पति-पत्नी के साथ हुआ बड़ा हादसा, वजह जानकर डॉक्टर भी रह गए हैरान।
पति-पत्नी के साथ हुआ बड़ा हादसा, वजह जानकर डॉक्टर भी रह गए हैरान।
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नमस्कार दोस्तों। यह कहानी राजस्थान के अलवर जिले के खरेली गाँव से शुरू होती है। वहाँ मनोज कुमार रहता था। वह ट्रक चलाता और अच्छी कमाई करता, पर दो आदतें उसे घेरे रहतीं—शराब और परायी औरतों में दिलचस्पी। जितना कमाता, उतना बाहर बिखेर देता। घर में पत्नी उर्वशी थी। उसे सजने-सँवरने और नए कपड़े का शौक था। गहने और भी चाहिए थे। तीन साल से वह एक ही बात दोहराती—सोने की चेन खरीद दो। मनोज एक कान से सुनता, दूसरे से निकाल देता।

छह अक्टूबर दो हजार पच्चीस की शाम छह बजे मनोज ने फोन किया कि आज गाँव आ रहा हूँ। उर्वशी खुश हुई। उसे लगा आज चेन जरूर आएगी। मनोज गाँव के पास ट्रक रोककर ठेके से शराब पीया, फिर मेडिकल दुकान से कंडोम लिया और घर के सामने आ खड़ा हुआ। उर्वशी ने दरवाजा खोला तो पति नशे में था और हाथ में पैकेट था। उसने पूछा—चेन नहीं लाए न? मनोज बोला पैसे नहीं बचे, छह महीने में लाऊँगा। सपना टूटा। गुस्से में उर्वशी ने पैकेट छीनकर आग में डाल दिया और कहा जब तक चेन न आए, साथ नहीं रहूँगी। मनोज गुस्से में उसे कमरे में ले गया। उस रात सावधानी नहीं बरती गई। सुबह मनोज खाना खाकर ट्रक लेकर निकल गया।
उर्वशी सोचने लगी कि पति कभी चेन नहीं देगा। अब उसे खुद रास्ता निकालना होगा—कोई ऐसा व्यक्ति जो कपड़े और गहने दे सके। दो-तीन दिन बाद पड़ोसन गायत्री आई। उसके गले में मोटी सोने की चेन थी। उर्वशी ने पूछा तुम्हारे पति भी तो ड्राइवर हैं, चेन कैसे मिली? गायत्री ने खुलकर कहा पति ने नहीं दी, गाँव के सुनार सुभाष ने रात बुलाकर तोहफे में दी है। उर्वशी के मन में विचार आया—क्यों न उसी सुनार को अपने जाल में फँसाऊँ।
शाम पाँच बजे उसने घर बंद किया और सुनार की दुकान पहुँची। ग्राहक नहीं था। सुभाष उसकी सुंदरता देखकर बोल पड़ा—बहुत दिनों बाद आई हो। उर्वशी मुस्कराई—चेन चाहिए, पैसे नहीं हैं। सुभाष समझ गया। बोला मुफ्त दे सकता हूँ, पर कीमत चुकानी पड़ेगी, सेवा करनी पड़ेगी, साथ समय बिताना होगा। उर्वशी तैयार थी। उसने कहा रात घर आना, चेन साथ लाना। घर लौटकर वह काम में लग गई और रात का इंतजार करने लगी।
दस बजे उसने फोन किया—अगर आना है तो चेन लेकर जल्दी आओ। सुभाष पत्नी से झूठ बोलकर दुकान से चेन लेकर निकला और दरवाजा खटखटाया। उर्वशी ने देखा हाथ में चेन है तो अरमान पूरे होते दिखे। उसे अंदर लिया, मुख्य द्वार बंद किया। दोनों ने सहमति से एकांत में समय बिताया। बाद में सुभाष ने चेन दी और कहा अब आता-जाता रहूँगा। उर्वशी सोचने लगी गहनों की इच्छाएँ पूरी होंगी। वह नहीं जानती थी आगे क्या होगा। सुभाष रात को चला गया।
इसके बाद जब मौका मिलता, उर्वशी फोन करती। सुभाष आता, समय बिताता, कभी पैसे भी देता। बीस अक्टूबर की शाम मनोज ट्रक में बैठा था। साथ में दोस्त मनीराम था—युवा, सुंदर, अकेला ड्राइवर। मनोज बोला आज घर चलो, रात यहीं गुजारो। आठ बजे दोनों घर आए। मनीराम ने उर्वशी को देखा तो उसकी नियत डोल गई। दोनों बैठकर शराब पीने लगे। उर्वशी खाना बनाने लगी। मनोज इतना पी गया कि खाने से पहले चारपाई पर सो गया। मनीराम ने मौका देखा। बोला दोस्त सुबह तक नहीं जागेगा, मैं घर जाना चाहता हूँ। उर्वशी का इरादा और था। उसने कहा बाहर जाने की जरूरत नहीं, रात यहीं रह सकते हो। मनीराम समझ गया। बोला घर में हम दो अकेले हैं, समय बिताना चाहता हूँ। उर्वशी ने कहा कीमत चुकानी पड़ेगी—पाँच हजार अभी। मनीराम के पास पैसे थे, परिवार नहीं था। उसने नोट दिए। उर्वशी ने द्वार बंद किया और उसे कमरे में ले गई। रात भर दोनों साथ रहे। सुबह मनीराम ने कहा अब आता रहूँगा। दोनों ड्राइवर खाना खाकर काम पर निकल गए।
अब उर्वशी दो लोगों को अलग-अलग बुलाती—कभी सुनार, कभी मनीराम। पैसे और तोहफे लेती, जरूरतें पूरी करती। पाँच नवंबर शाम छह बजे उसने सुभाष को फोन किया—दस हजार चाहिए। सुभाष बोला अभी दिन में नहीं आ सकता, कोई देख लेगा। उर्वशी ने कहा रात आ जाना। नौ बजे सुभाष पहुँचा। पड़ोसन गायत्री ने उसे दरवाजे पर देख लिया और गुस्साई—उर्वशी ने मेरा पत्ता साफ कर दिया। अंदर दोनों ने समय बिताया, सुभाष पैसे देकर चला गया। गायत्री ने ठान लिया कि यह बात पति को बतानी चाहिए।
दस नवंबर शाम सात बजे मनोज ट्रक लेकर लौट रहा था। गायत्री रास्ते में मिली और बोली तुम्हारी पत्नी गलत राह पर है, पीठ पीछे सुभाष घर आता है। मनोज गुस्से में घर गया और पूछा सुनार क्या करने आता है? उर्वशी बोली किसी ने कान भरे हैं, कोई नहीं आता। मनोज विश्वास कर गया। उस रात भी दोनों साथ रहे और फिर सावधानी नहीं बरती। इसके बाद मनोज पत्नी पर नजर रखने लगा।
अट्ठाईस नवंबर सुबह आठ बजे मनोज ने कहा पंद्रह-बीस दिन बाद लौटूँगा। उर्वशी खुश हुई—गैरहाजिरी में समय अच्छा कटेगा। पति निकलते ही उसने मनीराम को फोन किया—पाँच हजार चाहिए। मनीराम बोला रात आऊँगा, समय भी बिताऊँगा, पैसे भी दूँगा। साढ़े नौ बजे वह आया। गायत्री ने उसे भी देख लिया और सोचा यह स्त्री कितने लोगों को बुलाती है। अंदर दोनों व्यस्त थे तभी सुभाष का फोन आया—आज पत्नी घर नहीं, मैं आना चाहता हूँ। उर्वशी मना करती रही, सुभाष अड़ गया। सवा दस बजे वह दरवाजा खटखटाने लगा। उर्वशी थककर खोला। सुभाष ने अंदर मनीराम देखा और पूछा यह कौन है। उर्वशी ने सच बता दिया। सुभाष को फर्क नहीं पड़ा। तीनों ने घर बंद कर समय बिताया।
थोड़ी देर बाद फिर दस्तक हुई। उर्वशी डर गई—शायद पति आ गया। उसने दोनों से कहा दीवार फाँदकर भाग जाओ। दोनों निकल गए। दरवाजा खोला तो मनोज खड़ा था। बोला तबीयत खराब है, बुखार और चक्कर आते हैं, अस्पताल चलो। साढ़े ग्यारह बजे दोनों नजदीकी अस्पताल गए। डॉक्टर ने जाँच की, दवा दी और कहा दो दिन बाद रिपोर्ट आएगी।
अगले दिन फिर गए। रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने कहा मनोज को जानलेवा बीमारी एड्स हो गई है। जमीन पैरों तले खिसक गई। मनोज सोचने लगा यह कहाँ से लगी। डॉक्टर ने उर्वशी की भी जाँच करवाई। उनकी रिपोर्ट में भी वही बीमारी निकली। डॉक्टर ने मनोज को एकांत में कहा हो सकता है पत्नी किसी और के साथ रही हो। मनोज बोला हो सकता है, मैं भी कई औरतों के साथ रहा हूँ। फिर भी मन में घर कर गया कि शायद पत्नी की वजह से यह हुआ। उर्वशी उलटा सोच रही थीं—पति की वजह से लगा। डॉक्टर ने दवाई देकर घर भेज दिया।
रात दोनों कमरे में लेटे, नींद नहीं आई। डेढ़ बजे मनोज ने देखा पत्नी सो चुकी है। गुस्सा भरा था। उसने सोचा उसी ने यह बीमारी दी। वह रसोई गया, चाकू उठाया और सोती पत्नी की हत्या कर दी। उसी रात पुलिस स्टेशन जाकर सरेंडर कर दिया और बताया घर में पत्नी की लाश है, उसी की वजह से मुझे यह बीमारी लगी। पुलिस घर गई, शव बरामद किया और मनोज के खिलाफ चालान दर्ज किया।
दोस्तों, लालच, शराब, छल और बिना सोचे-समझे रिश्ते जब एक छत के नीचे इकट्ठा होते हैं तो अंत बहुत काला होता है। मनोज ने जो किया वह न्याय था या अपराध—यह सोचने वाली बात है। जय हिंद।