पत्नी की गलती की वजह से पति ने कर दिया बड़ा कां**/ड/ वजह जानकर पुलिस के होश उड़ गए/
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आनंदपुर का अनमोल खजाना
उत्तर प्रदेश के एक हरे-भरे और शांत इलाके में आनंदपुर नाम का एक सुंदर गांव बसा हुआ था। इस गांव की आबोहवा में मिट्टी की सोंधी महक और लोगों के दिलों में एक-दूसरे के लिए प्रेम बसता था। आनंदपुर के लोग मुख्य रूप से खेती-बाड़ी किया करते थे, लेकिन गांव में कुछ कारीगर भी थे जो अपनी कला और मेहनत के लिए पूरे जिले में मशहूर थे। उन्हीं में से एक था सुमेर सिंह। सुमेर सिंह गांव का सबसे होनहार और मेहनती लोहार था। उसकी लोहे के दरवाजे, औजार और बर्तन बनाने की एक छोटी सी लेकिन मशहूर दुकान थी। सुमेर के हाथों में मानो कोई जादू था; वह कठोर लोहे को भी आग में तपाकर मनचाहा और सुंदर आकार दे देता था। उसकी दुकान की भट्टी की आग कभी ठंडी नहीं होती थी, और उसके हथौड़े की थाप गांव वालों के लिए सुबह की पहली घड़ी जैसी होती थी। सुमेर स्वभाव से बहुत ही शांत, ईमानदार और मिलनसार व्यक्ति था। उसके चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान तैरती रहती थी, जिसके कारण गांव का हर व्यक्ति उसका सम्मान करता था।
सुमेर सिंह का परिवार बहुत छोटा और सुखी था। उसकी पत्नी का नाम राधिका था, जो न केवल अत्यंत सुंदर थी, बल्कि बहुत ही समझदार और गुणी महिला भी थी। राधिका घर के सभी कामकाज बहुत ही सलीके से संभालती थी और सुमेर के काम में भी उसका हौसला बढ़ाती थी। जब सुमेर दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद पसीने से लथपथ होकर घर लौटता, तो राधिका के हाथ का बना गरमा-गरम खाना और मीठे बोल उसकी सारी थकान मिटा देते थे। सुमेर अक्सर सोचता था कि वह दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान है जिसे राधिका जैसी जीवनसाथी मिली है। दोनों का जीवन बड़ी ही सादगी और शांति से कट रहा था। सुमेर का एक ही सपना था कि वह अपनी कला को और निखारे और अपने परिवार को हर संभव खुशी दे सके। गांव वाले अक्सर सुमेर और राधिका की मिसाल दिया करते थे कि एक आदर्श जोड़ा कैसा होना चाहिए।

एक दिन, जब सुमेर अपनी दुकान पर एक बड़ा सा लोहे का गेट तैयार कर रहा था, तभी एक बूढ़ा अजनबी गांव में आया। उस अजनबी के कपड़े फटे-पुराने थे और उसके चेहरे पर लंबी यात्रा की थकान साफ देखी जा सकती थी। वह बूढ़ा आदमी सुमेर की दुकान के बाहर आकर रुक गया और प्यास से हांफने लगा। सुमेर ने तुरंत अपना काम छोड़ा, उसे बैठने के लिए चारपाई दी और पीने के लिए ठंडा पानी पिलाया। पानी पीने के बाद बूढ़े की जान में जान आई। उसने सुमेर को आशीर्वाद देते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारी दयालुता ने आज एक राहगीर की जान बचाई है। मेरे पास तुम्हें देने के लिए धन-दौलत तो नहीं है, लेकिन मेरे पास एक बहुत पुरानी लोहे की संदूकची है, जिसे मेरे पूर्वजों ने मुझे दिया था। मैं अब बूढ़ा हो चुका हूं और इसे और नहीं संभाल सकता। तुम एक सच्चे और ईमानदार कारीगर लगते हो, इसलिए मैं इसे तुम्हें सौंपना चाहता हूं।” सुमेर ने पहले तो मना किया, लेकिन बूढ़े के बहुत जोर देने पर उसने वह छोटी सी जंग लगी संदूकची रख ली। कुछ देर विश्राम करने के बाद वह अजनबी वहां से चला गया और फिर कभी गांव में नहीं दिखा।
शाम को जब सुमेर वह संदूकची लेकर घर पहुंचा, तो उसने राधिका को सारी बात बताई। दोनों ने मिलकर उस संदूकची को साफ किया। वह बहुत ही मजबूती से बंद थी और उस पर कोई ताला नहीं था, बल्कि एक अजीब सी पहेली नुमा लोहे की कुंडी लगी थी। सुमेर की कारीगरी यहां काम आई। उसने बड़ी ही सावधानी से अपने औजारों का इस्तेमाल करते हुए उसे खोला। संदूकची के अंदर कोई सोना-चांदी नहीं था, बल्कि एक पुराने, पीले पड़ चुके भोजपत्र पर बना हुआ एक नक्शा था। नक्शे पर कुछ प्राचीन संकेत और कविता की पंक्तियां लिखी हुई थीं। सुमेर और राधिका ने जब उसे ध्यान से देखा, तो उन्हें समझ में आया कि यह नक्शा आनंदपुर गांव और उसके आस-पास की पहाड़ियों का ही है। कविता में किसी ‘जीवन के सच्चे खजाने’ का जिक्र था जो एक भूली-बिसरी गुफा में छिपा हुआ था। सुमेर को यह सब किसी कहानी जैसा लगा, लेकिन राधिका की आंखों में एक चमक थी। उसने सुमेर से कहा कि हमें इस खजाने की खोज करनी चाहिए, शायद इसमें गांव वालों की भलाई के लिए कुछ छुपा हो।
कुछ महीनों बाद, आनंदपुर गांव पर एक भयानक संकट आ पड़ा। उस साल बारिश बिल्कुल नहीं हुई। आसमान से आग बरस रही थी और गांव का बड़ा तालाब भी धीरे-धीरे सूखने लगा था। खेतों में खड़ी फसलें मुरझाने लगीं और मवेशियों के लिए चारे-पानी का इंतजाम करना मुश्किल हो गया। गांव के जमींदार और सरपंच सभी परेशान थे, लेकिन किसी को इस समस्या का हल नजर नहीं आ रहा था। जल स्तर इतना नीचे गिर गया था कि गांव के कुएं भी जवाब देने लगे थे। चारों ओर हाहाकार मचने लगा था। कई परिवार तो गांव छोड़कर शहरों की तरफ पलायन करने की सोचने लगे थे। यह सब देखकर सुमेर और राधिका का दिल बहुत दुखी हुआ। उन्हें अपने गांव और यहां के लोगों से बहुत लगाव था। एक रात, जब दोनों उदास बैठे थे, तो राधिका को अचानक उस पुराने नक्शे की याद आई। उसने नक्शा निकाला और सुमेर से कहा, “क्या पता यह नक्शा हमें किसी जल स्रोत तक ले जाए? पूर्वजों ने इसे संजोकर रखा था, तो जरूर इसमें कोई गहरा रहस्य होगा।” सुमेर को भी यह बात जंच गई। दोनों ने तय किया कि वे गांव वालों को बचाने के लिए इस खजाने की खोज में निकलेंगे।
अगली सुबह, सुमेर और राधिका ने गांव के सरपंच को अपनी योजना बताई। पहले तो लोगों को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन सुमेर की ईमानदारी और समर्पण को देखते हुए कुछ मजबूत युवा उनके साथ चलने को तैयार हो गए। सुमेर ने अपने कुछ बेहतरीन औजार साथ लिए और नक्शे के सहारे पहाड़ियों की ओर चल पड़ा। सूरज आग उगल रहा था और रास्ता बहुत ही पथरीला और दुर्गम था। कंटीली झाड़ियों और ढलान वाले रास्तों ने उनकी परीक्षा ली, लेकिन सुमेर का हौसला और राधिका का साथ उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहा था। वे नक्शे पर बने निशानों का मिलान करते हुए आगे बढ़ते रहे। दो दिन की कठिन यात्रा के बाद, वे एक ऐसी पहाड़ी के पास पहुंचे जिसका आकार नक्शे में बने एक बाज के सिर जैसा था। कविता की पंक्तियों में लिखा था, ‘जहां बाज की नजर गिरे, वहीं जीवन का स्रोत मिलेगा।’ सुमेर ने उस दिशा में देखा और उन्हें पत्थरों के बीच एक पुरानी, लगभग बंद हो चुकी गुफा का मुहाना दिखाई दिया।
गुफा का रास्ता बड़े-बड़े पत्थरों से ढका हुआ था। सुमेर और उसके साथियों ने मिलकर अपनी पूरी ताकत लगा दी। सुमेर के बनाए हुए लोहे के मजबूत औजारों ने उन भारी पत्थरों को हटाने में बहुत मदद की। कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद, गुफा का रास्ता खुल गया। जैसे ही वे गुफा के अंदर दाखिल हुए, बाहर की चिलचिलाती गर्मी के विपरीत अंदर एक ठंडी और सुकून देने वाली हवा महसूस हुई। वे मशालें जलाकर धीरे-धीरे आगे बढ़े। अंदर का नजारा अद्भुत था। गुफा की दीवारों पर प्राचीन चित्रकारी थी। चलते-चलते वे एक विशाल भूमिगत गुफा में पहुंचे, और वहां जो उन्होंने देखा, उसे देखकर सबकी आंखें फटी की फटी रह गईं। वहां कोई सोने-चांदी का खजाना नहीं था, बल्कि एक बहुत बड़ा, साफ और मीठे पानी का भूमिगत झरना था। यह पानी एक विशाल कुंड में इकट्ठा हो रहा था। यह वही प्राचीन जल स्रोत था जिसके बारे में पुराने नक्शे में बताया गया था, जो कभी सूखा नहीं था।
पानी देखते ही सब खुशी से झूम उठे। सुमेर ने पानी चखा; वह किसी अमृत से कम नहीं था। अब सबसे बड़ी चुनौती इस पानी को गांव तक पहुंचाना था। सुमेर ने अपने कारीगरी के दिमाग का इस्तेमाल किया। गुफा की ढलान गांव की तरफ थी। सुमेर और गांव वालों ने मिलकर बांस और मिट्टी की पक्की पाइपलाइन बनाने का काम शुरू कर दिया। दिन-रात एक करके, पूरे गांव ने एकजुट होकर इस महाअभियान में हिस्सा लिया। औरतें, बच्चे, बुजुर्ग—सभी ने अपनी क्षमता के अनुसार काम किया। राधिका ने सभी के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था संभाली। सुमेर दिन-रात लोहे के जोड़ों और पाइपलाइन के रास्ते को पक्का करने में लगा रहा। उसकी मेहनत और गांव वालों की एकता रंग लाई। करीब पंद्रह दिन की अथक मेहनत के बाद, पानी का वह रास्ता गांव के मुख्य सूखे तालाब तक जुड़ गया।
जिस दिन वह जलधारा गांव के तालाब में गिरी, वह दिन आनंदपुर के इतिहास का सबसे सुनहरा दिन बन गया। जब पहली बार गुफा का मीठा पानी पूरे वेग से गांव के तालाब में आकर गिरा, तो लोगों की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। बच्चे पानी में छपाछप करने लगे, मवेशियों को पीने का पानी मिला और सूखी धरती मानो फिर से सांस लेने लगी। सरपंच ने सुमेर और राधिका को गले लगा लिया और पूरे गांव ने उनकी जय-जयकार की। वह बूढ़ा अजनबी वास्तव में गांव के लिए एक देवदूत साबित हुआ था, और सुमेर की निस्वार्थ भावना ने गांव को एक नए जीवन का वरदान दिया था। उस दिन आनंदपुर के लोगों ने यह सबक सीखा कि असली खजाना सोने-चांदी में नहीं, बल्कि प्रकृति के संसाधनों, आपसी एकता और निस्वार्थ कर्म में छिपा होता है।
इस घटना के बाद, सुमेर का सम्मान गांव में और भी बढ़ गया। गांव वालों ने मिलकर सुमेर के लिए एक नई और बड़ी दुकान बनवा दी। राधिका ने गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक छोटा सा सिलाई और बुनाई केंद्र शुरू किया। सुमेर अब सिर्फ लोहे के दरवाजे नहीं बनाता था, बल्कि उसने खेती के लिए नए और आधुनिक औजार बनाना भी शुरू कर दिया जिससे किसानों की पैदावार बढ़ने लगी। आनंदपुर गांव अब पहले से कहीं ज्यादा हरा-भरा और खुशहाल हो गया था। सुमेर की वह पुरानी संदूकची आज भी उसके घर के सबसे ऊंचे स्थान पर रखी हुई है, जो सबको यह याद दिलाती है कि ईमानदारी से किया गया काम और दूसरों की भलाई के लिए उठाया गया कदम कभी व्यर्थ नहीं जाता। सुमेर और राधिका की यह कहानी आस-पास के कई गांवों में एक लोककथा की तरह सुनाई जाने लगी, जो सदियों तक लोगों को प्रेम, मेहनत और मानवता का पाठ पढ़ाती रही।