**माँ और बेटी ने किया बड़ा कांड / पुलिस और स्थानीय लोग हैरान /**
माँ और बेटी ने किया बड़ा कांड / पुलिस और स्थानीय लोग हैरान /
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उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले का अंगोरा गाँव अपनी हरियाली और शांत माहौल के लिए जाना जाता था। इस गाँव में बनवारी लाल नाम का एक नामी और प्रतिष्ठित ज़मींदार रहता था। बनवारी के पास अपनी 12 एकड़ उपजाऊ ज़मीन थी, जिस पर वह खेती-किसानी करके अपना जीवन बिताता था। स्वभाव से बनवारी बेहद मेहनती, ईमानदार और दयालु प्रवृत्ति का इंसान था। गाँव के गरीब-गुरबे जब भी किसी मुसीबत में होते, बनवारी दिल खोलकर उनकी मदद करता था। यही वजह थी कि पूरे अंगोरा गाँव में बनवारी लाल का बड़ा नाम था और लोग उसकी दिल से इज़्ज़त करते थे।
लेकिन बनवारी के खुशहाल घर पर किस्मत की मार पड़ी थी। उसके इकलौते बेटे कदम सिंह की आठ साल पहले गाँव के पास बहती एक नहर में डूबने से अकाल मृत्यु हो गई थी। इस हादसे ने परिवार को झकझोर कर रख दिया था। कदम सिंह अपने पीछे अपनी जवान पत्नी सरला देवी और एक नन्हीं बेटी पूजा को छोड़ गया था।
पति की मौत के बाद सरला देवी बेहद कम उम्र में विधवा हो गई थी। सरला बेहद खूबसूरत और आकर्षक महिला थी। जब भी वह अपने घर के आँगन से निकलकर बाहर आती, तो गाँव के लोग उसकी सुंदरता को निहारे बिना नहीं रह पाते थे। लेकिन इस रूप-रंग के पीछे सरला के भीतर एक गहरा अकेलापन छिपा हुआ था।

दूसरी तरफ, सरला की बेटी पूजा अब 12वीं कक्षा में पहुँच चुकी थी। पढ़ाई-लिखाई में पूजा का मन बिल्कुल नहीं लगता था। वह अक्सर अपनी माँ से कहती, “माँ, मेरा पढ़ाई में ज़रा भी जी नहीं लगता। मुझे स्कूल नहीं जाना।” सरला अपनी बेटी को काफी समझाती, “बेटी पूजा, पढ़ाई के बिना जीवन में कुछ हासिल नहीं होता। थोड़ा मन लगाकर पढ़ा करो।” लेकिन पूजा अपनी माँ की बातों को एक कान से सुनती और दूसरे से निकाल देती। दोनों माँ-बेटी के जीवन में कोई बड़ी महत्वाकांक्षा नहीं थी, लेकिन आगे चलकर यही माँ-बेटी एक ऐसे भयानक मोड़ पर पहुँचने वाली थीं, जिसकी कल्पना गाँव के किसी व्यक्ति ने नहीं की थी।
दिन बीतते गए। सुबह के करीब 8:00 बजे का समय होता। पूजा अपने स्कूल के लिए निकल जाती और बूढ़ा बनवारी लाल अपने खेतों की देखभाल के लिए निकल पड़ता। घर में सरला अकेली रह जाती।
सन्नाटे से भरे उस बड़े घर में सरला का अकेलापन उसे अंदर ही अंदर खाने लगा था। वह अक्सर शीशे के सामने खड़ी होकर अपने रूप को देखती और सोचती, “मैं अभी इतनी जवान और खूबसूरत हूँ। मेरा पूरा जीवन यूँ ही सन्नाटे में कट जाएगा? काश कोई हैंडसम और नौजवान लड़का मेरी ज़िंदगी में होता, जिसके साथ मैं अपने कुछ हसीन पल गुज़ार पाती।”
सरला के पड़ोस में गोविंद नाम का एक 22-23 साल का नौजवान रहता था। गोविंद गाँव के पास ही स्थित एक गत्ता (कार्डबोर्ड) फैक्टरी में मज़दूरी का काम करता था। गोविंद देखने में लंबा, सुगठित और बेहद आकर्षक था। सरला अक्सर सुबह के समय गोविंद को फैक्टरी जाते देखती तो टकटकी लगाए निहारती रहती। गोविंद भी सरला की सुंदरता से अनजान नहीं था; जब भी दोनों की नज़रें मिलतीं, एक अजीब सी खामोश कशिश महसूस होती। लेकिन लोक-लाज के डर से सरला कभी हिम्मत नहीं जुटा पाई कि गोविंद को अपने घर बुला सके।
धीरे-धीरे समय बीतता रहा। एक दिन दोपहर के लगभग 12:00 बजे बनवारी लाल खेत से थका-हारा घर लौटा। पसीना पोंछते हुए उसने सरला से कहा, “बहू, अब मेरी उम्र हो चली है। मुझसे अकेले 12 एकड़ खेत का काम नहीं सँभलता। हमें खेत के काम-काज के लिए किसी मेहनती नौकर या मज़दूर की ज़रूरत पड़ेगी।”
सरला ने तुरंत कहा, “पिताजी, जब शरीर साथ नहीं दे रहा, तो आप खेती का झंझट छोड़ क्यों नहीं देते?”
बनवारी ने सिर हिलाते हुए जवाब दिया, “नहीं बहू, अगर मैं हाथ पर हाथ धरकर बैठ गया तो बीमार पड़ जाऊँगा और ज़मीन भी बंजर हो जाएगी। खेती मैं छोड़ नहीं सकता। हाँ, कोई वफादार नौकर मिल जाए तो राहत हो जाएगी।”
बनवारी उसी समय गाँव में नौकर की तलाश में निकल पड़ा। उसने पूरे गाँव में ढूँढा, कई लोगों से बात की, लेकिन शाम तक उसे कोई उपयुक्त नौकर नहीं मिला। निराश होकर बनवारी घर लौटा और सरला से बोला, “बहू, लगता है मुझे खेती बंद ही करनी पड़ेगी। गाँव में कोई नौकर मिलने को तैयार नहीं है।”
सरला के दिमाग में तुरंत पड़ोस के गोविंद का ख्याल आया। उसने झट से कहा, “पिताजी, हमारे पड़ोस का गोविंद गत्ता फैक्टरी में काम करता है। उसे खेती-किसानी का भी अच्छा अनुभव है। क्यों न आप उससे बात कर लें?”
बनवारी का चेहरा खिल उठा, “यह तो तुमने बहुत अच्छी बात बताई बहू! मैं अभी जाकर उससे बात करता हूँ।”
बनवारी तुरंत गोविंद के घर पहुँचा। गोविंद घर पर ही था। बनवारी ने सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, “गोविंद बेटा, मुझे अपने खेतों के लिए एक भरोसेमंद आदमी की ज़रूरत है। तुम फैक्टरी का काम छोड़कर मेरे खेत सँभाल लो। मैं तुम्हें हर महीने ₹10,000 दूँगा।”
गोविंद के लिए यह एक सुनहरा मौका था। उसने मुस्कुराकर कहा, “ज़मींदार साहब, मैं आपके खेत में काम करने को तैयार हूँ। लेकिन मुझे ₹10,000 की जगह ₹11,000 दे दीजिएगा।”
बनवारी ने दरियादिली दिखाते हुए कहा, “अरे ₹11,000 क्या, मैं तुम्हें पूरे ₹12,000 महीना दूँगा! बस तुम कल से काम सँभाल लो। आधे घंटे बाद मेरे घर आ जाना, मैं तुम्हें काम की बारीकियाँ समझा दूँगा।”
बनवारी घर लौटा और सरला से कहा कि उसने गोविंद को काम पर रख लिया है और वह आधे घंटे में घर आ रहा है। यह सुनते ही सरला के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। बनवारी खेतों की तरफ किसी काम से निकल गया।
आधे घंटे बाद दरवाज़े पर दस्तक हुई। सरला ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, सामने 6 फीट लंबा, गठीले बदन का नौजवान गोविंद खड़ा था। गोविंद की नज़र जैसे ही सरला पर पड़ी, वह उसकी सुधबुध खो बैठा। सरला के चेहरे की चमक और आकर्षण ने गोविंद को बाँध लिया। वहीं सरला भी गोविंद के रोबीले व्यक्तित्व को देखकर मन ही मन सोच रही थी कि यही वह इंसान है जो उसके खालीपन को भर सकता है।
सरला ने मुस्कुराते हुए कहा, “गोविंद, अंदर आ जाओ।”
गोविंद ने झिझकते हुए कहा, “मालकिन, ज़मींदार साहब ने बुलाया था…”
सरला ने नज़ाकत से कहा, “अरे, यह नौकरी मैंने ही तुम्हें दिलवाई है। तुम बेफिक्र होकर अंदर आओ।”
दोनों बैठक में बैठकर बातें करने लगे। कुछ ही देर में बनवारी लाल भी आ गया। उसने गोविंद को खेतों के काम समझाए और अगले दिन से काम पर आने को कहा। गोविंद खुशी-खुशी अपने घर चला गया।
अगले ही दिन से गोविंद ने बनवारी के खेतों में काम करना शुरू कर दिया। गोविंद बेहद मेहनती था। कुछ ही हफ्तों में उसने अपनी ईमानदारी और लगन से बूढ़े बनवारी का दिल जीत लिया। बनवारी उस पर आँख मूँदकर भरोसा करने लगा।
समय का पहिया घूमता रहा। 4 जुलाई 2026 का दिन आया। सुबह के 8:30 बजे बनवारी ने गोविंद को फोन किया और दोनों खेत चले गए। दोपहर के 2:00 बजे के करीब गोविंद ने बनवारी से कहा, “ज़मींदार साहब, मेरी माँ की तबियत काफी खराब है। मुझे उन्हें शहर से दवाइियाँ दिलवानी हैं। मुझे ₹5,000 की सख्त ज़रूरत है, एडवांस दे दीजिए।”
बनवारी ने कहा, “गोविंद, इस समय खेत पर मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं। लेकिन तुम परेशान मत हो। सारा लेन-देन मेरी बहू सरला सँभालती है। तुम गाँव में हमारे घर चले जाओ और सरला से ₹5,000 ले लो।”
गोविंद अपनी साइकिल उठाकर सीधे ज़मींदार के घर पहुँचा और दरवाज़ा खटखटाया। सरला ने दरवाज़ा खोला तो सामने गोविंद को पाया। गोविंद ने घर के अंदर आते हुए कहा, “मालकिन, माँ की दवाई के लिए ज़मींदार साहब ने ₹5,000 माँगे हैं।”
सरला ने मुस्कुराकर कहा, “तुम बैठो, मैं अभी लाती हूँ।”
सरला ने मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। वह कमरे में गई, अलमारी खोली और ₹5,000 की जगह पूरे ₹10,000 निकालकर लाई। उसने गोविंद के हाथ में पैसे थमा दिए।
गोविंद ने पैसे गिनते हुए कहा, “मालकिन, आपने ₹5,000 ज़्यादा दे दिए?”
सरला ने गोविंद का हाथ अपने हाथों में लेते हुए धीमी आवाज़ में कहा, “गोविंद, तुम तो जानते ही हो कि मेरे पति के जाने के बाद मैं कितनी अकेली हूँ। यह सन्नाटा मुझे काटता है। अगर तुम मेरी इस तन्हाई को दूर कर दो, तो पैसे की कोई कमी नहीं होगी।”
गोविंद भी अंदर से इसी मौके की तलाश में था। उसने मुस्कुराकर सरला का हाथ थाम लिया। सरला उसे खींचकर अपने बेडरूम में ले गई। कमरे का दरवाज़ा बंद हुआ और उस दिन के बाद से सरला और गोविंद के बीच अनैतिक संबंध बन गए। सरला जब भी मौका पाती, गोविंद को पैसे देती और अपनी हवस बुझाती। गोविंद भी पैसों और शारीरिक सुख के लालच में इस रिश्ते में अंधा होता चला गया।
लेकिन कहानी में मोड़ अभी आना बाकी था। सरला की बेटी पूजा, जो अब 18 वर्ष की हो चुकी थी, वह भी गोविंद के आकर्षक व्यक्तित्व से अछूती नहीं थी।
10 जुलाई 2026 की सुबह लगभग 9:00 बजे, सरला ने अपनी बेटी पूजा से कहा, “पूजा, आज तुम स्कूल मत जाओ। घर की सफाई कर लेना। मेरे सारे कपड़े पुराने हो गए हैं, मैं आज नए कपड़े खरीदने शहर जा रही हूँ।”
पूजा पढ़ाई से भागती ही थी, वह खुशी-खुशी मान गई। आधे घंटे बाद सरला शहर के लिए निकल गई। बूढ़ा बनवारी खेतों में गोविंद के साथ काम कर रहा था।
दोपहर के समय खेत में काम बहुत ज़्यादा था। बनवारी ने गोविंद से कहा, “गोविंद, दोपहर का 1 बज गया है और काम अभी बहुत बाकी है। तुम साइकिल लेकर गाँव जाओ और घर से खाना ले आओ।”
गोविंद तुरंत साइकिल चलाकर ज़मींदार के घर पहुँचा। उसने दरवाज़ा खटखटाया। इस बार दरवाज़ा सरला ने नहीं, बल्कि उसकी बेटी पूजा ने खोला।
गोविंद ने पूजा को देखते ही कहा, “पूजा, ज़मींदार साहब ने खेत पर खाना मँगवाया है।”
पूजा ने लजाते हुए कहा, “गोविंद, खाना तो अभी बन रहा है। तुम अंदर आकर बैठो, मैं अभी तैयार कर देती हूँ।”
गोविंद घर के अंदर आ गया। उसने इधर-उधर देखते हुए पूछा, “तुम्हारी माँ कहाँ हैं?”
पूजा ने मासूमियत से कहा, “माँ तो कपड़े खरीदने शहर गई हैं। घर पर मैं बिल्कुल अकेली हूँ।”
‘अकेली’ शब्द सुनते ही गोविंद के मन की नीयत डोल गई। उसने पूजा के करीब जाकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, “पूजा, तुम बहुत खूबसूरत हो। मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूँ।”
पूजा भी गोविंद की तरफ आकर्षित थी। उसने कोई विरोध नहीं किया। गोविंद ने मुख्य दरवाज़ा बंद किया और पूजा को बेडरूम में ले गया। उस दिन सरला की गैरमौजूदगी में गोविंद ने उसकी बेटी पूजा के साथ भी वही संबंध बना लिए। काम खत्म होने के बाद पूजा ने अलमारी से कुछ पैसे निकालकर गोविंद को दिए और कहा, “यह बात किसी को पता नहीं चलनी चाहिए।”
गोविंद मन ही मन अपनी किस्मत पर इतरा रहा था—माँ और बेटी दोनों उसके जाल में फँस चुकी थीं और उसे काम के साथ-साथ मुफ़्त के पैसे और जिस्मानी सुख मिल रहा था।
समय बीतता गया। गोविंद अब एक ही घर की दो महिलाओं—सरला और उसकी बेटी पूजा—दोनों के साथ अलग-अलग समय पर रंगरलियाँ मना रहा था। न सरला को पूजा के बारे में पता था, और न ही पूजा को अपनी माँ के करतूतों की भनक थी।
5 अगस्त 2026 को बनवारी किसी काम से शहर गया था। मौका मिलते ही सरला ने गोविंद को फोन करके खेत में गन्ने के झुरमुट में बुलाया और दोनों ने वहाँ अपने अनैतिक संबंध बनाए। सरला ने उसे फिर पैसे दिए।
लेकिन पाप का घड़ा एक न एक दिन ज़रूर भरता है। वह काली तारीख थी 2 सितंबर 2026।
शाम के करीब 4:00 बजे सरला ने अपनी बेटी पूजा से कहा, “पूजा, मैं पड़ोस वाली चाची के घर जा रही हूँ, 2 घंटे में आऊँगी।”
सरला के जाते ही पूजा ने मौका ताड़ा। उस समय दादा बनवारी खेत में अकेले थे। पूजा ने तुरंत गोविंद को फोन मिलाया, “गोविंद, माँ घर पर नहीं है। तुम तुरंत घर आ जाओ, कोई नहीं है।”
गोविंद ने खेत में बनवारी से बहाना बनाया, “ज़मींदार साहब, माँ की दवाई खत्म हो गई है, मुझे 2 घंटे की छुट्टी चाहिए।” बनवारी ने तरस खाकर उसे जाने दिया।
गोविंद दौड़ता हुआ ज़मींदार के घर पहुँचा। पूजा ने उसे अंदर लिया और मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। दोनों बेडरूम में जाकर अपने अनैतिक काम में लिप्त हो गए।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। सरला पड़ोस में गई तो थी, लेकिन किसी वजह से वह महज़ आधा घंटे में ही घर लौट आई। सरला ने जब मुख्य दरवाज़ा खोला तो वह अंदर से बंद मिला। सरला ने दरवाज़ा खटखटाया, “पूजा! दरवाज़ा खोल।”
अंदर बेडरूम में पूजा और गोविंद के हाथ-पाँव फूल गए। पूजा घबराकर बोली, “यह तो माँ की आवाज़ है! अब क्या होगा?”
गोविंद ने हताशा में कहा, “मैं बेड के नीचे छुप जाता हूँ। जब वो दूसरे कमरे में जाएँगी, मैं भाग जाऊँगा।” गोविंद बदहवासी में बेड के नीचे घुस गया।
पूजा ने खुद को सँभाला और जाकर मुख्य दरवाज़ा खोला। सरला का माथा ठनका, “इतनी देर क्यों लगाई दरवाज़ा खोलने में? चेहरा क्यों उड़ा हुआ है?”
सरला को शक हो गया। उसने घर के एक-एक कमरे की तलाशी लेनी शुरू कर दी। जब वह पूजा के बेडरूम में पहुँची, तो उसकी नज़र बेड के नीचे छिपे गोविंद पर पड़ी। सरला के पैरों तले ज़मीन खिसक गई!
सरला ने गोविंद को कॉलर से पकड़कर बाहर खींचा और चीखने लगी, “हरामज़ादे! तेरी यह हिम्मत? मेरी बेटी पर नीयत खराब करता है!”
पूजा से अब सहा नहीं गया। वह चीखकर अपनी माँ पर बरसी, “माँ, तुम अपना नाटक बंद करो! मुझे सब पता है। तुम खुद इस नौकर के साथ रातें रंगीन करती हो! मुझे ज्ञान मत बाँटो!”
सरला और पूजा के बीच ज़ोर-ज़ोर से गाली-गलौज और झगड़ा शुरू हो गया। माँ अपनी बेटी को कोस रही थी और बेटी अपनी माँ की काली करतूतें उछाल रही थी। इस पूरे हंगामे और आपाधापी के बीच मौका पाकर गोविंद चुपके से दरवाज़ा खोलकर वहाँ से दुम दबाकर भाग निकला।
माँ-बेटी का यह भयानक झगड़ा चल ही रहा था कि लगभग आधे घंटे बाद बनवारी लाल खेत से घर लौटा। घर के अंदर से आ रही चीखें सुनकर वह हैरान रह गया।
बनवारी ने अंदर आकर देखा कि बहू और पोती एक-दूसरे के बाल खींच रही हैं और गंदी-गंदी गालियाँ दे रही हैं। बनवारी ने कड़कदार आवाज़ में कहा, “बंद करो यह सब! क्या तमाशा बना रखा है? तुम दोनों इस तरह क्यों लड़ रही हो?”
गुस्से में अंधी हो चुकी पूजा ने अपने दादा से कहा, “दादाजी! आपकी यह संस्कारी बहू सरला, आपके इस नौकर गोविंद के साथ महीनों से रंगरलियाँ मना रही है! उसे पैसे दे-देकर घर में बुलाती है!”
सरला ने भी आपा खो दिया और चिल्लाई, “और यह आपकी पोती? यह भी उसी नौकर के साथ कमरे में बंद थी! मैंने इसे रंगे हाथों पकड़ा है!”
बनवारी के कानों में जैसे पिघला हुआ सीसा ढाल दिया गया हो। जिस बहू और पोती के लिए वह दिन-रात पसीना बहाता था, गाँव में जिनकी इज़्ज़त के लिए वह जीता था, उन्होंने एक मामूली नौकर के साथ मिलकर उसके घर की गरिमा को तार-तार कर दिया था। बनवारी का खून खौल उठा। उसके सिर पर खून सवार हो गया।
“तुम दोनों ने मेरी कुल की मर्यादा मिट्टी में मिला दी! गाँव में मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा मुझे!” बनवारी चीखा।
क्रोध में अंधा होकर बनवारी दौड़कर आँगन में गया और वहाँ रखी धारदार गंडासी (चारा काटने वाला हथियार) उठा लाया।
सरला कुछ समझ पाती, उससे पहले ही बनवारी ने पूरी ताकत से गंडासी का वार सरला की गर्दन पर कर दिया। एक ही वार में सरला का सिर धड़ से अलग हो गया और खून का फव्वारा छूट पड़ा।
यह देखकर पूजा चीखती हुई बाहर की तरफ भागी। लेकिन सिर पर सवार मौत से वह बच नहीं सकी। बनवारी ने उसे दरवाज़े के पास दबोच लिया और गंडासी से उस पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए। पूजा के शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो गए। पूरा कमरा खून से लथपथ हो चुका था।
दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने के बाद, बनवारी लाल हाथ में खून से सनी गंडासी लिए उन्मादी हालत में घर से बाहर निकला। उसके कपड़ों पर खून के छींटे थे। पड़ोसी जब उसे इस रूप में देखा, तो गाँव में हड़कंप मच गया।
बनवारी चिल्लाता हुआ गोविंद के घर की तरफ भागा, “कहाँ है वो गोविंद? आज मैं उसका भी सिर कलम करूँगा!” लेकिन गोविंद गाँव छोड़कर पहले ही फरार हो चुका था।
गाँव वालों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। कुछ ही देर में पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुई अंगोरा गाँव पहुँच गईं। घर के अंदर का नज़ारा देखकर पुलिस अधिकारियों के भी रोंगटे खड़े हो गए। सरला और पूजा की क्षत-विक्षत लाशें खून के पोखर में पड़ी थीं।
पुलिस ने दोनों शवों को सील कर अपने कब्ज़े में लिया। घटना के एक घंटे के भीतर ही पुलिस ने गाँव के बाहर से बनवारी लाल को गिरफ्तार कर लिया।
जब थाने में पुलिस ने बनवारी से पूछताछ की, “तुमने अपनी ही बहू और पोती को इतनी बेरहमी से क्यों मार डाला?”
तब बनवारी ने रोते और कड़कते हुए माँ-बेटी और नौकर गोविंद के त्रिकोण और अनैतिक संबंधों की पूरी कहानी उगल दी। यह सनसनीखेज़ कहानी सुनकर पुलिस अफसर भी सन्न रह गए।
पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए गोविंद की तलाश में छापेमारी शुरू की। हत्या के तीन दिन बाद पुलिस ने भगोड़े नौकर गोविंद को भी पड़ोसी ज़िले से गिरफ्तार कर लिया।
बरेली के अंगोरा गाँव की यह घटना आज भी लोगों के दिलों में खौफ पैदा कर देती है। जहाँ एक तरफ हवस और लालच ने पूरे परिवार को तबाह कर दिया, वहीं दूसरी तरफ गुस्से के एक पल के जुनून ने एक सम्मानित ज़मींदार को खूनी सलाखों के पीछे पहुँचा दिया। कानूनी प्रक्रिया जारी है और अदालत जल्द ही बनवारी और गोविंद के गुनाहों का फैसला सुनाएगी।
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