सड़क पर पंचर जोड़ रहे UPSC छात्र के साथ खूबसूरत विधवा SDM महिला ने जो किया देखकर सभी दंग रह गए…
सड़क पर पंचर जोड़ रहे UPSC छात्र के साथ खूबसूरत विधवा SDM महिला ने जो किया देखकर सभी दंग रह गए…
अभिमन्यु जब भी अपने गांव की टूटी हुई पगडंडी पर नंगे पांव चलता था तो उसकी नजर हमेशा दूर आसमान की तरफ उठ जाती थी। उसे लगता था कि इंसान की भी उसी आसमान की तरह होती है। जितनी दूर दिखती है उतनी ही बड़ी भी होती है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि कोई उस तक पहुंचने की कोशिश करता है और कोई रास्ते में ही हार मान लेता है।
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव देवपुर में रहने वाला अभिमन्यु भी हजारों गरीब बच्चों की तरह पैदा हुआ था। लेकिन उसके सपने हजारों बच्चों जैसे नहीं थे। उसके पिता रामस्वूप गांव के बड़े किसानों के खेतों में मजदूरी करते थे। सुबह सूरज निकलने से पहले घर से निकल जाते और रात को थके हुए शरीर के साथ लौटते। उनकी हथेलियों की दरारें इस बात की गवाही देती थीं कि उन्होंने जिंदगी भर सिर्फ मेहनत की है। उसकी मां सरस्वती गांव के चार-पांच घरों में बर्तन मांझती थी और रात को लालटेन की पीली रोशनी में सिलाई करती थी ताकि घर का चूल्हा किसी तरह जलता रहे। उनका मिट्टी का छोटा सा घर बरसात में टपकता था। गर्मियों में तपता था और सर्दियों में ठंड से कांपता था। लेकिन उस घर के भीतर एक सपना पल रहा था जो किसी महल से भी बड़ा था। वह सपना था अभिमन्यु को एक दिन भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी बनते देखने का।
बचपन से ही अभिमन्यु पढ़ाई में असाधारण था। गांव का सरकारी स्कूल था जहां ना ठीक से बेंच थी, ना पंखे और ना ही पर्याप्त किताबें। कई बार तो अध्यापक भी पूरे सप्ताह में दो या तीन दिन ही आते थे। लेकिन अभिमन्यु ने कभी शिकायत नहीं की। वो स्कूल से लौट कर पेड़ के नीचे बैठ जाता और पुरानी किताबें पढ़ता रहता। गांव के लोग अक्सर उसका मजाक उड़ाते थे। कोई कहता गरीब का बेटा कलेक्टर बनेगा तो कोई हंसकर कह देता पहले दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर लें फिर अफसर बनने का सपना देखना। अभिमन्यु हर ताने को मुस्कुरा कर सुन लेता। उसे मालूम था कि सपनों का जवाब शब्दों से नहीं बल्कि मेहनत से दिया जाता है।

एक दिन स्कूल के प्रधानाचार्य ने पूरी कक्षा से पूछा कि बड़े होकर क्या बनना चाहिए? मैं पुलक बनूंगी। किसी ने पुलिस वाला कहा, किसी ने शिक्षक तो किसी ने दुकान खोलने की बात कही। लेकिन जब अभिमन्यु की बारी आई तो उसने बिना झिझक कहा, “मैं आईएएस अधिकारी बनना चाहता हूं।” पूरी कक्षा हंस पड़ी। कुछ बच्चे तो पेट पकड़ कर हंसने लगे। प्रधानाचार्य भी कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने अभिमन्यु के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “सपना बड़ा है बेटा। लेकिन मेहनत उससे भी बड़ी करनी पड़ेगी।”
उसी दिन अभिमन्यु ने मन ही मन संकल्प लिया कि चाहे जिंदगी कितनी भी कठिन क्यों ना हो जाए वो अपने इस सपने से कभी पीछे नहीं हटेगा। समय धीरे-धीरे बीतता गया। उसने 10वीं में पूरे जिले में शानदार अंक प्राप्त किए। गांव में पहली बार किसी गरीब मजदूर के बेटे का नाम अखबार में छपा था। लोग उसके घर बधाई देने आए। लेकिन बधाई के साथ ताने भी खत्म नहीं हुए। कोई कहता 12वीं तक तो पढ़ लिया अब कमाने लग जा। कोई कहता गरीब आदमी के बच्चों को इतने बड़े सपने नहीं देखने चाहिए। मगर रामस्वूप हर बार एक ही बात कहते मेरा बेटा पढ़ेगा जरूर पढ़ेगा। 12वीं की परीक्षा आई अभिमन्यु ने दिन रात एक कर दिया। रात को जब पूरा गांव सो जाता तब भी उसके घर की लालटेन जलती रहती। उसकी मां कई बार कहती, बेटा थोड़ा सो जा आंखें खराब हो जाएंगी। लेकिन वह मुस्कुरा कर कहता, “मां अभी सो गया तो सपना जागते-गते ही टूट जाएगा।” परीक्षा खत्म हुई और परिणाम आया तो पूरे जिले में पहला स्थान अभिमन्यु का था। गांव में पहली बार किसी ने मिठाई बांटी जो खुद दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करता था।
बेटा अब तुझे शहर जाकर पढ़ना होगा। गांव में रहकर तू अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाएगा। यह बात सुनकर अभिमन्यु का चेहरा खिल उठा। लेकिन अगले ही पल वह उदास हो गया क्योंकि उसे पता था कि शहर जाने के लिए पैसे चाहिए और उनके घर में तो खाने के पैसे भी मुश्किल से आते थे। उस रात रामस्वूप और सरस्वती देर तक जागते रहे। दोनों के बीच लंबी चुप्पी थी। आखिर रामस्वूप ने कहा, “अगर मैं सरपंच जी से उधार मांग लूं, तो शायद बात बन जाए।” अगले ही दिन वह गांव के सरपंच के घर पहुंचे। आप मुझे कुछ रुपए उधार दे दीजिए। मैं आपके खेतों में मजदूरी करके एक-एक पैसा चुका दूंगा। सरपंच कुछ देर तक उन्हें देखते रहे। फिर मुस्कुरा कर बोले, तुम्हारा बेटा सिर्फ तुम्हारा नहीं पूरे गांव का बेटा है। अगर वह अफसर बनेगा, तो हमारे गांव का नाम रोशन करेगा। और पैसे लेकर घर लौट आए।
घर पहुंचकर जैसे ही उन्होंने पैसे अभिमन्यु के हाथ में रखे और सारी बात बताई तो अभिमन्यु की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने अपने पिता के खुरदरे हाथ पकड़ लिए। उन हाथों पर पड़े छाले उसे किसी किताब से ज्यादा बड़ा पाठ पढ़ा रहे थे। वो फूट-फूट कर रो पड़ा। बाबूजी आपने मेरे लिए अपना सिर झुका दिया। मैं वादा करता हूं आपका यह त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाने दूंगा। मैं चाहे कितनी भी मुश्किलों से गुजरू लेकिन एक दिन आईएएस बनकर ही लौटूंगा। बेटा हमें अमीरी नहीं चाहिए। बस तू अच्छा इंसान बन जा ना। कुछ दिनों बाद गांव से शहर जाने का दिन आ गया। पूरा गांव बस अड्डे तक उसे छोड़ने आया। उसकी मां ने उसके बैग में अपने हाथों से बने परांठे रखे। समय पर खाना खा लेना। रामस्वूप ने उसकी पीठ थपथपाई लेकिन उनकी आंखों की नमी छिप नहीं सकी। बस धीरे-धीरे गांव से दूर निकल गई और अभिमन्यु खिड़की से अपने गांव को तब तक देखता रहा जब तक वो आंखों से ओझल नहीं हो गया। उसके मन में सिर्फ एक ही बात गूंज रही थी कि अब पीछे मुड़कर नहीं देखना है।
शहर पहुंचकर उसने सबसे पहले रहने के लिए सस्ता कमरा ढूंढा। कई घंटे भटकने के बाद उसे एक पुरानी बस्ती में छोटा सा कमरा मिला। जिसमें एक टूटी चारपाई, एक बल्ब और एक छोटी सी खिड़की थी। कमरे की दीवारों पर सीलन थी। लेकिन अभिमन्यु के लिए वही कमरा किसी महल से कम नहीं था। क्योंकि वहीं से उसके सपनों की असली शुरुआत होने वाली थी।
अगले दो-तीन दिन उसने शहर को समझने में बिताए। लेकिन जल्दी ही उसे एहसास हो गया कि गांव से लाए हुए पैसे ज्यादा दिन नहीं चलेंगे। उसने तय किया कि पढ़ाई के साथ कोई काम भी करना होगा। अगले दिन सुबह वह नौकरी की तलाश में निकल पड़ा। उसने होटल में पूछा, दुकान में पूछा, गोदाम में पूछा। लेकिन हर जगह एक ही जवाब मिला कि पढ़ाई करने वाले लड़के काम ठीक से नहीं कर पाते। शाम तक उसके पैर जवाब दे चुके थे। लेकिन उसे कहीं काम नहीं मिला। सूरज ढलने लगा था। वह निराश होकर शहर से बाहर की सड़क तभी उसकी नजर सड़क किनारे एक छोटी सी पंचर की दुकान पर पड़ी। जहां एक बुजुर्ग आदमी अकेले बैठे किसी साइकिल का टायर जोड़ रहे थे। अभिमन्यु कुछ पल उन्हें देखता रहा। उसके मन में उम्मीद की एक छोटी सी किरण जगी।
बुजुर्ग ने अपने हाथ का काम रोक कर धीरे-धीरे सिर उठाया। उनके माथे पर पसीने की बूंदे थी। चेहरे पर उम्र की झुर्रियां थी। लेकिन उन्होंने सामने खड़े दुबले पतले लड़के को ऊपर से नीचे तक देखा। अभिमन्यु के कपड़े साधारण थे। पैरों में घिसी हुई चप्पल थी और कंधे पर एक पुराना बैग टंगा हुआ था। बेटा तुम्हें पंचर जोड़ना आता है? नहीं बाबा। लेकिन सीख सकता हूं। मैं कोई भी मेहनत करने से पीछे नहीं हटूंगा। मुझे बस इतना काम चाहिए जिससे मैं अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल सकूं। मुझे किसी नौकर की जरूरत तो नहीं है। लेकिन तुम्हारी आंखों में झूठ नहीं दिख रहा। पहले बैठो और बताओ कौन हो? कहां से आए हो? अभिमन्यु वहीं रखी लकड़ी की बेंच पर बैठ गया। उसने गांव से लेकर शहर तक की पूरी कहानी बिना कुछ छिपाए सुना दी। उसने बताया कि उसके पिता खेतों में मजदूरी करते हैं। मां लोगों के घरों में बर्तन धोती है और सिलाई करके घर चलाती है। उसने यह भी बताया कि पिता ने गांव के सरपंच से कर्ज लेकर उसे शहर भेजा है और वह किसी भी हालत में उनका भरोसा टूटने नहीं देगा। कहानी सुनते-सुनते बुजुर्ग की आंखें नम हो गई। उन्होंने अपने गमचे से आंखें पोंछी और मुस्कुरा कर बोले बेटा मेरा नाम हरि नारायण है। लोग मुझे हरि बाबा कहते हैं। मेरी अपनी कोई संतान नहीं है। तुम्हें मेरे पास भेजा है। उसने तुरंत झुककर हरि बाबा के पैर छू लिए। हरि बाबा ने उसे उठाकर गले लगा लिया और बोले लेकिन एक बात याद रखना मेहनत में कभी बेईमानी मत करना।
अगले ही दिन से अभिमन्यु ने दुकान संभालनी शुरू कर दी। शुरुआत में उसे कुछ भी नहीं आता था। हरी बाबा उसे धैर्य से हर काम सिखाते थे। टायर निकालना, ट्यूब में हवा भरना, पानी में डुबोकर छेद ढूंढना, रबर घिसना, सॉल्यूशन लगाना, पैच चिपकाना और फिर दोबारा फिट करना। पहले दिन उसने एक पंचर लेकिन हरी बाबा ने उसे डांटा नहीं। उन्होंने कहा, धीरे-धीरे हाथ बैठ जाएगा। सचमुच कुछ ही दिनों में अभिमन्यु का हाथ इतना साफ हो गया कि वह बड़े से बड़ा पंचर भी मिनटों में जोड़ देता था। उसकी मेहनत देखकर ग्राहक भी खुश रहने लगे। दिन भर वह काम करता और जब दुकान पर कोई ग्राहक नहीं होता तो वह चारपाई पर बैठकर अपनी मोटी-मोटी यूपीएससी की किताबें खोल लेता। सड़क से गुजरने वाले लोग उसे हैरानी से देखते। कोई कहता पहली बार ऐसा पंचर वाला देखा है जो संविधान पढ़ रहा है। कोई हंस देता लगता है यह सीधे कलेक्टर बनकर ही दुकान छोड़ेगा। लेकिन अभिमन्यु किसी की बात पर ध्यान नहीं देता। उसके लिए हर खाली मिनट कीमती था। रात को वह अपने छोटे से कमरे में लौटता, थोड़ा सा खाना बनाता और देर रात तक पढ़ाई करता। कई बार आंख लग जाती तो किताब पर ही सिर टिक जाता। लेकिन सुबह सूरज निकलने से पहले वह फिर उठ खड़ा होता। गांव में उसकी मां रोज भगवान से प्रार्थना करती और पिता हर शाम किसी ना किसी से अपने बेटे की चर्चा करते। उन्हें अपने बेटे पर अटूट विश्वास था। उधर शहर में अभिमन्यु धीरे-धीरे हरि बाबा के परिवार जैसा बन चुका था। हरी बाबा उसे बेटा कहकर बुलाने लगे थे।
एक दोपहर का समय था। जून की तेज धूप सड़क को तपते तवे की तरह गर्म कर रही थी। दुकान के सामने दूर-दूर तक सन्नाटा था। हरी बाबा किसी जरूरी काम से पास के बाजार गए हुए थे और दुकान पर सिर्फ अभिमन्यु था। उसने एक चारपाई पर अपनी किताबें फैला रखी थी और भारतीय संविधान के अनुच्छेदों का अध्ययन कर रहा था। तभी दूर से लाल नीली बत्ती वाली एक काली सरकारी एसयूवी तेजी से आती दिखाई दी। गाड़ी के आगे बड़े अक्षरों में एसडीएम लिखा हुआ था। अचानक गाड़ी हिचकोले खाने लगी और सड़क किनारे रुक गई। ड्राइवर नीचे उतरा और उसने देखा कि पिछले पहहिए में पंचर हो चुका था। कुछ ही क्षण बाद गाड़ी का पिछला दरवाजा खुला। उसमें से लगभग 28 वर्ष की एक बेहद सुंदर, आत्मविश्वासी और गरिमामई महिला बाहर उतरी। उसने हल्के क्रीम रंग की सादी लेकिन बेहद आकर्षक सूती साड़ी पहन रखी थी। चेहरे पर कोई बनावटीपन नहीं था। आंखों में तेज था और व्यक्तित्व ऐसा कि सामने वाला अनायास ही सम्मान से सिर झुका दे। वह थी जिले की नई एसडीएम अंजलि। अंजलि ने आसपास नजर दौड़ाई। ड्राइवर, गाड़ी का पंचर ठीक करवा लो। वे समझ गए कि अब कर्तव्य का समय है। मैं तब तक यहीं पेड़ की छांव में खड़ी हूं। ड्राइवर ने सिर हिलाया और गाड़ी धीरे-धीरे पंचर की दुकान तक ले आए। उसने अभिमन्यु से कहा, भाई साहब जल्दी से पंचर बना दीजिए। मैडम को मीटिंग में जाना है। अभिमन्यु ने बिना समय गवाए काम शुरू कर दिया। वो पूरी लगन से टायर खोलने लगा।
उसी दौरान अंजलि की नजर चारपाई पर रखी मोटी यूपीएससी की किताबों पर पड़ी और किताबों को देखते हुए बोली, “यह किताबें तुम्हारी हैं।” अभिमन्यु ने सिर उठाकर पहली बार अंजलि को गौर से देखा। एक पल के लिए वह उनकी सादगी और व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ। लेकिन अगले ही क्षण उसने संयमित होकर कहा, जी मैडम मेरी ही है। अंजलि ने अगला प्रश्न किया, तुम इन्हें पढ़ते हो? अभिमन्यु मुस्कुराया। जी, मैं यूपीएससी की तैयारी कर रहा हूं। अंजलि कुछ क्षण चुप रह गई। उसने सोचा शायद लड़का शौक में किताबें रखता होगा। उसने वहीं से एक किताब उठाई और भारतीय राज व्यवस्था से जुड़ा एक कठिन प्रश्न पूछ लिया। अभिमन्यु ने बिना किताब देखे इतने सरल और तार्किक तरीके से उत्तर दिया कि अंजलि की भौहें आश्चर्य से उठ गई। उसने तुरंत दूसरा प्रश्न पूछा। फिर इतिहास, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े सवाल। सरलता ही किसी भी कठिन सवाल का सबसे सही जवाब होती है। और मेरी मेहनत ही मेरी असलियत को साबित करती है। अंजलि के मन में पहली बार यह विचार आया कि प्रतिभा सचमुच परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती। उसने देखा कि अभिमन्यु एक हाथ से टायर पर काम कर रहा है और दूसरे हाथ से किताब का पन्ना मोड़कर याद किए हुए बिंदु दोहरा रहा है। उसके चेहरे पर संघर्ष था लेकिन शिकायत का एक भी भाव नहीं था। पंचर तैयार हो गया। अभिमन्यु ने टायर दोबारा फिट किया और ड्राइवर से कहा, “अब गाड़ी बिल्कुल ठीक है।” ड्राइवर ने पैसे निकालने चाहे। लेकिन अंजलि ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया। वह खुद अभिमन्यु के सामने आई और बोली, “तुम दिनभर यही काम करते हो?” अभिमन्यु ने विनम्रता से जी मैडम दिन में काम करता हूं और रात में पढ़ाई। उसकी निष्ठा देख अंजलि दंग रह गई। जब दुकान खाली रहती है तो यही किताबें पढ़ लेता हूं। अंजलि कुछ क्षण तक उसे देखती रही। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके सामने खड़ा यह युवक केवल अपने लिए नहीं बल्कि अपने पूरे परिवार के सपनों के लिए लड़ रहा हो। उसने अपने पर्स से एक छोटा सा विजिटिंग कार्ड निकाला। अगर पढ़ाई के दौरान कभी किताबों, नोट्स या किसी मार्गदर्शन की जरूरत पड़े तो बिना झिझक मेरे ऑफिस आ जाना। अभिमन्यु एक पल के लिए चौंका। उसने दोनों हाथों से कार्ड लिया और बोला धन्यवाद मैडम। मैं पैसों की मदद नहीं लूंगा लेकिन अगर पढ़ाई में कभी मार्गदर्शन की जरूरत पड़ी तो जरूर आऊंगा। यही आत्मसम्मान तुम्हें बहुत आगे लेकर जाएगा। अंजलि के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। उसने कहा, यही आत्मसम्मान तुम्हें बहुत आगे लेकर जाएगा।
इतना कहकर वो गाड़ी चली गई। लेकिन अंजलि की नजरें बार-बार रियर व्यू मिरर में उसी पंचर की दुकान की ओर लौट रही थीं। दूसरी तरफ अभिमन्यु ने एक कार्ड को बड़ी सावधानी से अपनी किताब के बीच रख दिया। और फिर चुपचाप अगले ग्राहक का इंतजार करने लगा। उसे क्या पता था कि आज की यह छोटी सी मुलाकात उसकी पूरी जिंदगी की दिशा बदलने वाली थी। वहीं दूसरी ओर ऑफिस पहुंचते ही अंजलि के मन में बार-बार उसी मेहनती युवक का चेहरा घूमने लगा। आखिर उसने तुरंत अपनी मेज पर रखा इंटरकॉम उठाया और आदेश दिया मेरे दो विश्वसनीय अधिकारियों को तुरंत मेरे कमरे में भेजिए। मुझे उस लड़के के बारे में पूरी जानकारी चाहिए। वह कौन है? कहां से आया है? उसका परिवार कैसा है? और क्या वो वास्तव में यूपीएससी की तैयारी कर रहा है? लेकिन ध्यान रहे उसे इस बात का जरा भी एहसास नहीं होना चाहिए कि उसकी जानकारी जुटाई जा रही है। दोनों अधिकारियों ने सिर झुकाकर आदेश स्वीकार किया और तुरंत निकल पड़े। अंजलि कुर्सी पर बैठी रही लेकिन उसकी आंखों के सामने रिश्ते से सने हाथ, चारपाई पर रखी मोटी-मोटी ताबें और कठिन से कठिन प्रश्नों का सहज उत्तर देता हुआ अभिमन्यु उसे याद आ रहा था। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए उसने हजारों लोगों से मुलाकात की थी। लेकिन किसी ने उस पर ऐसा प्रभाव कभी नहीं छोड़ा था।
आइए शाम ढलते ढलते दोनों अधिकारी वापस लौट आए। उन्होंने अभिमन्यु की पूरी जानकारी एक फाइल में रखकर अंजलि के सामने रख दी। अंजलि ने फाइल खोली और पढ़ना शुरू किया। उसमें लिखा था आर्थिक तंगी के कारण वह शहर आकर पंचर की दुकान पर काम करता है और साथ ही यूपीएससी की तैयारी करता है। किसी प्रकार की आपराधिक या संदिग्ध जानकारी उसके बारे में नहीं मिली। फाइल बंद करते हुए अंजलि की आंखों में सम्मान झलक रहा था। देश को ऐसे ही युवाओं की जरूरत है। उसी रात अंजलि देर तक सो नहीं सकी। वो अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी आसमान को देखती रही। उसके मन में अपने बीते हुए जीवन की यादें भी ताजा हो गई। कुछ वर्ष पहले ही एक सड़क दुर्घटना में उसने अपने पति को खो दिया था। उस घटना के बाद उसने खुद को पूरी तरह अपने काम में झोंक दिया था। लोगों की सेवा ही उसकी जिंदगी का उद्देश्य बन गई थी। लेकिन आज पहली बार किसी अनजान युवक का संघर्ष उसके दिल को इस तरह छू गया था। अगली सुबह उसने बिना किसी सरकारी काफिले के अपनी निजी कार निकाली। इस बार उसके साथ केवल ड्राइवर था। उसने जानबूझकर सरकारी लाल बत्ती वाली गाड़ी नहीं ली। ताकि किसी का ध्यान उसकी ओर ना जाए। अगर कोई पूछे तो कहना कि गाड़ी में हल्की खराबी आ गई थी।
कुछ देर बाद कार फिर उसी पंचर की दुकान के सामने आकर रुकी। अभिमन्यु उस समय एक मोटरसाइकिल का टायर खोल रहा था। उसने सिर उठाकर देखा तो सामने वही महिला खड़ी थी जिससे उसकी मुलाकात एक दिन पहले हुई थी। नमस्ते मैडम। वो तुरंत उठ खड़ा हुआ और आदरपूक बोला अंजलि मुस्कुरा कर बोली लगता है मेरी गाड़ी फिर नाराज। अभिमन्यु तुरंत काम में लग गया। उसने बोनट खोला, इंजन देखा और कुछ ही मिनटों में छोटी जानती थी कि खराबी मामूली है। वह तो केवल उससे मिलने का बहाना था। गाड़ी ठीक होने के बाद दोनों कुछ क्षण अभिमन्यु तुम्हारी सबसे बड़ी परेशानी क्या है? पढ़ाई के लिए अच्छी किताबें और सही मार्गदर्शन। मेहनत करने से मुझे कभी डर नहीं लगा। उसे सिर्फ अवसर की तलाश थी। लेकिन कई बार कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन्हें समझाने वाला कोई नहीं होता। अंजलि ने अपने बैग से एक नया विजिटिंग कार्ड निकाला। इस बार कार्ड के पीछे उसने अपने हाथ से एक मोबाइल नंबर भी लिख दिया। उसने कार्ड अभिमन्यु को देते हुए कहा, जब भी जरूरत महसूस हो सीधे मेरे ऑफिस आ जाना। अगर किताबें चाहिए हो, नोट्स चाहिए हो या किसी विषय में मार्गदर्शन चाहिए हो तो संकोच। लेकिन एक बात याद रखना मैं तुम्हें सफलता नहीं दे सकती। मेहनत तुम्हें ही करनी होगी। अभिमन्यु ने दोनों हाथों से कार्ड लिया और गंभीर स्वर में बोला, “मैड, मैं किसी से पैसे नहीं लेना चाहता। मेरे पिता ने मुझे आत्मसम्मान सिखाया है। अगर आप पढ़ाई में मदद करेंगी, तो मैं जीवन भर आपका आभारी रहूंगा।” अंजलि मुस्कुराई और बोली, “मुझे भी पैसों की बात नहीं करनी।” मैं सिर्फ तुम्हारे सपनों को मंजिल तक पहुंचते देखना चाहती हूं। इतना कहकर वह चली गई।
अगले कुछ दिन अभिमन्यु पहले की तरह अपने काम और पढ़ाई में जुट गया। लेकिन अब उसके मन में एक नई उम्मीद थी। उसने कार्ड अपनी सबसे कीमती किताब के बीच संभाल कर रखा। कुछ दिनों बाद उसे भारतीय अर्थव्यवस्था और निबंध लेखन की कुछ महंगी किताबों की जरूरत पड़ी। उसने कई दुकानों पर कीमत पूछू लेकिन वे उसकी पहुंच से बाहर थी। उसी रात वह देर तक अपने कमरे में बैठा सोचता रहा। अंत में उसे अंजलि की बात याद आई। जरूरत हो तो मेरे ऑफिस आ जाना। अगले दिन सुबह उसने हिम्मत जुटाई और पहली बार एसडीएम कार्यालय पहुंच गया। विशाल सरकारी भवन, सुरक्षा गार्ड, कर्मचारियों की आवाजी और लंबी कतारें देखकर वह कुछ पल के लिए घबरा गया। उसने रिसेप्शन पर जाकर अपना नाम बताया। जैसे ही कर्मचारी ने अंजलि को सूचना दी, उन्हें सीधे मेरे कमरे में भेज दीजिए। अभिमन्यु धीरे-धीरे अंदर पहुंचा। मुझे पूरा विश्वास था कि एक दिन तुम जरूर आए। मैडम, मुझे कुछ किताबों की जरूरत है और कुछ विषय समझ नहीं आ रहे थे। अंजलि ने बिना देर किए उसे अपने कार्यालय के पीछे बने एक शांत अध्ययन कक्ष में ले गई। कमरा देखकर अभिमन्यु कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गया। चारों तरफ बड़ी-बड़ी अलमारियां थीं। जिनमें यूपीएससी की सैकड़ों किताबें करीने से रखी थीं। भारत का बड़ा नक्शा दीवार पर टंगा था। एक मजबूत अध्ययन मेज, नोट्स, पिछले वर्षों के प्रश्न पत्र, पत्रिकाएं और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी लगभग हर जरूरी सामग्री वहां मौजूद थी। यह कमरा अब तुम्हारे लिए खुला रहेगा। जब चाहो यहां आकर पढ़ सकते हो। यहां कोई तुम्हें परेशान नहीं करेगा। अगर किसी विषय में कठिनाई हो तो मैं अपने परिचित शिक्षकों से तुम्हारी मदद करवाऊंगी। मैडम आपने मेरे लिए इतना सब क्यों किया? क्योंकि प्रतिभा को अवसर मिलना चाहिए। अगर तुम्हारे जैसे लड़के केवल पैसों की कमी के कारण पीछे रह जाएंगे तो नुकसान सिर्फ तुम्हारा नहीं पूरे देश का होगा। अब भावुक होने का समय नहीं है। यहां बैठो और पढ़ाई शुरू करो। अभिमन्यु ने उसी दिन से उस अध्ययन कक्ष को अपना दूसरा घर बना लिया। सुबह कुछ घंटे पंचर की दुकान पर काम करता। फिर दोपहर और शाम अध्ययन कक्ष में पढ़ता। अंजलि समय-समय पर आकर उसकी प्रगति पूछती। कभी किसी कठिन विषय पर चर्चा करती तो कभी कोई नई किताब उसके धीरे दोनों के बीच गहरा विश्वास और सम्मान का रिश्ता बनने लगा। लेकिन शहर में हर कोई इस संबंध को उसी नजर से नहीं देख रहा था। कुछ स्वार्थी लोग कानाफूसी करने लगे कि एसडीएम एक साधारण पंचर वाले लड़के पर इतना ध्यान क्यों दे रही है? कुछ कर्मचारियों ने बातें बनानी शुरू कर दी। मैडम आपके फैसले पर दफ्तर में बातें हो रही हैं। जिस दिन लोगों की बातों से डरकर प्रतिभा की मदद करना छोड़ दूंगी, उस दिन इस कुर्सी पर बैठने का कोई अधिकार नहीं रहेगा।
दूसरी ओर अभिमन्यु इन सब बातों से बिल्कुल अनजान था। उसका पूरा ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर था। उसे नहीं पता था कि उसकी जिंदगी का सबसे कठिन और सबसे महत्वपूर्ण सफर अब शुरू होने वाला है। लेकिन अभी बदलते रहे लेकिन अभिमन्यु च्या कभी नहीं बदली। सुबह सूरज निकलने से पहले वह उठ जाता। थोड़ी देर योग और दौड़ लगाता। फिर अपनी पुरानी डायरी में उस दिन का लक्ष्य लिखता। उसके बाद कुछ घंटे हरी बाबा की पंचर की दुकान पर काम करता। हर ग्राह कर पेश आता। धन्यवाद आपकी साइकिल ठीक हो गई है। किसी की साइकिल हो, मोटरसाइकिल हो या ट्रैक्टर का भारी टायर। वो पूरी लगन से अपना काम करता। दोपहर होते ही वह सीधे एसडीएम कार्यालय के अध्ययन कक्ष में पहुंच जाता और देर शाम तक पढ़ाई में डूबा रहता। रात को अपने छोटे से कमरे में लौटकर दिन भर पड़े हुए विषयों का दोहराव करता। कई बार रात के 2-2 बजे तक उसकी मेज पर रखा छोटा सा बल्ब जलता रहता। कमरे की दीवार पर उसने एक कागज चिपका रखा था। जिस पर लिखा था आज की मेहनत ही कल की पहचान बनेगी। जब भी उसका मन थकता वो उसी कागज को देखता और फिर किताब खोल कर बैठ जाता। दूसरी ओर गांव में रामस्वूप और सरस्वती हर महीने किसी तरह थोड़ा बहुत पैसा बचाकर उसे भेज देते। कई बार वे खुद आधा पेट खाकर रहते। लेकिन बेटे को कभी इसकी भनक नहीं लगने देते। अभिमन्यु भी यह समझता था कि घर की हालत अच्छी नहीं है इसलिए उसने अपने खर्चे से जितना हो सके कम कर दिए थे। वो पुराने कपड़े पहनता, सादा खाना खाता और अनावश्यक खर्च से हमेशा बचता। उधर अंजलि समय-समय पर उसकी तैयारी का आकलन करती रहती। कभी वह मॉक इंटरव्यू करवाती, कभी उत्तर लेखन की कॉपियां जांचती और कभी किसी वरिष्ठ अधिकारी से उसकी चर्चा करवा देती। लेकिन उसने कभी अभिमन्यु को कोई विशेष सुविधा नहीं दी। अगर तुम्हें अधिकारी बनना है तो अपनी मेहनत के दम पर बनो। किसी की सिफारिश पर नहीं। अभिमन्यु भी यही चाहता था। उसके कि वह सफलता का एक भी अंग बिना योग्यता के नहीं लेना चाहता था।
देखते-देखते यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा का दिन आ गया। परीक्षा केंद्र के बाहर हजारों अभ्यर्थी खड़े थे। किसी के हाथ में नोट्स थे। कोई अंतिम समय तक किताबें पलट रहा था। कोई घबराकर इधर-उधर टहल रहा था। लेकिन अभिमन्यु शांत था। उसने परीक्षा भवन में प्रवेश करने से पहले अपनी मां की दी हुई तस्वीर को हाथ लगाया और मन ही मन अपने माता-पिता तथा हरी बाबा का आशीर्वाद याद किया। परीक्षा समाप्त हुई। बाहर निकलते ही कई छात्र उत्तरों पर चर्चा करने लगे। लेकिन अभिमन्यु बिना कुछ बोले सीधे अपने कमरे में चला गया। कुछ सप्ताह बाद परिणाम घोषित हुआ। प्रारंभिक परीक्षा में उसका चयन हो चुका था। उसने सबसे पहले गांव फोन किया। उधर रामस्वूप की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। सरस्वती बार-बार भगवान का धन्यवाद करने लगी। हरी बाबा ने दुकान पर आने वाले हर ग्राहक को मुफ्त चाय पिलाई। लेकिन अभिमन्यु जानता था कि असली परीक्षा अभी बाकी है। अब मेंस की तैयारी पहले से भी कठिन थी। उसने दिन रात का अंतर लगभग खत्म कर। उत्तर लेखन का अभ्यास, अखबारों का विश्लेषण, नैतिक्स, इतिहास हर विषय पर वो घंटों मेहनत करता। कई बार उसकी आंखें लाल हो जाती। हाथ दर्द करने लगते। लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की। अभिमन्यु थोड़ी देर आराम कर लो। मैडम अभी रुक गया तो मंजिल दूर हो जाएगी। उसने मुस्कुरा कर कहा। आखिरकार मेंस परीक्षा भी समाप्त हुई। कुछ महीनों की प्रतीक्षा के बाद उसका परिणाम आया और इस बार भी उसका नाम सफल अभ्यर्थियों की सूची में था। अब अंतिम चरण यानी इंटरव्यू बचा था। याद रखना इंटरव्यू में किताबें नहीं तुम्हारा व्यक्तित्व परखा जाएगा। वहां बनावटी जवाब मत देना। जो सच है वही कहना। अभिमन्यु ने उनकी बात गांठ बांध ली।
इंटरव्यू का दिन भी आ गया। दिल्ली के धौलपुर हाउस के बाहर खड़े होकर उसने एक गहरी सांस ली। जब उसका नाम पुकारा गया तो वह आत्मविश्वास के साथ अंदर गया। बोर्ड के सदस्यों ने उससे प्रशासन, संविधान, ग्रामीण विकास, कृषि, पर्यावरण, अंतरराष्ट्रीय संबंध और नैतिकता से जुड़े कई कठिन प्रश्न पूछे। अगर तुम्हें पूरा बोर्ड उसकी वित्त हुआ। तुमने पंचर की दुकान पर काम क्यों किया? अभिमन्यु मुस्कुराया और बोला, “सर, काम छोटा या बड़ा नहीं होता। ईमानदारी से कमाया गया हर रुपया सम्मान देता है। तो शायद आज यहां बैठने का आत्मा मेरे पास ना होता। धन्यवाद। अब आप जा सकते हैं।” बोर्ड के सभी सदस्य नजर आए। इंटरव्यू समाप्त होने के बाद अभिमन्यु बाहर निकला तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। उसने महसूस किया कि उसने अपनी पूरी क्षमता से प्रयास किया है। अब परिणाम भगवान और उसकी मेहनत पर निर्भर था। कुछ सप्ताह बाद पूरे देश की नजर अंतिम परिणाम पर थी। हरी बाबा ने उस दिन दुकान दुकान जल्दी बंद कर दी थी। अंजलि अपने कार्यालय में थी लेकिन उनका ध्यान किसी फाइल में नहीं लग रहा था। दोपहर ठीक 12:00 बजे परिणाम घोषित हुआ। जैसे ही सूची खुली सबसे ऊपर लिखा था अभिमन्यु रामस्वूप कुछ क्षणों के लिए जैसे समय थम गया। फिर पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। लोग चिल्लाते हुए रामस्वरूप के घर पहुंचने लगे। किसी ने ढोल मंगवा लिया। किसी ने मिठाइयां बांटनी शुरू कर दी। सरस्वती खुशी से रोती जा रही थी और बार-बार कह रही थी मेरा बेटा अफसर बन गया। रामस्वूप ने कांपते हाथों से आ धन्यवाद किया। शहर में हरी बाबा की आंखों से भी आंसू बह निकले। आज मेरे बेटे ने मेरी दुकान का नाम ही ऊंचा कर दिया।
दूसरी ओर एसडीएम कार्यालय में जब अंजलि ने परिणाम देखा तो कुछ पल तक स्क्रीन को देखती रह गई। उधर फोन उठते ही अभिमन्यु बोला मैडम मैं सफल हो गया। नहीं अभिमन्यु तुम सिर्फ सफल नहीं हुए हो। तुमने यह साबित कर दिया है कि गरीबी सपनों को रोक नहीं सकती। मुझे तुम पर गर्व है। अंजलि ने उसे शुभकामनाएं दी और कहा अब असली परीक्षा शुरू होगी। एक अच्छा अधिकारी बनना क्योंकि देश को तुम्हारी जरूरत है। अभिमन्यु ने मैडम मैं लौट कर सबसे पहले आपसे ही मिलूंगा। मेरे जीवन का सबसे बड़ा ऋण आपका है। अंजलि ने कुछ नहीं कहा। केवल मुस्कुरा दी कि प्रशिक्षण पूरा होने के बाद अभिमन्यु उनसे ऐसी बात कहने वाला है जो उनकी पूरी जिंदगी बदल देगी। मसूरी की पहाड़ियों में स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन एकेडमी में प्रशिक्षण शुरू होते ही अभिमन्यु ने एक बार फिर वही सिद्ध कर दिया जो उसने अपने पूरे जीवन में किया था। मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। जहां कई प्रशिक्षु खाली समय में घूमने निकल जाते वहीं अभिमन्यु पुस्तकालय में बैठकर सबसे बड़ी प्रेरणा किससे मिली? प्रशिक्षण के दौरान जब सभी प्रशिक्षुओं से पूछा गया कि उन्हें प्रशासनिक सेवा में तो अभिमन्यु ने बिना किसी झिझक के ला और एसडीएम अंजलि मता हर एसडीएम ने मैडम है। पूरे सभागार में तालियां गूंज उठी। कुछ महीनों बाद प्रशिक्षण पूरा हुआ और वह आधिकारिक रूप से भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी बन गया। उसकी कंधों पर जिम्मेदारी के सितारे भले ही चमक रहे थे लेकिन उसके भीतर वही गांव का साधारण और संस्कारी लड़का जिंदा था।
अभिन्यु रामस्वूप बार रही थी। रामसूप बार-बार यही कह रहे थे थे। बेटा आज तेरी मेहनत जीत गई। लेकिन अभिमन्यु के मन में एक और बात चल रही थी। उसने उसी दिन अंजलि को फोन किया और कहा मैडम अगर आप समय निकाल सके तो मैं आपको अपने गांव ले जाना चाहता हूं। मेरे माता-पिता आपसे मिलना चाहते हैं। मैं चाहता हूं कि वे उस इंसान को अपनी आंखों से देखें जिसने मेरे सपनों को उड़ान दी। अंजलि कुछ क्षण चुप रही। मैं जरूर चलूंगी। फिर मुस्कुरा कर बोली, 2 दिन बाद दोनों एक सरकारी वाहन से गांव देवपुर के लिए रवाना हुए। जैसे ही गांव के बाहर गाड़ी पहुंची, पूरे गांव में खबर फैल गई। अभिमन्यु आईएएस बनकर लौट आया है और उसके साथ जिले की एसडीएम मैडम भी आई हैं। देखते ही देखते सड़क के दोनों ओर बच्चों के हाथों में फूल थे। महिलाओं ने मंगल गीत गाने शुरू कर दिए और बुजुर्गों ने दोनों का तिलक करके स्वागत किया। रामस्वूप अपने बेटे को अफसर के व्यक्तित्व में देखकर खुद को रोक नहीं पाए। उन्होंने अभिमन्यु को गले लगा लिया। सरस्वती के आंसू लगातार बह रहे थे। अभिमन्यु तुरंत झुककर उनके पैर छूने लगा। फिर वो अंजलि की ओर मुड़ा और बोला मां बाबूजी यह वही मैडम है जिनकी वजह से आज मैं यहां तक पहुंच पाया हूं। अगर इन्होंने मेरा साथ ना दिया होता तो शायद मेरा सपना अधूरा रह जाता। यह सुनते ही रामस्वूप और सरस्वती दोनों ने अंजलि के सामने हाथ जोड़ दिए। अंजलि घबरा गई कर लिए। ऐसा मत कीजिए। मैंने सिर्फ अपना कर्तव्य निभाए की है। गांव वालों की अंजलि के लिए सम्मान और बढ़ गया। पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल था। शाम को पंचायत भवन में अभिमन्यु के सम्मान में कार्यक्रम रखा गया। जिस लड़के के लिए कभी मैंने कर्ज दिया था, आज वही पूरे गांव का गौरव बन गया है।
गलियों की मैदान में गूंज उठी। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद अभिमन्यु ने क्या आप मेरे साथ थोड़ी देर चलेंगी? अंजलि ने मुस्कुरा कर हामी भर दी। दोनों धीरे-धीरे गांव के बाहर उसी पुराने तालाब की ओर चल पड़े। जहां बचपन में अभिमन्यु अक्सर बैठकर अपने सपनों के बारे में सोचा करता था। शाम का सूरज डूब रहा था। तालाब का शांत पानी सुनहरी किरणों से चमक रहा था। कुछ देर तक दोनों बिना कुछ बोले किनारे पर बैठे रहे। फिर अभिम मैडम जब मैं पहली बार आपको पंचर की दुकान पर मिला था तब मुझे लगा था कि आप सिर्फ एक अधिकारी हैं। लेकिन समय के साथ मैंने जाना कि आप एक ऐसी इंसान हैं जो दूसरों के सपनों को अपना सपना बना लेती हैं। आपने कभी मुझे दया नहीं दी। हमेशा सम्मान दिया। आपने मुझे आत्मविश्वास दिया। आज मैं जो कुछ भी हूं उसमें मेरे माता-पिता हरी बाबा और आपका बराबर का योगदान। अंजली शांत होकर उसकी बातें सुनती रही। अभिमन्यु ने आगे कहा, आज मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं जो बहुत दिनों से मेरे दिल में है। अगर आपको मेरी बात गलत लगे तो मुझे माफ कर दीजिएगा। अंजलि ने उसकी ओर देखा और धीरे से कहा, कहो अभिमन्यु, अभिमन्यु ने कांपती आवाज में कहा, मैं आपसे प्रेम करता हूं। यह प्रेम आपके पद, आपकी सुंदरता या आपके अधिकार से नहीं है। यह उस इंसान से है जिसने बिना किसी स्वार्थ के एक गरीब लड़के का हाथ थामा। यह सुनकर अंजलि कुछ क्षण उनकी आंखें नम हो चुकी थी। उन्होंने आसमान की ओर देखा। मेरे जीवन में एक समय ऐसा भी आया था जब मुझे लगा था कि अब कभी खुशी वापस नहीं आएगी। लेकिन तुम्हारी ईमानदारी, संघर्ष और सादगी ने मुझे फिर से जिंदगी पर भरोसा करना सिखाया। उन्होंने अभिमन्यु अंजलि शिक्षा ट्रस्ट की स्थापना की। जिसका उद्देश्य था कि देश का कोई भी गरीब और प्रतिभाशाली बच्चा केवल पैसों की कमी अपने सपनों से समझौता ना करें। मैं भी तुम्हारा सम्मान करती हूं और तुम्हारे साथ अपना जीवन बिताना चाहती हूं।
इतना सुनते ही अभिमन्यु की आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े। उसने भगवान का धन्यवाद किया। कुछ महीनों बाद दोनों परिवारों की सहमति से पूरे गांव की मौजूदगी में के साथ उनका विवाह संपन्न हुआ। विवाह में कोई दिखावा नहीं था। कोई फिजूल खर्ची नहीं थी। गांव के हर गरीब परिवार को भोजन कराया गया और बच्चों को किताबें बांटी गई। विवाह के बाद दोनों ने मिलकर एक बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने अभिमन्यु अंजलि शिक्षा ट्रस्ट की स्थापना की जिसका उद्देश्य था कि देश का कोई भी गरीब और प्रतिभाशाली बच्चा केवल पैसों की कमी अपने सपनों से समझौता ना करें। ट्रस्ट के माध्यम से गरीब विद्यार्थियों को मुफ्त किताबें, छात्रवृत्ति, रहने की सुविधा, अनुभवी शिक्षकों का मार्गदर्शन। हरी बाबा को उस ट्रस्ट का संरक्षक बनाया गया और गांव के सरपंच को सलाहकार। कुछ ही वर्षों में उस ट्रस्ट से पढ़े सैकड़ों छात्र प्रशासनिक सेवाओं, पुलिस सेवा, न्यायिक सेवा और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचे। जब भी कोई छात्र सफलता हासिल करता, अभिमन्यु हमेशा एक ही बात कहता। कभी अपनी शुरुआत मत भूलना। कई साल बाद भी शहर के बाहर वही पुरानी पंचरकर की दुकान मौजूद थी। फर्क सिर्फ इतना था कि अब वहां एक बड़ा बोर्ड लगा था। जिस पर लिखा था यहीं से शुरू हुआ था एक आईएएस अधिकारी का सफर। कोई काम छोटा नहीं होता। छोटे होते हैं। उस दुकान पर आने वाला हर राहगीर यह कहानी जरूर सुनता कि किस तरह एक गरीब मजदूर का बेटा जिसने दिन में पंचरस जोड़े और रात में किताबें पढ़ी। अपनी मेहनत, माता-पिता के त्याग, एक बुजुर्ग के विश्वास और एक संवेदनशील एसडीएम के मार्गदर्शन से देश का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी बना था। है और फिर अपनी सफलता को केवल अपने तक सीमित ना रखकर हजारों गरीब बच्चों के सपनों की रोशनी बना दिया। यही कारण था कि देवपुर गांव के लोग आज भी अपने बच्चों से कहते हैं अगर इरादे सच्चे हो, मेहनत ईमानदार हो और रास्ते में कोई अंजलि जैसी इंसानियत मिल जाए तो मिट्टी के घर से निकलकर भी इतिहास लिखा जा सकता है।