ससुर ने खूबसूरत बहू के साथ घिनौनी हरकत की / बहू की मौत /
ससुर ने खूबसूरत बहू के साथ घिनौनी हरकत की / बहू की मौत /
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पहला अध्याय: अड्डा गाँव और भूपेंद्र सिंह का अतीत
राजस्थान के भरतपुर जिले का अड्डा गाँव अपनी हरियाली और शांत माहौल के लिए जाना जाता था। गाँव की सीमा पर एक छोटा सा पक्का मकान था, जो भूपेंद्र सिंह का था। भूपेंद्र एक समय में बेहद साधारण और मेहनती किसान हुआ करता था। उसके पास अपनी दो एकड़ उपजाऊ ज़मीन थी, जिसमें वह दिन-रात पसीना बहाकर खेती करता था। मेहनत के बल पर उसने अपने जीवन में अच्छा-खासा पैसा कमाया था, और गाँव के लोग उसकी सादगी और व्यवहार की सराहना करते थे।
लेकिन वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। भूपेंद्र सिंह के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उसकी पत्नी का असामयिक निधन हो गया। पत्नी के जाने के बाद भूपेंद्र भीतर से बिल्कुल अकेला पड़ गया। घर का खालीपन उसे खाने को दौड़ता था। इस अकेलेपन और गम को भुलाने के लिए उसने धीरे-धीरे शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया। शुरुआत में जो शराब केवल गम गलत करने का जरिया थी, वह देखते ही देखते उसकी आदत बन गई।

समय के साथ भूपेंद्र की लत इतनी बढ़ गई कि वह दिन-रात नशे में डूबा रहने लगा। शराब की इस बुरी लत ने उसके विवेक को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। वह अपनी ज़मीन-जायदाद और घर की जिम्मेदारियों को भूलकर असामाजिक संगति में पड़ गया। उसकी जीवनशैली में संयम नाम की कोई चीज़ नहीं बची। उसने अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा अपनी बुरी आदतों पर पानी की तरह बहाना शुरू कर दिया।
देखते ही देखते भूपेंद्र की जमापूंजी खत्म होने लगी। जब उसके पास पैसे खत्म हो गए, तो उसकी नज़र अपनी उस दो एकड़ ज़मीन पर पड़ी, जो उसके परिवार के भरण-पोषण का एकमात्र सहारा थी। अब वह अपनी ज़मीन का एक हिस्सा बेचकर अपनी लत और इच्छाओं को पूरा करने के सपने देखने लगा।
दूसरा अध्याय: रमेश और रुचि का आगमन
भूपेंद्र सिंह के परिवार में उसका इकलौता बेटा था—रमेश कुमार। रमेश स्वभाव से सीधा-साधा था, लेकिन उसमें अपने फैसले खुद लेने की दृढ़ता की कमी थी। रमेश की शादी कुछ साल पहले रुचि देवी नाम की एक बेहद संस्कारी, मेहनती और सुंदर महिला से हुई थी।
रुचि इस परिवार में एक नई उम्मीद की किरण बनकर आई थी। वह न केवल देखने में अत्यंत सौम्य और शालीन थी, बल्कि उसमें पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों की गहरी समझ थी। वह सुबह-सवेरे उठकर घर के सारे काम निपटाती, अपने ससुर भूपेंद्र सिंह के खाने-पीने का ध्यान रखती और अपने पति का हर कदम पर साथ देती।
रमेश गाँव के बाज़ार में एक छोटी सी नाई की दुकान चलाता था। वह लोगों के बाल-दाढ़ी काटने का काम करता था। रमेश की मेहनत से दुकान ठीक-ठाक चलने लगी थी और उससे होने वाली आमदनी से घर का खर्च आराम से निकल जाता था। रुचि हमेशा रमेश को यही समझाती थी कि थोड़ी-थोड़ी बचत करके वे अपने भविष्य को बेहतर बना सकते हैं।
लेकिन भूपेंद्र की परछाईं आखिरकार रमेश पर भी पड़ ही गई। जैसे-जैसे समय बीतता गया, रमेश के आचरण में बदलाव आने लगा। अपने पिता की संगत और गाँव के कुछ गलत दोस्तों के साथ उठने-बैठने के कारण रमेश को भी शराब पीने की लत लग गई।
रमेश हर शाम अपनी दुकान बंद करने के बाद शराब के ठेके की तरफ निकल जाता। रात के नौ-साढ़े नौ बजे जब वह घर लौटता, तो वह पूरी तरह से नशे में होता था। नशे की हालत में वह अक्सर अपनी पत्नी रुचि के साथ छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करने लगता। रुचि चुपचाप उसके दुर्व्यवहार को सह लेती, इस उम्मीद में कि शायद एक दिन रमेश सुधर जाएगा और उनका परिवार फिर से खुशहाल हो जाएगा।
तीसरा अध्याय: ज़मीन का विवाद और भूपेंद्र की गलत नीयत
समय बीतता गया और भूपेंद्र सिंह पर कर्ज़ का बोझ बढ़ता गया। घर की माली हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करना भी मुश्किल हो रहा था।
5 जुलाई 2026 की सुबह लगभग 8:00 बजे का समय था। भूपेंद्र अपने आँगन में चारपाई पर बैठा हुआ था। उसने अपने बेटे रमेश को अपने पास बुलाया।
भूपेंद्र ने रमेश से कहा, “रमेश, देख रहे हो हमारे घर के क्या हालात हैं। गरीबी लगातार बढ़ती जा रही है और घर के नाम पर हमारे पास बस यह एक कमरा बचा है। मैं सोच रहा हूँ कि अपनी दो एकड़ ज़मीन में से एक एकड़ ज़मीन बेच दूँ। जो पैसे मिलेंगे, उससे हम एक शानदार नया मकान बनाएँगे और बाकी पैसों से अपनी ज़रूरतें पूरी करेंगे।”
रमेश अपने पिता की बात सुनकर हाँ में हाँ मिलाने ही वाला था कि पास में खड़ी रुचि आगे आई।
रुचि ने बेहद नम्रता लेकिन दृढ़ता से अपने ससुर से कहा, “पिताजी, ज़मीन हमारे पूर्वजों की अमानत है। इसे बेचना सही नहीं होगा। घर अगर बनाना ही है, तो हम रमेश की दुकान से होने वाली कमाई और अपनी मेहनत के दम पर धीरे-धीरे बना लेंगे। ज़मीन बिक गई तो हमारे पास भविष्य के लिए कुछ नहीं बचेगा।”
रुचि की यह बात न तो भूपेंद्र को पसंद आई और न ही रमेश को। रमेश, जो पहले से ही अपने पिता के बहकावे में था, अपनी पत्नी पर भड़क उठा।
“तुम हमें मत सिखाओ कि क्या करना है और क्या नहीं!” रमेश ने चिल्लाकर कहा। “ज़मीन हमारे पिता की है, वे जो चाहें करेंगे।”
रमेश और रुचि के बीच तीखी बहस होने लगी। रुचि बार-बार यही कहती रही कि मेहनत से कमाया धन ही फलता-फूलता है, ज़मीन बेचना विनाश की शुरुआत होगी। भूपेंद्र ने बीच-बचाव करके झगड़े को शांत तो कराया, लेकिन रमेश गुस्से में अपनी दुकान चला गया।
घर में अब केवल रुचि और उसका ससुर भूपेंद्र ही बचे थे। भूपेंद्र, जिसकी नीयत शराब और गलत संगति के कारण पहले ही खराब हो चुकी थी, उसने रुचि के अकेलेपन का फायदा उठाने की सोची। वह रुचि के पास गया और अनुचित बातें करते हुए कहने लगा कि अगर वह उसकी बातों को मान ले और उसकी शर्तों से समझौता कर ले, तो वह ज़मीन बेचने से मिलने वाले आधे पैसे उसके नाम कर देगा।
रुचि यह सुनकर सन्न रह गई। उसने अपने ससुर के इस आचरण पर कड़ा ऐतराज जताया और साफ शब्दों में कहा, “पिताजी, आप अपनी मर्यादा भूल रहे हैं। आप तुरंत यहाँ से हट जाइए, वरना परिणाम अच्छे नहीं होंगे।”
भूपेंद्र चुपचाप वहाँ से बाहर निकल गया, लेकिन उसके मन का पाप खत्म नहीं हुआ था।
चौथा अध्याय: पवन का आगमन और रात का घटनाक्रम
उसी दिन शाम के लगभग 6:00 बजे गाँव का एक नवयुवक पवन, जो रमेश का पुराना मित्र था, उनके घर आया। उसने बाहर से आवाज़ लगाई।
रुचि ने दरवाज़ा खोला। पवन ने रुचि से पूछा, “भाभी, रमेश कहाँ है? मैं उससे मिलने आया था।”
रुचि ने शालीनता से जवाब दिया, “वे अपनी दुकान पर हैं। आप वहीं जाकर उनसे मिल लीजिए।”
पवन वहाँ से सीधा रमेश की दुकान पर पहुँचा। दोनों दोस्त काफी समय बाद मिले थे। पवन ने रमेश से कहा, “रमेश, आज मेरा मन बहुत उदास है और शराब पीने की इच्छा हो रही है, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं।”
रमेश, जो खुद शराब का आदी हो चुका था, बोला, “पैसे की चिंता क्यों करते हो दोस्त? आज का इंतज़ाम मैं करता हूँ।”
दोनों दुकान बंद करके पास के शराब के ठेके पर गए। वहाँ से शराब और खाने-पीने का सामान खरीदा और गाँव से थोड़ी दूर बहती नदी के किनारे चले गए। नदी के किनारे बैठकर दोनों देर रात तक पीते रहे।
नशे में धुत होने के बाद रमेश रात के लगभग 9:30 बजे अपने घर पहुँचा। वह इतना नशे में था कि घर का मुख्य दरवाज़ा बंद करना भी भूल गया। वह सीधे अपने कमरे में गया।
रुचि ने जब अपने पति को इस हालत में देखा, तो उसका दिल बैठ गया। उसने रमेश से कहा, “आप फिर इतनी शराब पीकर आए हैं? मेरी तबीयत आज ठीक नहीं है, कृपया आप शांत होकर सो जाइए।”
लेकिन नशा रमेश के सिर चढ़कर बोल रहा था। उसने रुचि की एक न सुनी और उसके साथ दुर्व्यवहार करने लगा। उसने घर में रखी रस्सी उठाई और जबरदस्ती रुचि के हाथ-पाँव बाँध दिए ताकि वह विरोध न कर सके, और उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। इसके बाद रमेश ने अपनी ही पत्नी की असहमति और पीड़ा की परवाह किए बिना उसके साथ अत्यधिक कठोर और अमर्यादित व्यवहार किया। रुचि आँखों में आँसू लिए असहाय पड़ी रही।
इसी दौरान, भूपेंद्र सिंह भी बाहर से अत्यधिक शराब पीकर लौटा। उसने देखा कि घर का मुख्य दरवाज़ा खुला पड़ा है। जब वह अंदर आया, तो उसने अपने बेटे के कमरे का दरवाज़ा भी अधखुला पाया। अंदर का दृश्य देखकर भूपेंद्र के मन का बचा-खुचा नैतिक संयम भी समाप्त हो गया।
भूपेंद्र ने बाहर से ही आवाज़ लगाई, “रमेश, कम से कम कमरे का दरवाज़ा तो बंद कर लिया करो!”
रमेश ने नशे की धुन में उठकर कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया। कुछ देर बाद, जब रमेश का नशा थोड़ा शांत हुआ और वह अपने कृत्य के बाद कमरे से बाहर निकलकर रसोई में खाना खाने चला गया, तो भूपेंद्र की नीयत अपनी ही बहू के प्रति पूरी तरह से हिंसक और कलंकित हो चुकी थी।
पाँचवाँ अध्याय: पटवारी अमरपाल सिंह का षड्यंत्र
इस घटना के बाद घर में तनाव और सन्नाटा पसर गया। रुचि लोक-लाज और सामाजिक बदनामी के डर से घुट-घुट कर जीने लगी। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसके खिलाफ इससे भी बड़ा षड्यंत्र रचा जा रहा था।
लगभग दस दिन बीत गए। 15 जुलाई 2026 की सुबह के 8:00 बजे का समय था। भूपेंद्र अपने आँगन में बैठा था और रमेश पास ही नाश्ता कर रहा था। रुचि रसोई में काम में व्यस्त थी।
भूपेंद्र ने रमेश से कहा, “रमेश, अब ज़मीन बेचे बिना गुज़ारा नहीं है। अमरपाल सिंह पटवारी से जो हमने एक लाख रुपये का कर्ज़ लिया था, वह उसे वापस माँग रहा है। आज वह पैसे लेने यहाँ आने वाला है।”
रमेश ने कहा, “पिताजी, अगर ऐसी बात है तो आप वह एक एकड़ ज़मीन अमरपाल पटवारी को ही बेच दीजिए। कर्ज़ भी चुकता हो जाएगा और बाकी पैसे भी मिल जाएँगे।”
भूपेंद्र को यह सुझाव सही लगा। उसने तुरंत अपना फोन निकाला और अमरपाल सिंह पटवारी को फोन मिलाया। “पटवारी साहब, ज़रा तुरंत मेरे घर आइए, ज़मीन और कर्ज़ के सिलसिले में ज़रूरी बात करनी है।”
अमरपाल सिंह पटवारी गाँव का एक प्रभावशाली लेकिन बेहद चरित्रहीन और लालची व्यक्ति था। वह अपनी सत्ता और पैसों के दम पर लोगों का शोषण करने के लिए कुख्यात था। सूचना मिलते ही वह अपनी मोटरसाइकिल उठाकर भूपेंद्र के घर पहुँच गया।
जब अमरपाल घर में दाखिल हुआ, तो उसकी नज़र रसोई में काम कर रही रुचि पर पड़ी। रुचि की सादगी और सुंदरता को देखकर अमरपाल की नीयत में खोट आ गया।
भूपेंद्र अमरपाल को घर के एक कोने में ले गया और बोला, “पटवारी साहब, मैं अपनी एक एकड़ ज़मीन आपको बेचना चाहता हूँ ताकि आपका एक लाख का कर्ज़ भी उतर जाए और मेरे पास कुछ नकद भी आ जाए।”
अमरपाल ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहा, “भूपेंद्र, मैं तुम्हारी ज़मीन खरीदने को तैयार हूँ और तुम्हारा कर्ज़ भी माफ कर सकता हूँ, लेकिन मेरी एक शर्त है।”
“कैसी शर्त?” भूपेंद्र ने उत्सुकता से पूछा।
अमरपाल ने धीमी आवाज़ में अपनी घृणित शर्त रखी, “तुम्हारी बहु रुचि बेहद सुंदर है। यदि तुम मुझे उसके साथ एक रात बिताने की अनुमति दो, तो मैं तुम्हारी ज़मीन की अच्छी कीमत दूँगा और तुम्हारा एक लाख का कर्ज़ पूरी तरह से माफ कर दूँगा।”
एक ससुर के रूप में भूपेंद्र को इस प्रस्ताव पर क्रोधित होना चाहिए था, लेकिन शराब और लालच ने उसके विवेक को पूरी तरह से मार दिया था। उसने बिना किसी झिझक के अमरपाल का यह शर्मनाक प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
“आप चिंता मत कीजिए पटवारी साहब, काम हो जाएगा,” भूपेंद्र ने कहा।
अमरपाल यह सुनकर आश्वस्त हो गया और कागज़ी कार्रवाई जल्द शुरू करने का वादा करके वहाँ से चला गया।
छठवाँ अध्याय: 15 जुलाई की भयानक रात
अमरपाल के जाने के कुछ ही देर बाद पवन फिर से रमेश के घर आया। उसने रमेश से कहा, “रमेश, मेरे जीजाजी की तबीयत बहुत खराब है। मुझे तुरंत उनके गाँव जाना है। क्या तुम दो दिनों के लिए मेरे साथ चल सकते हो?”
रमेश ने अपने पिता से पूछा। भूपेंद्र, जो पहले से ही अपने घिनौने प्लान को अंजाम देने का अवसर तलाश रहा था, तुरंत बोला, “हाँ-हाँ रमेश, तुम्हें पवन के साथ ज़रूर जाना चाहिए। दोस्त ही दोस्त के काम आता है।”
रमेश अपने दोस्त पवन के साथ गाँव से बाहर चला गया। अब घर में केवल रुचि और भूपेंद्र ही रह गए।
शाम के 6:00 बजे भूपेंद्र अमरपाल के पास पहुँचा और उसे बताया कि रमेश दो दिनों के लिए शहर से बाहर गया है और आज रात का समय बिल्कुल सही है। अमरपाल ने भूपेंद्र को एक नशीला पदार्थ दिया और कहा, “इसे किसी तरह अपनी बहू को खिला देना, ताकि कोई रुकावट न आए।”
भूपेंद्र बाज़ार से दो लीटर दूध लेकर घर आया। उसने चुपके से उस दूध में नशीला पदार्थ मिला दिया। घर पहुँचकर उसने रुचि से कहा, “बहू, यह दूध गर्म कर दो। थोड़ा मैं पी लूँगा और थोड़ा तुम पी लेना।”
रुचि ने अपने ससुर के लिए खाना बनाया, उन्हें खाना परोसा और फिर दूध गर्म किया। भूपेंद्र ने अपने हिस्से का दूध पीने का नाटक किया और फेंक दिया, जबकि रुचि ने अपना दूध पी लिया।
दूध पीने के आधे घंटे के भीतर ही नशीले पदार्थ का असर होने लगा और रुचि अपने कमरे के बिस्तर पर ढह गई और पूरी तरह से अचेत (बेहोश) हो गई।
रात के लगभग 9:30 बजे, भूपेंद्र अपनी अचेत बहू के कमरे में पहुँचा। उसने अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया और असहाय व बेहोश रुचि की गरिमा को पूरी तरह तार-तार करते हुए उसके साथ गंभीर दुर्व्यवहार किया।
जब भूपेंद्र का मन भर गया, तो उसने बाहर निकलकर अमरपाल को फोन किया, “पटवारी साहब, रास्ता साफ है। आप आ सकते हैं।”
रात के 10:30 बजे अमरपाल पटवारी भूपेंद्र के घर पहुँचा। भूपेंद्र ने मुख्य दरवाज़ा खोला और अमरपाल को सीधे रुचि के कमरे में भेज दिया। अमरपाल ने भी उस असहाय और अचेत महिला का घिनौना शारीरिक शोषण किया।
काम खत्म होने के बाद अमरपाल ने बाहर आकर भूपेंद्र से कहा, “सुबह जब इसे होश आएगा, तो मामला संभाल लेना।”
भूपेंद्र ने कहा, “आप बेफिक्र रहिए, मैं सब देख लूँगा।”
अगली सुबह जब लगभग 7:30 बजे रुचि की आँखें खुलीं, तो उसने अपनी अस्त-व्यस्त हालत देखी। उसे यह समझने में देर न लगी कि उसके साथ रात में क्या हुआ है। वह रोती-बिलखती अपने ससुर के पास पहुँची और उस पर चिल्लाई।
भूपेंद्र ने तुरंत रसोई से धारदार चाकू उठाकर रुचि को डराया और कहा, “अगर तुमने मुँह खोला तो याद रखना, बदनामी तुम्हारी ही होगी। रात में अमरपाल पटवारी भी यहाँ आया था। अगर तुम शांत रहोगी तो घर में शांति रहेगी, वरना मैं तुम्हें जान से मार दूँगा।”
बदनामी के डर और जान के खतरे को देखकर असहाय रुचि रोकर चुप रह गई। उसे लगा कि शायद यह दुःस्वप्न अब खत्म हो गया है, लेकिन उसे क्या पता था कि नियति ने उसके लिए और भी भयानक अंत लिख रखा था।
सातवाँ अध्याय: 15 अगस्त की कालातीत रात
कुछ दिनों बाद अमरपाल ने भूपेंद्र की एक एकड़ ज़मीन की कागज़ी कार्रवाई पूरी कर ली और पैसे भूपेंद्र के खाते में जमा कर दिए।
पैसा आते ही भूपेंद्र का हौसला और बढ़ गया। वह रोज़ शराब पीता और पैसे उड़ाता।
देखते ही देखते 15 अगस्त 2026 का दिन आ गया। शाम के लगभग 6:00 बजे रमेश अपने घर आया और अपने पिता से 2000 रुपये माँगे। भूपेंद्र समझ गया कि रमेश शराब के लिए पैसे माँग रहा है। भूपेंद्र ने तुरंत पैसे दे दिए, क्योंकि वह जानता था कि पैसे मिलते ही रमेश रात भर घर नहीं आएगा।
रमेश ने पवन को बुलाया और दोनों पवन के खेत में जाकर शराब पीने लगे।
इधर भूपेंद्र ने तुरंत अमरपाल को फोन किया और उसे अपने घर बुलाया। अमरपाल अपनी बैठक से शराब और अपने एक नौकर को लेकर भूपेंद्र के घर पहुँच गया। रात 9:00 बजे तक दोनों ने जमकर शराब पी।
जब दोनों पूरी तरह से नशे में धुत हो गए, तो भूपेंद्र ने घर का मुख्य दरवाज़ा बंद कर दिया। भूपेंद्र अपनी बहू रुचि के कमरे में गया और उससे अमरपाल के साथ सहयोग करने को कहा।
रुचि, जो पहले ही बहुत अत्याचार सह चुकी थी, इस बार पूरी ताकत से खड़ी हो गई। उसने साफ मना कर दिया, “मैं मर जाऊँगी लेकिन यह पाप दोबारा नहीं होने दूँगी!”
भूपेंद्र को इस इनकार पर इतना भीषण गुस्सा आया कि उसने न पिए हुए नशे में रुचि की गर्दन पकड़ी और उसका सिर दीवार पर पूरी ताकत से दे मारा।
एक ज़ोरदार आवाज़ हुई और रुचि के सिर से खून बहने लगा। वह तुरंत ज़मीन पर गिर पड़ी और एकदम शांत हो गई। भूपेंद्र ने सोचा कि रुचि बेहोश हो गई है (या मर गई है), लेकिन उसके सिर पर सवार हैवानियत कम नहीं हुई। उसने उस गंभीर रूप से घायल और अचेत महिला के साथ फिर से घिनौना कृत्य किया।
इसके बाद उसने बाहर आकर अमरपाल से कहा, “जाओ, तुम भी अंदर चले जाओ, लेकिन शायद वह मर चुकी है।”
अमरपाल भी नशे में इतना अंधा हो चुका था कि उसने भी उस मरणासन्न महिला के साथ दरिंदगी की।
कृत्य समाप्त होने के बाद अमरपाल बाहर आया और बोला, “यह तो वाकई मर चुकी है। इसे यहीं घर के अंदर दफनाना पड़ेगा।”
भूपेंद्र ने कहा, “दफनाने के लिए फावड़ा/कसी चाहिए, जो मेरे घर में नहीं है। चलो पहले थोड़ी और शराब पी लेते हैं।”
दोनों बैठकर रात के अंधेरे में फिर से शराब पीने लगे।
आठवाँ अध्याय: भयानक अंत और न्याय का कुल्हाड़ा
रात के लगभग 1:30 बजे का समय था। घर के मुख्य दरवाज़े पर अचानक ज़ोर-ज़ोर से दस्तक होने लगी।
दहशत में भूपेंद्र ने उठकर दरवाज़ा खोला। सामने उसका बेटा रमेश खड़ा था। हवा और पैदल चलने के कारण रमेश का नशा काफी हद तक उतर चुका था।
रमेश सीधे अंदर आने लगा, तो भूपेंद्र ने उसे रोकने की कोशिश की, “अंदर मत जाओ रमेश!”
लेकिन रमेश को कुछ अनहोनी का अहसास हो चुका था। वह सीधे अपनी पत्नी के कमरे की तरफ भागा। जब उसने कमरे का दरवाज़ा खोला, तो अंदर का दृश्य देखकर उसके होश उड़ गए। उसकी पत्नी रुचि खून से लथपथ, निर्वस्त्र और बेजान हालत में ज़मीन पर पड़ी थी।
रमेश का खून खौल उठा। वह दौड़कर बाहर आया और चिल्लाया, “तुम दोनों ने मेरी पत्नी के साथ यह क्या किया?”
भूपेंद्र ने उल्टा अपने बेटे को थप्पड़ मारते हुए कहा, “बकवास मत कर! ऐसी औरतें और मिल जाएँगी।”
तभी अमरपाल पटवारी ने नशे के घमंड में सच्चाई उगल दी, “हाँ, हमने ही तुम्हारी पत्नी का यह हाल किया है! तेरा बाप हर बार मुझसे पैसे लेता था और अपनी बहू को मेरे पास भेजता था!”
यह सुनते ही रमेश के भीतर का इंसान मर गया और एक भयानक रूप बाहर आ गया। अपनी पत्नी की हत्या और इस घिनौने विश्वासघात ने उसे पागल कर दिया।
रमेश दौड़कर आँगन के कोने में गया और वहाँ रखी भारी कुल्हाड़ी उठा ली। इससे पहले कि भूपेंद्र कुछ समझ पाता, रमेश ने पूरी ताकत से कुल्हाड़ी अपने पिता भूपेंद्र के सिर पर दे मारी। भूपेंद्र का सिर धड़ से अलग हो गया और वह वहीं ढेर हो गया।
अमरपाल पटवारी डर के मारे बाहर भागने लगा। लेकिन रमेश पर खून सवार था। उसने भागते हुए अमरपाल की पीठ और कमर पर कुल्हाड़ी से ज़ोरदार वार किया। अमरपाल चीखते हुए ज़मीन पर गिर पड़ा। रमेश ने उस पर तब तक वार किए जब तक अमरपाल की साँसें पूरी तरह से थम नहीं गईं।
रात के सन्नाटे में अड्डा गाँव का वह घर चीखों और खून से भर चुका था।
सुबह जब गाँव वालों को इस भयानक हत्याकांड का पता चला, तो पूरे भरतपुर जिले में सन्नाटा पसर गया। पुलिस मौके पर पहुँची। पुलिस ने रुचि के शव को अस्पताल पहुँचाया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। भूपेंद्र और अमरपाल के शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया, और रमेश ने बिना किसी प्रतिरोध के पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
शराब की लत, अनैतिक इच्छाओं और लालच के कारण एक पूरा हंसता-खेलता परिवार और तीन जिंदगियाँ पूरी तरह से तबाह हो गईं।
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