताजी, मैं सारा काम खत्म करके शाम को गांव आ जाऊंगा।” भंवर सिंह मेडिकल शॉप से कुछ शक्तिवर्धक टैबलेट खरीदकर लौटा। कांता दरवाजा खोलते ही भंवर सिंह ने कहा, “घर का दरवाजा बंद कर दो।” कांता डर गई और बंद कर दिया। भंवर सिंह ने कांता को कमरे में ले जाकर गलत काम शुरू कर दिया। कांता हाथ जोड़ती रही। भंवर सिंह का मन भरने के बाद भी धमकी दी, “बात किसी को बताई तो मार दूंगा।”
शाम को नसीब आया। उसने कहा, “आज खेत में ज्यादा काम किया, भूख लगी है।” कांता ने खाना तैयार किया। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। नसीब का दोस्त दीपक आया। दीपक ने देखा कि कांता घर में है। दीपक ने नसीब से कहा, “तुम्हारा भाई सुमित कभी नहीं लौटेगा। कांता देवी उसके बिना कैसे रहती है?” नसीब ने कहा, “मेरी दुकान के लिए सौ हजार रुपये चाहिए।” दीपक ने सौ हजार रुपये दिए और कहा, “इस कांता के साथ तुम्हारा वक्त गुजारा दो।” नसीब समझ गया कि दीपक कहता है “मेरी बहू” से मिलने दो। नसीब ने दीपक को घर पर आने का इजाजत दे दी।
कांता ने नसीब से कहा, “तुम्हारे पिता भंवर सिंह भी मेरे साथ गलत काम करते हैं।” नसीब ने कहा, “पिता शराबी हैं, लेकिन गलत काम नहीं कर सकते।” कांता ने कहा, “आज रात को अपनी आंखों से देख लो।” नसीब ने खाना खाया और दुकान चला गया।
रात करीब आठ बजे भंवर सिंह शराब के नशे में धुत घर आया। कांता दरवाजा खोलती ही भंवर सिंह ने कहा, “घर का दरवाजा बंद कर दो।” कांता बंद कर दी। भंवर सिंह ने कांता को कमरे में ले जाकर गलत काम शुरू किया। नसीब ठीक उसी समय घर के दरवाजे पर दस्तक देता। भंवर सिंह ने दरवाजा नहीं खोला। कांता ने कहा, “दरवाजा नहीं खोलना।” नसीब ने गुस्से में दरवाजा तोड़ दिया और कमरे का दरवाजा भी तोड़ दिया। वह देखता रह गया कि उसके पिता भंवर सिंह कांता के साथ गलत काम कर रहा है।
गुस्सा आकर नसीब ने घर से एक कुल्हाड़ी उठाई और पिता की गर्दन काट दी। कांता चुपके से बाहर निकल गई और जोर-जोर से चिल्लाने लगी। पड़ोसी इकट्ठा हो गए। पड़ोसी कांतलाल ने पुलिस को फोन किया। एक घंटे बाद पुलिस पहुंची। पुलिस ने देखा कि भंवर सिंह की लाश जमीन पर पड़ी है। नसीब को गिरफ्तार कर लिया गया। कांता ने पूरी बात पुलिस को बताई। पुलिस के होश उड़ गए। उन्होंने नसीब के खिलाफ चार्जशीट दायर कर दी।
दोस्तों, इस पूरे घटनाक्रम में कांता देवी का कोई कसूर नहीं था। बाप और बेटे ने मिलकर उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी। नसीब को सजा मिलेगी, लेकिन कांता का दिल टूट गया है। उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई है। दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि अकेलेपन में किसी भी तरह का गलत काम नहीं करना चाहिए। परिवार के सदस्य एक-दूसरे की रक्षा करें। किसी की जिंदगी को बर्बाद न करें।
कांता देवी आज भी रोती रहती है। वह सोचती है कि अगर उसने किसी को बताया होता तो शायद बच जाती। लेकिन डर के कारण चुप रही। नसीब और भंवर सिंह दोनों को सजा मिलनी चाहिए। जज साहब उन्हें उचित सजा सुनाएंगे। कांता देवी की कहानी हमें याद दिलाती है कि परिवार में भाई-भाई का रिश्ता, पिता-पुत्र का रिश्ता, और पति-पत्नी का प्यार कितना जरूरी है।
दोस्तों, अगर आपने भी कभी किसी की जिंदगी में अकेलापन महसूस किया हो तो इस कहानी से सीख लीजिए। कभी भी किसी को शोषित मत कीजिए। रिश्ते टूटने नहीं देंगे। कांता देवी की तरह रहकर मत जिए। अपने परिवार को संभालिए, प्यार कीजिए। जिंदगी एक बार की है, उसे बर्बाद मत कीजिए।
यह थी भंवर सिंह, नसीब सिंह और कांता देवी की कहानी। आखिरी घटना के बाद गांव में सन्नाटा छा गया। लोग कांता के चेहरे पर देखकर सोचते हैं कि अकेलापन कितना खतरनाक हो सकता है। कांता अब कभी हंसती नहीं। उसकी आंखों में हमेशा डर छाया रहता है। लेकिन वह जिंदगी जी रही है। उसके बच्चे भी बड़े हुए। वह सोचती है कि अगर सुमित लौट आता तो शायद सब कुछ ठीक हो जाता। लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता।
दोस्तों, इस घटना की वजह से बीकानेर पुलिस ने खास तैनात किया गया। नसीब सिंह को कोर्ट में पेश किया गया। चार्जशीट में कांता का नाम भी शामिल है। जज साहब ने पूरे केस को ध्यान से सुना। उन्होंने फैसला सुनाया कि नसीब सिंह को उम्रकैद की सजा मिलेगी। भंवर सिंह की मौत की जांच भी पूरी हुई। कांता देवी को न्याय मिला। उसने कहा, “मैंने सिर्फ बचा लिया।”
कांता आज भी उसी घर में रहती है। उसके बच्चे स्कूल जाते हैं। पड़ोसी अब उसका सम्मान करते हैं। लेकिन दिल की चोट कभी पूरी नहीं होती। यह कहानी हमें सबक सिखाती है कि शोषण कभी नहीं करना चाहिए। परिवार में किसी की इज्जत का ख्याल रखिए। अकेलापन में किसी से बात कीजिए। किसी को अकेला मत छोड़िए।
दोस्तों, अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी हो तो कमेंट में जरूर बताइए कि आपने क्या सीखा। जय हिंद, वंदे मातरम।