Money Shower Nandos Case ड्राइवर ने पैसों की बारिश के खेल में एक के बाद एक कर दिए 9 लोगों के कत्ल!
Money Shower Nandos Case ड्राइवर ने पैसों की बारिश के खेल में एक के बाद एक कर दिए 9 लोगों के कत्ल!
नांदोड की पहाड़ियों से जाली नोटों का खूनी खेल: ऑटो ड्राइवर से जल्लाद बनने की दास्तान
लगभग 25 साल का अमित शिंदे मुंबई में एक ऑटो-रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पालता था। रोज तड़के उठकर वह अपनी खटारा रिक्शा लेकर शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर निकल पड़ता। दफ्तर जाने वाले, बाजार जाने वाले और आम मुसाफिर उसकी सवारी बनते थे। कमाई बहुत मामूली थी, लेकिन उसी से वह गांव में अपनी बूढ़ी मां और दो छोटे भाई-बहनों का खर्च चलाता था। अमित हमेशा यही सोचता था, “अगर मैं यूं ही मेहनत करता रहा, तो एक दिन जिंदगी जरूर बदलेगी।”
सितंबर 2003 की एक तपती दोपहर, अमित महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले के मालवण में एक छोटे से होटल के बाहर सवारी के इंतजार में खड़ा था। तभी चार नौजवान लड़के हंसते-खिलखिलाते हुए उसके ऑटो में आकर बैठ गए।

“भैया, हमें नांदोड की सोने की खदान की तरफ ले चलो!” — उनमें से एक लड़के ने बड़े जोश में कहा।
अमित को समझ नहीं आया कि यहां कौन सी ‘सोने की खदान’ है, लेकिन उसने ऑटो पहाड़ी रास्ते की ओर मोड़ दिया। रास्ते भर वे चारों बातें करते रहे।
“वहां एक तांत्रिक बाबा रहता है। वह असली नोटों की बारिश करता है! इतनी बारिश कि अलमारियां और संदूक भर जाएं!”
अमित चुपचाप सुनता रहा, लेकिन उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं। ‘पैसों की बारिश? क्या सच में ऐसा हो सकता है?’
गाड़ी एक खुले मैदान में जाकर रुकी, जहां चारों तरफ पथरीली पहाड़ियां थीं और पीछे कुछ कामचलाऊ तंबू लगे थे। वहां एक सफेद दाढ़ी वाला, पुराना चोगा पहने तांत्रिक लकड़ी के चबूतरे पर खड़ा था। वह चिल्लाया: “आओ भक्तों! तुम बस पैसे चढ़ाओ, मैं तुम्हारे लिए धन की बारिश कर दूंगा!”
लोगों ने जयकारे लगाए। उन्होंने अपनी नकदी तांत्रिक के सामने रखी और दूर हटकर खड़े हो गए। तांत्रिक एक काले पर्दे के पीछे गया और जब वापस लौटा, तो उसके हाथ खाली थे। लेकिन अगले ही पल, आसमान से रंग-बिरंगे चमचमाते नोट बारिश की तरह गिरने लगे। सैकड़ों नोट हवा में उड़ते हुए जमीन पर बिखर गए। लोग हैरान रह गए और पागलों की तरह नोट लूटने लगे। वे जाली नोट असली जैसे ही दिखते थे, जिन्हें दूर से पहचानना नामुमकिन था।
अमित थोड़ी दूरी पर खड़ा फटी आंखों से यह सब देख रहा था। ‘हे भगवान… यह तो सच है!’
जब भीड़ चली गई और मैदान खाली हो गया, तो वह बूढ़ा तांत्रिक हाथ झाड़ते हुए बाहर निकला। अमित से रहा नहीं गया, वह दौड़कर उसके पैरों में गिर पड़ा: “बाबा… मुझे भी यह नोटों की बारिश का हुनर सिखा दो! मुझे यह सीखना है!”
बूढ़े ने तंज कसते हुए कहा: “घर लौट जा लड़के। मैं किसी को यह विधा नहीं सिखाता।”
अमित रोने लगा, गिड़गिड़ाने लगा: “बाबा, मुझ पर रहम करो… मैं सिर्फ सीखना चाहता हूं, किसी का बुरा नहीं करूंगा…” उसने बार-बार मिन्नतें कीं। आखिरकार बूढ़े का दिल पसीज गया: “ठीक है… मैं तुझे सिखाऊंगा।”
इसके बाद अमित ने उस तांत्रिक से कई रहस्यमयी तरकीबें सीखीं। नोटों की बारिश का भ्रम कैसे पैदा किया जाए, नजरबंदी कैसे की जाए, नोटों की अदला-बदली कैसे हो, और विरोध करने वालों को चाकू और बंदूक से कैसे ‘खामोश’ किया जाए। अमित अब वह सीधा-सादा ऑटो ड्राइवर नहीं रहा था; वह धीरे-धीरे जुर्म के अंधेरे दलदल में उतरकर एक दरिंदा बन चुका था।
तीन हफ्ते बाद, मुंबई से अमित के पुराने दोस्तों का एक गिरोह उससे मिलने आया। उनके पास 3,10,000 रुपये नकद थे। उन्हें पूरा यकीन था कि अगर ‘पैसों की बारिश’ का टोटका कामयाब रहा, तो यह रकम दस गुना, यहां तक कि सौ गुना बढ़ जाएगी। वे नहीं जानते थे कि वे सीधे मौत के फंदे में कदम रख रहे हैं।
उस तांत्रिक ने अमित को एक खौफनाक राज सिखाया था: “जब नोटों की बारिश का नाटक हो, तो उनके हाथ-पैर बांध देना और उन पर हमला करना। आसमान से असली नोट नहीं गिरते, सब फरेब है। फिर उन्हें मारकर बोरियों में बंद करना और पहाड़ियों में दफना देना।”
अमित ने ठीक वैसा ही किया। उसने अपने चार दोस्तों को शिकार बनाया—जिनमें एक एलआईसी एजेंट, एक व्यापारी, एक रियल एस्टेट कारोबारी और एक अन्य दुकानदार शामिल था। 30 अक्टूबर 2003 को नांदोड के सुनसान जंगलों में यह खूनी खेल खेला गया। चारों को रस्सियों से बांधा गया, लाठियों से पीटा गया, चाकुओं से गोदा गया और गोलियां मार दी गईं। फिर उनकी लाशों को बोरियों में भरकर गहरी खाइयों में गाड़ दिया गया।
लेकिन यह तो सिर्फ खूनी सिलसिले की शुरुआत थी।
पांच दिन बाद, एक अन्य दोस्त का परिवार भी इसी लालच में वहां आ पहुंचा। उस छोटे से परिवार में माता-पिता और उनके दो मासूम बेटे थे। उन्हें भी बंधक बनाया गया, बेरहमी से पीटा गया और मौत के घाट उतार दिया गया। सभी को बोरियों में सिल दिया गया।
कुल मिलाकर, 10 बेगुनाह लोगों का बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। डायरी और तस्वीरों की मदद से 8 शवों की पहचान हो पाई, जबकि हेमंत ठाकरे और एक अन्य शख्स का कोई सुराग नहीं मिल सका।
तभी सिंधुदुर्ग पुलिस को एक गुमनाम खत मिला, जिसमें लिखा था: “नांदोड की पहाड़ियों में लावारिस बोरियों के अंदर इंसानी लाशें दबी हैं।”
जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) के होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत एक विशेष जांच दल का गठन किया और भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। इलाके में सड़ांध फैली हुई थी। खोजी कुत्तों की मदद से जमीन खोदकर पहले 7 बोरियां निकाली गईं। अंदर का मंजर देखकर पुलिसकर्मियों के रोंगटे खड़े हो गए—एक औरत, दो मासूम बच्चे और चार मर्दों के सड़े-गले शव।
इसके बाद खुदाई जारी रही और 8वीं, 9वीं और 10वीं बोरी भी मिल गई। कुल 10 नरकंकाल और लाशें बरामद हुईं।
जांच में खुलासा हुआ कि ज्यादातर पीड़ित मुंबई के रहने वाले थे। फर्जी कागजातों, फर्जी दस्तखत और नकदी से खरीदी गई गाड़ियों का इस्तेमाल करके इन लोगों को फंसाया गया था। और इन सभी को मौत के इस मुहाने तक लाने वाला कोई और नहीं, बल्कि अमित शिंदे ही था।
पुलिस ने घेराबंदी करके अमित को धर दबोचा। पुलिस के सामने अब वह मुस्कुराने वाला ऑटो ड्राइवर नहीं था। वह खामोश था, उसकी आंखें पथराई हुई थीं, मानो वह अपने ही बुने किसी खौफनाक भ्रमजाल में खोया हुआ हो। उसने टूटे मन से कबूल किया: “गुरुजी ने मुझे नोटों की बारिश सिखाई थी… मैं तो बस खेल रहा था…”
अमित और उसके साथियों पर अदालत में मुकदमा चला, जो करीब छह साल तक खिंचा। निचली अदालत ने इसे ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ अपराध मानते हुए फांसी की सजा सुनाई। उच्च न्यायालय (High Court) ने भी मौत की सजा बरकरार रखी। हालांकि, 2014 में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने इस आधार पर फांसी को उम्रकैद में बदल दिया कि आरोपी की उम्र 30 साल से कम थी, वह एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखता था, उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और उसके सुधरने की गुंजाइश थी।
लेकिन इस लालच की कीमत बहुत भारी थी। नकली नोटों और काले जादू के फरेब ने 10 मासूम जिंदगियां निगल लीं।
आज भी नांदोड की वे पहाड़ियां और घने जंगल उसी खामोशी के साथ खड़े हैं। जब भी कोई मुसाफिर वहां से गुजरता है, तो स्थानीय लोग उसे यह दर्दनाक दास्तान सुनाते हुए आगाह करते हैं: “कभी झूठे चमत्कारों पर भरोसा मत करना, क्योंकि लालच का रास्ता अक्सर कब्रगाह पर जाकर ही खत्म होता है।”
और उस ऑटो ड्राइवर की कहानी, जिसने पैसों की हवस में औजारों को कत्ल का हथियार बना दिया, आज भी उस इलाके में एक खौफनाक सबक बनकर गूंजती है।
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