बैंक मैनेजर की बीवी ने नौकर के साथ उठाया बहुत बड़ा कदम! – News

बैंक मैनेजर की बीवी ने नौकर के साथ उठाया बहुत बड़ा कदम!

बैंक मैनेजर की बीवी ने नौकर के साथ उठाया बहुत बड़ा कदम!

बैंक मैनेजर की बीवी ने नौकर के साथ उठाया बहुत बड़ा कदम!

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नमस्कार दोस्तों।
दोस्तों आज की कहानी सोने महल और बैंक का दायरा गुलाबी नगरी जयपुर के एक शांत और पास इलाके में बना विशाल बंगला बाहर से जितना भव्य दिखता था अंदर से उतना ही वीरान था।
इस खूबसूरत बंगले के मालिक थे सतीश शर्मा।
सतीश शर्मा शहर के एक बहुत बड़े राष्ट्रीयकृत बैंक में वरिष्ठ शाखा प्रबंधक ब्रांच मैनेजर के पद पर तैनात थे।
दोस्तों उनकी उम्र लगभग 45 वर्ष थी।
रोबदार व्यक्तित्व चेहरे पर हमेशा बना रहने वाला बेशेवर तनाव और हाथों में फाइलों व लैपटॉप का पुलिंदा या सतीश शर्मा की दिनचर्या की पहचान बन चुका था।
दोस्तों सतीश की शादी को लगभग 15 से 20 साल बीत चुके थे।
उनकी पत्नी सुनीता जिनकी उम्र लगभग 42 वर्ष थी।
एक सुसंस्कृत दयालु और भावुक महिला थी।
इस विशाल बंगले में अपार धन दौलत, गाड़ियां, नौकर चाकर और सुख सुविधाओं के सारे साधन मौजूद थे।
लेकिन अगर किसी चीज की कमी थी तो वह थी एक किलकारी की।
सतीश और सुनीता की कोई संतान नहीं थी।
शादी के शुरुआती वर्षों में दोनों ने एक कमी इस कमी को एक दूसरे के साथ से पूरा करने की कोशिश की थी।
लेकिन जैसे-तैसे समय बीतता गया।
सतीश का मन घर से उचटने लगा।
उन्होंने अपने आप को पूरी तरह बैंक के काम में झोंक दिया।


वह सुबह जल्दी घर से निकल जाते और रात को देर से लौटते।
कई बार तो ऑडिट क्लोजिंग या मीटिंग्स का बहाना बनाकर पूरे-पूरे हफ्ते घर से ही नहीं आते थे।
दोस्तों, सुनीता दिन रात इस खाली घर में अकेली रहती थी।
वह जब भी सतीश से शिकायत करती तो सतीश बात टाल देते।
एक दिन जब सतीश देर रात घर लौटे तो सुनीता ने उनका रास्ता रोक लिया।
आंखों में आंसू लिए सुनीता बोली सतीश आखिर कब तक ऐसा चलेगा?
आप पूरा पूरा दिन पूरी पूरी रात बैंक के कामों में ही बिजी रहते हैं।
घर आने का नाम नहीं लेते।
कभी सोचा है कि इस बड़े से घर में मेरा दम घुटता है।
हम महिलाओं की भी कुछ उम्मीदें और कुछ जरूरतें भावनाएं होती हैं।
मुझे यह धन दौलत नहीं चाहिए।
मुझे आपका समय चाहिए।
हमारी कोई संतान नहीं है।
कम से कम हम एक दूसरे को सहारा तो बन सकते हैं ना।
दोस्तों कल को हमारी इस संपत्ति का वारिस कौन होगा?
हमारे बुढ़ापे की लाठी कौन बनेगा?
दोस्तों सतीश ने अपनी ब्रीफ केस मेज पर रखी और झल्लाहट भरे स्वर में बोले सुनीता तुम रोज-रोज वही रोना लेकर बैठ जाती हो।
तुम्हें किस चीज की कमी रखी है?
मैंने नौकर हैं। गाड़ी है, बैंक बैलेंस है।
जो मांगती हो तुरंत हाजिर हो जाता है।
मैं बैंक का मैनेजर हूं।
सैकड़ों जिम्मेदारियां हैं मुझ पर।
मैं कोई वेल नहीं हूं।
जो दिन भर बैठकर घर पर तुम्हारा हाथ थामे रहूं बच्चा नहीं हूं तो इसमें मैं क्या करूं?
अब बार-बार इस बात को दोहराकर मेरा दिमाग खराब मत करो।
दोस्तों सतीश की यह बेरुखी सुनीता के कलेजे को छलनी कर देती थी।
सतीश के एक कान से सुनता और दूसरे कान से निकाल देता था।
पर सुनीता को यह अंदाजा नहीं था कि सतीश की इस बेरुखी के पीछे सिर्फ बैंक का काम नहीं था बल्कि हकीकत कुछ और ही थी।
दोस्तों हकीकत यह थी कि सतीश शर्मा का अपने ही बैंक की शाखा में हाल ही में एक नियुक्त हुई एक युवा असिस्टेंट कैशियर नेहा के साथ अफेयर चल रहा था।
दोस्तों नेहा की उम्र मुश्किल से 22-23 साल थी।
उसकी नईनई नौकरी लगी थी।
शुरुआत में काम सीखने के बहाने उसने मैनेजर साहब से नजदीकियां बढ़ाई और धीरे-धीरे सतीश उसके हुस्न और अलपकड़पन जाल में फंसते चले गए।
सतीश ने जो समय बैंक में क्लोजिंग के नाम पर बिताने की बात कहते थे।
असल में वह समय नेहा के साथ किराए के मकानों, रेस्टोरेंट या शहर में महंगे होटलों में बीतता था।
अपनी आधी उम्र की लड़की के चक्कर में पड़कर सतीश अपनी 20 साल की पुरानी वफादार पत्नी को पूरी तरह भूल चुके थे।
सुनीता इन सब बातों से पूरी तरह बेखबर थी।
उन्हें यही लगता था कि उनके पति बैंक की जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे हुए हैं।
लेकिन सच ज्यादा दिनों तक छिपता नहीं है।
दोस्तों, एक दिन सुनीता का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था।
उन्होंने सोचा कि क्यों ना वह सतीश को सरप्राइज दे और खुद बैंक जाकर उनसे मिले ताकि साथ में किसी डॉक्टर के पास जाया जा सके।
सुनीता गाड़ी लेकर सतीश के बैंक पहुंची।
जब वह बैंक परिसर में दाखिल हुई तो उन्होंने सतीश देखा कि सतीश अपने केबिन में बैठे थे और उनके पास वही नई कैशियत नेहा खड़ी थी।
दोनों के बीच की नजदीकियां और बात करने का अंदाज सामान्य अधिकारी कर्मचारी जैसा बिल्कुल नहीं था।
सुनीता को थोड़ा अजीब लगा लेकिन उन्होंने अपने मन को समझाया कि शायद यह उनका भ्रम है।
दोस्तों जब सतीश किसी काम से क्षेत्रीय कार्यालय रीजनल ऑफिस की मीटिंग के लिए बाहर निकले तो सुनीता बैंक के एक पुराने चपरासी रामदीन के पास गई।
रामदीन पिछला 15 सालों से सतीश का वफादार चपरासी था और सुनीता को बहुत सम्मान देता था।
दोस्तों सुनीता ने रामन से महेश भाव में पूछा।
रामदीन भैया साहब आजकल बहुत तनाव में रहते हैं।
बैंक में काम बहुत ज्यादा बढ़ गया है क्या?
रात भर घर नहीं आते हैं।
रामदीन ने इधर-उधर देखा।
उसका चेहरा पीला पड़ गया।
वह कांपते स्वर में बोला मैडम जी मैं आपको क्या बताऊं?
मेरी बात का बुरा मत मानिए और साहब से मेरा नाम मत लीजिए।
वरना वह मुझे नौकरी से निकलवा देंगे।
मैं बाल बच्चों वाला आदमी हूं।
मेरे पेट पर लात पड़ जाएगी।
लेकिन मैडम जी यह सच है कि साहब बैंक के काम में नहीं बल्कि नई मैडम नेहा के चक्कर में बिजी रहते हैं।
दोस्तों सुनीता के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उन्होंने बदहवास होकर पूछा क्या क्या बक रहे हो रामदीन?
रामदीन ने हाथ जोड़ते हुए कहा मैडम जी यह कड़वा सच है।
बैंक बंद होने के बाद भी दोनों घंटों केबिन में रहते हैं।
कई बार मैंने साहब को नेहा मैडम को उनकी किराए की गाड़ी से उनके कमरे तक छोड़ने छोड़ते देखा है।
पूरा बैंक इस बात को जानता है।
बस डर के मारे कोई नहीं बोलता है।
साहब के पास बहुत पवार है।
वह किसी भी किसी की भी नौकरी खा सकते हैं।
दोस्तों सुनीता का सिर चकरा गया।
आंखों के आगे अंधेरा छा गया।
जिस पति पर उन्होंने 20 साल तक अंधा विश्वास किया, वह उनके साथ इतना बड़ा धोखा कर रहा था, फिर भी एक पत्नी का मन इतनी आसानी से हार नहीं मानता।
दोस्तों, सुनीता ने सोचा कि शायद चपरासी को कोई गलतफहमी हुई हो।
वह शांत होकर अपनी कार में जाकर बैठ गई और बैंक के बाहर से ही नजर रखने लगी।
शाम को जब बैंक बंद हुआ, तो उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि सतीश और नेहा एक साथ बाहर निकले।
दोस्तों नेहा ने सतीश को देखकर एक खास अंदाज में मुस्कुराते हुए आंख का इशारा किया और सतीश की गाड़ी में जाकर बैठ गई।
दोस्तों जब सुनीता पास शक की कोई गुंजाइश नहीं बची।
उसका दिल पूरी तरह टूट चुका था।
उसी रात जब सतीश देर से घर लौटे तो सुनीता का सब्र बांध टूट चुका था।
दोस्तों उन्होंने सतीश के सामने नेहा का नाम लेकर सीधे सवाल किया।
सतीश नेहा कौन है?
और उसका आपका उसके साथ क्या रिश्ता है?
दोस्तों सुनीता की आवाज कांप रही थी लेकिन उसमें गुस्सा साफ था।
दोस्तों सतीश चौंक गए लेकिन तुरंत अपने पद के रो में आकर चिल्लाए यह क्या बकवास है सुनीता तुम अब मेरे बैंक के कर्मचारियों पर भी शक करोगी तुम्हें जिंदगी दिमागी इलाज की जरूरत है
दोस्तों शक नहीं सुनी सतीश मैंने अपनी आंखों से देखा है कि सब सच जान चुकी हूं सुनीता रोते हुए बोली इसलिए आप घर नहीं आते हैं इसलिए आपको मेरी जरूरतों मेरी तन्हाई का एहसास नहीं था
आपने मुझे इस सोने के पिंजरे में अकेले छोड़ दिया और वह बाहर अपनी रंग मिलाजी में लगे हो।
दोस्तों बात इतनी बढ़ गई कि दोनों के बीच तीखी बहस तू तू मैंम शुरू हो गई।
दोस्तों सतीश ने साफ कह दिया कि हां अगर तुम्हें यही लगता है तो समझ लो जो समझना है मैं अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जिऊंगा।
तुम्हें जो करना है कर लो।
दोस्तों सुनीता समझ गई कि इस आदमी के दिल में उसके लिए कोई जगह नहीं बची है।
बहस के अंत में सुनीता ने रूंधे गले से कहा ठीक है सतीश आप अपनी दुनिया में खुश रहिए।
लेकिन इस बड़े से घर में मैं अकेली नहीं रह सकती।
मुझे घर के कामकाज के लिए मेरी देखरेख के लिए एक नौकर चाहिए।
ऐसा नौकर जो घर की सफाई झाड़ू पोछा गाड़ी की ड्राइविंग और बाग बगीचे का ध्यान रख सके।
दोस्तों सतीश अपनी ही धुन में मग्न थे।
उन्हें लगा कि नौकर रख देने से सुनीता उनका पीछा छोड़ देगी और वह आजादी से नेहा का वक्त बिता सकेंगे।
दोस्तों सतीश ने कहा ठीक है तुम्हें नौकर चाहिए ना तो मैं व्यवस्था कर देता हूं।
सतीश शर्मा ने अपने सोशल मीडिया Facebook अकाउंट पर एक विज्ञापन पोस्ट कर दिया।
जयपुर स्थित बैंक मैनेजर के निवास हेतु एक ईमानदार और मेहनती पुरुष घरेलू सहायक की आवश्यकता है।
काम घर की साफ सफाई बागवानी ड्राइविंग और मालकिन की देखरेख वेतन ₹35,000 प्रतिमाह।
दोस्तों, ₹35,000 महीने की तनख्वाह किसी घरेलू काम के लिए बहुत बड़ी रकम थी।
पोस्ट डालते ही सतीश के इनबॉक्स में कमेंट सेक्शन में आवेदनों की बाढ़ आ गई।
दोस्तों उसी समय जयपुर के ही एक मध्यम वर्गीय इलाके में रहने वाला अनुज नाम का एक युवक नौकरी की तलाश में सोशल मीडिया खंगाल रहा था।
अनुज की उम्र लगभग 23 से 24 साल की थी।
वह दिखने में लंबा हट्टाकट्टा बेहद सुंदर और सीधे स्वभाव का था।
अनुज ने जब बैंक मैनेजर की वह पोस्ट देखी तो उसने तुरंत कमेंट किया सर मैं जयपुर से ही हूं।
मुझे काम की सख्त जरूरत है।
अगर आप चाहे तो यह काम मुझे दे सकते हैं।
मैं ईमानदारी से जिम्मेदारी से निभाऊंगा।
दोस्तों सतीश शर्मा ने अनुज का प्रोफाइल देखा और उसे अपने बैंक में इंटरव्यू के लिए बुला लिया।
जब अनुज सतीश से मिलने पहुंचा तो सतीश उसकी कद काठी और शालीन व्यवहार से प्रभावित हुए।
उन्होंने अनुज को अपने साथ कार में बिठाया और सीधे अपने बंगले पर ले गए।
दोस्तों घर पहुंचकर सतीश ने सुनीता को आवाज दी।
सुनीता देखो तुम्हारे लिए नौकर ले आया हूं।
सुनीता कमरे से बाहर आई।
वह जब उसकी नजर अनुज पर पड़ी तो वह उसे देखती ही रह गई।
हट्टाकट्टा साफ सुथरा और मासूम चेहरे वाला।
अनुज पहली ही नजर में बेहद भद्र और संस्कारी लग रहा था।
सुनीता के मन ही मन सोचा कि यह लड़का घर के कामों के साथ-साथ उनके सुनेपन को दूर करने और एक सहारे के रूप में बहुत सही साबित होगा।
दोस्तों, पैसे की तो उसके पास कोई कमी थी ही नहीं।
सतीश का बैंक मैनेजर का पद और अपार संपत्ति।
बस उन्हें एक सच्चे और वफादार इंसान की तलाश थी।
दोस्तों, सतीश ने अनुज को काम समझा समझाते हुए कहा देखो अनुज तुम्हारा मुख्य काम घर की देखभाल करना गाड़ी चलाना और खासतौर पर अपनी मालकिन का ध्यान रखना उन्हें किसी चीज की तकलीफ नहीं होनी चाहिए।
अनुज ने हाथ जोड़कर कहा जी मालिक आप बिल्कुल बेफिक्र रहिए।
मैं मालकिन जी को अपनी मां सम्मान मानकर पूरी निष्ठा से सेवा करूंगा।
दोस्तों सतीश तो अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होकर वापस अपनी रंगीन दुनिया और नेहा के पास चले गए।
उन्हें क्या पता था कि कहानी अब एक नया मोड़ लेने वाली है।
दोस्तों, अनुज ने पहले ही दिन से काम संभाल लिया।
वह सुबह-सुबह उठकर पूरे बंगले की सफाई करता।
बाग बगीचे के पौधों को पानी देता और सुनीता के लिए समय पर चाय और नाश्ता तैयार करता।
या वह सिर्फ घर का काम ही नहीं करता था बल्कि सुनीता की छोटी-छोटी जरूरतों का भी ख्याल रखता था।
दोस्तों सुनीता जो सालों से अकेलेपन और अपेक्षा का शिकार थी उन्हें अनुज की सेवा भावना में एक अजीब सा सुकून मिलने लगा।
दोस्तों एक दिन शाम को जब सुनीता सोफे पर बैठी थी तो उनके सिर में दर्द हो रहा था तो अनुज धीरे से पास आया और बोला मालकिन जी आपके चेहरे से लग रहा है कि आपका सिर दुख रहा है।
अगर आप इजाजत दे तो मैं थोड़ा सिर दबा दूं।
सुनीता ने सहमति से सिर हिलाया और अनुज ने बड़े ही आदर से सलीके से मालकिन के सिर की मालिश करना शुरू कर दिया।
उसके हाथों में एक अजीब सी नरमी और अपनापन था।
दोस्तों कुछ ही देर में सुनीता का दर्द गायब हो गया।
उसके बाद जब भी सुनीता थक जाती तो अनुज उसके पैर दबा देता तो उनके सिर की मालिश करता और दिन भर उनका हालचाल पूछता रहता था।
दोस्तों एक दिन बातचीत के दौरान सुनीता ने अनुज से पूछा अनुज तुम इतने संस्कारी और मेहनती हो।
तुम्हारे परिवार में कौन-कौन है?
दोस्तों अनुज की आंखें थोड़ी नम हो गई।
उसने गहरी सांस ली और बोलना शुरू किया।
मालकिन जी मेरे परिवार में मेरे माता-पिता एक छोटा भाई और एक छोटी बहन है।
हम लोग बहुत गरीब थे।
मैंने दिन रात मजदूरी करके अपनी खुशियों का गला घोटकर अपने छोटे भाई को पढ़ाया लिखाया।
वह पढ़ने में तेज था तो मैंने उसे जयपुर के बड़े कॉलेज में भेजा।
आज वह एक बहुत बड़ी मल्टीसनल कंपनी में अच्छे पद पर काम कर रहा है।
यह तो बहुत अच्छी बात है।
अनुज सुनीता बोली हां मालकिन जी लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती है।
अनुज ने दुखी स्वर में कहा जैसे ही उसकी नौकरी लगी और उनकी शादी हुई वह अपनी पत्नी को लेकर अलग हो गया।
उसने हम गरीबों से मुख मोड़ लिया।
आज उसके पास अपना बड़ा बंगला, गाड़ी, अपार संपत्ति है।
लेकिन वह अपने बूढ़े माता-पिता और भाई को पहचानता तक नहीं।
उसकी संपत्ति हमारे किसी काम की नहीं है।
मेरा दिल उस दिन बहुत टूटा था।
मालकिन जी सुनीता का दिल अनुज की बात सुनकर पसीज गया।
उन्होंने पूछा और तुम्हारी बहन मेरी बहन अभी 12वीं कक्षा में पढ़ रही है।
मैं इस नौकरी से जो पैसे कमाऊंगा उससे बहन की पढ़ाई पूरी कराऊंगा और उसकी शादी करूंगा।
माता-पिता की सेवा करूंगा।
मैंने अभी तक शादी नहीं की क्योंकि पहले मुझे अपने परिवार को संभालना है।
दोस्तों, अनुज की यह दर्द भरी और ईमानदारी से भरी दास्तान सुनकर सुनीता की आंखों में आंसू आ गए।
उन्हें महसूस हुआ कि सतीश के पास अब कुछ होते हुए भी दिल नहीं था।
जबकि इस गरीब के लड़के के पास धन भले ही ना हो लेकिन संस्कारों और आत्मीयता का खजाना था।
दोस्तों सुनीता ने तुरंत कहा अनुजात से तुम्हारी तनख्वाह 35,000 नहीं बल्कि 45,000 होगी।
तुम सिर्फ घर का काम नहीं देखोगे बल्कि इस पूरे बाग बगीचे और मेरी देखभाल की पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी है।
अनुज ने हाथ जोड़कर कहा मालकिन जी आप बहुत दयालु हैं।
भगवान आपको हमेशा खुश रखे।
अनुज जब भी छुट्टी पर अपने गांव या घर जाता तो अपने माता-पिता को अपनी मालकिन के दयालु स्वभाव के बारे में पता था।
अनुज के माता-पिता हर रोज अपनी मालकिन के लिए हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करते और ढेरों दुआएं देते।
दोस्तों जब अनुज आकर सुनीता को बताता कि मालकिन जी मेरे माता-पिता को बहुत दुआएं दे रहे हैं तो सुनीता को ऐसा लगता जैसे उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी दौलत मिल गई हो।
दोस्तों समय बीतता गया अनुज और सुनीता का रिश्ता नौकर और मालकिन के ऊपर ऊपर उठकर एक पवित्र भावना रिश्ते में बदलने लगा था।
सुनीता अनुज में वह बेटा नहीं देखने लगी थी।
जिसकी कमी उन्हें जिंदगी भर सताती रही।
अनुज भी अपनी मालकिन को अपनी मां जैसा सम्मान और स्नेह देता था।
एक दिन दोपहर के समय सतीश शर्मा को अचानक बैंक से किसी जरूरी फाइल के सिलसिले में घर आना पड़ा।
उन्हें लगा कि घर पर हमेशा की तरह सन्नाटा होगा।
दोस्तों सतीश ने जब मुख्य दरवाजा खोला और चुपचाप बडरूम की तरफ बढ़े तो उन्होंने देखा कि उन्हें देखकर उनके होश उड़ गए।
सतीश को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था।
बैडरूम में सुनीता पलंग पर लेटी थी और अनुज पूरी तन्मयता और आदर के साथ अपनी मालकिन के पैर दबा रहा था और उनके सिर की मालिश कर रहा था।
कमरे का माहौल बहुत ही शांत और आत्मीय था।
दोस्तों सतीश का बैंक मैनेजर वाला अहंकार शक तुरंत जाग उठा।
उन्हें लगा कि उनकी गैर मौजूदगी में उनकी पत्नी और नौकर के बीच कुछ गलत या संग रंगीन मिजाजी का चल रहा है।
सतीश का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
वह दरवाजे पर जोर से चिल्लाया।
क्या निजता चल रही है यहां?
अनुज तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई बेडरूम में आकर मालकिन के इतने करीप जाने की?
मैंने तुम्हें झाड़ू पोछा और बागवानी के काम के लिए रखा था।
यह सब हरकतों के लिए नहीं।
अनुज डर के मारे तुरंत पीछे हट गया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
मालिक मालिक आप गलत समझ रहे हैं।
इससे पहले कि सतीश अनुज पर हाथ उठाते या उन्हें जहरीले शब्द बोलते ही सुनीता पलंग से उठी और सतीश के सामने ढाल बनकर खड़ी हो गई।
सुनीता की आंखों में कोई डर या झिझक नहीं थी बल्कि एक अजीब सा स्वाभिमान और दृढ़ता थी।
दोस्तों सुनीता ने कड़क आवाज में कहा, सतीश अपनी जबान को लगाम दीजिए और चिल्लाना बंद कीजिए।
आप जैसा सोच रहे हैं वैसा कुछ भी नहीं है।
अपनी गंदी सोच को अपने पास रखिए।
सतीश से बिफरने हुए कहा, गंदी सोच अपनी आंखों से देख रहा हूं और यह नौकर तुम्हारे बडरूम में क्या कर रहा है?
तुम मुझसे क्या छुपाने की कोशिश कर रही हो?
दोस्तों, सुनीता ने सतीश की आंखों में आंखें डालकर कहा, “मैं कुछ नहीं छुपा रही हूं।
मैं सुन सुन लीजिए।
अब अनुज से मेरा रिश्ता नौकर और मालकिन का नहीं रहा।”
मैं इस लड़के को गोद लेने जा रही हूं और इसे अपना बेटा मानने का फैसला कर चुकी हूं।
यह सुनते ही सतीश के पांव तले जमीन खिसक गई।
क्या गोद लेने जा रही हो?
तुम्हारा दिमाग ठिकाने पर है।
सुनीता एक हमारा नौकर को तुम शर्मा खानदान का वारिस बनाओगी।
सुनीता ने शांत लेकिन कठोर शोर में कहा, हां सतीश आपने मुझे 20 साल में सिर्फ अकेलापन अपेक्षा और धोखा दिया है।
आपने अपनी आधी उम्र की कैशियर नेहा के चक्कर में मुझे बुला दिया।
लेकिन इस लड़के ने जिसे आप नौकर बनाकर लाए थे।
मुझे एक मां का सम्मान दिया है।
इसने बिना किसी स्वार्थ के मेरी सेवा की है।
मेरे दुख को समझा है।
जो बेटा मुझे भगवान ने नहीं दिया, वह बेटा मुझे अनुज के रूप में मिला है।
इसने तेरे शून्य जीवन में बेटे की कमी पूरी कर दी।
सतीश आवाक रह गए।
इसका सच इस तरह उनके सामने आ जाएगा।
इसकी उन्होंने कल्पना नहीं की थी।
वह हकलाते हुए बोले तुम यह फैसला अकेले कैसे ले सकते हो?
क्या तुमने मुझसे सलाह ली?
दोस्तों सुनीता ने मुस्कुराकर कहा सलाह मैं आपसे सलाह मांग नहीं रही हूं।
सतीश मैं आपको अपना अंतिम निर्णय बता रही हूं।
दोस्तों अनुज अपने माता-पिता और बहन को लेकर जयपुर के उस विशाल बंगले में आ गया जिस बंगले में अपनी वीरानी और अकेलापन छाया रहता था।
आज वहां हंसी खुशी और चहल-पहल थी।
अनुज की बहन का दाखिला जयपुर के एक बेहतरीन स्कूल में करा दिया गया।
अनुज के माता-पिता को कहने रहने के लिए बंगले का एक सुंदर हिस्सा दे दिया।
दूसरी ओर बैंक मैनेजर सतीश शर्मा का जीवन वैसा ही रहा।
वह अपनी अय्याशी और बैंक कैशियर नेहा के साथ अपने खोखले रिश्ते में उलझे रहे लेकिन उन्हें इस बात का एहसास जरूर हो गया था कि उन्होंने धन और वासना के चक्कर में एक सच्चा परिवार वफादार पत्नी एक सच्चा बेटा खो दिया था।
अब घर पर उनका हुक्म नहीं चलता था बल्कि सुनीता और अनुज का प्यार भरा राज था।
दोस्तों, यह कहानी हमें यह सिखाती है कि रक्त के रिश्ते भी बड़े हमेशा बड़े नहीं होते बल्कि भावना नियत और संस्कारों के रिश्ते उससे भी कहीं ज्यादा गहरे होते हैं।
जहां एक तरफ सतीश शर्मा ने सब कुछ रोते हुए अपने चरित्र और जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया।
वहीं दूसरी तरफ अनुज ने अपनी ईमानदारी, निष्ठा, निस्वार्थ सेवा से यह पूरे परिवार का दिल जीत लिया और टॉपर से बेटे का दर्जा हासिल किया।
दोस्तों, कहानी कैसी लगी कमेंट में जरूर बताइए।
मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में।
तब तक के लिए, धन्यवाद।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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