सौतेली माँ ने बेटी की शादी भिखारी से कर दी… लेकिन सच्चाई सामने आते ही उड़ गए सबके होश! 😱
सौतेली माँ ने बेटी की शादी भिखारी से कर दी… लेकिन सच्चाई सामने आते ही उड़ गए सबके होश! 😱
कमला की तीखी और कर्कश आवाज ने उस सुबह घर की खामोशी को चीर कर रख दिया था। घर के दालान में खड़ी काव्या अपनी आँखों से बहते आंसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी। उसकी सौतेली माँ कमला का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था, और उसकी आँखों में काव्या के लिए सिर्फ नफरत थी। “तू मेरे लिए सिर्फ एक बोझ है! मेरे पास तुझ पर लुटाने को पैसे नहीं हैं। मेरी अपनी सगी बेटी रिया भी है, मुझे उसकी भी शादी करनी है। इसलिए आज ही तू एक भिखारी से शादी कर और मेरे घर से निकल जा!”
काव्या के होंठ कांप रहे थे। उसने अपने हाथ जोड़ लिए और गिड़गिड़ाते हुए कहा, “माँ, मैंने आपका क्या बिगाड़ा है? पिताजी घर पर नहीं हैं, उनके बिना मेरी शादी ऐसे कैसे कर सकती हैं आप? मैं जिंदगी भर आपकी सेवा करूंगी, मुझे घर से मत निकालिए।” लेकिन कमला का दिल पत्थर का था। उसने काव्या को धक्का देते हुए कहा, “अपने पिताजी का नाम मत ले। वो परदेस में बैठे हैं और यहाँ तेरा बोझ मैं उठा रही हूँ। आज मैंने तेरी शादी उस पागल भिखारी से तय कर दी है जो गांव में फटे कपड़ों में घूमता रहता है। पुराने बक्से में एक जोड़ा कपड़ा रखा है, वो निकाल ला। आज ही तेरी विदाई होगी।”

कुछ ही घंटों बाद, काव्या को एक पुरानी सी साड़ी पहनाकर घर के बाहर खड़ा कर दिया गया। गांव वाले तमाशा देख रहे थे। सामने वह आदमी खड़ा था जिसे सब पागल भिखारी कहते थे। उसका नाम अर्जुन था। उसके कपड़े फटे हुए थे, बाल बिखरे थे और चेहरे पर धूल जमी थी। लेकिन अगर कोई ध्यान से देखता, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति और गहराई थी, जो किसी भिखारी की नहीं हो सकती थी। काव्या फूट-फूट कर रो रही थी, लेकिन कमला ने निर्दयता से उसका हाथ अर्जुन के हाथ में थमा दिया। “बस यही तेरी विदाई है। अब जा इसके साथ और इस घर में कभी वापस मत आना,” कमला ने दरवाजा जोर से बंद करते हुए कहा। गांव की औरतें फुसफुसा रही थीं, “कितना कठोर दिल है इस औरत का। अपनी सगी बेटी के लिए सौ से ज्यादा लड़के देख चुकी है, और सौतेली बेटी को सीधे भिखारी से ब्याह दिया ताकि पैसे बच जाएं।”
अर्जुन ने एक बार भी कुछ नहीं कहा। उसने काव्या की तरफ देखा और खामोशी से अपने कदमों को आगे बढ़ा दिया। काव्या अपने आंसू पोंछते हुए उस अजनबी, फटेहाल इंसान के पीछे-पीछे चल पड़ी। उसका दिल खौफ से भरा था। उसे लग रहा था कि उसकी जिंदगी अब एक ऐसे अंधेरे कुएं में गिर चुकी है, जहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। चलते-चलते वे दोनों गांव के बाहर एक छोटी सी झोपड़ी के पास पहुंचे।
“यह तुम्हारा घर है,” अर्जुन ने पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा। उसकी आवाज में कोई पागलपन नहीं था, बल्कि एक ठहराव था। काव्या झिझकते हुए अंदर गई। झोपड़ी छोटी थी, लेकिन वहाँ कोई गंदगी नहीं थी। एक कोने में साफ पानी का मटका रखा था और जमीन पर एक साफ चटाई बिछी थी। रात होने पर अर्जुन ने अपनी फटी हुई चादर काव्या को दे दी और खुद जमीन पर एक कोने में सो गया। काव्या सारी रात सो नहीं पाई। वह सोचती रही कि अगर यह इंसान सच में पागल है, तो यह इतने सलीके से कैसे पेश आ रहा है? और कल जब गांव के कुछ गुंडों ने काव्या को परेशान करने की कोशिश की थी, तो इसी अर्जुन ने अपनी जान पर खेलकर उसे बचाया था। काव्या के मन में एक अजीब सी उलझन थी।
उधर, शहर से रघुवीर, काव्या के पिता, वापस लौट आए। घर में कदम रखते ही उन्हें कुछ अजीब लगा। “काव्या कहाँ है? आज वो दिखाई नहीं दे रही,” रघुवीर ने पानी का गिलास हाथ में लेते हुए पूछा। कमला ने अपनी घबराहट छुपाते हुए तुरंत झूठ गढ़ लिया, “वो काव्या अपनी मौसी के घर गई है। मौसी घर पर अकेली थीं, इसलिए उन्होंने उसे कुछ दिनों के लिए बुला लिया।” रघुवीर ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और नहाने चले गए। लेकिन अगले दिन जब रघुवीर बाजार से सब्जियां लेकर लौट रहे थे, तो रास्ते में उन्हें गांव के सरपंच मिल गए।
“और भैया, क्या हालचाल हैं? आज अकेले? काव्या बिटिया दिखाई नहीं दे रही,” सरपंच ने पूछा। “जी, वो अपनी मौसी के यहां गई है,” रघुवीर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। सरपंच ने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा, “भैया, आप कैसे पिता हैं? अपनी फूल सी बच्ची का हाथ ऐसे आदमी के हाथ में दे दिया जिसे कोई अपने घर का कचरा भी ना दे। अरे, वो तो एक पागल भिखारी है!”
रघुवीर के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उनके हाथ से सब्जियों का थैला नीचे गिर गया। “आप… आप यह क्या कह रहे हैं? मेरी काव्या की शादी? वह तो अपनी मौसी के घर है।” सरपंच की पत्नी ने बीच में टोकते हुए कहा, “अरे बहन, इन्हें कैसे पता होगा? यह तो परदेसी बाबू हैं। घर में पीछे से इनकी पत्नी क्या गुल खिला रही है, इन्हें क्या खबर।”
रघुवीर गुस्से से आगबबूला होते हुए घर की तरफ दौड़े। उन्होंने घर का दरवाजा जोर से धक्का देकर खोला और चिल्लाए, “कमला! बाहर आओ!” कमला और उसकी बेटी रिया घबराते हुए बाहर आईं। “जी, क्या हुआ? आप इतने गुस्से में क्यों हैं?” कमला ने कांपती आवाज में पूछा। “सच-सच बता, काव्या कहाँ है?” रघुवीर की आवाज पूरे घर में गूंज गई। “बताया तो था जी, मौसी के घर गई है,” कमला ने अपनी चोरी छिपाने की आखिरी कोशिश की।
रघुवीर ने अपनी जेब से फोन निकाला और सीधा मौसी को फोन मिला दिया। मौसी ने फोन उठाते ही कहा, “हाँ बेटा, बोलो।” रघुवीर ने पूछा, “मौसी, काव्या आपके यहाँ है क्या?” मौसी को कमला ने पहले ही पट्टी पढ़ा रखी थी, इसलिए उन्होंने झूठ बोल दिया, “हाँ बेटा, यहीं है। अभी बगल में पूजा हो रही है, वहीं गई है। आएगी तो बात करा दूंगी।” रघुवीर ने फोन काट दिया, लेकिन उनका शक यकीन में बदल चुका था। मौसी की घबराई हुई आवाज ने उन्हें बता दिया था कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
उन्होंने तुरंत अपना बैग पैक किया और मौसी के घर के लिए निकल पड़े। जब कमला ने उन्हें जाते देखा तो उसकी जान सूख गई। उसने रिया से कहा, “अगर तेरे पिता मौसी के घर पहुंच गए तो हमारा सारा भंडा फूट जाएगा। उन्हें रोकना ही होगा।” रिया ने रोने का नाटक करते हुए रघुवीर को फोन किया, “पिताजी! जल्दी घर आइए, माँ की तबीयत बहुत खराब है, वो उठ भी नहीं पा रही हैं।” रघुवीर आधे रास्ते से लौट आए। घर आकर देखा तो कमला को आईसीयू में भर्ती होने का नाटक करना पड़ा। लेकिन रघुवीर कोई बेवकूफ नहीं थे। जैसे ही डॉक्टर ने कमला को छुट्टी दी, रघुवीर सीधा मौसी के घर पहुंच गए।
“मौसी, बाहर आइए!” रघुवीर ने दरवाजे पर खड़े होकर कहा। मौसी घबराते हुए बाहर आईं। “अरे बेटा, तुम अचानक?” “काव्या को बुलाइए। आज उससे मिले बिना मैं यहाँ से नहीं जाऊंगा,” रघुवीर की आंखों में एक पिता का दर्द और गुस्सा था। मौसी अब और झूठ नहीं बोल पाईं। उन्होंने रोते हुए कहा, “मुझे माफ़ कर दो बेटा। काव्या कभी मेरे घर आई ही नहीं थी। कमला ने मुझसे झूठ बुलवाया था। उसने तुम्हारी गैरमौजूदगी में काव्या की शादी एक भिखारी से कर दी है। वो गांव के बाहर झोपड़ी में रहता है।”
रघुवीर का दिल टूट गया। वह बिना एक पल गंवाए गांव के बाहर उस झोपड़ी की तरफ भाग निकले। जब वह वहां पहुंचे, तो काव्या बाहर चूल्हे पर कुछ पका रही थी। “काव्या!” रघुवीर की रुंधे गले से निकली आवाज सुनकर काव्या पलट गई। पिता को देखते ही वह दौड़कर उनके गले लग गई और फूट-फूट कर रोने लगी। “पिताजी! आप आ गए।” “मुझे माफ़ कर दे बिटिया। मुझे कुछ पता नहीं था। तेरी माँ ने मुझसे सब छिपाया। चल, अब तू मेरे साथ अपने घर वापस चलेगी,” रघुवीर ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा।
तभी वहां अर्जुन आ गया। रघुवीर ने उसे देखा, लेकिन काव्या ने अपने पिता का हाथ पकड़ लिया। “मैं आपके साथ चलूंगी पिताजी, लेकिन अर्जुन को छोड़कर नहीं। जब मैं मुसीबत में थी, तो इन्होने मेरी जान बचाई थी। इन्होंने मेरे साथ कभी कुछ गलत नहीं किया। अगर आप मुझे ले जाना चाहते हैं, तो इन्हें भी हमारे साथ चलना होगा।” रघुवीर ने काव्या की आँखों में देखा। वहां कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक सम्मान था। “अगर तू इसके साथ खुश है बिटिया, तो मैं तेरे फैसले के खिलाफ नहीं जाऊंगा। यह तेरा पति है, तो अब से यह भी मेरे परिवार का हिस्सा है।”
रघुवीर काव्या और अर्जुन को लेकर घर पहुंचे। उन्हें देखते ही कमला के होश उड़ गए। “मेरी गैरमौजूदगी में काव्या की शादी करने का हक तुम्हें किसने दिया कमला?” रघुवीर ने दहाड़ते हुए कहा। “जी, मैंने जो किया काव्या की भलाई के लिए किया,” कमला ने सफाई देनी चाही। तभी रिया, जो अब तक खामोश थी, आगे आई और रोते हुए बोली, “नहीं पिताजी, माँ झूठ बोल रही हैं। माँ ने काव्या दीदी की शादी जबरदस्ती इस भिखारी से करवाई थी ताकि उन्हें दीदी पर पैसे खर्च ना करने पड़ें। मुझे सब पता था, लेकिन मैं चुप रही। मुझे माफ़ कर दीजिए दीदी।”
कमला का चेहरा पीला पड़ गया। रघुवीर ने कड़क आवाज में कहा, “आज तूने सिर्फ मुझसे नहीं, काव्या के साथ भी बहुत बड़ा धोखा किया है। अभी इसी वक्त मेरी बेटी से माफ़ी मांग!” कमला को घुटनों के बल बैठकर काव्या से माफ़ी मांगनी पड़ी। लेकिन कमला का अहंकार अभी भी जिंदा था। उसने अर्जुन की तरफ नफरत से देखते हुए कहा, “लेकिन जी, इस पागल भिखारी को आप हमारे घर क्यों ले आए? मैं इसे इस घर में नहीं रख सकती।”
काव्या तुरंत आगे आई, “माँ, यह मेरे पति हैं। इनके बारे में ऐसे मत बोलिए। जहां यह रहेंगे, मैं भी वहीं रहूंगी।” रघुवीर ने भी काव्या का साथ दिया, “काव्या कहीं नहीं जाएगी, और अर्जुन भी यहीं रहेगा। यह घर जितना तुम्हारा है, उतना ही मेरी बेटी का भी है।”
समय बीतता गया। अर्जुन घर में खामोशी से सारे काम करता। वह बाजार से राशन लाता, घर की सफाई करता और बिना किसी शिकायत के कमला के ताने सुनता। “घर जमाई हो तो कम से कम कुछ कमाते तो होगे? दामाद होते तो दामाद जैसी इज्जत भी मिलती। हमारे यहां घर जमाई को नौकर ही समझा जाता है,” कमला अक्सर उसे ताने मारती। अर्जुन बस हल्का सा मुस्कुरा देता और चुपचाप अपने काम में लग जाता।
काव्या यह सब देखकर बहुत दुखी होती। उसने फैसला किया कि वह नौकरी करेगी ताकि उसके पति को किसी के ताने न सुनने पड़ें। वह एक बड़ी कंपनी, ‘राठौर ग्रुप इंडस्ट्रीज’ में इंटरव्यू देने गई। वहाँ के एचआर मैनेजर अमित ने उसका इंटरव्यू लिया और तुरंत उसे नौकरी दे दी। “काव्या जी, आप कल से ऑफिस जॉइन कर सकती हैं। हमारी एचआर डिपार्टमेंट में एक अच्छी पोस्ट खाली है, मैं चाहता हूँ आप वह जिम्मेदारी संभालें,” अमित ने मुस्कुराते हुए कहा। काव्या खुशी-खुशी घर लौटी और उसने अर्जुन को मिठाई खिलाई। “पता है अर्जुन, जब से आप मेरी जिंदगी में आए हैं, सब कुछ अच्छा होने लगा है। अब मैं नौकरी करूंगी और आपको किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाऊंगी।” अर्जुन ने उसकी मासूमियत देखकर सिर्फ प्यार से उसके सिर पर हाथ रख दिया। उसे नहीं पता था कि अमित को काव्या को नौकरी देने का आदेश खुद राठौर ग्रुप इंडस्ट्रीज के मालिक ने दिया था, और वो मालिक कोई और नहीं, बल्कि खुद अर्जुन था।
एक दिन, रघुवीर का बिजनेस पार्टनर विक्रम घर आया। रघुवीर की टेक्सटाइल कंपनी बहुत घाटे में चल रही थी। विक्रम ने एक फाइल रघुवीर के सामने रखते हुए कहा, “सर, हमारे तीन बड़े ग्राहक चले गए हैं। बैंक ने भी लोन रोक दिया है। कंपनी बचाने का एक ही रास्ता है, हम फैक्ट्री को आधी कीमत में बेच दें। खरीदार तैयार है, आज ही डील हो जाएगी।”
रघुवीर बहुत परेशान थे। तभी वहां अर्जुन चाय लेकर आया। उसने फाइल पर एक नजर डाली और शांत आवाज में कहा, “यह फैक्ट्री आधी कीमत में बेचना बहुत बड़ी गलती होगी।” कमला तुरंत भड़क उठी, “तुम होते कौन हो हमारे बिजनेस के बीच में बोलने वाले? जिसे खुद दो वक्त की रोटी कमानी नहीं आती, वो हमें सलाह देगा?” विक्रम ने भी हिकारत से कहा, “अर्जुन, अपनी औकात से ज्यादा चीजों में मत पड़ना। यह करोड़ों का मामला है।” अर्जुन ने विक्रम की आँखों में सीधा देखते हुए कहा, “तो विक्रम जी, जरा बताइए, यह जो इन्वेस्टमेंट कंपनी फैक्ट्री खरीद रही है, इसका असली मालिक कौन है?” विक्रम हड़बड़ा गया। “आपको उससे क्या मतलब?” “मतलब है,” अर्जुन की आवाज में अब वह भिखारी वाली नर्मी नहीं, बल्कि एक बिजनेसमैन वाली कड़क थी।
तभी वहां काव्या आ गई। “माँ, अर्जुन गलत नहीं कह रहे हैं। अगर वे कुछ कह रहे हैं, तो हमें उनकी बात सुननी चाहिए,” काव्या ने अपने पति का पक्ष लिया। लेकिन कमला गुस्से से पागल हो गई। “बहुत हो गया! अभी इसी वक्त मेरे घर से निकल जाओ तुम दोनों!” उसने चिल्लाते हुए कहा। “अगर अर्जुन जाएंगे, तो मैं भी उनके साथ जाऊंगी,” काव्या ने दृढ़ता से कहा। दोनों ने अपना थोड़ा बहुत सामान बांधा और घर से बाहर निकल गए।
अगले दिन राठौर ग्रुप इंडस्ट्रीज में एक खास हलचल थी। अमित सारे स्टाफ को निर्देश दे रहा था। “बोर्ड मीटिंग की सारी तैयारी पूरी रखना। आज कंपनी के मालिक खुद ऑफिस आने वाले हैं।” काव्या, जो अब तक कंपनी में काम कर रही थी, उसने हैरानी से पूछा, “सर, मालिक हमेशा इतने अचानक आते हैं क्या?” अमित ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं काव्या जी, आज उनका आना खास है। लीजिए, उनकी गाड़ी आ गई।”
कंपनी के दरवाजे पर चार चमचमाती लग्जरी गाड़ियां आकर रुकीं। सूट-बूट में बॉडीगार्ड्स बाहर निकले। और बीच वाली गाड़ी से जो इंसान बाहर निकला, उसे देखकर काव्या के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह कोई और नहीं, अर्जुन था। उसने एक शानदार थ्री-पीस सूट पहना हुआ था, उसके बाल करीने से संवरे हुए थे, और उसकी चाल में एक गजब का आत्मविश्वास था।
वह सीधे काव्या के पास आया। “गुड मॉर्निंग, काव्या जी।” काव्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। “अर्जुन? आप… ये सब क्या है? आप यहाँ के मालिक हैं?” “हाँ काव्या, मैं अर्जुन राठौर हूँ, और यह कंपनी मेरी है,” अर्जुन ने एक सौम्य मुस्कान के साथ कहा। “तो आपने मुझसे यह सब छिपाया क्यों? आपने खुद को पागल और गरीब क्यों दिखाया?” काव्या की आवाज कांप रही थी।
अर्जुन ने गहरी सांस ली और कहा, “क्योंकि मेरी जिंदगी में लोग सिर्फ मेरे पैसे और रुतबे के लिए जुड़ते थे। मैं एक ऐसे इंसान की तलाश में था जो मेरी दौलत को नहीं, मुझे अपनाए। जो मेरे बुरे वक्त में मेरे साथ खड़ा हो। और उस फटेहाल हालत में भी, जब मैं एक भिखारी के भेष में था, तुमने मेरा साथ नहीं छोड़ा। तुमने मेरी इज्जत की।” काव्या की आंखों में आंसू आ गए। “मतलब मेरी नौकरी भी…?” “हाँ काव्या, मैंने ही अमित को फोन किया था। लेकिन मौका मैंने दिया था, तुम्हारी काबिलियत तुम्हारी अपनी है,” अर्जुन ने समझाया। “और रही बात हमारी शादी की, वह कोई योजना नहीं थी। कमला जी ने जो फैसला लिया, उसमें मेरा कोई हाथ नहीं था। लेकिन जब मैंने तुम्हारी आँखों में वो डर देखा था, तो मैं तुम्हें उस क्रूरता के सहारे अकेला नहीं छोड़ सकता था।”
इधर, रघुवीर की कंपनी ‘शर्मा टेक्सटाइल्स’ में विक्रम पूरी तरह से कंपनी को हड़पने की साजिश रच चुका था। रघुवीर निराश होकर डील के कागजात पर साइन करने ही वाले थे कि अचानक वहां राठौर ग्रुप के वकील और खुद अर्जुन राठौर पहुंच गए। “यह डील नहीं होगी,” अर्जुन की आवाज पूरे बोर्ड रूम में गूंज गई। रघुवीर और विक्रम दोनों हैरान रह गए। अर्जुन के पीछे-पीछे काव्या भी वहां आई। रघुवीर अर्जुन के इस नए रूप को देखकर सदमे में थे।
अर्जुन ने एक फाइल टेबल पर फेंकते हुए कहा, “इतना पैसा कहाँ गया विक्रम? जरा रघुवीर जी को समझाइए। यह जो कंपनी फैक्ट्री खरीद रही है, इसका असली मालिक कोई और नहीं, बल्कि विक्रम खुद है। इसने कंपनी का पैसा गबन किया और अब औने-पौने दाम में फैक्ट्री हड़पना चाहता है।” विक्रम के पसीने छूटने लगे। “सर… यह सिर्फ गलतफहमी है।” “अब खेल खत्म हो चुका है विक्रम,” अर्जुन ने कड़क आवाज में कहा। फिर उसने रघुवीर की तरफ मुड़कर कहा, “पापा जी, शर्मा टेक्सटाइल्स बंद नहीं होगी। मल्होत्रा ग्लोबल ग्रुप की तरफ से इसमें पांच करोड़ का इन्वेस्टमेंट अप्रूव हो गया है।”
रघुवीर की आँखों से आंसू छलक पड़े। उन्हें अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “अर्जुन बेटा, मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हें बहुत गलत समझा। तुम हमारे दामाद नहीं, इस घर के बेटे हो। तुमने हमारा सब कुछ बचा लिया।” कमला, जो यह सब तमाशा देख रही थी, शर्म से पानी-पानी हो गई। वह अर्जुन के पैरों में गिरने लगी, “मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैंने तुझे हमेशा भिखारी समझा। मुझे नहीं पता था कि तू…” अर्जुन ने कमला को बीच में ही रोक दिया। “माफ़ी मुझसे नहीं, काव्या से मांगिए माँ जी। आपने सबसे ज्यादा दर्द इसे दिया है। रिश्ते हैसियत से नहीं, सम्मान से चलते हैं। काव्या ने तब मेरा साथ दिया जब उसके पास खुद कुछ नहीं था।”
कमला ने रोते हुए काव्या को गले लगा लिया। “मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची। आज मुझे अपनी सोच पर बहुत शर्म आ रही है।” काव्या ने अपनी माँ के आंसू पोंछते हुए कहा, “अब सब ठीक है माँ।”
अर्जुन काव्या को लेकर अपने असली घर, राठौर मेंशन पहुंचा। वह घर किसी महल से कम नहीं था। घर के दरवाजे पर अर्जुन की माँ आरती जी आरती की थाल लेकर खड़ी थीं। अर्जुन ने उन्हें पहले ही सब कुछ बता दिया था। आरती जी ने काव्या का माथा चूमा और कहा, “मुझे तुम पर गर्व है बेटी। तुमने मेरे बेटे को उसकी असल पहचान के बिना प्यार किया। आज से यह घर तुम्हारा है।”
रामू काका ने गृह प्रवेश की थाली फर्श पर रखी। काव्या ने कलश को पैर से गिराया और कुमकुम के पानी में पैर रखकर घर के अंदर प्रवेश किया। पूरे घर में मंगल गीत गूंज रहे थे। हर तरफ खुशियां ही खुशियां थीं। अर्जुन ने काव्या का हाथ थाम रखा था, और काव्या की आँखों में एक सुरक्षित भविष्य की चमक थी।
लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। विक्रम की हार ने उसे पागल कर दिया था। उसका पूरा करियर और पैसा डूब चुका था। बदले की आग में जलते हुए, उसने कुछ गुंडों को साथ लिया और शर्मा टेक्सटाइल्स पर धावा बोल दिया। वहां रघुवीर, कमला और रिया मौजूद थे। विक्रम ने बंदूक निकालकर रघुवीर की तरफ तान दी।
“बहुत चैन से रह लिया तुम लोगों ने! मुझे निकाल दिया था ना अपनी कंपनी से? अब देखते हैं तुम्हें कौन बचाता है!” विक्रम चीखा। रिया ने घबराते हुए फोन निकाला, “रुको, मैं पुलिस को कॉल करती हूँ। आज तुम जेल जाकर ही रहोगे।” विक्रम जोर से हंसा, “कर लो कॉल! मैंने पुलिस वालों को पहले ही खरीद रखा है। कोई नहीं आएगा तुम्हें बचाने।”
रिया ने बार-बार फोन मिलाया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। कमला बुरी तरह रोने लगी। उसने छुपकर काव्या को फोन लगा दिया। “काव्या बेटी! विक्रम ने हमें गुंडों के साथ चारों तरफ से घेर लिया है। पुलिस भी नहीं आ रही। वो तुम्हारे पिता को मार देगा, जल्दी कुछ करो!”
काव्या के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। उसने घबराकर अर्जुन को सारी बात बताई। “अर्जुन, विक्रम ने मम्मी-पापा और रिया को घेर लिया है। पुलिस भी जवाब नहीं दे रही है!” अर्जुन का चेहरा सख्त हो गया। उसकी आँखों में वो ज्वाला भड़क उठी जो उसके अपनों पर आंच आने पर उठती थी। “रुको काव्या, मेरी जान-पहचान के एक सीनियर आईपीएस ऑफिसर हैं, राजवीर। उन्हें ये लोकल पुलिस वाले नहीं रोक सकते। मैं अभी उन्हें कॉल करता हूँ, और हम भी अभी वहीं चलते हैं।”
अर्जुन ने तुरंत राजवीर को फोन मिलाया। “हेलो राजवीर, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। शर्मा टेक्सटाइल्स पर विक्रम नाम के एक आदमी ने गुंडों के साथ मेरे परिवार को बंधक बना लिया है। वहां की लोकल पुलिस बिकी हुई है।” फोन के दूसरी तरफ से राजवीर की कड़क आवाज आई, “आप चिंता मत कीजिए अर्जुन। मैं स्पेशल फोर्स के साथ अभी वहां पहुंचता हूँ। कोई परिंदा भी वहां से बचकर नहीं निकलेगा।”
अर्जुन और काव्या अपनी गाड़ी से तेज रफ्तार में शर्मा टेक्सटाइल्स की तरफ निकले। जब वे वहां पहुंचे, तो विक्रम रघुवीर पर हाथ उठाने ही वाला था। “रुक जाओ विक्रम!” अर्जुन की दहाड़ सुनकर विक्रम चौंक कर पीछे मुड़ा। “अरे वाह! बड़ा हीरो बनने आया है। आज मैं तुम सबको एक साथ खत्म कर दूंगा,” विक्रम ने बंदूक अर्जुन की तरफ तान दी।
लेकिन इससे पहले कि विक्रम ट्रिगर दबा पाता, चारों तरफ से पुलिस की सायरन की आवाज गूंजने लगी। आईपीएस राजवीर अपनी पूरी फोर्स के साथ वहां पहुंच चुके थे। पुलिस ने एक झटके में विक्रम के सारे गुंडों को धर दबोचा। राजवीर ने खुद आगे बढ़कर विक्रम के हाथ से बंदूक छीन ली और उसे हथकड़ी पहना दी।
“विक्रम, अब तुम्हारा खेल हमेशा के लिए खत्म हो चुका है,” अर्जुन ने उसके पास जाकर शांत लेकिन खौफनाक आवाज में कहा। राजवीर ने अर्जुन की तरफ देखकर कहा, “आप लोग चिंता मत कीजिए। अब आप सब सुरक्षित घर जाइए। बाकी इसका हिसाब अब कानून करेगा। कांस्टेबल, ले जाओ इसे!”
पुलिस विक्रम और उसके गुंडों को लेकर चली गई। रघुवीर और कमला ने अर्जुन को गले लगा लिया। आज सच में उनके दामाद ने पूरे परिवार को मौत के मुंह से निकाल लिया था। रिया ने भी काव्या और अर्जुन से माफ़ी मांगी और उन्हें धन्यवाद दिया।
रात के अंधेरे में जब अर्जुन और काव्या अपनी कार में वापस राठौर मेंशन की तरफ लौट रहे थे, तो काव्या ने अपना सिर अर्जुन के कंधे पर रख दिया। “आज अगर आप नहीं होते अर्जुन, तो पता नहीं क्या होता,” काव्या ने धीमी आवाज में कहा। अर्जुन ने काव्या का हाथ अपने हाथों में ले लिया। “और अगर उस दिन तुम उस झोपड़ी में मेरे साथ खड़ी नहीं होती, तो शायद मैं कभी जान ही नहीं पाता कि दुनिया में सच्चा प्यार भी होता है। तुमने मुझे मेरी दौलत से नहीं, मेरी रूह से पहचाना है काव्या।”
कार शहर की चमकदार रोशनी से होते हुए उनके खूबसूरत घर की तरफ बढ़ रही थी। काव्या को अब किसी बात का डर नहीं था। उसे पता था कि चाहे वक्त कैसा भी हो, चाहे वो गांव की फूस की झोपड़ी हो या शहर का आलीशान महल, जब तक अर्जुन उसके साथ है, उसकी दुनिया हमेशा सुरक्षित और खुशियों से भरी रहेगी। उनके जीवन का वह अध्याय जो आंसुओं और तिरस्कार से शुरू हुआ था, आज प्यार, सम्मान और एक अटूट विश्वास पर आकर मुकम्मल हो गया था। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामे हुए अपनी इस नई, खूबसूरत जिंदगी की तरफ एक गहरा और सुकून भरा कदम बढ़ा दिया।