पत्नी ने अपने पति को फोन करके घर आने के लिए कहा, लेकिन पति घर नहीं आया। – News

पत्नी ने अपने पति को फोन करके घर आने के लिए कहा, लेकिन पति घर नहीं आया।

पत्नी ने अपने पति को फोन करके घर आने के लिए कहा, लेकिन पति घर नहीं आया।

राजस्थान के एक शांत और छोटे से गांव में पली-बढ़ी सुनीता की जिंदगी हमेशा से सादगी और संघर्षों से भरी रही थी। उसके माता-पिता के पास अपनी कोई जमीन नहीं थी। वे दूसरों के खेतों में दिन-रात कड़ा परिश्रम करके जो थोड़ा-बहुत कमाते थे, उसी से पूरे घर का गुज़ारा चलता था। लेकिन इसके बावजूद, सुनीता का बचपन अभावों के बीच भी खुशियों से भरा हुआ था। उसे छोटी-छोटी चीजों में खुश रहने की आदत थी।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, सुनीता बड़ी होती गई। उसने मेहनत से पढ़ाई की और 12वीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की। इसके बाद उसके माता-पिता ने हिम्मत जोड़कर उसका दाखिला शहर के एक कॉलेज में करा दिया। कॉलेज की दुनिया सुनीता के लिए एकदम नई और रंगीन थी। वहीं उसकी मुलाकात संजय नाम के एक लड़के से हुई। संजय बेहद हैंडसम, स्मार्ट और एक अमीर घराने से ताल्लुक रखता था।

संजय को सुनीता की सादगी और मासूमियत बहुत भा गई। धीरे-धीरे दोनों के बीच बातें शुरू हुईं, जो जल्द ही एक गहरी दोस्ती में बदल गईं। संजय हर मोड़ पर सुनीता का ध्यान रखता, उसे छोटे-छोटे उपहार देता और हमेशा खुश रखने की कोशिश करता। समय बीतने के साथ यह दोस्ती एक अटूट प्यार में बदल गई। लगभग डेढ़ साल बाद, संजय ने सुनीता को एक मोबाइल फोन उपहार में दिया ताकि वे आपस में बात कर सकें।

सुनीता अपने माता-पिता से छिपाकर दिन में संजय से बातें किया करती थी। लेकिन एक माँ की नज़र से कुछ भी छिपा रहना मुमकिन नहीं होता। धीरे-धीरे उसकी माँ को सुनीता के बदले व्यवहार पर शक होने लगा। जब माता-पिता ने सुनीता से सख्ती से पूछा, तो उसने रोते हुए सारी सच्चाई बता दी। उसने बताया कि वह संजय से प्यार करती है और दोनों शादी करना चाहते हैं। शुरुआत में उसके माता-पिता डर गए; उन्हें लगा कि अमीर घर का लड़का उनकी गरीब बेटी को धोखा दे देगा। लेकिन सुनीता को संजय पर पूरा भरोसा था।

बेटी का फैसला और उसकी जिद देखकर माता-पिता ने एक रास्ता निकाला। उन्होंने कहा, “अगर वह लड़का सच में तुमसे प्यार करता है, तो उसे और उसके परिवार को हमारे घर बुलाओ। हम खुद उनसे बात करेंगे।” सुनीता ने तुरंत संजय को फोन करके सारी बात बताई। संजय ने बिना किसी झिझक के अपने माता-पिता को मनाया और वे सुनीता के छोटे से घर पहुंचे। संजय के परिवार ने सुनीता को देखते ही पसंद कर लिया और वहीं दोनों की सगाई पक्की हो गई।

कुछ समय बाद सुनीता और संजय का विवाह बड़ी धूमधाम से संपन्न हुआ। सुनीता एक गरीब घर की देहरी लांघकर अपने ससुराल पहुंची, जो किसी महल से कम नहीं था। उसके ससुराल में केवल तीन लोग थे—उसके सास, ससुर और संजय। शादी के बाद संजय ने अपनी पढ़ाई पूरी की और काम-धंधे में लग गया। शुरुआत में सब कुछ बहुत खुशहाल बीत रहा था। सुनीता अपने सास-ससुर की सेवा करती और संजय के साथ सुखद जीवन बिता रही थी।

लेकिन वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी सुनीता की कोई संतान नहीं हुई। इस बात को लेकर उसकी सास अक्सर उसे ताने दिया करती थी। सुनीता चुपचाप सब सह लेती। इसी बीच, संजय अपनी काबिलियत के बल पर एक बड़ी कंपनी में ऊंचे पद पर पहुंच गया। काम के सिलसिले में उसे दूसरे शहर जाना पड़ा। अब उसका घर आना बहुत कम हो गया था—अक्सर छह-आठ महीने में वह एक बार घर लौट पाता। पति के दूर चले जाने और बच्चे न होने के अकेलेपन ने सुनीता को भीतर से तोड़ दिया था।

दुखों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। पिछले साल सुनीता की सास अचानक बहुत बीमार पड़ गईं। संजय ने घर आकर अपनी माँ का बड़े से बड़े अस्पताल में इलाज करवाया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। सास का देहांत हो गया। इस हादसे के बाद घर में केवल सुनीता और उसके ससुर ही रह गए। संजय कुछ दिन रुकने के बाद वापस अपनी नौकरी पर लौट गया।

अब उस बड़े से घर में सुनीता अपने ससुर के साथ अकेली रहती थी। उसके ससुर स्वभाव से शांत थे, लेकिन उन्हें कभी-कभार त्योहारों या खास मौकों पर शराब पीने की आदत थी। सुनीता उनका सम्मान करती थी और उसने कभी उनके बारे में कुछ गलत नहीं सोचा था।

समय बीतता गया और होली का त्योहार करीब आ गया। सुनीता ने संजय को कई बार फोन करके होली पर घर आने का आग्रह किया, लेकिन कंपनी में काम का भारी दबाव होने के कारण संजय ने आने से साफ मना कर दिया। सुनीता का दिल टूट गया। त्योहार के दिन चारों तरफ खुशियां थीं, लेकिन सुनीता अपने खाली और सुनसान घर में अकेली बैठी रही।

होली वाले दिन, सुबह लगभग 7 बजे ही सुनीता के ससुर अपने दोस्तों के साथ होली खेलने बाहर निकल गए। घर पर अकेली सुनीता ने नहा-धोकर पूजा की, खाना बनाया और नए कपड़े पहनकर अपने कमरे में जाकर बैठ गई। उधर, ससुर जी अपने दोस्तों के साथ रंग खेलते-खेलते बहुत अधिक शराब पी गए। नशे में धुत होकर वे पूरी तरह अपनी सुध-बुध खो बैठे।

दोपहर के करीब 12 बजे ससुर जी लड़खड़ाते कदमों से घर लौटे और ज़ोर-ज़ोर से मुख्य दरवाज़ा खटखटाने लगे। जब सुनीता ने दरवाज़ा खोला, तो उसने देखा कि उसके ससुर सिर से पांव तक रंगों में सने हुए थे और उनसे शराब की तीव्र बदबू आ रही थी। सुनीता चुपचाप दरवाज़ा खोलकर अपने कमरे की तरफ मुड़ने लगी।

लेकिन नशे में धुत ससुर की नज़र जब अपनी बहू पर पड़ी, तो उसने देखा कि सुनीता के कपड़ों या चेहरे पर कहीं कोई रंग नहीं लगा है। शराब के तीव्र नशे में उसका विवेक और मर्यादा का भान पूरी तरह समाप्त हो चुका था। वह भूल गया कि सामने खड़ी स्त्री उसकी बहू है। उसने अपने हाथों में गुलाल उठाया और सुनीता की तरफ बढ़ा।

सुनीता ने घबराकर पीछे हटने की कोशिश की और कहा, “पिता जी, यह क्या कर रहे हैं? आप बहुत नशे में हैं, अपने कमरे में जाकर आराम कीजिए।” लेकिन ससुर ने उसकी एक न सुनी और ज़बरदस्ती उस पर रंग लगाने लगा। सुनीता खुद को बचाते हुए भागकर अपने कमरे में चली गई और दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की।

लेकिन ससुर जी भी उसके पीछे-पीछे कमरे में घुस आए। नशे के अंधियारे में उन्होंने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं। उन्होंने सुनीता को ज़बरदस्ती पकड़ लिया। सुनीता चिल्लाती रही, उन्हें रोकती रही और अपनी मर्यादा का वास्ता देती रही, लेकिन भारी शरीर और नशे के जुनून के आगे सुनीता की कमज़ोर ताकत हार गई। सुनीता ने खुद को छुड़ाने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन वह पूरी तरह थक चुकी थी।

नशे में धुत ससुर ने अपनी ही बहू के साथ वह सब कुछ किया जो एक ससुर और बहू के रिश्ते को शर्मसार कर देता है। सुनीता असहाय पड़ी रही और उस भयानक मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना को सहने पर मजबूर हो गई। लगातार दो घंटे तक चले इस भयानक ड्रामे और प्रताड़ना के बाद, सुनीता की हालत बेहद गंभीर हो गई और वह बिस्तर पर ही बेसुध होकर बेहोश हो गई।

जब शाम को सुनीता को होश आया, तो उसके शरीर पर लगे रंग और बिखरा हुआ सामान उस दर्दनाक हादसे की गवाही दे रहे थे। वह फूट-फूटकर रो पड़ी। एक ही झटके में उसके विश्वास, सम्मान और मर्यादा का संसार उजड़ चुका था। यह दर्दनाक घटना इस बात की सीख देती है कि नशा इंसान से उसका विवेक और रिश्ते-नातों की समझ पूरी तरह छीन लेता है।

होश में आने के बाद, सुनीता का शरीर दर्द से टूट रहा था और उसका मन आत्मग्लानि और आक्रोश से भरा हुआ था। बिस्तर पर फैले रंग और अपने बिखरे कपड़ों को देखकर उसका दिल दहल गया। जिस घर को उसने अपना माना था, वहीं उसकी अस्मिता की धज्जियाँ उड़ चुकी थीं।

उधर, ससुर का नशा जब धीरे-धीरे उतरा और उसे अपनी घिनौनी करतूत का अहसास हुआ, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह डर और शर्म के मारे अपने कमरे में मुँह छिपाकर बैठ गया। उसने सुनीता के पास आकर रोते हुए माफी माँगने और इस बात को दबाने की कोशिश की। उसने कहा, “सुनीता, मुझे माफ कर दो, नशे में मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। अगर यह बात बाहर निकली तो समाज में हमारी थू-थू होगी और संजय भी जीते-जी मर जाएगा।”

लेकिन सुनीता अब वह असहाय औरत नहीं रही थी जो चुपचाप सब सह लेती। उसने अपने आँसू पोंछे, अपनी हिम्मत समेटी और ससुर को साफ शब्दों में धिक्कारते हुए कहा, “पाप आपने किया है, और इसकी सजा भी आपको ही मिलेगी। समाज और लोक-लाज के डर से मैं अपने सम्मान का सौदा कभी नहीं करूँगी।”

सुनीता ने बिना एक पल गँवाए तुरंत पुलिस को फोन किया और पूरी आपबीती सुनाई। कुछ ही देर में पुलिस की गाड़ी उनके घर के बाहर आकर रुकी। होली के दिन हुई इस सनसनीखेज घटना से पूरे गाँव में हड़कंप मच गया। जो लोग कल तक इस परिवार की इज़्ज़त की मिसाल देते थे, वे सब ससुर की इस घिनौनी हरकत पर थू-थू करने लगे। पुलिस ने मौके से सबूत जुटाए और ससुर को गिरफ्तार कर लिया।

जब संजय को इस खौफनाक घटना की खबर मिली, तो वह बदहवास हालत में तुरंत घर लौटा। अपनी पत्नी की यह हालत देखकर और अपने ही पिता के इस घिनौने अपराध को सुनकर उसका दिल पूरी तरह टूट गया। उसने अपनी पत्नी का साथ देने का फैसला किया और अपनी माँ समान पत्नी के न्याय की लड़ाई में उसके साथ खड़ा हुआ।

अदालत में मुकदमा चला। सुनीता ने तमाम सामाजिक दबावों और तानों के बावजूद पीछे हटने से इंकार कर दिया। कानून ने ठोस सबूतों और सुनीता के कड़े बयानों के आधार पर उसके ससुर को कड़ी से कड़ी सजा सुनाई।

इस घटना ने सुनीता की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। उसने उस घर और गाँव को छोड़ दिया और अपने पति संजय के साथ शहर जाकर एक नई शुरुआत की। उसने खुद को संभाला और आगे चलकर महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा के लिए काम करने वाली एक संस्था से जुड़ गई, ताकि किसी और औरत को अपनी इज़्ज़त और आत्मसम्मान के लिए इस तरह न तड़पना पड़े।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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